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आंदोलन

 

उत्तराखण्ड में नशे के अभिशाप को मिटाना तब तक संभव नहीं जब तक माफिया नशे के तस्करों और व्यवसायियों के पैसों पर पलने वाली राजनीति का मटियामेट नहीं कर दिया जाता

 

उनतीस वर्ष पहले २ फरवरी १९८४ को अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव बसभीड़ा से शुरू हुआ नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन माफिया नौकरशाहों और राजनीति के जनविरोधी गठजोड़ के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध के रूप में सामने आया है। वैश्वीकरण उदारीकरण निजीकरण के इस दौर में इस आंदोलन से जुड़ी शक्तियां आज भी जलजंगल और जमीन पर जनता के अधिकारों के साथ राजनीति और माफिया के गठजोड़ के खिलाफ सशक्त जनप्रतिरोध के वाहक बने हुए हैं। आंदोलन की वर्षगांठ पर हर वर्ष आंदोलनकारी मिल-बैठकर समाज के दुश्मनों से लड़ने के लिए संकल्प लेते हैं जिसका प्रभाव उत्तराखण्ड के जन-जीवन पर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

 

उत्तराखण्ड में नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के नाम से २ फरवरी १९८४ को अलमोड़ा जिले के बसभीड़ा गांव से चला आंदोलन मादक द्रव्यों के खिलाफ चले पूर्ववर्ती आंदोलनों से अनेक मामलों में वैचारिक रूप से ज्यादा स्पष्ट गतिशील और तेजस्वी आंदोलनों में से एक था। आंदोलन इस बात को सामने लाने में सफल रहा कि शराब एक सामाजिक बुराई से कहीं अधिक एक राजनीतिक समस्या है। यदि कारगर रोक लगानी है तो शराब की बोतल से अधिक शराब की राजनीति से लड़ना होगा।

 

बसभीड़ा से प्रारम्भ हुए आंदोलन की पृष्ठभूमि में उत्तराखण्ड में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के लिए युवाओं की सक्रियता का कम से कम एक दशक शामिल था। इस एक दशक में पर्वतीय युवा मोर्चा ग्रामोत्थान छात्र संगठन से लेकर उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के नाम से काम करने वाले युवाओं ने उत्तराखण्ड के ग्रामीण अंचलों की आर्थिक सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को लम्बी-लम्बी पदयात्राओं के माध्यम से काफी हद तक समझ लिया था। यह वह दौर था जब हमारे राजनेताओं के दिखाये गये सुन्दर सपने बिखर रहे थे और देश के साथ-साथ उत्तराखण्ड का युवा इस तथ्य को समझने का प्रयास कर रहा था कि आखिर इस आजादी का हमारे लिए क्या अर्थ है?

 

हमारी यह आजादी जहां एक ओर ठेकेदारों पूंजीपतियों उनके दलालों और नेताओं के लिए प्राकृतिक और इन्सानी लूट से मालामाल होने के रास्ते प्रशस्त कर रही थी वहीं दो जून की रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनत करने वाली महिलाओं और बच्चों के लिए सुरा-शराब के प्रचार-प्रसार का नया अभिशाप लेकर भी आई थी। इस कारण पर्वतीय क्षेत्रों में कलह सामाजिक बिखराव अपसंस्कृति असामयिक मृत्यु दुर्घटना एवं अपराध में भारी बढ़ोत्तरी हो रही थी। सुरा शराब अशोका लिक्विड तथा तरह-तरह के नशीले और मादक द्रव्यों से उत्तराखण्ड के बाजार-कस्बे भरे पड़े थे और इस नशे में डूबे उत्तराखण्डी समाज की इस करुण पुकार को सुनने और इसकी आड़ में धड़ल्ले से हो रही लूट को रोकने में हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रणाली अक्षम साबित हो रही थी। 

 

इसी दौर में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी ने २३-२४ अप्रैल १९८३ को अल्मोड़ा में पेशावर स्मृति समारोह पर एक सम्मेलन आयोजित किया सम्मेलन में उत्तराखण्ड और देश के करीब ४०० प्रतिनिधियों ने गंभीरतापूर्वक विचार कर यह निष्कर्ष निकाला कि उत्तराखण्ड में व्याप्त हताशा-निराशा को तोड़ने के लिए एक सशक्त जन आंदोलन की आवश्कता है। सम्मेलन में वन-खन और मादक द्रव्यों को लेकर इस प्रकार के आंदोलन को शुरू करने की संभावना को रेखांकित भी किया गया। इस सम्मेलन के बाद २ फरवरी १९८४ को अल्मोड़ा जिले के घूंगोली-बसभीड़ा से आंदोलन का श्रीगणेश हो गया।

 

 

  • साठ के दशक में पहली बार शराब विरोधी आंदोलन शुरू हुआ।
  • इसमें सबसे ज्यादा महिलाओं ने भागीदारी की।

 

 

  • एक गांव से शुरू हुआ आंदोलन पूरे राज्य में फैला।
  • सरकार ने शराबबंदी की जगह एक्साइज ड्यूटी कम कर पड़ोसी प्रदेशों से भी सस्ती शराब की योजना बनाई है।
  • आज भी विभिन्न जगहों पर नशा विरोधी आंदोलन चल रहे हैं।

 

 

यहां यह दर्ज करना आवश्यक है यह वही काल था जब उत्तराखण्ड के हर क्षेत्र में अंग्रेजी और देशी शराब की खुली बिक्री के साथ आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बिकने वाली संजीवनीसुरा बॉयोटोनिक और एलोपैथिक दवा के नाम पर अनेक प्रकार के नशीले लिक्विड बाजार में भरे पड़े थे। 

 

१ फरवरी १९८४ को वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने चौखुटिया बाजार में आबकारी विभाग के अधिकारियों और जवानों को शराब तस्करी की कोशिश में रंगे हाथों पकड़कर संघर्ष की शुरुआत कर दी। २ फरवरी को बसभीड़ा में सभा का आयोजन किया गया जिसके लिए हाथ से बने पोस्टर चिपकाये गए थे। इस बीच गांव के बच्चों को व्यक्तिगत सफाई से लेकर गांव के रास्तों की सफाई निर्माण एवं क्रांतिकारी गीत सिखाये जा रहे थे। २ फरवरी से पहले ही बच्चे जो शराब पीता है वो परिवार का दुश्मन है जो शराब बेचता है वो समाज का दुश्मन है जो शराब बिकवाता है वो राष्ट्र का दुश्मन है नशे का प्रतिकार न होगा पर्वत का उद्धार न होगा जैसे नारे लगाने लगे थे। इससे पहले जनवरी १९८४ में आंदोलन मुखर करने के प्रयास में साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था जागर के साथियों का एक दल नैनीताल से गढ़वाल तक की पदयात्रा कर चुका था। पीड़ित महिलाएं आंदोलन की ओर आकर्षित हो रही थीं। ऐसे में २ फरवरी १९८४ की शाम को बसभीड़ा में नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन की पहली सभा हुई और इस पहली सभा में इस क्षेत्र के तमाम लोगों एवं महिलाओं ने स्वयं को आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया। इस सभा में बसभीड़ा क्षेत्र में जुएं एवं शराब पर पूर्ण रोक लगाने की घोषणा की गयी और आंदोलन को तेज करने के लिए १४ फरवरी को बसभीड़ा से चौखुटिया में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के आह्वान पर जोरदार प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए बसभीड़ा क्षेत्र से ढोल-नगाड़ों एवं गननभेदी नारों के साथ सैकड़ों स्त्री-पुरुष और बच्चे चौखुटिया तक गये। प्रदर्शन में ब्लॉक स्तर तक के सभी दलों के सक्रिय कार्यकर्ता आंदोलन के साथ जुड़ गये। इसी के साथ युवाओं के दल स्वयं संगठित होकर शराब की तस्करी पर नजर रखने लगे।

 

जिसके डर से अशोका लिक्विड के बड़े तस्कर चौखुटिया छोड़कर भाग खड़े हुए। घटना के बाद से युवाओं के जत्थों ने गाड़ियों दुकानों की तलाशी का काम अपने हाथों में ले लिया। जिन लोगों के यहां अवैध शराब अशोका लिक्विड पायी जाती थी उनका मुंह काला किया जाने लगा। आंदोलन तेजी से द्वाराहाट भिकियासैंण ताड़ी खेत गैरसैंण सल्ट रामनगर समेत सोमेश्वर आदि अन्य हिस्सों में फैल गया। 

 

इसके बाद भवाली रामगढ़ रानीखेत गरमपानी नैनीताल आदि अनेक क्षेत्रों में भी आंदोलन प्रखर होता चला गया। आंदोलन की तेजी के साथ ही प्रशासन का दमन चक्र भी तेज हुआ। २६ मार्च १९८४ को सरकार ने आंदोलनकारियों की मांगों पर गौर किए बिना अल्मोड़ा में धारा-१४४ लगाकर शराब की नीलामी की घोषणा की जिसके विरोध में धारा-१४४ तोड़कर अल्मोड़ा में जोरदार प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया और दर्जनों आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसी दिन गरमपानी (नैनीताल में शराब का ठेका लेने आये ठेकेदारों को पकड़कर जनता ने नंगा और मुंह काला कर उन्हें सामाजिक दंड दिया। लंबे संघर्षो के बाद सरकार ने अल्मोड़ा जिले में आंशिक मद्यनिषेध लागू किया और आंदोलनकारियों के विरोध के कारण शराब के ठेकेदारों के स्थान पर उत्तर प्रदेश सरकारी चीनी संघ को शराब की बिक्री का काम दिया। 

 

किन्तु संजीवनीसुरा और अन्य दवाओं के नाम पर बिकने वाली शराबों के खिलाफ आंदोलनकारियों को लंबे प्रतिरोध करना पड़ा। उच्च न्यायालय इलाहाबाद के १८ अक्टूबर १९८६ के फैसले के बाद आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बिकने वाली दवाओं के प्रसार पर भी कारगर रोक लगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने दस प्रतिशत से अधिक एल्कोहल वाली दवाओं पर रोक लगाने की आंदोलन की मांग को पूरा करते हुए १२ प्रतिशत से अधिक एल्कोहल की दवाओं को शराब घोषित कर दिया। इसके बावजूद उत्तराखण्ड में यदि शराब की नदियां बह रही हैं तो इसके पीछे शराब की बोतल से अधिक योगदान शराब की राजनीति का रहा है। 

 

१९८४ में शुरू हुए आंदोलन के साथ ही यह साबित हो गया था कि स्थापित दल नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन से पैदा हुई ऊष्मा सहन करने की स्थिति में नहीं हैं। इन स्थितियों में आंदोलन के उत्तरार्द्ध में शराब समर्थक तत्वों ने अल्मोड़ा के बाजार में शराब दो वोट लो सस्ती शराब जल्दी खोलो जैसे नारे लगाते हुए प्रदर्शन किया था। एक मई १९८४ को तत्कालीन सत्ताधारियों ने चौखुटिया में पुलिस से बर्बर लाठीचार्ज करवाया। इस मामले को लेकर मुंसिफ मजिस्ट्रेट के न्यायालय में १४ वर्ष तक मुकदमा चला। 

 

इसके बावजूद मादक द्रव्यों के खिलाफ आंदोलन अभी जारी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने दस वर्ष की आंशिक नशाबंदी के बाद १९९४ में मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखण्ड में शराबबंदी समाप्त कर दी। इसके बाद एक बार फिर पिथौरागढ़ जनपद में खेतीखान धुनाघाट अल्मोड़ा में दनिया काफलीखान और गढ़वाल मंडल में अनेक क्षेत्रों में आंदोलन मुखर हुए। 

 

दुर्भाग्य की बात यह है कि आज छात्र संघ के चुनावों से लेकर दलीय राजनीति के स्तर पर पंचायतों तक में शराब माफिया अपनी पैठ बनाने में लगा है। नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन ने किसी हद तक एक समय एक क्षेत्र में ही सही शराब के सेवन और बिक्री पर कारगर रोक लगायी थी पर कुख्यात नशे के तस्करों व्यावसायियों के पैसे पर पलने वाली राजनीति का जब तक हम मटियामेट नहीं करेंगे तब तक नशे के अभिशाप को मिटाना सम्भव नहीं है। इसके लिए हमें माफिया के छल-बल और धन पर पलने वाले हर प्रकार की राजनीति को ध्वस्त करना होगा। राजनीतिक दलों को मादक पदार्थो को लेकर होने वाले अपराधों के खिलाफ सख्त कानून बनाने को मजबूर करना होगा और उन्ही लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनना होगा जो इन संघर्षो में प्रमुख रूप से जनता के साथ खड़े हों। 

 

(लेखक उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष और नशा विरोधी आंदोलन के अग्रणी नेता हैं।

 

 
         
 
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