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आंदोलन

 

उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद सरकार ने आंदोलनकारियों के लिए कल्याण परिषद गठित की। लेकिन हालत यह है कि शहीद आंदोलनकारियों के परिजन सरकारी घोषणाओं को हवाई बता रहे हैं। आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय ऋषि बल्लभ सुंदरियाल जैसे नेताओं के नाम से आज तक कोई योजना नहीं चलाई गई। वीएस परमार उत्तराखण्डी जीवन के अंतिम दिनों में रोटी और इलाज के लिए मोहताज रहे तो बाबा बमराड़ा के पास इलाज के पैसे न होने के कारण उन्हें हिमालयन इंस्टीट्यूट ने डेढ़ माह तक बंधक बनाए रखा। मोहन बाबा उत्तराखण्डी के परिजनों की आर्थिक हालत भी दयनीय है। आंदोलनकारियों की दशा का जायजा लेती दि संडे पोस्ट टीम की यह रिपोर्ट

 

उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए जिन नेताओं ने चार दशक तक सड़क पर संघर्ष किया जेल यात्राएं कीं वे आज भी उपेक्षित हैं। इनमें एक नाम बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा का है। ७५ वर्षीय बाबा बमराड़ा लगभग तीन साल से अस्वस्थ चल रहे हैं। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली। पौड़ी जनपद के पणिया गांव में जन्मे बाबा बमराड़ा ने छात्र जीवन में शास्त्री की उपाधि ग्रहण की थी। वे चाहते तो सुखद जीवन जी सकते थे। अपने परिवार को सुख-सुविधाएं दे सकते थे। लेकिन उन्होंने जन संघर्षों का रास्ता चुनना पसंद किया।

 

उत्तराखण्ड राज्य गठन की मांग के लिए १९७३ में उन्होंने तिहाड़ जेल की यात्रा की १९७४ में बाबा बमराड़ा ने उत्तराखण्ड रक्षा मंच के बैनर तले सम्पूर्ण उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए जन जागरण अभियान किया। उन्होंने नारा दिया था कि धरती के बेटों को जगाने चलें साथियों उत्तराखण्ड बसाने चलें। इसी वर्ष बाबा ने १९ दिन की भूख हड़ताल भी की।

 

१९७४ में पौड़ी कमिश्नरी पर सुन्दरी नेगी के साथ ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। २१ जून १९७५ को लोक नायक जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर छोटे राज्यों की मांग के समर्थन में डेढ़ वर्ष की जेल यात्रा भी की। १९७८ में उत्तराखण्ड युवा मोर्चा और उत्तराखण्ड राज्य परिषद की महिला पुरुष कार्यकर्ताओं के साथ वह ८ दिन तक तिहाड़ जेल में बन्द रहे। 

 

जनआंदोलन में भी बाबा ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और बाद के वर्षों में भी वह निरंतर सक्रिय रहे। जून २०११ में अस्वस्थता के चलते उन्हें हिमालयन अस्पताल (जौलीग्रान्ट में भर्ती करवाया गया। इलाज का खर्च वहन न कर पाने पर उन्हें अस्पताल प्रशासन ने डेढ़ माह तक बन्धक बनाकर रखा। मीडिया के दबाव के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। लेकिन इलाज का खर्चा किसने वहन किया यह बाबा नहीं जानते हैं। इस तरह की उपेक्षा से वह काफी आहत हैं। उनके बेरोजगार पुत्र के कन्धों पर ही अब उनकी जिम्मेदारी है। 

 

पूर्व मंत्री और सांसदों की ओर से बाबा को मदद के आश्वासन तो बहुत मिले लेकिन अमल किसी पर नहीं हुआ। भले ही बाबा बमराड़ा राज्य आन्दोलन के उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने राज्य की मांग को जीवित रखा। प्रदेश सरकार से खिन्न बाबा का कहना है कि उत्तराखण्ड राज्य के आंदोलनकारियों की चयन प्रक्रिया असंवैधानिक है। जेल जाओ और नौकरी पाओ साथ ही नेता अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर आंदोलनकारी चयनित करें तो यह गलत है। जिस उद्देश्य को लेकर उत्तराखण्ड राज्य की मांग की गई थी वह हकीकत से कोसों दूर है। आज राज्य सरकार उन लोगों को लाभान्वित कर रही है जो राज्य आन्दोलन के विरोधी रहे हैं जबकि मूल व्यक्ति आज भी अपने हक लिए संघर्षरत हैं। राज्य बनने के १२ साल बाद भी इसी तरह कई ऐसे राज्य आंदोलनकारी हैं जो अपने खून पसीने से सींचें गए अपने राज्य में ही उपेक्षा के शिकार हो गए है। अपने ही राज्य में अपना हक पाने के लिए ऐसे तमाम आंदोलनकारियों को धरना प्रदर्शन करना पड़ रहा है।

 

कालाढूंगी के पूरनपुर चकलुवा निवासी नंदन सिंह कुमटिया एक ऐसे ही राज्य आंदोलनकारी हैं जिसने राज्य की मांग को लेकर आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा की। वर्ष २००५ में एक सड़क दुर्द्घघटना में उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और शासन-प्रशासन के नुमाइंदों उनसे मुंह फेर लिया। ये वही कुमटिया हैं जिन्हें राज्य आंदोलनकारी घोषित कर प्रमाण पत्र भी दिया गया साथ ही नौकरी भी। लेकिन कुछ दिनों बाद ही प्रशासन की ओर से नौकरी का नियुक्ति पत्र वापस ले लिया गया। इसी नियुक्ति पत्र और नौकरी बहाल करने के चक्कर में वे सड़क हादसे के शिकार हो गए। अब विकलांग हो चुके नंदन सिंह कुमटिया बताते हैं कि वह कई आंदोलनकारियों के साथ २७ दिन फतेहगढ़ जेल में कैद रहे। 

गरीब की कौन सुने फरियाद

 

राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अधिकांश आंदोलनकारी आज भी हाशिए पर हैं। इतने वर्ष बाद भी उन्हें न तो उचित सम्मान दिया जा सका है और न ही सुविधाएं। भले ही सरकार ने ५० वर्ष से कम उम्र के राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी देने नौकरियों में उनके आश्रितों के लिए कुछ सीटें आरक्षित करने ५० वर्ष की उम्र पार कर चुके लोगों को प्रतिमाह ३००० रुपए पेंशन देने जैसी तमाम सुविधाएं दी हैं। लेकिन कुछ आंदोलनकारी ऐसे भी हैं जिनको चिन्हित कर प्रमाण पत्र दिए जा चुके हैं। फिर भी वे सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं से महरूम हैं। ऐसे ही एक राज्य आंदोलनकारी हैं चंदोला राई पटटी नादलस्यूं प्रेमनगर पौड़ी के निवासी कुशलानाथ। भले ही सरकारी स्तर पर उन्हें राज्य आंदोलनकारी मान लिया गया हो। लेकिन उम्र के पांच दशक पार कर चुका यह आंदोलनकारी पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों और अफसरों के चक्कर काटने को मजबूर है। वे २०१० में राज्य आंदोलनकारी घोषित किए गए। कुशलानाथ को जून २०११ से पेंशन देने की स्वीकृति दी गयी थी। 

गौरतलब है कि चंदोला राई निवासी कुशलानाथ १९९४ में कर्फ्यू के दौरान पुलिस लाठीचार्ज से बुरी तरह जख्मी हो गये थे। उनके दोनों पैर भी फ्रैक्चर हुए। जिसके चलते वह ९ अक्टूबर १९९४ से १८ अक्टूबर १९९४ तक हॉस्पिटल में भर्ती रहे। आज भी कुशलानाथ उन जख्मों से नही उबर पाये हैं और ठीक से चलने में असमर्थ हैं। 

 

कुशलानाथ का कहना है कि पेंशन के लिए आवेदन किये डेढ़ वर्ष हो चुके हैं लेकिन अभी तक सरकारी स्तर पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। जब भी किसी मंत्री या विधायक के सामने वह इस सम्बन्ध में बात करते हैं तो उन्हें मात्र आश्वासन ही दिए जाते रहे हैं।  

कुशलानाथ गरीब भूमिहीन मजदूर हैं जो कि किसी दुकान में सिलाई का काम करके अपने व अपने चार बच्चों का भरण-पोषण कर रहे हैं। काफी लंबे समय से सचिवालय स्तर पर पत्राचार करने के बाद भी उन्हें कोई संतुष्ट जवाब नहीं मिल पाया है। जिससे यह लगता है कि राज्य सरकार राज्य आंदोलनकारियों को दी जाने वाली सुविधाओं में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला जुमला अपना रही है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि राज्य आन्दोलन में सक्रिय रहे कुशलानाथ जैसे गरीब मजदूर लोगों के हितों की रक्षा के प्रति उत्तराखण्ड सरकार कितनी संजीदा है।

किस हाल में हैं आंदोलनकारी

उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान शहीद हुए 

१-अशोक केशिव

पिता का नाम- शिव प्रसाद केशिव

माता का नाम -धूमा देवी

गांव का नाम -ऊखीमठ

भाई मनोज केशिव को २००१ में जूनियर क्लर्क पद रुद्रप्रयाग कलेकटे्रट में नौकरी मिली।

मुआवजे के रूप में दस लाख रुपये मिले

खामियां

शहीद स्मारक नहीं बनाया गया। जबकि स्वयं परिजनों के द्वारा तीन लाख रुपये खर्च कर शहीद की मूर्ति बनाकर पैतृक गांव में लगायी गयी। शहीद के नाम पर सड़क अस्पताल स्कूल नहीं बनाया गया। रोडवेज व चिकित्सा सुविधा की निःशुल्क व्यवस्था नहीं दी गयी।

शहीद परिवार होने का प्रमाण पत्र आज तक नहीं मिला है। धूमा देवी का स्वास्थ्य लगातार खराब रहता है। इसके लिए इनके पुत्र का स्थानांतरण देहरादून किया जाना है। लेकिन अभी तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है। 

२-यशोधर बेंजवाल

पिता का नाम -मित्रानंद बेंजवाल

माता का नाम -धूमा देवी

पत्नी का नाम -उषा देवी

बच्चों का नाम- संदीप बेंजवाल आरती बेंजवाल सूरज बेंजवाल

गांव का नाम -बेंजी ऊखीमठ

१९९५ में शहीद की पत्नी को राबाइंका गोपेश्वर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिली २००२ में शहीद के पुत्र संदीप बेंजवाल को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिली। अब उसका प्रमोशन हो चुका है। गोपेश्वर में आठ मुट्ठी जमीन मिली।

खामियां

शहीद परिवार होने का प्रमाण पत्र आज तक नहीं मिला। २००९ में शहीद की पुत्री आरती बेंजवाल आयकर विभाग की लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण हुई थी। मौखिक परीक्षा में शहीद प्रमाण पत्र न होने के कारण इसका लाभ न मिलने से उसे बाहर किया गया। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी ने अगस्तमुनि खेल मैदान को इनके नाम करने की घोषणा की थी। जो अभी तक पूरी नहीं हुई है।

 

यशोधर बेंजवाल लेखक और कवि भी थे । 

उठो उठो हे उत्तराखण्डियों मां ने तुम्हें ललकारा है मां बहन बेटी बहू को मातृ भूमि ने आज पुकारा है।

यह तपोभूमि है। यह गढ़ है यह गढ़वीरों का। अबला यहां पैदा नहीं होती हैं। यह घर हैं दुर्गा माता का।

कहां गयी वह दुर्गा चंडी क्या निद्रा ने उन्हें आ द्घेरा है रहे नहीं आज सूरवीर क्या गोद अब मेरी खाली है। 

लाज लूट रहा है दुश्मन मेरी उसे बचा लोसारे भेद भुलाकर उत्तराखण्ड बना दो ।

ये चिंगारी नहीं अब शोले हैं

वक्त आने पर पहाड़ और तोप के गोले हैं । 

जो तुमने दी है शोलों को हवा तो इस आग में तुम्हें ही जलना होगा 

हम तो पहले भी पहाड़ थे अब भी पहाड़ हैं।

 

श्रीनगर थाने में इनकी निशानी-घड़ी कैमरा डायरी ४३ रुपये जमा हैं। जो आज तक शहीद के परिवार को नहीं मिल पायी है। 

३-रूद्र सिंह

पिता का नाम -महेन्द्र नेगी 

माता का नाम -मंगशरी देवी 

 ग्राम-कन्यार

पी ओ-पीपलकोटी 

नौकरी मिली ड्राईवर  के रूप में २००४ में 

खामियां

आंदोलनकारी के गांव में आज तक सड़क नहीं पहुंच पाई है। गांव के लोग ८ किमी क़ी दूरी पैदल ही तय करते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की गांव में कोई व्यवस्था नहीं है। 

लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

 

 
         
 
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