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चुनाव
 
सैन्य परिवारों के वोट अहम

  • दिनेश पंत

अब यह ११ मार्च को ही पता चल पाएगा कि प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। लेकिन अभी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जो पार्टी सैनिकों या पूर्व  सैनिकों के वोटों का साध पाई होगी उसे फायदा मिलना तय है

प्रदेश में बगावत] fHkrj?kkr और दलबदल से भी ज्यादा अहम सेवारत एवं पूर्व सैनिकों का वोट हो सकता है। यही वजह है कि सैन्य वोटों के महत्व को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिथौरागढ़ के स्पोटर्स स्टेडियम में हुई चुनावी सभा के अपने संबोधन का अधिकतर समय पूर्व सैनिकों को साधने में लगाया। अनुशासन में रहने वाला पूर्व सैनिक राजनीति के इन पैंतरों से कितना प्रभावित होगा] यह कह पाना तो मुश्किल है लेकिन यह तय है कि जिस भी उम्मीदवार की तरफ इनकी नजर इनायत होंगी] वह जरूर चुनावी लिहाज से फायदे में रहेगा। चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी] कांगे्रस सहित सभी राजनीतिक दलों ने सैन्य परिवारों को साधने का भरसक प्रयास किया। जहां भाजपा ने एक रैंक&एक पेंशन योजना और सातवें वेतन आयोग के नाम पर सैन्य मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया तो वहीं कांगे्रस ने पूर्व सैनिकों के हित में लागू की गई कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उत्तराखण्ड सैन्य बाहुल्य क्षेत्र होने से यहां सरकार बनाने में पूर्व सैनिकों एवं अर्द्धसैनिकों के परिवार बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। यूं तो प्रदेश में सैन्य वोटर कांगे्रस व भाजपा में बंटा हुआ है। लेकिन फिर भी दोनों पाटियों में हमेशा उन्हें अपने पाले में खिसकाने की होड़ बनी रहती है। इस बार भी पूर्व सैनिक किसको ताज पहनाने में अहम भूमिका निभाएंगे] इसमें सबकी दिलचस्पी बनी हुई है। 

प्रदेश के सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास निदेशालय के मुताबिक इस समय पूरे प्रदेश में १६२१९४ पूर्व सैनिक एवं विधवाएं पंजीकूत हैं। कुमाऊं मंडल में ७४७८० व गढ़वाल मंडल में ८७३८४ पूर्व सैनिक और विधवाओं की संख्या है। इसके अलावा ३० हजार से अधिक पूर्व अर्द्धसैनिक परिवार भी हैं। इस तरह से अगर एक परिवार में पांच लोगों का मत मानकर भी चलें तो संख्या बल की यह तादाद किसी भी उम्मीदवार का चुनाव समीकरण बना और बिगाड़ सकती है। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान हर उम्मीदवार ने इन्हें साधने की भरसक कोशिश की है लेकिन देखना यह होगा कि सैनिकों के रुख को अपनी और मोड़ने में कौन कितना सफल रहता है? जिलेवार स्थिति देखें तो कुमाऊं मंडल के जनपद  पिथौरागढ़ में २३८६५] चंपावत में ४४४६] बागेश्वर में ११२३६] अल्मोड़ा में १३८००] नैनीताल में १३०१२ और ऊधमसिंह नगर में ८४२१ पूर्व सैनिक और विधवाएं हैं। गढ़वाल मंडल के जनपद चमोली में १४४८०] देहरादून में २६५४६] लैन्सडॉन में १९८०२] पौड़ी में ९४१३] हरिद्वार में ५००७] रुद्रप्रयाग में ४६३६] टिहरी में ६५६६] उत्तरकाशी में ९३४ पूर्व सैनिक एवं विधवाएं पंजीकृत हैं। इसके अलावा सशस्त्र सेनाओं में इस समय लगभग ६० हजार सैनिक सेवारत हैं। पूर्व सैनिक परिवारों के वोटों को साधने के लिए हर राजनीतिक दल ने अपने यहां पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ भी बनाया हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सैन्य हित सैन्य मतदाताओं को अधिक प्रभावित करते हैं। इसलिए जहां भाजपा ने सर्जिकल स्ट्राइक] प्रधनमंत्री का मिलन कार्यक्रम] वन रैक&वन पेंशन एवं सातवें वेतन आयोग के जरिए पूर्व सैनिकों में मत व्यवहार को प्रभावित करने की कोशिश की तो वहीं कांगे्रस ने हरीश रावत सरकार के समय प्रदेश में पूर्व सैनिकों के हित में किए गए कल्याणकारी कार्यक्रमों के साथ ही वन रैंक&वन पेंशन के साथ ही सातवें वेतन आयोग की विसंगतियों को आधार बनाकर इन्हें लुभाने की भरसक कोशिश की।  

पूर्व सैनिक समय&समय पर कई तरह की समस्याओं से दो&चार होते रहे हैं। प्रदेश में बड़ी ताकत होने के बाद भी पूर्व सैनिक हमेशा अपने को ठगा महसूस करते आऐ हैं। जिस हिसाब से पूर्व सैनिकों की संख्या है उस हिसाब से प्रदेश की राजनीति में उनका प्रतिशत बेहद कम है। टिकटों के बंटवारे में भी देखें तो इक्का दुक्का लोगों को छोड़कर बहुत कम लोग सक्रिय रूप से राजनीति में हैं। संख्या बल व राजनीति को प्रभावित कर सकने की क्षमता के बाद भी सरकारों के ऊपर इनकी अनदेखी करने का आरोप लगता रहा है। प्रदेश में पूर्व सैनिकों को मिलने वाली सुविधा न्यूनतम है। पूर्व सैनिक लंबे समय से हर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में अधिक से अधिक कैंटीन सुविध उपलब्ध कराने की मांग करते आए हैं लेकिन इस ओर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। यह पूर्व सैनिकों की बड़ी नाराजगी का कारण बन रहा है। इसके अलावा चिकित्सा सुविधा की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने की मांग इनकी तरफ से की जाती रही है। प्रदेश में स्थित सैनिक विश्राम गृहों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। पूर्व सैनिकों की लंबे समय से मांग रही है कि प्रदेश में स्थित जर्जर विश्राम गृहों का जीर्णोद्वार के साथ ही नए विश्राम गृहों का निर्माण किया जाय। इसके अलावा पूर्व सैनिकों के रोजगार की व्यवस्था की जाए। कुल मिलाकर प्रदेश की नई सरकार बनाने में सैनिक मतदाताओं का निर्णयात्मक मत काफी अहम रहेगा। रिटायर्ड फौजी बलवंत सिंह सामंत कहते हैं कि केंद्र सरकार ने जब से वन रेंक वन पेशन दी है तब से पहाड़ी सैनिक भाजपा की तरह आकर्षित हुआ है। हालांकि अभी भी कांग्रेस में बहुत से फौजी भाईयों का मत बरकरार है।


धनबल&बाहुबल का खुला खेल

  • आकाश नागर

विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रत्याशियों ने आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी ने शराब बांटी तो किसी ने साड़ियां। धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल करने से भी प्रत्याशी नहीं चूके। राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार ही नहीं] बल्कि निर्दलीय भी साम]दाम] दंड] भेद की नीति अपनाने में पीछे नहीं रहे

  • महिलाओं को लुभाने के लिए बांटी गई साड़ियां।
  • शराब के ठेकों पर चले टोकन सिस्टम।
  • पुलिस और निर्वाचन की गाड़ी में पकड़ी गई शराब।
  • एक महिला प्रत्याशी ने नोट लो] वोट दो का जुमला चलाकर मतदाताओं को किया प्रभावित।

देवभूमि उत्तराखण्ड के चौथे विधानसभा चुनाव में कई प्रत्याशियों ने आचार संहिता का mYya?ku किया। वोटों की खातिर हर हथकंडे अपनाएं गए। चुनाव आयोग की सख्ती नहीं रहती तो इस चुनाव में न सिर्फ शराब की नदियां बहतीं] बल्कि जमकर पैसा भी बंटता। सख्ती के बावजूद प्रत्याशी नहीं माने। कहीं शराब बांटी गई तो कहीं साड़ियां। गुलाबी गैंग (दो हजार के नोट) वोट खरीदने के लिए खूब चर्चा में रहे। जाहिर है कि मतदाताओं को लुभाने के लिए साम&दाम] दंड&भेद की नीति अपनाई गई। ऐसे उम्मीदवारों का रवैया स्वस्थ लोकतंत्र की प्रक्रिया को चिढ़ाता हुआ नजर आया। कुमाऊं मंडल की एक महिला प्रत्याशी की बाबत तो जुमला भी चला कि 'तुम मुझे वोट दो] मैं तुम्हें नोट दूंगी।' राजनीतिक दल इसके लिए एक&दूसरे पर आरोप लगाकर dV?kjs में खड़े करते रहे।

मतदान से दो दिन पूर्व १३ फरवरी को अल्मोड़ा की भतरोजखान पुलिस ने द्घट्टी तिराहे के पास दो अलग&अलग वाहनों से १९२ बोतल अवैध शराब बरामद की। इस मामले में पुलिस ने चार लोगों को आबकारी अधिनियम में गिरफ्तार कर जेल भेजकर वाहनों को सीज कर दिया है। पकड़े गए वाहन सल्ट तहसील के अंतर्गत एक पार्टी के मछोड़ मंडल के दो पदाधिकारियों के बताए जा रहे हैं।  

बागेश्वर के कपकोट विधानसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी की १६५ पेटी शराब पकड़ी गई। उसके बाद रामनगर विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में भारी मात्रा में शराब पकड़ी गई। हद तो तब हो गई जब सल्ट विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय थानाध्यक्ष तक अपनी गाड़ी में शराब ले जाते हुए पकड़े गए। यह जांच का विषय है कि वाकई थानाध्यक्ष की गाड़ी में शराब थी या नहीं? यदि थी तो कैसे पहुंची। लेकिन इस मुद्दे पर दो राष्ट्रीय पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने एक&दूसरे पर जमकर प्रहार किए।

रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में एक गाड़ी से साड़ियां बरामद हुई। गाड़ी का नंबर यूपी १६]६६५७ है। १२ फरवरी को रानीखेत के सिंगोली&गनियाधोली मार्ग पर निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के अनुसार साड़ियों की पैंकिंग में एक निर्दलीय उम्मीदवार की फोटो एवं चुनाव चिन्ह छपे पर्चे लगे थे। वाहन में बैठे दो लोगों को हिरासत में ले लिया गया। जिसमें से एक गनियाधोली और दूसरा चिलियानौला का था। पकड़े गए युवकों ने बताया कि उन्होंने २५ साड़िया बांट दी हैं। वाहन को सीज कर आरोपियों को जेल भेज दिया गया। इसी तरह सोमेश्वर बाजार में भी शराब ठेके के बाहर १३ फरवरी की शाम करीब चार बजे निर्वाचन लिखी गाड़ी में कई पेटी शराब पकड़ी गई। बताया जाता है कि गाड़ी में आबकारी निरीक्षक देवेंद्र बिष्ट अपनी टीम के साथ सवार थे।

गढ़वाल मंडल की बात करें तो यहां भी भारी मात्रा में शराब और पैसे की बरामदगी पुलिस ने की है। गढ़वाल के डीआईजी पुष्पक ज्योति ने १४ फरवरी को शराब और नगदी बरामदगी के जो आंकड़े पेश किए वह चौंकाने वाले हैें। पुलिस के आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि उत्तराखण्ड में चुनाव के दौरान किस कदर शराब और पैसा बांटा जा रहा है। डीआईजी के मुताबिक चुनाव के दौरान  करीब ७६०२ बोतल देशी शराब] १४९८८ बोतल अंग्रेजी शराब] २१४ बीयर की बोतलों के साथ ही १०३३ लीटर कच्ची शराब बरामद की गई है। इसके साथ ही करीब सवा करोड़ रुपए नगद अकेले एसटीएफ ने जबकि ९५ लाख रुपए जिला पुलिस देहरादून ने बरामद किए। कुल मिलाकर अकेले गढ़वाल रेंज में दो करोड़ तैंतीस लाख रुपए बरामद हो चुके हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि उत्तराखण्ड में जनता के वोट खरीदने के लिए राजनीतिक दलों ने कैसे कैसे&हथकंडे अपनाए हैं।

कपकोट में तो एक प्रत्याशी ने भरी सभा में एक अन्य प्रत्याशी को अठन्नी] दूसरे को बंद हुआ ५०० का वोट और अपने आपको दो हजार का नोट बताकर वोट देने की अपील कर डाली। इस सभा में दो हजार के नोट की बात कहकर चर्चा में आए यह प्रत्याशी धनबल के मामले में आगे रहे हैं। विजय बहुगुणा सरकार में तो इन महाशय की तूती बोलती थी। तब इन्हें 'धन कुबेर' की संज्ञा दी गई थी। इसी तरह कुमाऊं मंडल में एक महिला प्रत्याशी विधानसभा चर्चा में रहीं। बताया जाता है कि महिला प्रत्याशी ने मतदाताओं से 'तुम मुझे वोट दो] मैं तुम्हे नोट दूंगी' की तर्ज पर बात की। इस महिला प्रत्याशी का पति अपराधिक प्रवृत्ति का है जो धन&बल के साथ ही बाहुबल का भी इस्तेमाल खुलेआम चुनाव में करते देखा गया। महिला प्रत्याशी का हिस्ट्रीशीटर पति साम&दाम] दंड& भेद सभी तरह की नीति अपनाकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में लगा रहा। 

कई विधानसभा क्षेत्रों में शराब ठेकों पर टोकन सिस्टम चर्चा में रहा। बताया जाता है कि कई प्रत्याशियों ने अपने कार्यकर्ताओं को शराब की सेवा के लिए बाकायदा टोकन दिए। इन टोकन के जरिए लोग ठेके पर जाकर शराब की बोतल ले गए। कुछ जगह वोटों के ठेकेदार भी पैदा कर दिए गए। ये ठेकेदार वोटों का सौदा करते रहे। वोट दिलवाने का दिलासा देकर वह प्रत्याशियों से मोटा धन वसूलते रहे। लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी के बेटे को इसलिए पीट दिया गया कि वह चुनाव में रुपए बांट रहा था। उसकी इतनी पिटाई कर दी गई। कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

akash@thesundaypost.in

 
         
 
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