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आंदोलन
 
सियासी साजिश के शिकार जनांदोलन

 

उत्तराखण्ड की किसी भी सरकार ने आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में शरीक रहे सेनानियों को सम्मान देने की जरूरत नहीं समझी। आजादी के बाद जिन आंदोलनों को जनता ने मुकाम तक पहुंचाया उन्हें भी साजिशों से विफल कर दिया गया। राज्य गठन के बाद अब जन आंदोलन बेमौत मारे जा रहे हैं

 

देवभूमि उत्तराखण्ड तमाम जनांदोलनों की जननी रही है। देश की आजादी से पूर्व और बाद में भी तमाम जनांदोलन इसके गर्भ से उपजे। जनता ने आंदोलनों को अपने सम्मान की लड़ाई बनाकर उन्हें मुकाम तक भी पहुंचाया लेकिन राजनीतिक साजिशों का सत्यानाश हो। सत्तानवीसों ने समय-समय पर अपनी चालबाजियों से जनता के संघर्ष और बलिदान को मटियामेट कर दिया।

 

आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में उत्तराखण्डवासियों का ऐतिहासिक योगदान रहा। आजाद हिंद फौज में यहां के सैनिकों ने अग्रणी भूमिका निभाई। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनके त्याग और बलिदान को वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके कि वे वास्तविक रूप से हकदार थे। आजादी के बाद (सीमांत गांधी) खान अब्दुल गफ्फार खां ने भारत आकर पेशावर क्रांति के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को न खोजा होता तो बहुत संभव था कि इस क्रांति के महानायक चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों ने राष्ट्रभक्ति अहिंसा और त्याग की जो मिसाल पेश की थी उससे उत्तराखण्ड की नई पीढ़ी परिचित ही नहीं हो पाती। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी कालू महर और कई अन्य सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान था। भवानी सिंह रावत और चंद्र शेखर आजाद गढ़वाल के कोटद्वार में स्वतंत्रता सेनानियों को प्रशिक्षण देते थे। आजाद हिंद फौज के कर्नल पितृशरण रतूड़ी के नेतृत्व में आराकान में गढ़वाली सैनिकों ने संगीनों के बूते गोलाबारूद से लैस अंग्रेजों को बुरी तरह परास्त किया। राजधानी दिल्ली में कुछ साल पहले नेताजी जन्मशती के अवसर पर आयोजित एक वृहद कार्यक्रम में आजाद हिंद फौज के कई बड़े सेनानियों ने रतूड़ी और उनके साथी सैनिकों की बहादुरी की जमकर प्रशंसा भी की थी। लेकिन सवाल यह है कि आजादी के इन नायकों के बारे में उत्तराखण्ड की नई पीढ़ी को बताने के लिए राज्य की सरकार ने क्या प्रयास किये?

 

आजादी से पूर्व सन् १९३० में जंगलों पर से जनता के हक-हकूक छीने जाने पर टिहरी रियासत के खिलाफ विशाल जनविद्रोह हुआ। तिलाड़ी में निहत्थे किसानों को गोलियों से भून दिया गया। कई जान बचाने के लिए यमुना में कूद गए लेकिन फिर भी नहीं बचे। जनता का आक्रोश था कि वनों की आरक्षित सीमाओं को गांवों की तरफ खिसका कर उनके हकों पर डाका डाला जा रहा है। इससे पशुओं को कहां बांधेंगे और कहां चराएंगे? जनता का यह आंदोलन आगे चलकर टिहरी रियासत के अंत का कारण भी बना। लेकिन नतीजा क्या हुआ। आजाद भारत में भी वन अधिनियम लागू कर जंगलों पर से जनता के हक-हकूक छीन लिये गए। आजादी के बाद उत्तराखण्ड में कई बड़े आंदोलन हुए लेकिन उनका हाल भी बहुत बुरा हुआ। सरकार ने ही इन आंदोलनों को कुचलने की तमाम साजिशें रचीं।

 

शराब विरोधी आंदोलन : ६० के दशक में गढ़वाल में टिंचरी तो कुमाऊं में कच्ची शराब के खिलाफ व्यापक जनांदोलन हुआ। शासन- प्रशासन ने आंदोलन का दमन करने के लिए हर हथकंडे आजमाए। महिलाओं और बच्चों को बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश में दूर की जेलों में डाल दिया गया। लेकिन जनता के इस संघर्ष का नतीजा क्या हुआ? पहाड़ के गांव-गांव तक शराब ने पकड़ बना ली।

 

विश्वविद्यालय आंदोलन : सन् १९७१ की गर्मियों में श्रीनगर में छात्रों ने उत्तराखण्ड विश्व विद्यालय संघर्ष समिति का गठन किया। सोच थी कि एक ऐसा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आए जो उच्च शिक्षा के साथ ही क्षेत्रीय विकास के रास्ते खोले। कुमाऊं में भी छात्र सड़कों पर उतरे। छात्रों को आम जनता का भरपूर सहयोग मिला। शासन- प्रशासन ने लाठी-गोलियों से आंदोलन को दबाने की कोशिश की। लेकिन सफल नहीं हुआ। अंततः गढ़वाल और कुमाऊं दो विश्व विद्यालय अस्तित्व में आए। लेकिन लंबे समय तक इन विश्वविद्यालयों की हालत खराब रही। राय यहां तक आई कि बदरी-केदार में इनकी मदद के लिए अलग से डिब्बे लगाए जाने चाहिए। जैसे-जैसे विश्वविद्यालयों ने रफ्तार पकड़ी थी तो गढ़वाल विश्वविद्यालय का स्वरूप ही बिगाड़ दिया गया। इसके दो कैंपस कॉलेजों को ही केंद्रीय विश्वविद्यालय में शामिल किया गया और इससे जुड़े तमाम डिग्री कॉलेजों और संस्थाओं द्वारा संचालित निजी कॉलेजों को लावारिस छोड़ दिया गया। लोगों ने आवाज उठाई तब जाकर सरकार एफिलिएटिंग यूनिवर्सिटी का शिगूफा लेकर सामने आई। ऊपर से इसका नाम बदलने पर राजनीति भी चल पड़ी। नतीजा यह है कि यूनिवर्सिटी अभी तक ठीक से अस्तित्व में नहीं आ सकी है और क्षेत्रीय जनता को अपनी नई पीढ़ी के भविष्य की चिंता सता रही है।

 

चिपको आंदोलन : सत्तर के दशक में ही उत्तराखण्ड की धरती से पर्यावरण सुरक्षा को लेकर चिपको के रूप में एक बहुत बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। इसकी शुरुआत गौरा देवी के नेतृत्व में वहां की मातृशक्ति ने की। चिपको की शुरुआत वास्तव में एक तरफ जहां पेड़ों को बचाने के लिए हुई थी वहीं दूसरी तरफ जनता की अपेक्षा थी कि जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक कायम रहें। वन आधारित ऐसे उद्योग लगें जिनसे पहाड़ के लोगों को अपनी ही धरती पर रोजगार के अवसर मिलें और पलायन रुके। वर्षों तक संपूर्ण उत्तराखण्ड में लोग जंगलों की रक्षा के लिए जंगलात और ठेकेदारों से जूझते रहे। संघर्ष को देखते हुए सरकार ने जनता की मांगें तो मान लीं लेकिन इसका फायदा क्या हुआ? पिछले दरवाजे से पेपर मिलों को जंगल दे दिए गए। बेतरतीब विकास योजनाओं के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटे गए मगर जनता के लिए वन अधिनियम लागू कर दिया गया। उसके सामने द्घास चारे का संकट खड़ा कर दिया गया। लोगों को मकान बनाने के लिए जंगल से लकड़ी और पत्थर नहीं निकालने दिये जा रहे हैं। लिहाजा लोगों को इस अधिनियम के खिलाफ फिर आंदोलित होना पड़ा। 

 

नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन साठ के दशक में चले व्यापक शराब विरोधी आंदोलन के बावजूद नशा उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में घर-घर तक अपना जाल फैलाने में सफल रहा। १९७८ में जनता पार्टी सरकार ने अल्मोड़ा देहरादून और नैनीताल में नशाबंदी नीति लागू की। लेकिन नशे के कारोबारी बिना किसी रुकावट के गांवों में अपना धंधा फैलाते रहे। गांवों में सुरा मतृ संजीवनी शर्बत अशोका लिक्विड आदि नामों से नशा परोसा जाता रहा। १९८० में कांग्रेस ने इन तीन जिलों में फिर से शराब की बिक्री शुरू कर दी लेकिन तब तक शर्बत अशोका लिक्विड़ मृत संजीवनी सुरा आदि गांवों को अपनी पकड़ में ले चुकी थी। इससे जनता ने शराब के खिलाफ गोलबंद होना शुरू किया। फरवरी १९८४ को अल्मोड़ा के चौखुटिया में आबकारी निरीक्षक को जीप में शराब ले जाते रंगे हाथों पकड़ा गया और अगले दिन २ फरवरी १९८४ को चौखुटिया के बसभीड़ा में नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन का शंखनाद कर दिया गया। इस आंदोलन में महिलाओं की बहुत बड़ी भूमिका रही। पूरे उत्तराखण्ड में जबर्दस्त आंदोलन चला। लोग जेल गए उन्होंने लाठियां खाई और शराब के ठेकों की नीलामी रुकवाई। लेकिन इस संघर्ष का परिणाम क्या हुआ? आज पहाड़ में शराब की नदियां बह रही हैं। राजनीतिक दल चुनावों में इस कदर शराब बांट रहे हैं कि वहां के लोक रचनाकारों ने इस पर गीत भी लिख डाले। 

 

टिहरी बांध विरोधी आंदोलन : सन् १९६९ में दिल्ली में बांध निर्माण की द्घोषणा होते ही क्षेत्रीय लोग इसके खिलाफ लामबंद हो गये थे। चार दशक तक जनता निरंतर सड़क पर आंदोलित रही। लोगों ने न्यायालय की शरण भी ली। पुनर्वास पैकेज की विसंगतियों को लेकर भी जनता को संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अंततः सरकार में बैठे लोगों ने १९८९ में बड़ी चालाकी से कुतर्क किया कि अब अरबों रुपया खर्च हो चुका है लिहाजा आंदोलन का कोई औचित्य नहीं। बांध नहीं रुकेगा। चार दशक के जनांदोलन के बावजूद टिहरी के सौ से अधिक गांव डुबा दिये गये। कई हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बांध की झील में समा गई। लोग अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से कट गए। इस तरह टिहरी उजड़े हुए लोगों की दास्तान बनकर रह गया। यही चालाकियां अब अन्य जगहों पर भी अपनाई जा रही हैं। 

 

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन उत्तराखण्ड राज्य के गठन की सोच वास्तव में देश की आजादी के आंदोलन के दौरान ही जन्म ले चुकी थी। तब से लेकर सन् २००० तक लोग निरंतर संघर्षरत रहे। संघर्ष को कुचलने के लिए सत्ता ने तमाम कुचक्र रचे लेकिन वह कामयाब नहीं हुई लेकिन राज्य गठन के बाद सत्ता इसमें अवश्य सफल हो गई। लोगों ने जिस राज्य के सपने देखे थे वह वास्तव में उन्हें मिला ही नहीं। अब वे खुद को ठगा हुए महसूस कर रहे हैं। जनता की भावनाओं के अनुरूप राजधानी गैरसैंण में नहीं बनाई गई। राज्य का नाम बदलने के लिए भी लोगों को आंदोलन चलाना पड़ा। विकास योजनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बनाई जा रही हैं। जबकि राज्य की मांग वास्तव में सत्ता के विकेंद्रीकरण से कहीं अधिक योजनाओं के विकेंद्रीकरण के सवाल को लेकर उठी थी। सुदूर पर्वतीय अंचलों के लोगों को राज्य निर्माण का कोई फायदा नहीं हो पाया। वर्षों के संघर्ष के बाद एक दिन पौ अवश्य फटी सवेरा भी हुआ लेकिन कुहासे से भरा। यह बात अब उनकी समझ में आ गई है। वे हताश और मायूस हैं। मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर वे हर वर्ष काला दिवस मनाते हैं और उत्तराखण्ड सरकार को कोसते हैं। राज्य निर्माण के बाद जनांदोलन बेमौत मार दिए गए ।

 

गैरसैंण आंदोलन उत्तराखण्ड की आंदोनकारी जनता ने गैरसैंण को राजधानी बनाना चाहती थी। राज्य निर्माण के बाद लोग निरंतर इसके लिए धरने-प्रदर्शन करते रहे हैं। मोहन बाबा उत्तराखण्डी ने इसके लिए कई बार अनशन भी किया। लेकिन इसके विपरीत राज्य गठन के बाद पहले तो अनावश्यक रूप से राजधानी चयन आयोग बना दिया गया और फिर बार-बार इसका कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। दुखद यह है कि २००४ में बाबा उत्तराखण्डी ने अंतिम अनशन कर अपने प्राणों की आहुति दे दी लेकिन उत्तराखण्ड सरकार को कोई अफसोस नहीं हुआ। बाबा के परिवार को आर्थिक मदद देने की द्घोषणा तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने इस तरह प्रचारित की कि मानो बाबा गैरसैंण को राजधानी बनाने की नहीं बल्कि मुआवजे की मांग कर रहे थे। इससे आक्रोशित पहाड़ की मातृशक्ति ने मुख्यमंत्री तिवारी को ललकारा भी कि तिवारी जी अगर आपको एक करोड़ रुपये देकर मार दिया जाए तो कैसा रहेगा? अब बड़े शातिराना अंदाज में कुछ लोग आंदोलन की आग को ठंडा करने के लिए कुतर्क पेश कर रहे हैं कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया जाए। इसके दो फायदे हो जायेंगे एक तो उन्हें गर्मियों में नया पिकनिक स्पॉट मिल जाएगा और दूसरे चुनाव में जनता को गुमराह करने का मुद्दा भी मिल जाएगा। बहरहाल गैरसैंण को राजधानी बनाने का आंदोलन निरंतर राजनीतिक चालबाजी में फंसता जा रहा है।

 

बांध विरोधी आंदोलन देश में पिछले ५० वर्षों के दौरान बने चार हजार बड़े बांधों के कारण चार करोड़ से अधिक लोगों को विस्थापन की त्रासदी झेलनी पड़ी। उत्तराखण्ड के लोगों ने टिहरी की पीड़ा खुद आत्मसात की है। लिहाजा पंचेश्वर से लेकर फाटा ब्यूंग फ्लेण्डा श्रीनगर पिंडर द्घाटी देवसारी जोशीमठ भिलंगना और भागीरथी द्घाटी सभी जगहों पर जनता बांधों के खिलाफ निरंतर विरोध प्रदर्शन कर रही है। सुरंगों के विस्फोटों ने लोगों को गुफाओं में रहने और खुले आसमान तले रातें बिताने को विवश किया। वे स्पष्ट देख रहे हैं कि उत्तराखण्ड में बड़े बांध उनके पर्यावरण संस्कृति इतिहास और आर्थिकी को चौपट कर देंगे। लेकिन सरकार उनके विरोध को अनसुना कर रही है। भूकंप और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं को दरकिनार कर बांध निर्माण का सिलसिला जारी है। जनता को गुमराह किया जा रहा है कि बांध विकास और रोजगार के प्रतीक हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि टिहरी जैसी विशाल परियोजना का क्या हुआ? लाखों लोगों को उजाड़ने के बावजूद कितनी बिजली पैदा हुई। तो अब सरकार और उसके योजनाकार रन ऑफ द रिवर का शिगूफा ले आए। यानी नदियों के नैसर्गिक प्रवाह से बिजली बनाई जाएगी। जबकि रेन ऑफ द रीवर के तहत गांवों के उजड़ने का सिलसिला जारी है। नदियों को सुरंगों में कैद कर लोगों को पीने के पानी से वंचित किया जा रहा है। नदी तटों पर बसे ग्रामीणों को अपने शवों के अंतिम संस्कार तक की चिंता है। विश्व बांध आयोग अंतरराष्ट्रीय बांध आयोग जैसी संस्थाओं की मान्य परिभाषाओं के अनुसार १५ मीटर से ऊंचा कोई भी बांध बड़े बांध की श्रेणी में आता है। लेकिन उत्तराखण्ड में श्रीनगर जैस विशालकाय परियोजना को भी छोटे बांध या रन ऑफ द रिवर परियोजना बताने के कुतर्क वहां के राजनेता और योजनाकार पेश कर रहे हैं। बांध निर्माण का विरोध करने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। दिखावे के लिए नाम मात्र की जनसुनवाई की जा रही है और जनआंदोलनों को कुचलकर बांध परियोजनाएं बनाई जा रही है। लगभग ५०० परियोजनाएं उत्तराखण्ड (मध्य हिमालय में निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं। अगर ये परियोजनाएं बन गई तो भविष्य में न तो उत्तराखण्ड बचेगा और न उत्तर भारत।

 

गुरिल्ला आंदोलन सन् १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमाओं पर स्थानीय खुफिया तंत्र के रूप में एसएसबी का गठन हुआ। उसी वक्त से गुरिल्ले सीमाओं के प्रहरी बनकर एसएसबी को सहयोग देते रहे हैं। एसएसबी स्वयं सेवक कल्याण समिति के बैनर तले वे खुद को एसएसबी में समायोजित किये जाने और अन्य सुविधाओं को लेकर पिछले कई वर्षों से आंदोलित हैं। अगर यह असंभव है तो 

 
         
 
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