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vad 41 02-04-2017
 
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प्रदेश 
 
नतीजे का इंतजार

 

  • गुंजन कुमार

इस बार का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच केंद्रित रहा। मोदी ने जहां चार रैलियां की वहीं रावत  अकेले मोर्चे पर डटे रहे। अब बंपर वोटिंग को दोनों पार्टियां अपने&अपने पक्ष में बता रही हैं। भाजपा को बदलाव तो कांग्रेस को उम्मीद है कि जनता बागियों को सबक सिखाएगी। बहरहाल मोदी मैजिक और रावत के रणनीतिक कौशल के साथ&साथ सैकड़ों प्रत्याशियों का भविष्य अभी ईवीएम मशीनों में बंद है

उत्तराखण्ड में हुए रिकॉर्ड मतदान ¼करीब ७० फीसदी½ को राजनीतिक पार्टियां अपने&अपने हिसाब से परिभाषित कर रही हैं। चुनावी मुकाबले में उतरी दो प्रमुख पार्टियों में से एक भाजपा को लग रहा है कि राज्य में प्रधानमंत्री मोदी का जादू काम कर गया है और एंटी इंकेबेंसी फैक्टर भी मतदाताओं को बूथों तक खींच लाया है। दूसरी ओर कांग्रेस को भी यकीन है कि मतदाता नोटबंदी और बढ़ती महंगाई जैसी समस्याओं के चलते बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे। सत्ता की दावेदार दोनों प्रमुख पार्टियों की अपनी&अपनी दलीलें और विश्वास है। लेकिन इसमें रुककर देखने वाली बात यह है कि जरूरी नहीं बंपर वोटिंग राज्य में बदलाव के लिए ही हुई हो। पूर्व में बिहार] बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी रिकॉर्ड मतदान को बदलाव का संकेत माना गया था। इसके बावजूद नतीजे एकदम उलट आए। लेकिन सवाल यह भी है कि जब जनता नोटबंदी और महंगाई को लेकर केंद्र से इतनी ही खफा थी तो फिर सीमांत इलाकों में भी प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में हजारों की भीड़ क्यों उमड़ी? क्या यह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो सकेगी? फिलहाल राजनीतिक पार्टियां मतदान को अपने&अपने हिसाब से बता सकती हैं। लेकिन वास्तविक तस्वीर ११ मार्च को ही सामने आएगी।

अपनी रणनीति को अंजाम देने के लिए कांग्रेस&भाजपा दोनों पार्टियों ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा ने केंद्र की पूरी टीम प्रचार में उतार दी। रोजाना तीन से चार केंद्रीय मंत्रियों की रैली या सभाएं हुईं। आखिरी दिनों में पार्टी ने अपने स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी मैदान में उतार दिया। प्रधानमंत्री की राज्य में कुल चार रैलियां ¼दो गढ़वाल&दो कुमाऊं में½हुईं। उनकी रैलियों में भीड़ बहुत जुटी। पिथौरागढ़ जैसे सीमांत जिले में अभी तक किसी प्रधानमंत्री की रैली नहीं हुई थी। इस रैली में भी खूब भीड़ जुटी। अब मतदाताओं ने प्रधानमंत्री के भाषण से प्रभावित होकर मतदान किया है या नहीं] यह नतीजा आने के बाद ही पता चलेगा। वैसे मोदी ने अपने भाषण में कई लोकलुभावन वादों के साथ ही हरीश रावत सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। मोदी के भाषणों का लोगों पर कितना प्रभाव पड़ा है] यह देखने के लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा। फिलहाल भाजपा के आधे से ज्यादा उम्मीदवार मोदी के करिश्मे की आस में हैं।

कांग्रेस चुनाव प्रचार में भाजपा की तुलना में पिछड़ती रही। कारण कि भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों के मुकाबले कांग्रेस के बहुत कम बड़े नेता प्रचार में उतरे। कांग्रेस की पूरी कमान मुख्यमंत्री हरीश रावत के पास ही रही। पार्टी के केंद्रीय नेताओं में से एक दिन मनीष तिवारी और कमलनाथ ने प्रेसवार्ता की तो कुमारी शैलजा और सचिन पायलट भी सिर्फ एक दिन के लिए ही देवभूमि में आए। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हरिद्वार जनपद में रोड शो किया। उन्होंने आम जनता को एक मात्र सितारगंज रैली में संबोधित किया। हालांकि कांग्रेस के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि राहुल की एक मात्र रैली होने के पीछे चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर का दिमाग था। संभवतः मोदी की रैली में जुटी भीड़ को देखते हुए प्रशांत किशोर ने उन्हें रैली के बजाए रोड शो की सलाह दी। जिसके बाद राहुल गांधी ने हरिद्वार की सभी ग्यारह विधानसभा सीटों पर एक ही दिन रोड शो किया। उनका रोड शो भी सफल रहा। मोदी की रैली और राहुल के रोड शो में से किसका असर ज्यादा रहा] यह चुनाव नतीजे आने से ही पता चल पाएगा।

उत्तराखण्ड में कांग्रेस की ओर से पूरा चुनाव प्रचार मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने कंधों पर समेटे रहे। वे रोजाना चार से पांच सभाएं संबोधित कर रहे थे। रावत पर गढ़वाल और कुमाऊं में भेद करने का भी आरोप लगा। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान वे दोनों क्षेत्रों में एक समान दिखे। कुमाऊं और गढ़वाल के सुदूर क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करने पहुंचे भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री के हमलों का जवाब हरीश रावत अकेले देते रहे। कहा जा रहा है कि यदि वैसे में उन्हें जीत मिलती है तो पार्टी में उनका कद बहुत बढ़ जाएगा। हरीश रावत कांग्रेस आलाकमान के सामने मजबूत होंगे। पार्टी के अंदर उनके विरोधियों को मजबूरन शांत होना पड़ेगा। ऐसे पार्टी में अब उनके बहुत कम विरोधी बचे हैं। ज्यादातर विरोधी बागी होकर भाजपा के पाले में चले गए हैं।

चुनाव प्रचार थमने के बाद उम्मीदवार द्घर&द्घर जाकर मतदाताओं को लुभाने में लगे रहे। मगर रिकॉर्ड मतदान होने के बावजूद प्रदेश में सीन साफ नहीं है कि सरकार किसकी बनेगी। उम्मीदवार अपनी&अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। मगर आश्वस्त कोई नहीं है। रिकॉर्ड मतदान का VSªMपहले सत्ता विरोधी लहर के रूप में देखा जाता था। सत्ताधारी पार्टी को हराने के लिए मतदाता अपने ?kjksa से मतदान के लिए निकलते थे। लेकिन वर्ष २०१५ में दिल्ली और बिहार में हुए चुनाव के तौर पर राजनीतिक समीक्षकों के होश उड़ा दिए थे। दिल्ली में ४९ दिन की आम आदमी पार्टी की सरकार को जनता ने एक बार फिर एतिहासिक जीत दिलाई। हालांकि यहां के बारे में कहा गया कि रिकॉर्ड वोटिंग भाजपा&कांग्रेस को हराने के लिए थी। मगर इसी साल बिहार में भी रिकॉर्ड मतदान हुआ था। बिहार में २०१० की तुलना में २०१५ में करीब ५ फीसदी ज्यादा मत पड़े थे। इस पर चुनाव सीमक्षक लालू के साथ नीतीश के महागठबंधन को नुकसान होने की बात कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। लालू&नीतीश और कांग्रेस महागठबंधन को पूर्ण बहुमत से कहीं ज्यादा सीटें मिलीं।

पिछले साल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी पिछले चुनाव की अपेक्षा कहीं ज्यादा वोट पड़े थे। वहां भी राजनीतिक समीक्षकों से मतदाताओं का VSªM समझने में चूक हुई। पुनः तमिलनाडु में रिकॉर्ड मतदान के बावजूद पुनः जयललिता की सरकार बनी। वहां रिकॉर्ड मतदान का कारण सत्ता विरोधी लहर नहीं थी। पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक पंडित मानकर चल रहे थे कि रिकॉर्ड मतदान ममता की विदाई के लिए है। लेकिन नतीजों ने सभी पंडितों के होश उड़ा दिए थे। ममता की पश्चिम बंगाल में वापसी हुई। अब राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि मतदान के प्रति लोग जागरूक हो रहे हैं। इसके लिए चुनाव आयोग कई तरह की रणनीति बना रहा है। आयोग कई कार्यक्रम आयोजित करता है। सोशल मीडिया पर भी मतदाताओं को जागरूक किया जा रहा है। अपने मत का महत्व समझ में आने पर मतदाता चुनाव में उत्साह से भाग लेते हैं। यही वजह है कि हर साल चुनाव में मतदान नया रिकॉर्ड बनता जा रहा है। उत्तराखण्ड में भी रिकॉर्ड मतदान को मतदाताओं की जागरूकता की तरह देखा जा रहा है। यानी उत्तराखण्ड में मतदाता ने ?kjksa से निकलकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। अब उसने किसके पक्ष में मतदान किया है] यह अभी कहा नहीं जा सकता।

सबसे ज्यादा मतदान सितारगंज विधानसभा सीट पर हुआ। यहां करीब ८५ फीसदी मतदान हुआ है। इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस में बगावत का नेतृत्व करने वाले विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा लड़ रहे हैं। सबसे कम मतदान कुमाऊं की ही सल्ट सीट पर हुआ है। यहां मात्र ४६ फीसदी मतदान हुआ। यहां भाजपा के सुरेंद्र सिंह जीना चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता रणजीत रावत का भी यह गृह क्षेत्र है] लेकिन वह यहां से पलायन कर रामनगर से चुनाव लड़ रहे हैं। प्रदेश के मतदान ने बेशक रिकॉर्ड तोड़ दिया हो। लेकिन यह टें्रड पूरे प्रदेश में एक समान नहीं है। यानी कई विधानसभा सीट पर पूर्व के चुनाव से बहुत ज्यादा मतदान हुआ है तो कई सीटों पर पिछले चुनाव की तुलना में कम हुआ है। मसलन उत्तरकाशी जिले की पुरोला विधानसभा सीटों पर जिले की करीब १२ फीसदी वोट ज्यादा पड़े हैं। इस बार यहां ७५ फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है। प्रदेश के मतदाताओं ने कई जगह पर उत्साह दिखाया तो कई जगह पर उनका जोश ठंडा ही दिखा।

हालांकि राज्य में अब तक हुए विधानसभा चुनाव में हर बार मतदान का रिकॉर्ड टूटा है। वर्ष २००२ में करीब ५४ फीसदी मतदान हुआ था। २००७ में मतदान का आंकड़ा ५९ फीसदी पर पहुंच गया। पिछले चुनाव में तो मतदान का प्रतिशत ६६ फीसदी से भी ज्यादा हो गया। इस बार यह ७० फीसदी के पार पहुंच गया है। उत्तराखण्ड में हर चुनाव के बाद सरकार भी बदली है। इस लिहाज से कुछ लोग सत्ता परिवर्तन की ओर भी इशारा कर रहे हैं। मगर जो भी हो] प्रदेश की जनता की उत्सुकता ११ मार्च तक यूं ही बनी रहने वाली है। उम्मीदवार चुनाव प्रचार की थकान जरूर निकाल रहे हैं लेकिन हर किसी का दिमाग मतगणना के दिन पर ही टिका है। यदि ११ मार्च को भाजपा के पक्ष में ईवीएम मशीनें अपना फैसला देती हैं तो मोदी का जादू बरकरार माना जाएगा। यदि ईवीएम से कांग्रेसी खुश हुए तो मुख्यमंत्री हरीश रावत बिहार के नीतीश की तर्ज पर मोदी का विजयी रथ रोकने वाले दूसरे नेता होंगे।

gunjan@thesundaypost.in

 

 

 
         
 
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