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vad 37 05-03-2017
 
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चुनाव 3
 
एजेंडे से बाहर सड़क सुरक्षा

 

  • दिनेश पंत

प्रदेश में पिछले आठ वर्षों के दौरान तेरह हजार से अधिक सड़क हादसे हुए। विधानसभा चुनाव के बीच भी सड़क nq?kZVukएं हुईं। एक हादसे में कर्णप्रयाग सीट के बसपा प्रत्याशी की दर्दनाक मौत हुई। इसके बावजूद सुरक्षित यातायात राजनीतिक दलों के एजेंडे का विषय नहीं बन पाया

 

कर्णप्रयाग विधनसभा सीट से बसपा प्रत्याशी कुलदीप सिंह कनवासी और पंतनगर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ + आलोक शुक्ला की सड़क हादसे में मौत ने यह साबित कर दिया कि प्रदेश में लगातार बढ़ती सड़क nq?kZVukvksa के प्रति कोई भी राजनीतिक दल गंभीर नहीं है। अगर होता तो जान व माल को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाने वाले सड़क हादसे इन दलों के एजेंडे में जरूर शामिल होते। दूसरा केंद्र सरकार का आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशनों के मार्फत वाहनों की जांच करने और फिटनेस सार्टिफिकेट जैसे प्रयासों का जमकर विरोध हो रहा है। जो चल रहा है] उसे चलने दो की मानसिकता के चलते प्रदेश में हर साल एक हजार से अधिक लोग nq?kZVukvksa में अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं। विगत आठ साल में एक लाख तेरह हजार से vf/kd सड़क हादसे हो चुके हैं। इन हादसों में केवल व्यक्ति नहीं मरते बल्कि पूरा परिवार ही बिखर जाता है। कई परिवारों के समक्ष तो भरण&पोषण की समस्या भी पैदा हो जाती है। nq?kZVuk के बाद दिए जाने वाले मुआवजे से भले ही दीर्द्घतात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हो लेकिन पीड़ित परिवारों के द्रीर्द्घकालीन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। सामाजिक] आर्थिक नुकसान अलग से प्रभावित परिवारों को उठाना पड़ता है। इन परिवारों को हादसे से पैदा हुई मानसिक स्थिति से उबरने में वर्षों लग जाते हैं। जो खालीपन और वीरानगी परिवार में आ जाती है उसे तोड़ पाना बेहद कठिन होता है। लेकिन तमाम जागरूकता अभियानों के बाद स्थितियां न तो सुधर पाई हैं न ही यह महत्वपूर्ण विषय राजनीतिक दलों के एजेंडे में शामिल हो पाया। 

 प्रदेश में सड़क सुरक्षा सप्ताह तो मनाया जाता है लेकिन सड़कों की हालत सुधारने की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। गाड़ियां बगैर मेंटीनेंस के सड़कों पर दौड़ रही हैं। प्रदेश की अधिकतर सड़कें सड़क डिजाइनिंग की खामियों से पटी हैं। टै्रफिक नियमों का प्रभावी तरीके से पालन नहीं के बराबर होता है। कहने को तो मोटर वाहन कानून १९८८ बना है लेकिन इसे कारगर तरीके से लागू करने के प्रयास नहीं होते। वाहनों की सुरक्षा खामियां nq?kZVuk की वजह बनती हैं लेकिन मजिस्ट्रेरियल जांच के आदेश से आगे बात नहीं बढ़ पाती है। nq?kZVuk के बाद अगर तत्काल मेडिकल उपचार ?kk;yksa को मिल जाए तो बड़ी जनहानि को बचाया जा सकता है लेकिन इसके लिए जगह&जगह जिन ट्रामा सेंटरों की जरूरत थी] उस तरफ सरकार ध्यान नहीं दे पाई। पहाड़ों में स्थित अधिकतर स्वास्थ्य केंद्र रेफरल केंद्र बने हुए हैं जिससे समुचित इलाज न मिल पाने से लोग दम तोड़ देते हैं। द्घटना स्थल पर उपचार] एंबुलेंस एवं अस्पताल की सुविधा जैसे बचाव कार्यों के लिए प्रदेश में विगत १६ वर्षों के अंदर कोई काम नहीं किया गया। ट्रामा केयर सेंटर सिर्फ बयानों तक सीमित रह गए। प्रभावी टै्रफिक निगरानी व्यवस्था नहीं बन पाई। सड़कों पर वाहन चलाने वाले आधे से अधिक चालक अप्रशिक्षित होते हैं] यह बात सरकार और उसके नुमाइंदे जानते हैं लेकिन इसके बाद भी व्यवस्था को बनाने में रुचि नहीं दिखाई जाती। प्रदेश में सड़क हादसों के लिए लापरवाही और परिवहन संसाधनों का टोटा ही बड़ी वजह बनती है। सड़कों पर सिग्नलों] डिवाइडर का न होना] सड़कों की खराब दशा] चौराहों पर टै्रफिक लाइट या किसी पुलिस वाले का मौजूद न होना यातायात और परिवहन विभाग की कमियों को उजागर करता है। प्रदेश में टै्रफिक पुलिस बल की भारी कमी है। दूसरी ओर पंजीकृत गाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 

ड्राइविंग लाइसेंस प्रदान कराने वाली संस्था आरटीओ में लाइसेंस बनाने के नाम पर किस तरह जमकर ?kwl[kksjh होती है] यह किसी से छिपा नहीं है। सड़क पर गश्त लगाने के लिए पर्याप्त वाहन व संकेतक जैसी व्यवस्था नहीं बन पाई। nq?kZVuk की स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा का द्घोर अभाव है। तकनीक के मामले में प्रदेश का टै्रफिक विभाग काफी पिछड़ा हुआ है। सड़कों में ट्रैफिक सिग्नल नहीं बने हैं या फिर खराब पड़े हैं। वायरलेस फोन के जरिए ही काम चलाया जा रहा है। स्मार्टफोन और अन्य नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल एवं कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था पर प्रदेश में काम नहीं हो पाया। यातायात पुलिस] आरटीओ या फिर स्वयं जनता भी खुलकर यातायात के नियमों का पालन नहीं करती। हेल्मट पहनने] सीट वेल्ट लगाने] शराब पीकर और तेज रफ्तार में गाड़ी न चलाने जैसे नैतिक कर्तव्यों की याद बार&बार पुलिस ही जनता को दिलाती है जबकि प्रदेश में वाहनों का प्रयोग करने वाले हर जागरुक व्यक्ति को इसका पालन करना चाहिए था। ड्राइविंग लाइसेंस यानी सड़क पर वाहन चलाने की अनुमति देने का कोई मापदंड नहीं है। प्रदेश में ड्राइविंग ट्रैकों की कमी है। बगैर ड्राइवर ट्रैक पर दक्षता दिखाए एवं ट्रायल लिए लाइसेंस जारी होता है। वाहन चालक बनना और इसका लाइसेंस लेना सबसे सरल श्रेणी में आता है। जिसके चलते न तो सुरक्षित चालक मिल पा रहे हैं न ही वाहन सुरक्षित रह पा रहे हैं। ड्राइविंग की कोई परीक्षा तक नहीं होती। ड्राइविंग लाइसेंस बनाने में ईमानदारी नहीं होती। 

डीएल बनाने की प्रक्रिया और दलालों के बीच लाखों रुपयों का गुप्त खेल होता है। कहने को तो आरटीओ के कंप्यूटीकरण एवं आवेदन की ऑनलाइन प्रक्रिया है लेकिन इसके बाद भी लोग दलालों के जरिए काम करवाना ज्यादा पंसद करते हैं। हेलमेट का प्रयोग लोग जानबूझ कर नहीं करते। अपरिपक्व उम्र में ड्राइविंग का शौक प्रदेश की जोखिम भरी सड़कों में पूरा होता है। सड़क पर गलत तरफ से गाड़ी मोड़ना] नो पार्किंग में गाड़ी खड़ी करना] सीट बेल्ट न लगाना] ओवरलोडिंग करना] तय रफ्तार से तेज वाहन चलाना] बिना लाइसेंस वाहन चलाना सब नियम विरुद्ध काम खुलेआम होते हैं। लेकिन इन्हें रोकने की व्यवस्था पर अमल नहीं किया गया। यह आरोप सरे आम लगते आए हैं कि टै्रफिक पुलिस] आरटीओ और हाईवे पर तैनात पुलिस बलों के बीच सांठगांठ होती है। इसके अलावा नशीले पदार्थों का इस्तेमाल] पूरी नींद न ले पाना जैसे कारण भी nq?kZVukvksa की वजह बनते हैं। ट्रकों की जर्जर हालत] ओवरलोडिंग भी जानलेवा साबित हो रही है। ड्राइविंग करते समय मोबाइल का प्रयोग आम है। 

प्रदेश के अधिकतर सड़क मार्गों में पैराफिट नहीं हैं। अधिकतर पैराफिट क्षतिग्रस्त हैं] उन्हें तेजी के साथ नहीं सुधारा जाता। सड़कों के किनारे नालियों का अभाव है। कहीं कलवर्ट नहीं हैं तो कहीं पूरी तरह खस्ताहाल हैं। बरसाती पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं हैं। दरकती पहाड़ियां और गिरते बोल्डर के साथ ये तमाम कारण सड़कों को लगातार खूनी बना रहे हैं। प्रदेश की जोखिम भरी सड़कें हर साल राज्य से कुशल मानव संसाधन छीन रही हैं। लेकिन राजनीतिक दलों का एजेंडा इस विधानसभा चुनाव में भी इतने महत्वपूर्ण विषय से खाली है। 

 

अकेला कानून इस समस्या का हल नहीं है। कानून सिर्फ व्यक्तियों को नियंत्रित कर सकता है। समस्या का मूल हल तो स्वयं व्यक्ति के पास है। अगर हम नियम कानूनों का पालन करें तो अपने समाज को कई तरह की समस्याओं से निजात दिला सकते हैं।

अजय जोशी] पुलिस अधीक्षक 


विदेशों में बंधक बनते कामगार

 

  • आकाश नागर

 

चंपावत जिले के चौमेल क्षेत्र के अंतर्गत खाती गांव निवासी ४५ वर्षीय जगत सिंह पर मलेशिया में जो गुजरी उसे सुनकर कोई भी विदेश में नौकरी से पहले दस बार सोचेगा। ४५ वर्षीय जगत सिंह पर मलेशिया में जगत सिंह पहले मुंबई के होटल में सैफ का कार्य करते थे। अपने गृह क्षेत्र के एक एजेंट के माध्यम से वह २०१४ में मलेशिया के पेंटालिन जेया एसएस&२ स्थित एक होटल में कार्य करने चले गए। लेकिन अच्छी कमाई के चक्कर में वह वहां मुसीबत में फंस गए। जगत के मुताबिक होटल मालिक चेन्नई निवासी बुरहान मोहम्मद शेख ने उनका वीजा परमिट नहीं बनाया। पासपोर्ट अपने पास जमा करा लिया। तब से वह बंधक बनकर कार्य कर रहे थे। होटल मालिक १२ से १४ द्घंटे कार्य कराता था और तनख्वाह केवल १६ सौ रिंगेट देता था। पहले रिंगेट १९ रुपये के बराबर होता था] लेकिन वर्तमान में कीमत द्घटकर १५ रुपए रह गई है। वीजा न बन पाने के कारण वह बाहर भी नहीं निकल पाते थे। किचन से कमरे और कमरे से किचन तक ही आना&जाना हो पाता था। काफी मिन्नतें करने के बाद भी मालिक ने उनका परमिट नहीं बनवाया। जबकि वीजा परमिट के नाम पर दो बार कई हजार रुपये काट लिए। मालिक हर बार एक महीने की सैलरी रोक कर रखता था। 

जगत पिछले तीन साल के दौरान किसी तरह वहां से भागने की फिराक में थे। आखिरकार २० जनवरी की रात को उन्हें मौका मिला। वह होटल से भाग गए और तमिलनाडु के रहने वाले टैक्सी चालक की मदद से किसी होटल में रुके। अगले दिन भारतीय दूतावास पहुंचे। जहां पर पहले से कई भारतीय रुके हुए थे। वे भी किसी तरह होटल से भागकर आए थे। जगत ने बताया कि उन्हें भारतीय दूतावास के एक हॉल में रखा गया था। वह भी किसी जेल से कम नहीं थी। कमरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। वहीं पर उन्हें तीन टाइम दाल का पानी और चावल आदि खाने को मिल जाता था। जगत के पास चम्पावत के पत्रकार गिरीश बिष्ट का नंबर था। उन्होंने वाट्सएप के माध्यम से गिरीश को संदेश भेज कर अपने वहां फंसे होने की जानकारी दी] तब जाकर उनकी पीड़ा प्रशासन व अन्य लोगों तक पहुंच सकी। दिल्ली एवं अन्य शहरों में रह रहे क्षेत्र के लोगों के सहयोग से उनकी आवाज विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक पहुंची] तब जाकर किसी तरह भारतीय दूतावास के अफसरों ने उनके होटल मालिक से पासपोर्ट वापस लिया और उन्हें भारत लौटने का अवसर मिला। 

मलेशिया में फंसे जगत सिंह भारत लौटने पर बेहद खुश थे। उन्होंने सोचा था कि वे कुछ दिन पत्नी बच्चों के साथ सुकून से रहेंगे। उसके बाद नौकरी की तलाश करेंगे] लेकिन उनकी मुसीबतें यहीं कम नहीं हुईं। दिल्ली पहुंचने के बाद जगत सिंह यहां नौकरी कर रहे अपने साले के कमरे में रुके। सुबह बाथरूम के पास फिसलने से उनका एक पांव टूट गया। कमर में भी गंभीर चोट आई। साला बलवंत सिंह सामंत परिजनों से बातचीत करने के बाद उन्हें खटीमा छोड़ गया। खटीमा के रतूड़ी अस्पताल में जगत सिंह का उपचार चल रहा है। उनके पांव की हड्डी कई जगह से टूटी है। उसमें रॉड पड़नी है। जिसमें हजारों रुपये का खर्च आना है। मशीन में खराबी के चलते आधे में ही उनका ऑपरेशन छोड़ना पड़ा। तीन दिनों तक उन्हें गंभीर पीड़ा भुगतनी पड़ी। मशीन ठीक होने पर उनका ऑपरेशन हो सका। जगत सिंह दुखी हैं कि इस बीच दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार करा रहे उनके बड़े भाई भवान सिंह का निधन हो गया। 

उनका बड़ा बेटा रोहित भी ब्लड कैंसर से पीड़ित है। उसका उपचार मुंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में चल रहा है। पिछले तीन साल से मलेशिया में फंसे रहने के चलते वह उसे चेकअप कराने नहीं ले जा सके थे। जगत कहते हैं कि सोचा था कि भारत लौटते ही बेटे को मुंबई ले जाऊंगा। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मलेशिया में भारत के तमाम लोग उनकी तरह फंसे हुए हैं। कम से कम ६० लोग तो उसी होटल में होंगे] जिसमें वह काम करते थे। दूतावास में भी तमाम लोग फंसे हुए हैं। उन्होंने भारत सरकार से मांग की है कि वह ठोस प्रयास कर मलेशिया में फंसे भारतीयों को वापस लाए। दूतावास में हिंदी भाषी अधिकारियों की तैनाती की जाए। वहां दक्षिण भारत के अधिकारी हैं। वे हिंदी भाषी लोगों की बात ठीक से नहीं समझ पाते।

akash@thesundaypost.in

 

 
         
 
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