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vad 15 30-09-2017
 
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पुनर्गठन विधेयक ही झगड़े की जड़

 

उत्तराखण्ड की मांग विशुद्ध पर्वतीय राज्य की थी। लेकिन इसके साथ छलपूर्वक मैदानी क्षेत्रों को चिपका दिया गया। यही वजह है कि इसे अन्य हिमालय राज्यों की तरह विशेष सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं

 

उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। सरकार ने वहां विधान भवन बनाने के लिए एक पांच सदस्यीय समिति बना दी हो या मकर संक्रांति के अवसर पर राज्य मंत्रिमंडल की बैठक कर लोगों की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने का उपक्रम किया हो लेकिन सच यही है कि इससे लोग संतुष्ट नहीं हैं। देहरादून में न केवल भारी-भरकम निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं बल्कि आगे भी इनमें कोई कमी आने की उम्मीद नहीं है। स्थाई राजधानी के लिए रायपुर बाईपास से जुडे़ क्षेत्र में ६०० एकड़ जमीन का चयन कर लिया गया है। ऐसे में गैरसैंण को लेकर राज्य के आमजन में निराशा और आक्रोश एक बार फिर व्याप्त होना लाजिमी है।

 

यदि गहराई से देखा जाए तो मुद्दा गैरसैंण नहीं राज्य पुनर्गठन विधेयक है। सारे झगड़े की जड़ उसी विधेयक के वे प्रावधान हैं जिनके तहत इस पर्वतीय क्षेत्र के भोले-भाले लोगों के साथ छल किया गया। यह महापाप करने वाले कोई और नहीं बल्कि इस पावन देवभूमि के अपने ही 'सपूत' थे। सतही तौर पर सीधा सा दिखने वाला यह आंकलन बेहद उलझा हुआ है और इस पूरे घटनाक्रम की पड़ताल किए बगैर मामला समझ में आने वाला नहीं है। क्योंकि समय के साथ सब कुछ धुंधलाता जा रहा है। पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन से पहले उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव की तत्कालीन सरकार ने उत्तराखण्ड राज्य बनने पर उसकी स्थाई राजधानी के लिए सुझाव के लिए जिस कौशिक समिति का गठन किया था उसने कुमाऊं और गढ़वाल के सभी जिलों का दौरा कर विशेषज्ञों बुद्धिजीवियों सामाजिक संगठनों और आमजन से सीधा संवाद कायम करने के बाद ४ मई १९९४ को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में गौशाला (रामनगर)पशुलोक (ऋषिकेश और गैरसैंण को इसके लिए उपयुक्त बताया था। उसमें हरिद्वार जिला या इसके कुंभ क्षेत्र का कोई उल्लेख नहीं था। राज्य गठन के लिए तत्कालीन केन्द्र सरकार की ओर से राष्ट्रपति के माध्यम से जब उत्तर प्रदेश सरकार के पास विचार के लिए प्रस्ताव भेजा गया था तब उसमें भी हरिद्वार शामिल नहीं था। लेकिन जब ९ नवंबर २००० को पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन की घोषणा हुई तब उसमें कुंभ क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे हरिद्वार जिले को ही शामिल कर दिया गया था।

 

यह चमत्कार कैसे हुआ? आइये देखते हैं-८ नवंबर २००० की शाम तक कुमाऊं के तीन और गढ़वाल के पांच जिलों को मिलाकर ही पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनाना प्रस्तावित था। उसी के अनुरूप केन्द्र सरकार के स्तर पर सभी तैयारियां की जा रही थीं। लेकिन इसी बीच कुछ भाजपा नेता तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह समझाने में सफलता पा ली कि कुमाऊं और गढ़वाल की दो लोकसभा सीटों पर परंपरागत रूप से ब्राह्मणों एवं राजपूतों का वर्चस्व रहा है। जिससे वहां के दलितों में गलत संदेश जा रहा है। उन्हीं दिनों एक कांग्रेसी नेता भी हरिद्वार जिले को प्रस्तावित राज्य में शामिल करने का मुद्दा बडे़ जोर-शोर से उठाये हुए थे। तब हरिद्वार लोकसभा सीट आरक्षित भी थी। आडवाणी को निर्णय लेने में अधिक देर नहीं लगी। उन्होंने तत्काल पूरे हरिद्वार जिले को ही शामिल करते हुए पृथक उत्तराखण्ड राज्य गठन की घोषणा करा दी। जिसमें अस्थाई राजधानी देहरादून बनाने का भी उल्लेख शामिल था। यदि हरिद्वार जिला उत्तराखण्ड में शामिल नहीं किया गया होता तो निश्चित रूप से यह एक शुद्ध पर्वतीय राज्य होता और तब गैरसैंण को इसकी राजधानी बनाने में कोई ऐतराज नहीं होता। 

 

इस पर्वतीय क्षेत्र का प्रारंभ से ही यह दुर्भाग्य रहा कि यहां के क्षेत्रीय विकास को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ कर देखने-दिखाने मेंं सक्षम नेतृत्व का सर्वथा अभाव रहा। जो एकाध हुए भी तो उनकी स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने की आतुरता और प्रबल महत्वाकांक्षा को यहां के अभावग्रस्त लोगों के दुख-दर्द दिखाई- सुनाई ही नहीं पडे़। इन तथाकथित बडे़ जन-नेताओं ने ही जब अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि के प्रति कर्तव्यबोध त्याग दिया तब फिर भला तीन तरफ से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरे इस भू-भाग की चिंता किसी दूसरे को क्यों होती।

इस कमजोरी के कारण ही केन्द्र में भाजपानीत सरकार ने बिना कोई होम वर्क किये ही रातों-रात आनन-फानन में अपने अल्प-राजनीतिक लाभ के लिए समूचे हरिद्वार जिले को उत्तराखण्ड में शामिल करते हुए पृथक राज्य का गठन कर दिया। उत्तराखण्ड के कांग्रेसियों में भी दूरदृष्टि वाले योजनाकार और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व से अपनी बात मनवा सकने में सक्षम नेताओं का सर्वथा अभाव रहा। इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि कांग्रेस ने उसी 'चमचों के विकास पुरुष' को नवगठित राज्य की बागडोर सौंप दी जो पृथक राज्य और समूचे पर्वतीय क्षेत्र के विकास का खांटी विरोधी था। भला ऐसा व्यक्ति हिमाचल के स्वनामधन्य नेता डॉ. यशवंत सिंह परमार से प्रेरणा लेकर इस नवसृजित पहाड़ी राज्य के साथ भी छलपूर्वक चिपका दिये गये मैदानी क्षेत्र को वापस मूल प्रदेश को लौटाने की बात कैसे कर सकता था? वह तो दूरदृष्टा महान योजनाकार और अपनी जन्मभूमि के प्रति समर्पित यशवंत सिंह परमार ही थे जिन्होंने हिमाचल का मुख्यमंत्री बनना तभी स्वीकार किया जब कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व उनकी इस बात पर सहमत हो गया कि नवगठित हिमाचल के साथ जोड़ दिये गये मैदानी भूभाग को अलग कर दिया जायेगा। फलस्वरूप पंजाब राज्य पुनर्गठन अधिनियम-१९६६ में संशोधन कर पेप्सू रियासत कहा जाने वाला संपूर्ण मैदानी क्षेत्र पंजाब को वापस लौटाया गया।

 

डॉ परमार के उस दूरदर्शी निर्णय के बडे़ दूरगामी परिणाम सामने आए। भूमि प्रबंधन सरकारी नौकरियों में आरक्षण उच्च हिमालयी तथा दुर्गम क्षेत्रों सम्बंधी राज्य कर्मचारियों की सेवा-शर्तें शुद्ध पहाड़ी राज्य होने से केन्द्रीय अनुदान पहाड़ बनाम मैदान की खींचतान जैसे अनेक ऐसे मामले हैं जिनको लेकर हिमाचल उत्तराखण्ड के बरक्स सुखी है। जबकि इसके ठीक विपरीत उत्तराखण्ड की हालत है। जहां इन सबके अलावा राज्य के स्थाई निवासी मामले का पेंच बुरी तरह फंसा हुआ है। उधर न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय परिसीमन आयोग की सिफारिशों के चलते इस पर्वतीय क्षेत्र की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के विपरीत राज्य विधान सभा में यहां का प्रतिनिधित्व घट जाने से जनता और जन-प्रतिनिधि के बीच दूरियां बढ़ गईं। यदि विकास पुरुष ने अपने पहाड़ विरोधी रवैए को बदल कर उसे पर्वतीय विकास का पैमाना बनाया होता तो उसके वैसे ही सकारात्मक परिणाम सामने आते जैसे कि हिमाचल मेंं आज भी देखे जाते हैं। यही कारण है लगभग आधी शताब्दी बीतने पर भी आज प्रत्येक हिमाचली डॉ य़शवंतसिंह परमार को आदर पूर्वक हिमाचल का निर्माता कहने में गर्व अनुभव करता है। जाहिर है कि बडे़ और अधिकार-सम्पन्न व्यक्ति की ओर से की गई गलती के दुष्परिणाम भी उतने ही व्यापक और दूरगामी होते हैं।

 

भाजपा नेताओं ने जिस प्रकार होम वर्क किए बिना अपना उत्तरांचल यहां की जनता पर थोपा उसी के दुष्परिणाम आज यहां की जनता भोग रही है और आगे भी कई पीढ़ियों तक भोगती रहेगी। फिर राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री ने भी यदि दूरदृष्टि का परिचय दिया होता तो इस राज्य की 'आधा बगूलाआधा सुवा' वाली हालत नहीं हुई होती। इसी के कारण समस्त हिमालयी राज्यों में केवल उत्तराखण्ड ही एकमात्र ऐसा उदाहरण है जिसे हिमालय के संदर्भ से काट कर देखा जाता है। यदि इसके साथ मैदानी क्षेत्र चिपकाने का छल नहीं हुआ होता तो इस शुद्ध पहाड़ी राज्य की भी गिनती अन्य हिमालयी राज्यों के साथ होती और उन्हीं के अनुरूप इसे भी केन्द्रीय सहायता दी जाती। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से लेकर त्रिपुरा और मिजोरम तक फैले हिमालयी क्षेत्र के सभी राज्यों में चीन (तिब्बत और नेपाल जैसी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के बावजूद उत्तराखण्ड अकेला राज्य है जिसके निवासियों के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं की गई है। जबकि हिमालय क्षेत्र के अन्य राज्यों के लिए संविधान के अनुच्छेद-३७० तथा ३७१ में ऐसे प्रावधान किये गये हैं जिनसे उन राज्यों के मूल निवासियों को अनेक प्रकार की रियायतें देने के अलावा वहां की सभ्यता संस्कृति तथा परंपराओं के संरक्षण की भी व्यवस्था की गई है। उत्तराखण्ड के पड़ोसी हिमाचल में ही ऐसे अनेक प्रावधान लागू हैं जिनके तहत वहां के मूल निवासियों को प्राप्त पुश्तैनी हक-हकूकों का अतिक्रमण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता। मगर यहां तो 'घर को ही आग लगा दी घर के चिराग ने' वाली कहावत चरितार्थ हुई है। आज पूरे राज्य भर में शायद ही ऐसा कोई मिलेगा जिसे इस छलावे का जरा भी दुख न हो। इस फैसले से तब उत्तराखण्ड के आमजन को न केवल हैरत हुई थी बल्कि उसके भीतर जिन भावी आशंकाओं ने तब जन्म लिया था वे अब रूप लेने करने लगी हैं। 

 

यहां यह अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है कि इससे कितनी हानि हो चुकी है और आगे कितनी होगी। लेकिन यह जरूर विचारणीय है कि राज्य आन्दोलनकारी आमजन की इच्छा भावना आशा आकांक्षा और आवश्यकता के विरुद्ध दिया गया भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व का वह निर्णय क्या अब नहीं बदला जा सकता? क्या राज्य पुनर्गठन विधेयक पत्थर की वह लकीर है जिसमेंं संशोधन नहीं हो सकता? राज्य के प्रबुद्ध व्यक्तियों का मानना है कि यहां के आमजन की जरूरतों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इसे शुद्ध पहाड़ी राज्य बनाना अावश्यक है। तभी यहां के विकास को पंख लगेंगे और यहां से पलायन रोका जा सकेगा। तभी इस पर्वतीय भू-भाग के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संवर्धन और दोहन समुचित रूप से हो सकेगा और इसे राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाया जा सकेगा।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उत्तराखण्ड के जनांदोलनों से जुड़े रहे हैं।

 

 
         
 
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