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देश
 
शशिकला को सर्प&दंश

आमतौर पर सियासत की तुलना शतरंज की विसात से की जाती है। मगर तमिलनाडु में चल रहे सियासी ड्रामा को देखकर लुडो का खेल याद हो आता है। बचपन में हम एक खेल खेला करते थे सांप सीढ़ी वाला। इस खेल में एक कागज पर एक से सौ तक डिब्बे बने होते हैं। अगर आप सौ नंबर पर पहुंच गए तो आप विजयी माने जाते हैं। लेकिन इस खेल की एक खास बात यह है कि उन डिब्बों पर सांप और सीढ़ी बनी होती है। जिस डिब्बे पर सीढ़ी बनी होती है] उस पर अगर आप पहुंचे तो आपकी अचानक वृद्धि हो जाती है और आप सात नंबर से उठकर ९३ नंबर पर पहुंच जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ अगर आप विजयी होने के एक नंबर पीछे वाले यानी कि ९९ नंबर पर अगर पहुंचे तो वहां एक सांप बड़ा सा मुंह फाड़े होता है] जो आपको सीधे तीन नंबर पर लाकर पटक देता है। कुछ ऐसा ही हुआ तमिलनाडु में शशिकला के साथ। नियति के सर्प&दंश से शशिकला का सत्ता स्वप्न अचानक टूट गया।

 गौरतलब है कि तमिलनाडु में पांच फरवरी को अन्नाद्रमुक के विधायकों ने जयललिता की करीबी वीके शशिकला को विधायक दल का नेता चुन लिया था। इसके बाद उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था। लेकिन राज्यपाल ने उन पर चल रहे मुकदमे की वजह से उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई। अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए आय से अधिक संपत्ति के मामले में चार साल की कैद और दस करोड़ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है। इस सजा के चलते वह दस साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। जिससे उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट गया है। इससे पहले सत्रह दिसंबर २०१४ को निचली अदालत ने जयललिता सहित शशिकला को चार साल की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। शशिकला पर ६६ करोड़ रुपए की आय से अधिक संपत्ति का मामला था। यह मामला २० साल से भी ज्यादा पुराना है। इस मामले में भी जयललिता आरोपी थीं। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने जे जयललिता के पांच दिसंबर को हुए निधन को ध्यान में रखते हुए उनके खिलाफ दायर अपीलों पर कार्यवाही खत्म की। ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद शशिकला सत्ताईस दिन तक जेल में रही थीं।

स्पष्ट रहे कि पिछले कई दिनों से तमिलनाडु में सीएम पद की दावेदारी के चलते राजनीतिक संकट गहराया हुआ है। शशिकला मुख्यममंत्री पद की दावेदारी कर रही थीं। इस संबंध में उन्होंने पन्नीरसेल्वम से इस्तीफा भी ले लिया था। हालांकि बाद में पन्नीेरसेल्वम बागी हो गए। उन्होंने पार्टी पर आरोप लगाया कि उन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला गया। शशिकला तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री और दिवंगत नेता जयललिता की करीबी थीं। वह जया के साथ ही उनके बंगले में रहती थीं। शशिकला को सजा सुनाए जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम का मुख्यमंत्री बनना तय था। लेकिन अन्नाद्रमुक के विधायक दल ने ईके पलानीस्वामी को विधायक दल का नेता और ओ पन्नीरसेल्वम को पार्टी से निकाल दिया। बहरहाल शशिकला के करीबी पालनीसामी को राज्यपाल विद्यासागर राव ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई। पालनीसामी के साथ तीस अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ली। मुख्यमंत्री को पंद्रह दिन के भीतर बहुमत साबित करने के लिए कहा गया है।


मुश्किल मुकाबले में मोदी

  • सिराज माही
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव काफी हद तक देश की राजनीति का भविष्य तय करने वाला है। इस चुनाव की जीत&हार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख निश्चित होगा। इसीलिए मोदी यहां अपना सब कुछ झोंक रहे हैं। विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में शामिल भारतीय जनता पार्टी ¼भाजपा½ ने साल २०१४ का आम चुनाव मोदी के चेहरे के बल पर लड़ा था। तबसे हुए लगभग हर विधानसभा चुनावों में भाजपा मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ रही है। विधानसभा चुनावों में मोदी का डर कुछ इस तरह रहा कि बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस] जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा। जिसमें उनको शानदार जीत मिली। नतीजतन भाजपा बिहार की सत्ता से दूर रही। उसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के सत्ता पर काबिज होने के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए कांग्रेस और 

समाजवादी पार्टी ¼सपा½ ने गठबंधन किया है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है। उत्तर प्रदेश में २०१२ के विधानसभा चुनावों में सपा को ४०३ में से २२४ सीटें मिली थीं और वह पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। लेकिन लोकसभा चुनावों में उसे ८० सीटों में मात्र पांच सीटें मिलीं। इसी तरह कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में करीब २८ सीटें जबकि लोकसभा चुनाव में मात्र दो सीटें मिलीं। इन आंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर ये दोनों दल अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरते तो इस चुनाव में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता। इसलिए सपा और कांग्रेस को गठबंधन करना पड़ा। 

कांग्रेस २०१४ के आम चुनावों में बुरी तरह हारी। उसके बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी वह लगातार हारती आई। शायद उत्तर प्रदेश में गठबंधन के सहारे उसे यहां कुछ राहत मिले। दूसरी बात लोकसभा चुनावों के बाद सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बसपा के अलावा भाजपा बन कर उभरी है। इसलिए उसने कांग्रेस का दामन थामा। दोनों का मकसद भाजपा को हराना है। 

सपा और कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने से सबसे बड़ा फायदा यह होने की उम्मीद है कि बिखरे हुए मुसलमान मतदाता इस गठबंधन का साथ दे सकते हैं। और अभी तक उत्तर प्रदेश चुनावों का गणित यही बताता है कि जिस दल के साथ मुसलमान मतदाता होते हैं] उसकी जीत आसान हो जाती है।

सपा और कांग्रेस ने समझौता करते हुए तय किया कि कांग्रेस १०५ सीटों पर और सपा २९८ पर चुनाव लड़ेगी। समझौता होने से पहले ही सपा ने ३०० से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे और उनमें से बहुतों को चिन्ह भी दे दिया गया था। बाद में हुए गठबंधन में जिनकी सीट कांग्रेस के खाते में गई वहां के उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी छोड़ने को राजी नहीं हुए। लिहाजा करीब बारह सीटों पर सपा और कांग्रेस उम्मीदवार सामने आ गए। हालांकि दोनों पार्टियों ने आपसी सहमति से इस मामले को सुलझा लिया। इसके बाद कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद ने दावा किया कि कांग्रेस सपा का गठबंधन दो साल बाद आने वाले 

लोकसभा चुनावों में भी न केवल कायम रहेगा] बल्कि दोनों पार्टिंयां मिलकर सरकार भी बनाएंगी। उत्तर प्रदेश में अगर सपा सरकार के कामकाज की बात करें तो जनता उनके काम से खुश है। सपा ने अपने द्घोषणापत्र में भी कई लुभावने वादे भी किए हैं। इसके अलावा केंद्र में भाजपा सरकार के कामकाज से लोगों में कुछ चीजों को लेकर निराशा हुई है। पर पिछले दिनों सपा में जिस तरह खींचतान चली] उससे कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ा। इससे कुछ सीटें कम आने की संभावना थीं जिसे सपा ने कांग्रेस से गठबंधन कर इस कमी को भी पूरा कर दिया।

जानकारों की मानें तो उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा की स्थिति सपा&कांग्रेस गठबंधन से पहले काफी मजबूत नजर आती थी। सपा सरकार को मुजफ्फरनगर में हुए दंगों को न रोक पाने में विफलता के कारण भले ही कुछ नाराजगी ही झेलनी पड़े। लेकिन सपा और कांग्रेस के इस गठबंधन से अब भाजपा और बसपा दोनों के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।

 

 
         
 
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  • गुंजन कुमार

कई दिनों से आंदोलन कर रहे लोग अब प्रधानमंत्री के समक्ष भी गुहार लगाने लगे हैं

उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों के साथ ही मैदानी

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