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सरगोशियां
 
यूं हुए संपादक गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव शांत स्वभाव और विनम्र आचरण के लिए जाने जाते हैं। इसलिए जब कभी वे क्रोधित होते हैं तो चिल्लाने&बरसने के बजाए खामोशी ओढ़ लेते हैं। पिछले दिनों जब दैनिक जागरण समाचार पत्र ने अपने ई&एडीशन में चुनाव आयोग के निर्देशों को धता बताते हुए तीन चरणों के एक्जिट पोल जारी किए तो अखिलेश सुनते हैं बेहद खफा हो गए। उन्होंने अधिकारियों संग मीटिंग में राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक ¼कानून व्यवस्था½ से प्रश्न किया कि उन्होंने इस मामले में क्या कार्यवाही की\ अधिकारी ने जब कहा कि एफआईआर दर्ज कर ली गई है तो अखिलेश ने पूछा गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। बैठक में मौजूदा अफसर चकरा गए। जब उन्होंने सीएम से पूछा कि सर किसे गिरफ्तार करें तो अखिलेश नाराज हो बैठक से उठ गए। बेचारे अफसर बहुत देर तक सीएम का इंतजार कर अपने दफ्तारों को लौट गए। इसके ठीक बाद अखबार के संपादक की गिरफ्तारी की गई।

डायरियों का नंगा सच

हमारा देश अद्भुत है। यहां न्याय का पैमाना एक नहीं। यदि ऐसा होता तो सहारा डायरी मामले में पीएम पर जांच का आदेश उच्चतम न्यायालय दे देता। ऐसा क्यों नहीं हुआ] को लेकर नाना प्रकार की अफवाहें सुनने को मिल रही हैं। सहारा डायरी से पहले सीबीआई के पूर्व निदेशक रणजीत सिन्हा के ?kj से बरामद एक विजिटर डायरी सामने आई थी। इस डायरी में उन दागियों की सिन्हा से मुलाकात का विवरण दर्ज बताया जाता है जिनकी जांच सीबीआई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस डायरी को तरजीह देते हुए सिन्हा के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन पीएम के नाम वाली सहारा डायरी को जांच लायक नहीं माना गया। इसके बाद अरुणाचल के पूर्व सीएम कलिखो पुल के सुसाइड नोट का मामला सामने आया। ६० पेज के इस विस्तृत नोट में सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश] कई अन्य न्यायधीशों के साथ&साथ कांग्रेसी नेता एवं अब देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नाम शामिल है। इस नोट में करोड़ों की द्घूस लेने के आरोप पुल ने लगाए हैं। लेकिन मोदी सरकार जांच कराने को तैयार नहीं। कारण स्पष्ट है यदि सरकार जांच कराती है तो शीर्ष अदालत की नाराजगी का भय है। भय यह भी है कि शीर्ष अदालत सहारा डायरी मामले को पुनः खोल सकती है।

लाट साहब का सद्भाव

दिल्ली के नए उपराज्यपाल अनिल बैजल की कार्यशैली नजीब जंग से ठीक उलट नजर आ रही है। जंग के उपराज्यपाल रहते आम आदमी पार्टी की सरकार पंगु होकर रह गई थी। मुख्यमंत्री तक के आदेश आला अफसर नहीं मान रहे थे। कारण था जंग का स्पष्ट निर्देश कि उनकी जानकारी और सहमति हर मामले में जरूरी है। अनिल बैजल के आते ही उपराज्यपाल और सरकार के बीच रिश्ते सुधरते दिख रहे हैं। बैजल ने न केवल दिल्ली सरकार के न्यून्तम मजदूरी बढ़ाने के निर्णय को अपनी सहमति दे डाली है बल्कि दिल्ली की महिला एवं समाज कल्याण सचिव दिलजीत कौर का भी तबादला सरकार की इच्छानुसार कर दिया है। कौर की नियुक्ति को लेकर जंग और केजरीवाल के बीच लंबी जंग चली थी। अरविंद केजरीवाल से नजदीकी रखने वालों को हालांकि आशंका है कि जब कभी भी नए उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के किसी निर्णय को मानने से इंकार कर देंगे] केजरीवाल तुरंत उनके खिलाफ ट्टिर वॉर में उतर आएंगे।

प्रीतम होंगे नेता प्रतिपक्ष!

हालांकि प्रदेश में कांग्रेस करारी हार से उबर नहीं पाई है। लेकिन जब भाजपा में मुख्यमंत्री की तलाश शुरू हो चुकी है तो ऐसे में कांग्रेस को भी नेता प्रतिपक्ष तय करना ही पड़ेगा। चूंकि मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव हार चुके हैं ऐसे में वरिष्ठता की सूची में विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश के नाम टॉप पर आता है। लेकिन अंदर की बात है कि कांग्रेस इन दोनों को शायद ही नेता प्रतिपक्ष बनाए। कारण कि प्रीतम सिंह युवा हैं और बहुत संभव है कि पार्टी भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए उनके नाम पर ही मुहर लगाए। पार्टी के एक वर्ग को लगता है कि प्रीतम युवा हैं। उन्हें भविष्य में नेतृत्व के तौर पर आगे किया जा सकता है। लेकिन प्रीतम के सामने भी दिक्कत यह है कि उनका जनाधार सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र तक सिमटा हुआ है। वह उसी चकराता तक सीमित हैं जो उनकी पारिवारिक सीट मानी जाती है। चकराता के आस&पास की सीटों में भी वह अपने पर नहीं फैला सके हैं। बहरहाल उनके नेता प्रतिपक्ष बनने की संभावनाएं प्रबल हैं।

 

 
         
 
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