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मिसाल
 
लोहे का हल

 

  • आकाश नागर

उत्तराखण्ड में हर साल कृषि उपकरणों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते रहे हैं। लेकिन अब किसानों में लकड़ी की जगह लोहे का हल लोकप्रिय हो रहा है। ऐसे में पर्यावरण के बचे रहने की संभावनाएं बन गई हैं। लोहे का यह हल स्याही देवी विकास समिति और विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान के संयुक्त प्रयास से विकसित हो पाया है

इस समय पूरे विश्व में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक ताप वृद्धि के दुष्प्रभावों के कारण कई तरह के खतरे महसूस किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसके लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन तथा जंगलों के कटान को जिम्मेदार ठहराया है। उत्तराखण्ड में भी जंगल तेजी से नष्ट हो रहे हैं। यहां हर साल लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर किए जा रहे हैं। वृक्षारोपण कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम लाने में विफल रहा है। इसका एक प्रमुख कारण यह रहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग उपयुक्त विकल्प के अभाव में अपनी दैनिक आवश्यकताओं जलौनी लकड़ी] कूषि उपकरण] ईमारती लकड़ी आदि के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। अकेले हल] नहेङ] जुआ] दनेला आदि कूषि उपकरणों के लिए ही १२ लाख किसान परिवार वनों पर आश्रित हैं। इसके परिणाम स्वरूप हर साल लाखों की संख्या में बांज] फलयांट] उतीस] सानण] मेहल आदि के पेङ काटे जा रहे हैं। जिससे पर्यावरण] पेयजल स्रोतों तथा जैवविविधता को अपूरणीय हानि पहुंच रही है। लेकिन अब लकड़ी की जगह लोहे के हल का विकल्प आया है तो संभावनाएं हैं कि काफी पेड़ बचे रह पाएंगे।

 स्याही देवी विकास समिति] शीतलाखेत] अल्मोड़ा ने वर्ष २००४ से लकड़ी के परम्परागत हल का धातु निर्मित विकल्प विकसित करने की मांग उठाई और इस दिशा में प्रयास किए। वर्ष २०११ में विवेकानंद पर्वतीय कूषि अनुसंधान संस्थान] अल्मोड़ा के निदेशक डॉक्टर जेसी भट्ट की पहल पर संस्थान तथा स्याही देवी विकास समिति] की संयुक्त टीम ने लोहे के हल के निर्माण की दिशा में काम शुरू किया। लगातार ६ माह तक खेत में किसानों के बीच काम करने और उनके सुझावों के अनुसार लौह हल का विकास किया गया। वर्ष २०१२ में इस हल का लोकार्पण किया गया और इसे 'वीएल स्याही लौह हल' का नाम दिया गया। 

२०१२ में लोकार्पण के बाद से अब तक हजारों किसान लकड़ी का हल छोड़कर इस लौह हल का प्रयोग करने लगे हैं जिससे हर साल हजारों की संख्या में बांज आदि चौड़ी पत्ती प्रजाति के पेड़ों को कटने से बचाने में कामयाबी मिली है। इस वक्त जनपद अल्मोड़ा के सैकड़ों गांवों में २००० किसान] बागेश्वर जनपद में लगभग १०० किसान तथा चमोली जनपद में लगभग २५० किसान लोहे के हल का प्रयोग कर रहे हैं। चिपको आन्दोलन के नेता पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट की संस्था सीपी मेमोरियल ट्रस्ट गोपेश्वर की ओर से चमोली जिला के दशोली] पोखरी विकासखंडों के २२ गांवों में निशुल्क हल वितरित किए गए हैं। जिनमें से कुलेनडु] कुनकुली तथा बेमरू गावों में शतप्रतिशत लोहे के हल चलाये जा रहे हैं। इन हलों के उपयोग में आने से हर साल बांज] फलयांट] मेहल] सानण के सैकड़ों पेड़ कटने से बचाये गए हैं। पिछले ४ सालों से लगातार हल का प्रयोग कर रहे विभिन्न जिलों के किसानों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया के आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के असिंचित खेती के लिए लकड़ी के परम्परागत हल का उपयुक्त विकल्प तैयार हो गया है। यदि शासन प्रशासन]पर्यावरण प्रेमियों द्वारा सहयोग दिया जाता है और वीएल स्याही लौह हल को प्रत्येक किसान तक पहुंचाया जाता है तो केवल कूषि उपकरणों के लिए प्रतिवर्ष लाखों पेड़ कटने से बच जाएंगे।

लौह हल को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए स्याही देवी विकास समिति को काफी मेहनत करनी पड़ी। यहां तक कि समिति ने चन्दा एकत्र कर किसानों को काफी कम कीमत पर हल उपलब्ध कराए। सैकड़ों साल से लकड़ी के हल के इस्तेमाल के आदी किसानों को लोहे के सस्ते हल के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई प्रकार का प्रतिरोध झेलना पड़ा। मगर धीरे-धीरे किसान यह समझने लगे कि यदि कूषि उपकरणों के लिए इसी तरह पेड़ों का कटान जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सारे पेड़ कट जायेंगे और फिर मजबूरी में ही सही लकड़ी के हल का विकल्प बनाना ही होगा। शुरुआती दौर में कई गांवों में कुछ किसान ही लोहे के हल के इस्तेमाल के लिए राजी हो पाए] मगर धीरे-धीरे इन किसानों को लोहे के हल के इस्तेमाल से संतुष्ट देख अन्य किसानों की ओर से भी हल की मांग की जाने लगी। इस दौरान किसानों द्वारा हल के मॉडल में सुधार करने की सलाह भी दी जाने लगी। किसानों के सुझावों को देखते हुए आवश्यक सुधार किए गए। 

२०१२-२०१३ में स्याही देवी विकास समिति] शीतलाखेत ने कई दानदाताओं के सहयोग से हल वितरण के शिविर आयोजित किए। जिनमें लागत मूल्य से काफी कम कीमत पर और लाटरी निकाल कर मुफ्त में लोहे के हल दिये गये। इसके बाद जिला नवाचार निधि के तहत जिला प्रशासन अल्मोड़ा के सहयोग से ७०० रुपए की कीमत पर किसानों को ५०० हल उपलब्ध कराये गये। बीच-बीच में कूषि विभाग की ओर से भी किसानों को हल उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। किसानों के बीच लगातार बढ़ रही लौह हल की लोकप्रियता को देखते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी की संस्था ने २०१४]२०१५ में चमोली जनपद के दूरस्थ गांवों में निशुल्क हल वितरित किए गए।

पिछले ४ साल से लौह हल को लेकर किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के उपरांऊ (असिंचित) खेतों के लिए लकड़ी के बने परम्परागत हल का विकल्प तैयार हो गया है। विकल्प के तैयार होने के बाद हर किसान तक हल को पहुंचाने के लिए समाज के हर तबके का सहयोग जरूरी है। मगर शासन -प्रशासन] गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ लगातार वार्ता] निवेदन करने के बाद भी कहीं से कोई सहायता नहीं मिल रही है] जिस कारण विकल्प होने के बावजूद लाखों किसानों द्वारा अभी भी लकड़ी के हल को बनाने के लिए असंख्य पेड़ों को काटा जा रहा है। हर किसान तक हल के पहुंचने के मार्ग में सरकारी तंत्र ही रुकावट बन रहा है। 

कूषि विभाग द्वारा हल आदि पशुचालित यंत्रों पर मात्र ४० प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है जबकि किसानों द्वारा निरन्तर मांग की जा रही है कि पेड़ों को बचाने में इस हल की उपयोगिता को देखते हुए इस हल पर अनुदान ८० प्रतिशत किया जाए। अनुदान बढ़ाने की मांग को लेकर संस्था द्वारा क्षेत्रीय विधायकों] सांसदों के साथ-साथ भारत सरकार के वन मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री से भी गुहार लगाई। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। आश्चर्य का विषय है कि एक ओर राज्य सरकार द्वारा नागरिकों को पौधारोपण के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ४ साल के पौधे को विकसित करने पर ४०० रुपए की धनराशि दी जा रही है वहीं हल आदि कूषि उपकरणों के लिए कट रहे ८० -१०० साल की उम्र वाले पेड़ों की कोई कीमत ही नहीं है। स्याही देवी विकास समिति के मुख्य सलाहकार गजेंद्र कुमार पाठक के अनुसार लोगों के पास हल बनाने के लिए लकड़ी कटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। लेकिन अब किसानी को लोहे का हल का विकल्प मिल गया है। ऐसे में सरकार को हल हर किसान तक पहुचाना चाहिए। जिसके लिए ८० प्रतिशत सब्सिडी दी जानी चाहिए।

   akash@thesundaypost.in


चुनाव के बीच अवैध खनन

हरिद्वार। राज्य में जहां एक ओर शासन-प्रशासन पूरी तरह चुनाव में मुस्तैद रहा तो वहीं दूसरी ओर हरिद्वार में खनन माफिया ने इस मौके का जमकर फायदा उठाने में कोई चूक नहीं की। हालत यह हैं कि शहरी क्षेत्र में प्रशासन की नाक के नीचे ही अवैध खनन होता रहा।  सप्तसरोवर क्षेत्र में महाराजा अग्रसेन ?kkV के पास गंगा नदी के दोनों ओर दिन-रात अवैध खनन का सिलसिला चलता रहा। दरअसल क्षेत्र में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की ओर से गंगा नदी के किनारे 

पत्थरों के वायरक्रेट बनाए जा रहे हैं। इस कार्य की आड़ में क्षेत्र के खनन माफिया ने योजनाबद्ध ढंग से गंगा नदी में जमा माल साफ किया। जिन स्थानों पर नदी में टै्रक्टर-ट्राली नहीं पहुंच पाई। वहां द्घोड़े-खच्चरों से पत्थर] रेत और बजरी निकलवाया गया। सप्तरोवर रोड पर सिंचाई विभाग की खाली मेला भूमि का इस्तेमाल अवैध खनन के भंडारण में किया गया। सर्वानंद ?kkV] जयराम पुल] लक्कड़ बस्ती आदि जगहों पर माफिया की खूब मौज रही। अवैध खनन से भविष्य में चंडी?kkV पुल के पिलरों को खतरा हो सकता है। बैरागी कैंप कनखल और दक्ष मंदिर के सामने भी गंगा नदी से जमकर खनन हुआ।


बर्फ की बेरुखी

चमोली। शीतकालीन खेलों के लिए दुनिया भर में मशहूर औली में इस बार कम बर्फबारी होने की मार यहां होने वाली राष्ट्रीय स्कीइंग चैंपियनशिप पर पड़ी है। एक तो बर्फ कम पड़ी और दूसरे धूप खिली रहने से पर तापमान इतना बढ़ा कि बर्फ जल्दी ही पिद्घल गई। ऐसे में देहरादून में जीएमवीएन और विंटर गेम्स एसोसिएशन की बैठक १९ से २२ फरवरी के बीच प्रस्तावित राष्ट्रीय स्कीइंग चैंपियनशिप को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है। जीएमवीएन के महाप्रबंधक बीएल राणा के मुताबिक राष्ट्रीय स्कीइंग चैंपियनशिप फिलहाल के लिए स्थगित की गई है। यदि इस माह बर्फबारी होती है] तो तत्काल बैठक  कर चैंपियनशिप आयोजित की जाएगी। बहरहाल चैंपियनशिप के स्थगित होने से न सिर्फ स्कीइींग के खिलाड़ी और पर्यटक बल्कि पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को भी निराशा हुई है। 

 

 
         
 
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