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प्रदेश 
 
संकट में जलचर

 

  • दिनेश पंत
उत्तराखण्ड में मत्स्य पालन से स्वरोजगार और आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन नीति&नियोजकों ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया

उत्तराखण्ड में मत्स्य पालन न सिर्फ सैकड़ों हाथों को रोजगार दे सकता है] बल्कि राज्य की आर्थिकी में भी इसका अभूतपूर्व योगदान साबित हो सकता है। लेकिन नीति नियोजकों ने इस तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। नतीजा यह है कि तमाम संभावनाओं वाला यह 'जलचर' अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। प्रदेश में नील क्रांति की संभावना खत्म होती जा रही है। 
पूरे प्रदेश में २६८६ किमी लंबी नदियां हैं। २००७५ हेक्टेयर जलाशय हैं। २९७ हेक्टेयर प्राकूतिक झीलें हैं। ७०० हेक्टेयर में तालाब और पोखर हैं। इनका सदुपयोग किया जा सकता था। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में मत्स्य उत्पादन की पहल नहीं हो रही है] लेकिन जितना वैध उत्पादन होता है उससे भी ऊपर अवैध उत्पादन के चलते संभावनाएं सिकुड़ रही हैं। वर्तमान में प्रदेश में ३८९० टन प्रतिवर्ष वैध मछली का उत्पादन होता है। चार करोड़ प्रतिवर्ष मत्स्य बीज का भी उत्पादन होता है। मत्स्य विभाग द्वारा काश्तकरों को इसके लिए लगातार प्रेरित भी किया जाता रहा है। छोटे तालाबों के जरिए भी मत्स्य उत्पादन के प्रयास हो रहे हैं। प्रदेश में मत्स्य विभाग की कई इकाइयां भी इस समय काम कर रही हैं। जनपद पिथौरागढ़ में नैनी सैनी] बागेश्वर में बैजनाथ] अल्मोड़ा में मनान व कोसी] नैनीताल में भीमताल] नौकुचियाताल] सातताल] ऊधमसिंह नगर में नानकसागर डैम] हरिपुरा] हैचरी] तुमड़िया] ढौरा] बौर एवं हरिद्वार में पनियाल में मत्स्य विभाग की कई इकाइयां काम कर रही हैं। कहने को तो बैंकों से ऋण एवं अनुदान मत्स्य किसानों को दिया जाता है। गेम फिशरीज विकास योजना भी प्रदेश में चलाई जा रही है। 
पर्यटन विकास के तहत पर्यटकों को एंगलिंग लाइसेंस भी दिए जा रहे हैं। पर्यटकों को लुभाने के लिए मत्स्य आखेट जैसी योजनाएं भी बनी] लेकिन यह पर्यटकों को लुभा पाने में सफल नहीं हो पाई। भारतीय कूषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से शीत जल मत्स्य पालन के नाम पर कई प्रायोगिक योजनाएं भी प्रदेश में चलाई जा चुकी हैं। जनपद पिथौरागढ़ के सेराद्घाट] ऊपरी रामगंगाद्घाटी के मुवानी] थल] द्घाट सहित प्रदेश की तमाम नदियों में डायनामाइट व ब्लीचिंग पाउडर डालकर मछलियों को मारा जा रहा है। नदी द्घाटी क्षेत्र के हजारों ऐसे परिवार हैं जिन्होंने मत्स्य पालन को आजीविका से जोड़ा है जो जाल डालकर मछलियां पकड़ते हैं। लेकिन वहीं कुछ लोगों ने शॉर्टकट अपनाकर इनकी आजीविका को भी प्रभावित किया है। आजीविका के नाम पर मछलियों का अवैध शिकार हो रहा है। 
जल&कल विभागों के पास उपलब्ध रहने वाला ब्लीचिंग पाउडर ही अवैध रूप से शिकारियों को उपलब्ध हो रहा है। ऐसे में आरोप लगाए जाते रहे हैं कि जिस जल&कल विभाग के ऊपर जल और जलचर को बचाने की जिम्मेदारी थी वही इनकी जान लेने में बराबर का जिम्मेदार बन रहा है। इस समय पहाड़ी नदियों में पाई जाने वाली महाशीर प्रजाति की मछलियां सर्वाधिक संकट में हैं। इनमें प्रजनन की भारी कमी हो रही है। इस समस्या को देखते हुए अभी गढ़वाल विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसरों को कार्य योजना तैयार करने का जिम्मा सौपा गया है। उल्लेखनीय है कि मई से अगस्त के बीच महाशीर प्रजनन करती हैं। इसके लिए उसे साफ] कठोर एवं रेतीली भूमि की आवश्यकता होती है। ऐसे में मछलियां जब प्रजनन के लिए किनारे आती हैं तो शिकारी उन्हें पकड़ लेते हैं। पहले जहां महाशीर मछली का वजन आठ किलो तक हो था तो वहीं अब यह ?kVdj ६०० ग्राम के बीच पहुंच चुका है। कहने को तो पौढ़ी के सतपुली एवं टिहरी डैम के पास कोटेश्वर में बीज उत्पादन की नर्सरी भी तैयार की गई है ताकि महाशीर का संरक्षण हो सके। लेकिन काली सरयू सहित तमाम नदियों में बारूदी सुरंग और खनन के चलते यह प्रजाति खतरे में आ चुकी है। 
भारतीय कूषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के तहत चंपावत में संचालित देश के एकमात्र रेनबो ट्राउड अनुसंधान केंद्र में भी पूर्व में ढेर सारी मछलियों की मौत हो चुकी है। चंपावत के शीतल जल मत्स्यकी अनुसंधान केंद्र में रेनबो ट्राउड मछली का अनुसंधान होता है और साथ ही बीज भी तैयार किया जाता है। लेकिन मछलियों की मौत के बाद इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।   
उत्तराखण्ड जैसे प्रदेश में जहां कूषि योग्य भूमि बेहद कम है] वहां पर मत्स्य पालन आजीविका के एक बड़े साधन के रूप में विकसित हो सकता था। एक हद तक यह पलायन को रोकने में भी सफल साबित हो सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसे तरीके से किया जाय तो मात्र एक वर्ष में ही यह व्यवसाय १२ हजार से भी अधिक लोगों को रोजगार देने के साथ ही करीब २६ करोड़ रुपए का व्यवसाय भी कर सकता है।

उत्तराखण्ड में मत्स्य पालन की अपार संभावनाएं हैं। यह प्रदेश को त्रिआयामी लाभ पहुंचा सकता है। पहला] इससे लोगों को रोजगार मिलता जो लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाता। दूसरा] प्रदेश की आर्थिकी में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण योगदान देता। तीसरा] यह पलायन रोकने में एक हद तक सफल भी साबित होता।  
&डॉ भुवन पाण्डे] मत्स्य विशेषज्ञ 


राष्ट्रीय दलों का बिगड़ा गणित
  • सुमित जोशी
देवभूमि की सत्ता पाने के लिए चल रहे जोर आजमाइश मतदान के साथ ही थम गई। राज्य की ६९ विधानसभा सीटों के ६२८ प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में कैंद हो गया है। राज्य की तमाम सीटों पर मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के बीच ही टक्कर देखी जा रही है। लेकिन कुछ सीटों पर सपा&बसपा के साथ ही कई निर्दलीय प्रत्याशी भी राष्ट्रीय दलों के समीकरण बिगाड़ते दिख रहे हैं। ऐसा ही कुछ हाल हॉट विधानसभा सीट रामनगर में भी देखने को मिल रहा है। रामनगर सीट पर करीब ७१ प्रतिशत मतदान हुआ। 
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस का अच्छा प्रभाव देखने को मिला। वहीं मालधन क्षेत्र में भी जातिगत आधार पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत दिखी। ऐसा इसलिए क्योंकि २०१२ के चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहे किशोरी लाल और सांसद प्रतिनिधी बसंती आर्या ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। बसपा प्रत्याशी को २०१२ में यहां से अच्छा वोट मिला था। वहीं मतदान के बहिष्कार की बात कर रहे वनग्राम के लोगों ने अन्त में कांग्रेस के समर्थन की बात कही। भाजपा को वनग्रामों से नुकसान होता दिख रहा है] क्योंकि यहां कांग्रेस के अलावा प्रभात ध्यानी की भी अच्छी पकड़ मानी जाती है। 
भाजपा के गढ़ माने जाने वाले कानीया] सांवल्दे और गौजानी क्षेत्र में प्रभात ध्यानी के समर्थकों की अच्छी खासी संख्या है। इन क्षेत्रों में बसपा भी वोट अपनी ओर खिंचती दिख रही है। जिसका सीधा नुकसान भाजपा को होना तय बताया जा रहा है। इसके अलावा भाजपा प्रत्याशी दीवान सिंह बिष्ट के गृह क्षेत्र शंकरपुर में कांग्रेस की दस्तक से खेल बिगड़ने के पूरे आसार हैं। २०१२ में भी शंकरपुर से कांग्रेस काफी मजबूत स्थिति में थी। बात क्षेत्र के उत्तरी छोर में बसे भरतपुरी] पम्पापुरी] दुर्गापुरी और कौशल्यापुरी की करें तो इस क्षेत्र को भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी रणजीत रावत की रिश्तेदारी और सल्ट के लोगों की अधिक संख्या को देखते हुए इस बार इस क्षेत्र से कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी। मगर ऐन वक्त पर भाजपा का दामन थामने वाले पूर्व छात्र संद्घ अध्यक्ष गणेश रावत और 'हम' संयोजक यशपाल रावत ने कांग्रेस के मनसूबों पर पानी फेर दिया लगता है। गणेश और यशपाल का इस क्षेत्र में अच्छा दबदबा माना जाता है। इसके अलावा इन दोनों के भाजपा में आने से रामनगर के अन्य क्षेत्रों में भी असर पड़ता दिख रहा है। बसपा मुस्लिम क्षेत्रों में कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है। रामनगर के मतदाताओं ने अपना आशीर्वाद किसे दिया है] यह तो ११ मार्च को ईवीएम खुलने के बाद ही पता चलेगा। मगर रामनगर में मोदी मैजिक और हरदा फैक्टर कम ही देखने को मिला। अधिकतर लोगों ने पूछने पर बताया कि उन्होंने १६ सालों से हुई रामनगर की उपेक्षा के खिलाफ मतदान किया। युवा मतदाओं ने शिक्षा और रोजगार के लिए मतदान किया। इस सीट पर इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद लगाई जा रही थी। लेकिन वैसा नहीं हुआ। 


भयभीत प्रत्याशी
रुद्रप्रयाग। केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र का एक गांव ऐसा है जहां इस बार राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता से लेकर प्रत्याशी तक वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए उन्होंने गांव से दूरी बनाए रखने में ही भलाई समझी। दरअसल] ऊखीमठ तहसील का तोषी गांव सड़क से ८ किलोमीटर दूर है। गांव के लोग वर्ष २००४ से गांव को सड़क से जोड़ने की मांग कर रहे हैं। लेकिन गांव के सेंचुरी एरिया में होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया है। लिहाजा ग्रामीणों को बुखार की दवा से लेकर अन्य जरूरी कार्यों के लिए त्रियुगीनारायण या सोनप्रयाग की दौड़ लगानी पड़ती है। बच्चों को ८वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जीजीआईसी त्रियुगीनारायण जाना पड़ता है। गांव के लोग सड़क] स्वास्थ्य] शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों से वंचित हैं। ग्रामीणों ने सड़क को लेकर कई बार शासन] प्रशासन को अवगत कराया] लेकिन कहीं से भी कोई सुनवाई नहीं हुई। मजबूर होकर उन्होंने निर्णय लिया कि वे इस बार नोटा का इस्तेमाल करेंगे। उनके आक्रोश से डरकर किसी भी प्रत्याशी और कार्यकर्ता ने गांव का रुख नहीं किया। 

सर्दियों में झुलसे जंगल
गोपेश्वर। राज्य के निचले इलाकों में वर्षां की कमी और ऊपर से वन विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि इस बार सर्दियों के मौसम में भी जंगल जल रहे हैं। बर्फबारी के लिए दुनियाभर में मशहूर चमोली जिले की पहाड़ियों का झुलसना लोगों को हैरान कर रहा है। बदरीनाथ हाईवे के समीप हेलंग के जंगल में दावानल इस कदर भड़की कि वन विभाग के कर्मचारियों ने करीब एक द्घंटे की मशक्कत के बाद इस पर काबू पाया। 
पीपलकोटी के पास की चट्टानें भी आग से काली पड़ी हुई हैं। द्घाट ब्लॉक के अंतर्गत रामणी के जंगल में भी आग लगी। इससे वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचा है। जानकारों की मानें तो जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अवश्य जमकर बर्फबारी हुई। लेकिन निचले क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई है। नमी कम होने से सर्दियों में भी जंगल जल रहे हैं। कुछ लोग इसमें वन विभाग की लापरवाही को जिम्मेदार मान रहे हैं। दूसरी ओर वन विभाग के अधिकारियों की दलील है कि तपोवन क्षेत्र में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन जंगलों की पिरूल इकट्ठा कर कंट्रोल वर्निंग करने में जुटा हुआ है। बदरीनाथ हाईवे से लगे जंगलों में कई बार लोग बीड़ी&सिगरेट फेंक देते हैं जिससे आग लग जाती है। आग लगने की सूचना मिलते ही तत्काल टीम भेजी जा रही है।

आवाजाही से सुकून
पिथौरागढ़। चुनाव में गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए सील की गई भारत&नेपाल सीमा को फिर से खोल दिए जाने पर लोगों ने राहत की सांस ली है। सीमा क्षेत्रों के आस&पास बसे दोनों देशों के नागरिकों को सीमाएं बंद होने से आवाजाही में दिक्कतें हो रही थीं। गौरतलब है कि भारत और नेपाल के बीच आवाजाही के लिए झूलाद्घाट] जौलजीबी] बलुवाकोट] धारचूला में झूलापुल बने हैं। इन पुलों से रोजाना सैकड़ों की संख्या में लोग आवाजाही करते हैं। यहां तक कि नेपाल के सीमावर्ती गांवों से लोग खरीदारी के लिए भारतीय क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में पुलों पर एसएसबी की तैनाती से पुल बंद होने से उनके सामने गंभीर समस्या पैदा हो गई। हालांकि नेपाल में दुर्द्घटनाग्रस्त और बीमार लोगों को भारत में इलाज मुहैया कराने के लिए एसएसबी के वाहिनी मुख्यालय और रिटर्निंग ऑफिसर से अनुमति की व्यवस्था थी। लेकिन लोगों को रोजाना की जरूरी चीजें लेने में दिक्कतें आईं।

 
         
 
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  • प्रेम भारद्वाज

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