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खास खबर 
 
बहिष्कार की वजह

  • गुंजन कुमार

चुनाव आयोग के जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद राज्य में हजारों लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। राज्य की अब तक की चुनी हुई सरकारों और शासन-प्रशासन के लिए गंभीर विषय है कि जनता ने बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर मतदान में भाग न लेने का फैसला किया। आजादी के सात दशक और राज्य गठन के सोलह साल बाद भी लोग बिजली] पानी] सड़क] स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए चुनाव बहिष्कार को मजबूर हुए

 

चुनाव आयोग मतदाताओं से अपील करता है कि वे मतदान जरूर करें। कार्यक्रमों और स्लोगन के जरिए जनता को मतदान के लिए जागरुक किया जाता है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के लिए भी आयोग ने कई स्लोगन बनाए। मसलन] 'पहले मतदान] फिर जलपान'] 'लोकतंत्र करता आह्वान] अवश्य करो मतदान'] 'पप्पू नहीं कहलाऊंगा] मतदान अवश्य करूंगा' आदि स्लोगन मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए जारी किए गए। यही नहीं आयोग की ओर से मतदान केंद्रों पर कई तरह की सुविधाएं भी दी गईं। आदर्श मतदान केंद्रों को सजाया और संवारा भी गया। इन सब कवायदों के बावजूद कई जगहों से चुनाव बहिष्कार की खबरें छाई रहीं। सड़क] बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित लोगों को मजबूर होकर मतदान के बहिष्कार का फैसला लेना पड़ा। अब सवाल यह है कि जब लोकतंत्र में हर वोट कीमती है] तो फिर चुनाव बहिष्कार को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा\ मतदान खत्म होते ही एक खबर हर तरफ द्घूमने लगती है कि इस बार रिकॉर्ड वोटिंग हुई। पिछली बार से ज्यादा मतदान हुआ है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इस बार भी रिकॉर्ड मतदान हुआ। उत्तराखण्ड में भी मतदान का प्रतिशत अच्छा रहा। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव से कम। इस स्थिति ने राजनीतिक पंडितों और नेताओं को सोचने को विवश किया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ\ लेकिन असल बात पर जाने की जरूरत है कि सुविधाओं के अभाव में जी रहे लोग मतदान के प्रति उदासीन हो रहे हैं।

रिकॉर्ड वोटिंग होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है। लेकिन इस वोटिंग प्रतिशत के बीच उन गिने-चुने लोगों की आवाज दब जाती है जिन्होंने चुनाव का बहिष्कार किया है। हालांकि] यह संख्या इतनी छोटी भी नहीं है कि इसे बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाए। फिर भी इन्हें नजरअंदाज किया जाता है। उत्तराखण्ड के चौथे विधानसभा चुनाव में कई गांवों ने मतदान में भाग नहीं लिया। कारण कि इन लोगों की समस्याएं वर्षों से बरकरार हैं। चुनाव के समय और बाद में भी इन्हें सरकार और प्रशासन से आश्वासन मिलता है। मगर स्थिति कभी नहीं बदलती। इस कारण नाराज मतदाता मतदान बहिष्कार जैसे फैसले को मजबूर हुए। मुख्य सहायक निर्वाचन अधिकारी मत्सु दास के मुताबिक इस बार विधानसभा चुनाव में सात गांवों ने चुनाव का बहिष्कार किया। हालांकि अलग-अलग जिलों से आई खबरें इस आंकड़े से कहीं ज्यादा हैं। अकेले सीमांत उत्तरकाशी जिले के पुरोला विधानसभा क्षेत्र में चार गांवों ने चुनाव बहिष्कार किया। कुमाऊं के अल्मोड़ा जिले में दो गांवों ने मतदान का बहिष्कार किया। ऐसे में आयोग के आंकड़ों पर सवाल उठना लाजमी है। वैसे भी इस बार उत्तराखण्ड चुनाव आयोग के आंकड़े गलत ही साबित हुए हैं। मतदान के अगले दिन आयोग ने ७० फीसदी मतदान होने की बात कही जो एक सप्ताह बाद अंतिम आंकड़े पेश करने के समय तीन फीसदी \kV गया।

उत्तरकाशी के जिन चार गांवों ने चुनाव का बहिष्कार किया] वे ओसला] गंगाड] पवाणी और ढाटमीर हैं। हरकी दून ट्रैकिंग रूट पर स्थित इन गांवों में आज तक सड़क नहीं पहुंच पाई है। ओसला और गंगाड़ के लोग १२ किमी से ज्यादा के पहाड़ी रास्ते पर पैदल चलकर सड़क मार्ग पर आते हैं। सड़क मार्ग पर भी उन्हें किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिलती है। इलाज के लिए गांव के लोगों को ७० किमी दूर पुरोला आना पड़ता है। चारों गांवों के लोगों की मुख्य मांग सड़क बनाने की है। ग्रामीण हर बार सरकार से इसकी मांग करते रहे हैं। लेकिन आजादी के ७ दशक और अलग राज्य बनने के १७ साल बाद भी उनकी मांग पूरी नहीं हो पाई है। ढाटमीर गांव निवासी एवं मोरी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजपाल रावत कहते हैं] 'लंबे समय से हमारी मांग सड़क बनाने की रही है। सड़क नहीं होने के कारण विकास तो दूर गांव के लोगों की स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। छोटी सी बीमारी के इलाज के लिए भी पुरोला जाना पड़ता है। कई बार तो मरीजों को पैदल अस्पताल ले जाते समय वे बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। अभी तक एक दर्जन के करीब लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

ओसला गांव के प्रधान मेंबर सिंह कहते हैं कि लोगों ने एक साथ बैठकर चुनाव बहिष्कार का फैसला लिया। हालांकि यह सही है कि मतदान करना चाहिए था मगर हम लोगों की आज तक किसी ने नहीं सुनी। चुनाव के दौरान भी किसी पार्टी के उम्मीदवार गांव में नहीं आए हैं। उम्मीदवारों के प्रतिनिधि ही हमारी मांगें पूरी करने का वादा कर जाते हैं। विधायक और सांसद कभी हमारे गांव नहीं आ पाए हैं। जिले के इन चार गांवों में करीब १६०० मतदाता हैं। 

अल्मोड़ा जिले के अंतर्गत भैंसियाछाना के बबूरियानायल गांव और सोमेश्वर के भेटा वडसिला गांव के लोगों ने भी चुनाव बहिष्कार किया। बाबूरियानायाल गांव में २९० मतदाता हैं। मतदान न होने के कारण पोलिंग में लगे कर्मचारी धूप सेंकते दिखे। वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में भी इस गांव के लोगों ने सड़क के लिए चुनाव का बहिष्कार किया था। इस बार भी उन्होंने सड़क की मांग को लेकर ही चुनाव बहिष्कार किया। सोमेश्वर विधानसभा क्षेत्र में आने वाले भेटा गांव के लोग भी लंबे समय से सड़क की मांग कर रहे हैं। जनता के मतदान का बहिष्कार करने की खबर मिलते ही प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। आनन- फानन में जिला निर्वाचन अधिकारी सचिन बंसल ने दोनों ही स्थानों पर अधिकारियों की टीम गांव में गई और लोगों को मनाने की पूरी कोशिश की। यहां कुल ३९८ मतदाता हैं। 

कुमाऊं के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में नौ गांवों ने चुनाव बहिष्कार की ?kks"k.kk की थी। ये नौ गांव हैं] जाखणी उप्रेती] धामा] डोगरी] पांधों] क्वीरी-जिमिया] परकरिया] विरयान] खर्क और न्वाली। इन गांवों के बहिष्कार की ?kks"k.kk के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। जिला निर्वाचन अधिकारी इन गांवों के मतदाताओं को मनाने के लिए गांव की ओर दौड़ पड़े। कई गांवों में जहां अधिकारी कभी नहीं पहुंचे] वहां बहिष्कार की ?kks"k.kk के बाद पहुंचे। अधिकारियों के मनाने पर नौ में से आठ गांवों के लोग इस आश्वासन के साथ मतदान को राजी हुए कि चुनाव बाद उनकी मांग को पूरा किया जाएगा। अधिकारियों ने मतदाताओं को आश्वासन तो दे दिया है] मगर नई सरकार बनने के बाद जनप्रतिनिधि एवं सरकार इनकी मांग को पूरा करते हैं या नहीं] यह सरकार पर ही निर्भर करता है। नौवां गांव धामा गंगोलीहाट विधानसभा क्षेत्र के अंर्तगत आता है। इस गांव के लोगों ने प्रशासन की बातों को नहीं माना और चुनाव बहिष्कार को जारी रखा। धामा गांव में करीब सौ मतदाता हैं। इन सभी गांवों की मांग सड़क] पानी और स्वास्थ्य को लेकर है। 

रुद्रप्रयाग जिले के करीब ५०० मतदाताओं वाले गाडगु गांव के लोगों ने भी चुनाव से पूर्व बहिष्कार की ?kks"k.kk की थीे। प्रशासन इन्हें मनाने की कोशिश में गांव गया। गांव वालों की मांग सड़क की है। उन्हें गांव तक पहुंचने के लिए चार किमी पैदल चलना पड़ता है। प्रशासन के लाख प्रयास के बाद करीब ५०० में से ४७ लोगों ने ही वोट डाले। जिस कारण इस गांव को चुनाव बहिष्कार की सूची में नहीं रखा गया। यहां पिछले विधानसभा चुनाव में 

गौंडर गांव के लोगों ने भी बहिष्कार किया था। इस गांव के लोग बिजली] सड़क की मांग कर रहे थे। इस गांव के लोगों की मांग अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। चमोली जिले के बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र में भी एक हजार मतदाता वाले एक गांव ने बहिष्कार की ?kks"k.kk की थी। मगर प्रशासन ने लोगों को मना लिया। इसी जिले के तोशी गांव के लोगों ने भी चुनाव बहिष्कार किया। गांव के लोग सड़क बनाने की मांग कर रहे हैं।

मतदान का बहिष्कार करने वाले गांव बेशक आधा दर्जन या एक दर्जन हों] लेकिन मतदाताओं की संख्या हजारों में है। यह बेहद त्रासद है कि जब उत्तराखण्ड में 'उत्तराखण्ड रहे खुशहाल] रावत पूरे पांच साल'] 'बाकी सब सपने हैं] हरीश रावत अपने हैं' जैसे नारों से मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव में अपनी छवि चमका रहे थे और विपक्षी भाजपा राज्य में अपनी सरकार आने पर काया कल्प कर देने का वादा कर रही थीं तो ठीक उसी समय राज्य के हजारों लोग वोट का बहिष्कार कर रहे थे। मतदान एक दिन था। इस दिन वोटर अपनी ताकत दिखा सकता था। इन गांवों  के लोगों ने अपनी तकलीफों को लेकर बहिष्कार किया और ताकत दिखाने की भी कोशश की। लेकिन शायद ही कोई उम्मीदवार कभी इन लोगों की तकलीफ सुनने गया हो। हां] जिला प्रशासन की तरफ से चुनाव बहिष्कार करने वालों को नसीहत जरूर मिलती है कि अगर अपनी ताकत दिखानी है तो वोट देकर दिखाइए।

चुनाव के नतीजे आने के बाद चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने लेकिन एक बात तय है कि चुनाव का बहिष्कार करने वालों को कोई याद नहीं रखेगा। शायद ही कोई उनसे इस लोकतांत्रिक पर्व में असहमति का कारण पूछेगा। लेकिन क्या इसे राजनीतिक रूप से इतनी सहजता के साथ लिया जाना चाहिए\ संवैधानिक रूप से इस देश में अब नोटा का अधिकार जनता के पास मौजूद है। लेकिन चुनाव बहिष्कार का कदम निश्चित रूप से कोई तभी उठाता है जब उसे लगता है कि शायद इसके जरिए उसकी बात सुनी जाएगी। लेकिन नेताओं की प्रतिक्रिया देखकर तो ये कतई नहीं लगता कि अभी तक कोई भी बड़ा नेता इसे गंभीरता से ले रहा है।

२०१४ के लोकसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल १ +१ प्रतिशत यानी ६० लाख वोटरों ने किया। पूरे देश में साठ लाख लोग ऐसे भी थे जिन्हें कोई भी राजनीतिक पार्टी या उम्मीदवार पसंद नहीं थे। लेकिन कमाल की बात यह है कि नोटा का इस्तेमाल करने वाले लोगों का डेटा तो आ जाता है लेकिन चुनाव बहिष्कार का कोई डेटा नहीं आता। चुनाव बहिष्कार करने वाले लोग अनाम ही रह जाएंगे न ही उनका कोई आंकड़ा कभी सामने आएगा।

राज्य या केंद्र में बैठे लोगों को कम से कम इस बात की व्यवस्था तो जरूर करवानी चाहिए कि जो लोग चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं] उनकी सुध ली जाए। इसका कारण भी है। दरअसल चुनाव बहिष्कार में ज्यादातर स्थानीय समस्याओं के लिए स्लोगन दिखाई दिए। मतलब लोगों का गुस्सा स्थानीय प्रशासन पर है न कि केंद्र या राज्य सरकार के खिलाफ। यानी ये चुनाव बहिष्कार माओवादियों द्वारा नहीं किया गया है जो लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया में भरोसा ही नहीं करते। इस चुनाव में जो लोग बहिष्कार कर रहे हैं] वो चुनाव प्रक्रिया और सरकार में भरोसा करते हैं। 

gunjan@thesundaypost.in

 
         
 
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