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vad 46 07-05-2017
 
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आवरण कथा
 
यह ^मोदीमय^ देश हमारा!

  • प्रेम भारद्वाज

तथ्य यह है कि राजनीति में काम नहीं] बल्कि कौशल और कारनामे अहम होते हैं। लोकतंत्र की इस प्रक्रिया में जहां इरोम शर्मिला को महज ९० वोट मिलते हैं] वहीं दूसरी तरफ राजा भैया भारी मतों से जीत जाते हैं। यह भी सच है कि जीत का दंभ सत्ता को निरंकुश बना देता है

 

महीनों तक चले महासमर के नतीजों ने  सवालों और स्थापनाओं का एक ऐसा वृत तैयार किया है जिसकी जद में हम चाहने या नहीं चाहने के बावजूद हैं। इस वृत में जीत से गदगद अमित शाह भी हैं और सबसे उदास कोने पर अपने अतीत की स्मृतियों के सहारे जीने के नाम पर पल&पल मरने को अभिशप्त लाल कृष्ण आडवाणी भी। होली के पहले होली के साथ दिवाली मनाने वाले जश्न में डूबे भाजपा के लोग हैं तो कुछ और लोगों के साथ जमाने के सामने अपने भावों को छिपाता वह मुसलमान भी है। आजादी के सात दशक बाद भी वह साथ रहने वाले हिंदू भाइयों का भरोसा नहीं जीत सका। अति उत्साही और देश भक्ति से लबरेज लोगों से गुजारिश है कि वे इस वृत्त को देश या राष्ट्र नहीं समझें।

इस वृत्त में कुछ कथ्य&तथ्य हैं जो भावनाओं& विचारों को किसी टैंक की तरह निर्ममतापूर्वक रौंदते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। यह टैंक वही है जिसे मैजिक कहा जा रहा है। राजनीति में जादू नहीं ताकत और कौशल चलता है। कौशल भी ताकत का ही हिस्सा है। कथ्य और तथ्य यह है कि पांच राज्यों के हुए चुनावों में उत्तर प्रदेश] उत्तराखण्ड की जय हो गई है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली है। काम नहीं] कारनामा जीता है। तथ्य यह भी है कि लोकतंत्र की इस प्रक्रिया में संद्घर्ष का प्रतीक बनी इरोम शर्मिला को महज ९० वोट मिलते हैं और बाहुबली राजा भैया को भारी जीत मिलती है। जादू से जीत&हार नहीं होती है&सिर्फ क्षण भर का कमाल होता है] सच है। जादू सच भी नहीं होता है। मगर भाजपा की जीत सच है] जादू नहीं। इस सबको हमें स्वीकारना ही होगा। अगर स्वीकारना सहना भी हो जाए तो कोई बात नहीं।

देश का राजनीतिक भविष्य तय करने वाला उत्तर प्रदेश का चुनावी नतीजा सामने है। इस प्रदेश का नतीजा अब भविष्य तय करेगा। जो कुछ खास लोगों की राय में बहुत सुखद नहीं है अलबत्ता चिंता में डालने वाला है। नतीजा आ जाने के बाद अब राजनीति के पंडितों द्वारा उसकी तार्किक विवेचना जा रही है। जो अगले कुछ दिनों हफ्तों तक जारी रहेगी। पराजय और जय के कारणों के पक्ष में तरह&तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। इनसे मन को समझाया जा सकता है। मगर तर्क का सच से बहुत मजबूती का रिश्ता नहीं होता है। अब उसकी कोई बहुत सार्थकता भी नहीं है और न ही उससे भविष्य को फर्क पड़ने वाला है। सांप के निकल जाने पर लाठी पीटने जैसी बात है।

पहली बात तो यह है कि मोदी अपने कौशल और करनामों की बदौलत व्यक्ति या आप चाहें तो कह लें कि प्रधानमंत्री से अब टैंक में बदल गए हैं। वे अब विरोधी शक्तियों को नम ?kkl की तरह रौंदते हुए जीत की ओर बढ़ रहे हैं। दिल्ली और बिहार चुनाव अपवाद हैं जहां टैंक को शिकस्त का सामना करना पड़ा।

जिन राज्यों में अभी विधानसभा चुनाव हुए उन राज्यों में भाजपा का कोई चेहरा नहीं था।  सभी राज्यों में मोदी के चहरे पर चुनाव लड़ा गया। दिल्ली और बिहार में शिकस्त के बाद यह कठिन चुनौती ही नहीं] बल्कि बेहद जोखिम भरा काम था। भाजपा के साथ&साथ मोदी की साख दांव पर थी। गनीमत है कि भाजपा को उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड राज्यों में अच्छी कामयाबी मिली। इसके उलट अगर नाकामी मिलती तो उसकी कल्पना कर और मोदी के साहस को सलाम करने में रीढ़ आड़े आती है तो कम से कम दाद जरूर दीजिए।

सच स्वीकारने की चीज होती है चाहे वह कितना भी तकलीफेदेह क्यों न हो। सच है कि मोदी की ताकत और उनका कद इस जीत के बाद बढ़ा है। इस देश की बहुसंख्य जनता को उनकी बातों पर भरोसा है। उनसे देश की वो जनता खुद को जोड़ते हुए अपना और देश का बेहतर भविष्य देखती है। लेकिन सपनों की दुनिया में न तो खुद बहुत देर तक रहा जा सकता है न ही किसी दूसरे को रखा जा सकता है। अभी में सपनों की ही बातें ज्यादा हुई हैं या की गई हैं। अभी तक मोदी शासन में उन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया गया है। मगर भरोसा है जनता का जो नोटबंदी के दौरान कतार में ?kaVksa खड़ा रहकर भी मोदी के साथ रही। अब भी साथ है। जीत हर किसी को चाहिए मगर इसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि जीत दंभ को भी जन्म देती है। बहुत शक्तिशाली होना भी ठीक नहीं होता। निरंकुशता आ जाती है। देश में चंद लोगों को यह चिंता सताने लगी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनका कद पार्टी से बड़ा हो गया है] कहीं मौजूदा जीत से निरंकुश न हो जाएं। कुछ लोगों को यह भी अंदेशा है कि लोकसभा के साथ&साथ राज्यसभा में भी बहुमत की स्थिति में आ जाने के बाद सरकार संविधान में अपनी मनोकूल अहम संशोधन कर डाले। संशोधन बहुत हुए हैं लेकिन वो अगर फासिज्म की ओर जाते हैं तो चिंता का विषय है।

दरअसल यह न भाजपा की जीत है] न मोदी की। असल में यह जनता की जीत है। जनता के मन&मिजाज को समझना किसी भी राजनेता के लिए मुश्किल है। जिस जनता ने आज मोदी को अपनी शक्ति देकर व्यक्ति से टैक में बंद किया है कल वही जनता मोदी को अर्श से फर्श पर भी ला सकती है। यह बात मोदी भक्तों के साथ&साथ खुद नरेंद्र मोदी को भी समझनी चाहिए।

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