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आंदोलन

 

नवउदारवादी नीतियों के हमलों और लिंगदोह समिति की सिफारिशों की मार से छात्र राजनीति कमजोर हुई है। राज्य की लड़ाई लड़ने वाली छात्र शक्ति को अपने बेहतर भविष्य के लिए फिर से संघर्ष खड़ा करना होगा। उत्तराखण्ड में छात्र आंदोलन के गौरवशाली अतीत को वापस लाने की जरूरत है

 

उत्तराखण्ड में जन आंदोलनों का समृद्ध इतिहास रहा है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में यहां के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वर्ष १९३० के तिलाड़ी किसान आंदोलन और उस वक्त टिहरी रियासत में चले तमाम ढंढ़कों ने विशाल आंदोलन का रूप लेकर १९४९ में निरंकुश राजशाही को उखाड़ फेंका। १९६० एवं ७० के दशक जनांदोलनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे। उस दौरान पूरे पहाड़ में शराब के खिलाफ व्यापक जनांदोलन चले जिसमें मातृ शक्ति की विशेष भूमिका रही। उच्च शिक्षा और क्षेत्रीय विकास के उद्देश्य से ७० के दशक में ऐतिहासिक विश्वविद्यालय आंदोलन चले। ८० के दशक में फिर नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन हुआ। इसी दशक में उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के लिए शुरू हुए धरना-प्रदर्शनों और रैलियों के सिलसिले ने नब्बे के दशक में इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया कि इसमें हर बच्चे से लेकर बूढ़े ने भागीदारी निभाई। जनता ने अपने लंबे संघर्ष से इन आंदोलनों को मुकाम तक पहुंचाया। सरकारें उसके सामने झुकी भी लेकिन राजनीतिक चालबाजियों ने उसे संघर्ष का प्रतिफल नहीं लेने दिया। जिसके चलते लोग खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। आज स्थिति यह है कि तमाम समस्याओं को लेकर लोग टुकड़ों-टुकड़ों में आंदोलन तो चला रहे हैं लेकिन उनके संगठित न हो पाने के कारण राज्य निर्माण के बाद उत्तराखण्ड की धरती से कोई बड़ा आंदोलन पैदा नहीं हो पा रहा है। जो छात्र शक्ति विश्वविद्यालय आंदोलन एवं राज्य आंदोलन में खास तौर पर सक्रिय रही वह भी शिक्षारोजगार और भविष्य की लड़ाई को तेज नहीं कर पा रही है

 

 

 

उत्तराखण्ड हमेशा से आन्दोलनों की जमीन रहा है। देखा जाए तो लगभग हर दशक में उत्तराखण्ड एक बड़े जनांदोलन का साक्षी बना है। राज्य के तमाम जनांदोलनों में छात्र-युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आजादी की लड़ाई रही हो या टिहरी राजशाही के खिलाफ लड़ाई इन सभी संघर्षों में छात्र-युवा अग्रिम पंक्ति में रहे। टिहरी राजशाही को उखाड़ फेंकने में तो छात्र-युवाओं की निर्णायक और बलिदानी भूमिका थी। राजशाही के खिलाफ चौरासी दिन अनशन कर शहीद होने वाले गांधीवादी श्रीदेव सुमन रहे हों या फिर राजशाही के खिलाफ निर्णायक शहादत देने वाले कामरेड नागेन्द्र सकलानी। इन्होंने छात्र जीवन से निकल कर युवावस्था में कदम रखते ही अपने जीवन का बलिदान कर दिया। सत्तर और अस्सी के दशक में चले वन आंदोलन नशा नहीं-रोजगार दो आंदोलन और विश्वविद्यालय स्थापना आन्दोलन को गति देने में छात्र-युवाओं की न केवल महत्वपूर्ण भूमिका थी बल्कि आज उत्तराखण्ड में संघर्षों और सत्ता की धारा की प्रतिनिधि शख्सियतें -कॉमरेड राजा बहुगुणा डॉ शमशेर सिंह बिष्ट कमला पन्त पीसी तिवारी प्रदीप टम्टा आदि इन आन्दोलनों से अपने छात्र जीवन में ही राजनीति के मैदान में उतर पड़ीं।

 

उत्तराखंड राज्य की मांग दशकों पुरानी थी। आरक्षण विरोध के सवर्णवादी आधार से शुरू होकर जब १९९४ का आंदोलन उत्तराखण्ड राज्य के प्रचंड आंदोलन में बदल गया तो अलग राज्य की मांग की उपेक्षा करने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए भी इसे अनदेखा करना संभव नहीं रह गया। इसके प्रचंड जन आंदोलन में तब्दील होने के पीछे छात्र-युवाओं का इस आंदोलन में भारी पैमाने पर उतर पड़ना ही था। बल्कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि १९९४ के इस आंदोलन का शुरुआती चरण तो पूरी तरह छात्रों के हाथ में ही था। आजादी के बाद से ही पलायन बेरोजगारी और विकास के पिछड़ेपन के खिलाफ छात्र-युवाओं के आक्रोश ने तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों को छात्रों के पीछे खड़ा कर दिया। लखनऊ-दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदार कांग्रेस-भाजपा के नेताओं पर तो छात्र-युवाओं का कहर कई जगह टूटा जहां उन्हें छात्र-युवाओं ने मंचों से धकेलने से लेकर कई बार इनके गले में जूतों की माला तक डाल दी। इस आंदोलन में शहीद होने वाले और उत्पीडन झेलने वालों में महिलाओं के अलावा छात्र-युवा ही थे। अब तक इस क्षेत्र की उपेक्षा के लिए एक बाहरी सत्ता जो यहां कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों को नहीं समझती थी जिम्मेदार थी। अलग राज्य बनने के बाद इस स्थिति के बदलने की कल्पना और आकांक्षा राज्य की आंदोलनकारी शक्तियों को थी। इसलिए कहा जा सकता है कि सन २००० में अलग राज्य बनने के साथ ही उत्तराखण्ड में आन्दोलनों का एक चरण पूरा हो गया। 

 

अलग राज्य इस पलायन के दर्द से निजात दिलाएगा ऐसी छात्र-युवाओं की ही नहीं आम उत्तराखण्डियों की भी आकांक्षा थी। यह अलग बात है कि राज्य बनने के बारह वषोर्ं में सत्ता की अदला-बदली करने वाली कांग्रेस-भाजपा ने कभी पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने के लिए कोई प्रभावी उपाय करना तो दूर इस दिशा में सोचने की जहमत भी नहीं उठाई। नतीजे सामने हैं। २०११ की जनगणना के आंकड़े बता रहे हैं कि राज्य बनने के बाद अल्मोडा और पौड़ी से सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। राज्य के सैकड़ों गांव भुतहा हो गए हैं। 

 

राज्य बनने के बाद नित्यानंद स्वामी के मुख्यमंत्रित्व में बनी पहली काम चलाऊ सरकार ने राज्य में १८ नए डिग्री कॉलेज खोलने की घोंषणा की। आजादी के ५३ सालों में जहां ३६ डिग्री कॉलेज खुले थे वहीं स्वामी की सरकार ने एक झटके में बिना आधारभूत संरचना और प्राध्यापकों की व्यवस्था के १८ डिग्री कॉलेज खोलकर उच्च शिक्षा के साथ नए राज्य में खिलवाड़ की शुरुआत कर दी। यह खिलवाड़ आज भी जारी है। बिना भवन और शिक्षकों के स्कूल और महाविद्यालय अब आम परिघटना है। स्वामी सरकार ने ही राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में फीस वृद्धि की घोंषणा की जिसके खिलाफ हुए छात्र आंदोलन के बाद बढ़ी हुए फीस आधी कर दी गयी।

 

२००५ में नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने निजी बीएड कॉलेज खोलने की प्रक्रिया शुरू की जिसके खिलाफ प्रदेश भर में जबरदस्त छात्र आंदोलन हुआ। लगभग पूरा एक शिक्षण सत्र इस आंदोलन में बीता। बाद में उच्च न्यायालय नैनीताल की दखल के बाद ही निजी बीएड कॉलेज शुरू हो सके लेकिन सरकार उनकी फीस एक लाख रुपये से ऊपर निर्धारित कर दे निजी बीएड कॉलेज संचालकों की ये इच्छा छात्र आंदोलन के चलते पूरी नहीं हो सकी।

 

देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव नहीं होते हैं। बिहार जैसे राज्य में तो पिछले तीन दशक से छात्र संघों के चुनाव नहीं हुए हैं। उत्तराखण्ड देश के उन गिने-चुने राज्यों में है जहां छात्र संघों के चुनाव होते हैं। लेकिन २००६ उच्चतम न्यायालय के आदेश से लागू लिंगदोह समिति की सिफारिशों ने छात्र राजनीति कमजोर और श्रीहीन करने का काम किया। इसके पीछे शिक्षा को बाजार के हवाले करने की सरकारों की मंशा थी। इस प्रक्रिया में सरकारों को छात्र संघ बाधक मालूम पड़ते थे इसलिए जहां छात्र संघ हैं भी वहां उन्हें कठपुतली या सजावटी जैसा बना दिया गया है।

 

उत्तराखण्ड में छात्र राजनीति को न केवल लिंगदोह समिति की सिफारिशों ने धक्का पहुंचाया बल्कि कांग्रेस भाजपा के छात्र संगठनों एनएसयूआई और एबीवीपी ने भी उसे कमजोर करने और उसका लम्पटीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज्य की घोंषणा के बाद ही गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर में हुए छात्र संघ के चुनावों में आइसा की जीत से बौखलाई हुई एबीवीपी ने सत्ता और पुलिस संरक्षण में हॉस्टलों पर हमला किया। ये राज्य बनने के साथ से छात्र राजनीति में सत्ता के संरक्षण में होने वाली गुंडई की शुरुआत थी। २००७ में देहरादून में डीएवी (पीजी कॉलेज में चुनाव जीतने के बाद जीते छात्र संघ पदाधिकारी और एबीवीपी के लोगों ने पूरे देहरादून में इतना उत्पात और लूटपाट मचाई कि पुलिस को छात्र संघ अध्यक्ष को गिरफ्तार करना पड़ा और छात्र संघ अध्यक्ष को जीत के बाद पहली रात हवालात में बितानी पड़ी। कड़क और ईमानदार कहे जाने वाले मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के छात्र संगठन के लोगों की गुंडई पर लगाम कसने वाले शहर कोतवाल को लाइन हाजिर कर दिया। यह सीधे-सीधे छात्र राजनीति की लम्पट धारा का प्रोत्साहन करने जैसी कार्यवाही थी।

 

हाल-हाल के दिनों में में उत्तराखण्ड के दो सबसे बड़े महाविद्यालयों-डीएवी (पीजी कॉलेज देहरादून और एमबी (पीजी कॉलेज हल्द्वानी के छात्र संघ चुनावों और उसके आगे-पीछे भी एनएसयूआई और एबीवीपी के बीच जिस तरह की हिंसक झड़पें लगातार होती रहीं उससे छात्र राजनीति में गुंडई और लम्पटई का बोलबाला ही बढ़ा है और ये भी साफ हुआ कि शिक्षा रोजगार पर मंडराते निजीकरण-बाजारीकरण के खतरों के खिलाफ संघर्ष के बजाय इन छात्र नेताओं की रुचि आपसी संघर्ष में ही ज्यादा है। कोढ़ में खाज ये कि देहरादून में तो कांग्रेस-भाजपा के विधायक भी अपनी-अपनी पार्टी के छात्र संगठनों ने कायम की लम्पटई के मोर्चे पर कॉलेज में ही मुस्तैदी से डट गए। जाहिर सी बात है कि गुंडागर्दी मारपीट और तोड़-फोड़ की राजनीति को इन पार्टियों का सीधा समर्थन और संरक्षण प्राप्त है। हो भी क्यों न गुंडागर्दी के इस माहौल के बीच छात्रों के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाते हैं और शिक्षा को बाजार के हवाले करने के इन पार्टियों के एजेंडे के राह की बाधाएं स्वतः दूर हो जाती हैं। सत्ताधारी राजनीति के संरक्षण में फलने- फूलने वाली छात्र राजनीति की दो धाराओं के अलावा वामपंथी और प्रगतिशील धारा के छात्र संगठनों की भी उत्तराखंड में उपस्थिति और छात्र आन्दोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 

आइसा एसएफआई एआईएसएफ पीएसएफ पछास जैसे वामपंथ के सभी धाराओं के छात्र संगठनों की उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में मौजूदगी है। छात्र संघ के चुनावों में भी इन में से कुछ संगठन जीतें दर्ज करते रहे हैं। नब्बे के दशक में गोपेश्वर में एसएफआई और एआईएसएफ ने छात्र संघ के चुनाव कई बार जीते। डीएवी (पीजी कॉलेज देहरादून में भी अध्यक्ष पद एसएफआई ने १९८८-८९ और १९९८ में जीता। मसूरी में एआईएसएफ चुनाव जीतता रहा है। आइसा ने १९९२ में कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। १९९९ २००१ २००२ २००७ रामनगर में भी इस संगठन ने जीत हासिल की। २००० में तो श्रीनगर पिथौरागढ़ आदि कई स्थानों पर आइसा ने जीत हासिल की। २०१० में श्रीनगर में आइसा जीता। अभी हाल में पिथौरागढ़ के चुनाव में भी आइसा ने अध्यक्ष पद जीता। २००४  अल्मोड़ा में प्रगतिशील छात्र संगठन ने भी छात्र संघ चुनाव में जीत हासिल की।

 

समग्रता में देखें तो उत्तराखण्ड में छात्र आंदोलन का एक गौरवशाली अतीत रहा है। नवउदारवादी नीतियों के हमलों के इस दौर में जब छात्र-युवाओं के बीच खाओ-पीयो-मौज करो की संस्कूति का प्रसार जोर-शोर पर है शिक्षा के निजीकरण- बाजारीकरण और लिंगदोह समिति की सिफारिशों की मार ने भी छात्र राजनीति को कमजोर किया है। शिक्षा रोजगार के बढ़ते संकट चौतरफा भ्रष्टाचार और संसाधनों की लूट के बीच उत्तराखण्ड के बारह साल छात्र-युवाओं और यहां की आम जनता के सपनों के सत्ता के कदमों तले कुचले के जाने के बारह साल हैं। राज्य की लड़ाई लड़ने वाले छात्र- युवाओं को राज्य में अपने लिए शिक्षारोजगार और बेहतर भविष्य की लड़ाई में भी उतरना होगा वरना गुंडा लम्पट राजनीति के संरक्षक सब हजम कर जायेंगे।

(लेखक आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं।

 

 

 
         
 
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