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vad 15 30-09-2017
 
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आंदोलन

 

उत्तराखण्ड में पिछले १२ सालों के दौरान निरंतर जन आंदोलन होते रहे हैं। लेकिन लोगों के संगठित होकर लड़ाई न लड़ने के कारण सरकार उनकी सुन नहीं रही है। सरकार का पूरा ध्यान देहरादून पर है। ऐसे में राजधानी निर्माण के लिए उठने वाली आवाज का जोर पकड़ना स्वाभाविक है। हालांकि लंबे समय तक इसे दबाया भी नहीं जा सकेगा। लेकिन फिलहाल राज्य में किसी बड़े आंदोलन की संभावना नहीं दिखाई दे रही है

 

उत्तराखण्ड में आंदोलनों की बाढ़ जैसा माहौल है। ऐसा कोई विषय नहीं है जिस पर इन १२ सालों में आंदोलन नहीं हुआ हो। इस पहाड़ी राज्य की राजधानी (गैरसैंण) इसकी नदियों के पानी से जल-विद्युत उत्पादन करने शराब बंदी सडकों की दुर्दशा बिजली कटौती पीने का पानी अध्यापकों डॉक्टरों दवाइयों का अभाव आपदा निवारण फसलों की क्षति जंगली जानवरों का उत्पात बेकारी पलायन सरकारी धन का अनुचित उपयोग जल जंगल जमीन का अधिग्रहणमुख्यमंत्री एनडी तिवारी के समय के तथाकथित ५६ घोटाले आरक्षण इत्यादि पर लगातार आंदोलन होते रहे हैं। यहां के जीवन से संबंधित कोई विषय नहीं था जिस पर लोगों ने आंदोलन न किया हो।

 

हालांकि आज भी आंदोलन समाप्त नहीं हुए हैं और समय- समय पर उभरकर आ रहे हैं। लेकिन यह सब अलग-अलग स्थानों और भिन्न समयों पर हुए और मिलकर एक नहीं बन पाए। दरअसल पहाड़ की जनसंख्या इतनी कम है कि इन आंदोलनों पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया और सबकी अनदेखी कर दी गई। लेकिन इनमें कुछ आंदोलन ऐसे हैं जिनकी लंबे समय तक अनदेखी करना संभव नहीं होगा जैसे स्थाई राजधानी की स्थापना। सरकार के अनुसार अभी अस्थाई राजधानी देहरादून से संचालित हो रही है। यह असंभव होगा कि वह सदैव अस्थाई राजधानी से ही काम चलाती रहे। कभी तो उसे स्थाई राजधानी बनानी ही होगी। इसलिए राजधानी आंदोलन रुकने वाला नहीं है। वह अभी उग्र नहीं हुआ है। लेकिन कभी वह अवश्य इतना भीषण रूप अवश्य ले लेगा कि उसकी अवहेलना न की जा सकेगी। नवंबर २०१२ में हुई वाली उत्तराखण्ड मंत्रिमंडल की गैरसैंण में पहली बैठक इन्हीं आंदोलनों का ही नतीजा है। इसमें भाग लेने मंत्री और उच्च अधिकारी सब हवाई जहाज से गौचर और फिर वहां से गैरसैंण हैलिकॉप्टर से आए। इस एक दिवसीय बैठक का खर्च पांच करोड रुपए के लगभग आया। हवाई यात्रा से मंत्रियों और अधिकारियों को सड़कों और उन पर स्थित गावों तथा लोगों की दशा देखने व उनकी समस्याओं को समझने का अवसर नहीं मिल पाया। लेकिन गौचर की हवाई पट्टी जो लगभग २० साल से अधिक समय तक बेकार पड़ी थी उसकी दशा कुछ दिनों के लिए जरूर सुधर गई।

 

यह सही है कि अभी राज्य के नेता और बडे़ अधिकारी देहरादून में ही रहना चाहते हैं क्योंकि वह सभी सुविधाओं वाला विकसित नगर है। इतनी सारी सुविधाएं पहाड़ में और कहीं नहीं हैं। लेकिन सुविधाएं तो जुटाई जा सकती हैं। उन पर जो व्यय होगा उसके लिए केंद्र के पास राजधानी विकास की कुछ धनराशि अभी बाकी बची है।

 

यदि राजधानी पहाड़ में होती तो वहां पंहुचने के लिए सड़कें अच्छी दशा में होतीं। इस वर्ष के वर्षाकाल में राज्य की अधिकतर सड़कें भूस्खलन से क्षतिगस्त हो गई थीं जिसके कारण चार-धाम की यात्रा कई दिनों के लिए अवरुद्ध् हो गई थी। राज्य भर में बहुत सारा यातायात बंद हो गया था। केवल देहरादून के आस-पास की सड़कें सुचारू रहीं। सिर्फ वही हवाई तथा रेल मार्गों से भी राज्य के बाहरी क्षेत्रों से भी जुड़ा रहा। लेकिन भीतर की सडकों के टूटने से लोगों का पहाड़ आना संभव नहीं हो पाया। उत्तरकाशी और ऊखीमठ की आपदाओं जिनमें बहुत से लोग मारे गए और घरों-खेतों संपत्तियों का बड़ा नुकसान हुआ की स्थिति देखने मुख्यमंत्री बहुगुणा को वहां हेलीकॉप्टर से यात्रा करनी पड़ी और आस-पास की सड़कों के टूटने से वे सभी आपदाग्रस्त क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाए।

 

राज्य के बहुत से स्थान देहरादून से बहुत दूर पड़ते हैं जिसके कारण लोगों का राजधानी जाना संभव नहीं हो पाता। देहरादून बहुत महंगा शहर हो गया है। वहां काम के लिए जाना पहाड़ के अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं हो पाता। देहरादून दिल्ली तथा अन्य मैदानी नगरों से सदैव जुड़ा रहता है और अधिकतर उन्हीं के संपर्क में रहता है पहाड़ के नहीं। पहाड़ी लोगों के लिए राजधानी एक बड़ी कठिनाई बन गई है। वे देहरादून को अपना नहीं समझते हैं। वहां पहाड़ के लोगों का वर्चस्व भी नहीं है। 

 

जल जंगल जमीन की समस्याएं और कठिन और पेचीदा हो रही हैं। खेती और विस्थापितों के लिए भूमि कम होने से लोगों को दूसरी जगहों पर बसाने में कठिनाइयां हो रही हैं। टिहरी बांध के कुछ विस्थापित अभी भी अन्य जगहों पर बसाए नहीं गए हैं। ग्रामीण जो जल-विद्युत योजनाओं के कारण अपने घर और खेत खो बैठे हैं उनका विस्थापन नहीं हो पा रहा है क्योंकि भूमि उपलब्ध नहीं है। योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहित की जा रही है लेकिन विस्थापितों के लिए जगह नहीं मिल पा रही है। पीने के पानी का संकट हो गया है। नदियों का पानी जल-विद्युत बनाने के लिए ले जाने पर उनके निचले पाट सूखे गए हैं। उनका पानी सुरंगों में डालने से ऊपर के गावों की सतह का पीने का पानी रिस कर नीचे चला गया है और सोते सोते जा रहे हैं। कई गावों में बिजली बनाने वाली कंपनियां टैंकरों से गावों को पीने का पानी पहुंचा रही है। नदियों के पाट सूखने से वातावरण में नमी कम हो गई है जिसके कारण जंगल खेती चरागाह प्रभावित हो रहे हैं। यदि नमी की कमी ऐसी ही बनी रही तो कुछ वर्षों में पहाड़ मरुस्थल बन जाएंगे।

 

स्कूलों में अध्यापक नहीं अस्पतालों में डॉक्टर दवाइयां नहीं। इन सब कमियों के कारण लगातार आंदोलन हो रहे हैं। लेकिन सब छुटपुट। कहीं भी उन्होंने मिलकर अभी एक विशाल उग्र और अराजक रूप नहीं लिया है। आशा की जा रही है कि इससे पहले यह अंदोलन ऐसा रूप लें इनका समाधान हो जाना चाहिए।

 

आजकल जब कभी कुछ लोग आंदोलनों को चलाए रखने की बात करते हैं तो अन्य कहते हैं कि देश में देखो तो सही क्या हो रहा। है? घोटाले और भ्रष्टाचार देश में फैल रहे हैं उनके सामने उत्तराखण्ड की समस्याएं महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन बड़ी बातों पर पहले आंदोलन होने दो तब उत्तराखण्ड राज्य की समस्याओं तथा आंदोलनों पर बातें की जायेंगी और उसकी कठिनाइयों का निवारण करने के लिए लड़ा जाएगा। लोग राष्ट्र की समस्याओं पर अधिक ध्यान दे रहे हैं और पहाड़ की दशा पर कम यह सोच पहाड़ के आंदोलनों को बढ़ावा नहीं दे पा रहे हैं। 

 

दूसरा कारण है लोगों का आने वाले चुनावों की प्रतीक्षा करना। अभी पहाड़ के लोग दोनों मुख्य दलों कांगे्रस और भाजपा के प्रति उदासीन हैं क्योंकि दोनों दलों की सरकारों ने वहां के लोगों की समस्याओं की अवहेलना की है। यह उन दोनों दलों के १२ सालों से राज करने से स्पष्ट हो गया है। तीसरा बड़ा दल राज्य में है नहीं जिसे लोग वोट द्वारा सत्ता में पहुंचा सकें। ऐसी स्थिति में यह हो सकता है कि जनता किसी भी दल को सरकार बनाने का बहुमत न दे। फिलहाल वहां एक बड़ा आंदोलन उभरने की कोई आशा नहीं दिखाई दे रही है। 

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्षों तक चीन में टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता रहे। सरकार और नगा आंदोलन के बीच मआँयस्थ भी रहे। 

 
         
 
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  • संजय चौहान

उच्च शिक्षा हासिल कर जब वे शहरों के बनाए निर्जन बुग्यालों में भविष्य तलाशने निकले तो हर किसी ने उन्हें पागल ठहराया। लेकिन वे पहाड़ की तरह अपने

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