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vad 37 05-03-2017
 
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उत्तराखण्ड की पहाड़ी पहचान नहीं बनी

 

मंगलेश डबराल का संबंध उत्तराखण्ड से जरूर है मगर वे समस्त हिन्दी जगत के शीर्षस्थ कवि हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल के चार कविता संग्रह और दो गद्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे पत्रकारिता से भी जुड़े हैं। जनसत्ता रविवारीय के दो दशक से अधिक समय तक संपादक रहे। फिलहाल दि पब्लिक एजेंडा पाक्षिक का संपादन कर रहे हैं। पेश है उनसे उत्तराखण्ड के साहित्यिक सांस्कृतिक और राजनीतिक हालात पर अंकित फ्रांसिस की बातचीत

 

राज्य गठन के बाद पहाड़ के आम आदमी के सपने जिस कदर धराशायी हुए उससे साहित्य संस्कृति पत्रकारिता और धार्मिक-सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय बौद्धिक वर्ग भी बेहद आहत है। वर्षों पहले पहाड़ पर लालटेन देखने को लालायित कवि घर वापसी को आतुर है। लेकिन आज उनकी चिंता यह है कि पहाड़ की मूल पहचान कहीं खोती जा रही है। वहां की संस्कृति तेजी से नष्ट हो रही है। वहां के जनजीवन में एक खालीपन है। कगार की आग जैसी लोकप्रिय कृति के शिल्पी दुखी हैं कि सरकार ने साहित्य और संस्कृति से जुड़े रचनाधर्मियों के लिए सृजन का कोई माहौल नहीं बनाया। वे आज भी अपनी प्रतिभा को तराशने और पहचान के लिए मैदानों का रुख कर रहे हैं। पहाड़ के जाने-माने लोकगायक संस्कृति के संरक्षण तो सर्वोच्च धर्म गुरु धर्म की रक्षा में सरकारी उदासीनता से खिन्न हैं। पत्रकारों की चिंता अपने परंपरागत तेवर और सम्मान को बनाए रखने की है। सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रहीं महिला कार्यकर्ताओं को शिकायत है कि मां-बहनों की कल्पनाओं का उत्तराखण्ड बनाने के बजाए सरकार आज फिर से समाज में शराब जैसी बुराई को ला रही है

 

राज्य गठन के बारह सालों बाद आप उत्तराखण्ड को किस तरह देखते हैं?

मेरा मानना है कि जब तक हम उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र की तरह माने जाते थे तो हमारी एक अलग पहचान थी और वह थी पर्वतीय क्षेत्र की पहचान। उत्तराखण्ड के एक अलग राज्य बन जाने से पहली दुर्द्घघटना यह हुई कि वह अब पर्वतीय राज्य नहीं रह गया है। दूसरी दुर्द्घघटना के अंतर्गत जो नया परिसीमन हुआ उससे पहाड़ी क्षेत्र की जो भूमिका थी या कहें कि उसकी जो अस्मिता थी वह पूरी तरह नष्ट हो गई है। अब निर्णयों में पहाड़ियों की भूमिका कितनी है इसे आप हाल ही में संपन्न टिहरी उपचुनाव से समझ सकते हैं। कांग्रेस का उम्मीदवार जो हालांकि काफी विवादास्पद था टिहरी और उत्तरकाशी के इलाकों में तो जीत गया लेकिन देहरादून से हार गया। इसका कारण है कि देहरादून में इतने गैरपर्वतीय लोग आ गए हैं कि उसकी डेमोग्राफी माने जनसंख्या का भूगोल ही बदल गया है। इसी जनसंख्या के असंतुलन की वजह से आज वह पर्वतीय राज्य नहीं रहा। आप पहाड़ के गांवों में जाकर देखिए कि गांव के गांव खाली हैं। मकानों पर ताले लटके हुए हैं। लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। चूंकि वहां उनके लिए कुछ है ही नहीं। हमारी सरकार की उपेक्षा के चलते खेती चौपट हो गई है। संस्कूति पर बात करें तो उत्तराखण्ड की संस्कूति तेजी से विलुप्त हो रही है। हमारे लोकगीत नष्ट होते जा रहे हैं लेकिन इस ओर किसी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। आपके सामने एक पूरी ऐसी पीढ़ी है जो पहाड़ से पलायन कर मैदान में आ चुकी है। जिसका पहाड़ से संबंध अब खत्म होता जा रहा है। मैदान में आकर पहाड़ी भी मैदानी होते जा रहे हैं। 

 

क्या आप भी पहाड़ी बनाम मैदानी वाली लड़ाई की ओर इशारा कर रहे हैं?

नही मैं यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं कोई पहाड़वादी नहीं हूं। पहाड़वाद से मुझे भी घ्रणा है लेकिन मुझे मेरी पहाड़ी पहचान से बेहद प्रेम है। पहाड़ी पहचान और पहाड़वाद दोनों को अलग करके समझना बहुत जरूरी है। पहाड़ियों में मैदानियों के प्रति किसी तरह के पूर्वाग्रह का होना भी बहुत गलत है। पहाड़ में मैदानियों का हमेशा स्वागत होना चाहिए। पिछले दिनों से उत्तराखण्ड में भी जो बाहरी लोगों को भगाइये वाली प्रवृत्ति उभरकर आई है इसकी मैं द्घोर निंदा करता हूं। भरत झुनझुनवाला के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ पिछले दिनों वो भी निंदनीय है। लेकिन सरकार को चाहिए था कि परिसीमन इस तरह हो कि हर क्षेत्र के लोगों का नेतृत्व बना रहे। 

 

पलायन उत्तराखण्ड गठन के बाद भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। उधर सरकार पलायन को विकास की प्रक्रिया का तर्क बता खारिज कर देती है? कहां गलती हो रही है?

देखिए दिक्कत ये है कि विकास का जो मॉडल अप्लाई किया जा रहा है उसमें पहाड़ और मैदान को एक मान लिया गया है। जिस मॉडल से देहरादून में विकास का सपना देखा जा रहा है उसी सपने को पहाड़ के सुदूर गांवों पर भी लाद दिया जा रहा है। हमने स्थानीय मॉडल विकसित ही नहीं किए हैं। आप टिहरी में इतना बड़ा बांध बनाते हैं जो कि पूरे क्षेत्र को ही निगलने का सबब बन सकता है। क्यों आप छोटे बांध बनाने पर राजी नहीं हैं? बहुत सी ऐसी गाड़ हैं जिन पर सफलता से छोटे बांध बना सकते हैं। लेकिन चूंकि ये परियोजनाएं विशाल नहीं होंगी तो आप और बनाने वाली कंपनियों को मुनाफाखोरी का मौका नहीं मिल पायेगा। इसी के चलते न तो पॉलीटिकल पार्टी और न ही कंस्ट्रक्शन कंपनियों की इसमें रुचि है। इन्हीं सब नीतियों के चलते उत्तराखण्ड के कई प्राकूतिक संसाधन बेकार जा रहे हैं। सरकार खामोश है क्योंकि अगर वह बोलती है तो कई बड़ी निजी कंपनियों के इनसे हित प्रभावित होते हैं। आप मुट्ठी भर लोगों को दिन पर दिन अमीर बना कर आम आदमियों का विकास नहीं कर सकते। सवाल यह है कि क्या पलायन कर चुके आदमी तक विकास पहुंच रहा है? मैं आपको बता दूं कि पलायन कर चुके आदमी का विकास नहीं हो रहा है उल्टे उनकी छोड़ी जगहों पर बाहर के लोग जमीनें खरीद रहे हैं। आप पिछले कुछ सालों के आंकड़े देंखे तो पता चलेगा कि पहाड़ के पहाड़ खरीदे- बेचे जा रहे हैं। और सिर्फ पहाड़ का ही ये हाल नहीं है यहां से बाहर झांकिए तो पता चलता है कि देश में मुट्ठी भर लोगों तक ही विकास सिमटता जा रहा है। इसी के चलते उत्तराखण्ड आज एक पहाड़ी राज्य नहीं है। जबकि आप देखिए बराबर में ही हिमाचल है और पंजाब से अलग होने के बाद उसने अपनी पहाड़ी राज्य की पहचान को बनाए रखा है। हिमाचल आज इसी वजह से समृद्धि की ओर बढ़ रहा है क्योंकि उसने सबसे पहले अपने मूल नागरिकों की ओर ध्यान दिया। उत्तराखण्ड की असफलता का प्रमुख कारण अब तक यह रहा है कि जिन लोगों ने मतलब कि उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी और उत्तराखण्ड क्रांति दल ने राज्य आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई वे राज्य गठन के बाद गठन में कोई भूमिका नहीं निभा सके। आज उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी तो हाशिए पर है और उक्रांद का हाल किसी से छिपा नहीं है। तमाम उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवी या आंदोलनकारी जिनकी वजह से आंदोलन मुमकिन हुआ उन्हें आज कोई पूछता नहीं। इन्ही में से एक ग्रुप ने उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी बनाई है। लेकिन सब इतने अलग-थलग हैं कि बदलाव संभव नहीं हो पा रहा है। दरअसल जो सारी बुराइयां उस समाज में व्याप्त थीं वे इन दलों में भी आ गई और इनकी ये गत हुई। इसका सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि पिछले बारह सालों में जो भी सरकारें आईं भाजपा या कांग्रेस की उन्होंने अपनी मर्जी से बिना किसी डर के काम किया। आप देखिए कि पिछले बारह सालों में धार्मिक पर्यटन के अलावा किसी भी और चीज को बढ़ावा नहीं दिया गया है। उत्तराखण्ड में सिर्फ सरकार के चमचे अफसरों की पौ-बारह रही है और आज भी है। अफसरशाही को बनाए रखने के लिए ही आज भी राजधानी देहरादून में बनी हुई है।

 

हाल-फिलहाल में खुद को पहाड़ से किस तरह जोड़ कर रख पाते हैं?

इस तरह जोड़ कर रख पाता हूं कि सोचता रहता हूं अक्सर पहाड़ के बारे में। मैं खुद को इस तरह देखता हूं कि जैसे पहाड़ से एक पत्थर फिसलता है और जहां तक बहाव होता है वह वहां तक पहुंच जाता है। मैं भी पहाड़ से फिसल कर इस तरह आ गया मैदान में। मैं भी वही पत्थर हूं जो कि निकला है पहाड़ से और आज भी पहाड़ का ही है। जहां से मैं निकला हूं जरूर आज भी वहां पहाड़ में एक खाली जगह होगी। 

 

कभी वह खाली जगह दोबारा भरने का इरादा है?

देखिए मेरे जीवन में काफी संघर्ष रहा खासकर आजीविका के लिए। मेरी शिक्षा भी अधूरी ही छूट गई थी। तब तक मैं मार्क्सवाद के भी संपर्क में आ गया था। मार्क्सवाद का अध्ययन करने से एक ये गलतफहमी भी हो जाती है कि भई अब क्या पढ़ेंगे अब तो हमें सब कुछ आता है हम इस दुनिया में क्या और क्यों होता है सब जान चुके हैं तो क्या फायदा पढ़ने का। इसी के चलते पढ़ाई भी छूट गई। इसी कारण आजीविका के लिए पत्रकारिता भी करनी पड़ी। बहरहाल उम्मीद करता हूं कि मैं वापस लौटूंगा। 

 

आपने मार्क्सवाद का जिक्र किया तो पिछले दस सालों में खासकर कुछ अमेरिकी चिंतक इस दौर को एंड ऑफ आइडियोलॉजी का दौर कहकर प्रचारित कर रहे हैं। इसे किस तरह देखते हैं?

ये जो विचारधाराओं के फ्रेम टूटने की बात है तो हां बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण ऐसा हुआ है और पिछले कई वर्षों से कुछ अमेरिकी चिंतक ये एंड ऑफ आइडियोलॉजी वाली बात रट रहे हैं। दरअसल वे लोग सिर्फ आइडियोलॉजी ही नहीं इसे एंड ऑफ हिस्ट्री और एंड ऑफ सिविलाइजेशन भी कह रहे हैं। उनका कहना है कि आने वाले समय में सिर्फ एक ही सभ्यता बची रहेगी। खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद से यह बात और जोर-शोर से कही जाने लगी कि अमेरिका ही सब कुछ है और वही बचा रहेगा। लेकिन अमेरिकी विचारधारा क्या है यह सब जानते हैं कि वह बाजार है। दरअसल आर्थिक नवउदारवाद ही इन सब चीजों को अपने अनुसार नियंत्रित कर रहा है। यही बाजार को चला रहा है सत्ता परिवर्तन कर रहा है सरकारें चला रहा हैबगावत कर रहा है। यही यह प्रचारित कर रहा है कि विचारधाराएं समाप्त हो गई हैं। जब तक सोवियत संघ था चाहे जैसा भी था बचा-खुचा टूटा-फूटा तब तक यह बात कहने का साहस उसमें नहीं था। अमेरिका अकेली शक्ति नहीं था। जिस दिन सोवियत संघ का पतन हुआ उसी दिन हेनरी किसिंगर का एक लेख छपा। उस लेख में था कि जिस चर्च का निर्माण अमेरिका कर रहा था वह अब पूरा हो चुका है और अब पूरी दुनिया को इसमें आकर सिर झुकाना चाहिए। सिर्फ एक ध्रुवीय हो जाने के कारण ही वह एक विचारधारा इतनी हावी है। लेकिन आप देखिए कि विचारधारा का अंत तो नहीं हुआ। इसका उदाहरण लैटिन अमेरिका है। लैटिन के बारह देश इस समय वामपंथी हैं। यूरोप के लिथुवानिया और लातविया में अभी-अभी कम्युनिस्टों की जीत हुई है। यूरोप में बड़े पैमाने पर सोशल डेमोक्रेट्स चुन कर आए हैं। दूसरी तरफ यूरोप में पूंजीवाद जिस अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है वह इतना भीषण है कि लोग उससे छुटकारा पाने के लिए भी वामपंथ की ओर आ रहे हैं। आक्युपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन की राजनीति हालांकि बहुत डिफाइन नहीं है लेकिन अपने लक्षणों में वो भी एक वामपंथी आंदोलन ही है। अगर वे लोग कह रहे हैं कि ये एंड ऑफ आइडियोलॉजी है तो हमें नारा देना चाहिए बैक टू आइडियोलॉजी। और मै तो कहना चाहूंगा कि स्थिति जैसी है वैसे में तो वी मस्ट गो टू आइडियोलॉजी से ही हमें ताकत मिलेगी और इसी से हम अपना स्वप्न फिर से पा सकते हैं। आप ये समझिए कि ये सच है कि समाजवादी सत्ताएं भी भ्रष्ट हो गई थीं। माना कि सोवियत संघ भी भ्रष्ट हो गया होगा लेकिन सत्ताओं के भ्रष्ट हो जाने से आइडियोलॉजी भ्रष्ट नहीं हो जाती। आज भी मार्क्सवाद ने मनुष्यों के जितने सवालों का जवाब दिया है उतने जवाब कोई आइडियोलॉजी नहीं दे पायी है। तमाम उत्तराधुनिकता फेल हो गई है। उत्तराधुनिकतावाद का भी वही हिस्सा बचा रह गया जो वामपंथ के ज्यादा करीब था।

 
         
 
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