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vad 15 30-09-2017
 
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सुर्खियां जो नहीं बनीं
 
शांति की रेखा

भारत एक ऐसा देश है] जिसकी सीमा कई देशों से मिलती है। एक तरफ जहां पाकिस्तान और चीन के बॉर्डर पर खींचतान चलती रहती है] वहीं दुनिया में कुछ ऐसे बॉर्डर भी हैं] जहां लोगों की जिंदगी काफी सुकून भरी है। दुनिया के कई देशों के बार्डर ऐसे हैं] जहां ना कड़ी सुरक्षा होती है और ना ही फौजियों की जमात। बावजूद इसके इन देशों में बहुत ही शांति और सुकून के साथ लोग अपनी जिंदगी बिताते हैं। फिलहाल अमेरिका और मेक्सिको के बीच दीवार बनाने को लेकर विवाद चल रहा है। लेकिन कुछ ही हफ्तों पहले यहां एक दूसरे देश के बीच बॉर्डर पर बालीबॉल मैच का आयोजन किया जाता था। जहां दोनों देशों के लोग आपस में मैच एन्जॉय करते थे। इंडिया और पाकिस्तान बॉर्डर पर ऐसा होना तो दूर की बात है] अगर महीने में एक बार गोलीबारी की खबर ना आए] तो वही बड़ी बात हो जाती है। पुर्तगाल और स्पेन का बॉर्डर दुनिया का इकलौता ऐसा बॉर्डर है जहां जिपलाइन के जरिए एक देश से दूसरे देश जा सकते हैं। नीदरलैंड और बेल्जियम का बॉर्डर एक मकान के अंदर है] इसे सिर्फ सांकेतिक अक्षरों से समझा जा सकता है कि यहां दो देशों की सीमाएं हैं। चीन और वियतनाम वाटरफॉल के पास मिलते हैं।

अपनी कलाई पर भरोसा

^मांझी^ फिल्म में बहुत मार्मिक कहानी दिखाई गई है। इसमें जब सरकार से कई विनतियों के बाद रास्ता बनाने के लिए कोई मदद नहीं मिलती] तब मांझी के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी खुद ही औजार उठा कर रास्ता बनाने के लिए अकेले ही चल पड़ते हैं। ऐसे ही एक मांझी की कहानी उत्तराखंड के डांग में देखने को मिली है। जहां कई सालों तक सरकार के चुनावी वादों के भरोसे रहने के बाद महिलाओं ने खुद ही सड़क बनाने का फैसला लिया। २०१२ में गोमुख उत्तरकाशी के १०० किलोमीटर के दायरे को ग्रीन इकोलॉजिकल द्घोषित किया गया था] जिसके बाद इन महिलाओं ने क्षेत्र में चल रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और कमर्शियल माइनिंग प्रोजेक्ट्स के खिलाफ आवाज भी उठाई थी। एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार का कहना है कि उसने पांच जनसुनवाई आयोजन की थीं। जिसे विपक्षियों के विरोध के बाद वापिस ले लिया गया था। वहीं दूसरी ओर ^उत्तराखण्ड महिला मंच^ से जुड़ी पुष्पा चौहान का कहना है कि उन्हें इसमें भाग ही नहीं लेने दिया गया। ये महिलाएं कई पेड़ काटने के खिलाफ रहने के साथ ही ऐसे कई फैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा चुकी हैं। पर इन सब के बावजूद सरकार या प्रशासन में से कोई भी इनकी सुध लेने वाला नहीं है। ये अपने क्षेत्र में विकास चाहती हैं] पर वो विकास पेड़ों को काट कर या नदियों की धारा में रुकावट पैदा करके नहीं चाहतीं। सरकार की अनदेखी के बाद इसलिए इन महिलाओं ने औजार उठाये और खुद सड़क बनाने के लिए निकल पड़ीं।

 
         
 
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  • सिराज माही

नोबल शांति पुरस्कार से नवाजी जा चुकीं आन सान सू की के देश म्यांमार में करीब दो हफ्ते से ज्यादा समय से जारी हिंसा के बाद रोहिंग्या विद्रोहियों

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