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vad 46 07-05-2017
 
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राजनीति

 

राजनीतिक पार्टियां क्षेत्र और जाति के गणित को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशियों को चुनाव में उतारती हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में पहाड़ और मैदान के बीच खाई पैदा करने की जो कोशिशें हुईं वे उत्तराखण्ड के अस्तित्व में आने के बाद घटने के बजाए बढ़ी ही हैं

 

भाजपा के पूर्व मंत्री मदन कौशिक एवं रुद्रपुर के पूर्व विधायक तिलकराज बेहड़ का विवादास्पद बयान लोग भूले नहीं थे कि काशीपुर के भाजपा विधायक हरभजन सिंह चीमा ने विवादास्पद बयान देकर पहाड़ बनाम मैदान की चिंगारी को सुलगा दिया। पहाड़ बनाम मैदान की इस चिंगारी की आग पिछले वर्ष पूरे प्रदेश में फैल गई थी। लोगों ने इसके विरोध में धरना-प्रदर्शन भी किया। कौशिक और बेहड़ ने यह कहा था कि मुख्यमंत्री अगर पहाड़ से बने तो उपमुख्यमंत्री मैदान का हो जबकि चीमा ने कहा कि पहाड़ से पलायन इस कदर हो रहा है कि पहाड़ वाले तराई पर बोझ बन गए हैं। यह जगजाहिर है कि प्रदेश में पलायन का मुद्दा दिन प्रतिदिन गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है। आंकड़े तस्दीक करते हैं कि जब से राज्य गठन हुआ है तब से अब तक दूर दराज के गांवों में घर सूने हो रहे हैं और तो और गांव के गांव पलायन के चलते उजड़ रहे हैं। प्रदेश में १२ सौ गांव अब तक पलायन की चपेट में आकर चौपट होने की राह पर हैं। 

 

चीमा ने भी अपने विवादास्पद बयान से मचे बवाल के बाद स्पष्ट किया कि उनकी मंशा पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की पैरवी करनी थी। लेकिन उनके बयान को गलत ढंग से पेश किया गया। गौरतलब है कि एक वर्ष के भीतर यह दूसरा मामला थी जब पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा विवाद का केन्द्र बना। यह उत्तराखण्ड की बदकिस्मती ही है कि अपनी स्थापना के समय से ही यहां वाद- विवाद का ज्वार भाटा उठता रहा है। राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे विवादों को जन्म देती रही हैं। यहां तक कि राजनीतिक पार्टियां क्षेत्र ही नहीं जाति के गणित को भी ध्यान में रखकर प्रत्याशियों को मैदान में उतारती हैं। चुनाव में कुमाऊंवाद-गढ़वालवाद ठाकुरवाद-ब्राह्मणवाद के बाद पहाड़वाद और मैदानवाद का राजनीतिक शिगूफा भी छोड़ा जाने लगा है। उत्तराखण्ड को बने १२ साल हो गए हैं लेकिन राज्य में बनी सरकारें यहां के लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं करा सकी हैं। पर्वतीय क्षेत्र से होने वाले पलायन का प्रभाव मैदानी विशेषकर तराई क्षेत्र पर पड़ रहा है। तराई को आबाद करने में पाकिस्तान और पंजाब से उजड़कर आए लोगों का विशेष योगदान रहा है। पलायन से जहां पहाड़वासियों को नुकसान हो रहा है वहीं तराई क्षेत्र पर भी इसका दबाव बढ़ा है। जिससे तराई को आबाद करने वाले आज मजबूरन यहां से पलायन कर रहे हैं। जो तराई क्षेत्र के लिए चिंता का विषय है। उत्तराखण्ड की पूर्व सरकारों द्वारा भू-अध्यादेश जैसे नियम बनाए जाना प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में बसे लोगों को जाति मूल एवं स्थायी प्रमाण पत्रों से वंचित रखे जाना मैदानी क्षेत्रों में बसे लोगों की मूलभूत सुविधाओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाना है। प्रदेश में तराई और पहाड़ की लड़ाई गहराती जा रही है। पूर्व में विधानसभा के अंदर भी जाति प्रमाण पत्र को लेकर हंगामा हो चुका है। इस वक्त भी यह मुद्दा तराई और पहाड़ के बीच गया था। जिसमें नरेन्द्र नगर के पूर्व विधायक ओम गोपाल और हरिद्वार से विधायक रहे निजामुद्दीन के बीच सदन के अंदर तीखी नोक-झोंक भी हुई थी। उस हंगामे से यह संकेत मिल गए थे कि आज नहीं तो कल यह मुद्दा उछलेगा। तब यह मामला मैदान में सीमित तौर पर बसपा और उक्रांद के बीच था। वैसे भी विधानसभा सीट के लिहाज से मैदान पहाड़ से आगे हो गया है। अभी तक कांग्रेस और भाजपा की सरकार में तराई के हिस्से में एक ही मंत्री पद आता था। २००२ के एनडी तिवारी सरकार में बेहड़ को मंत्री बनाया गया था। २००७ में भाजपा ने मदन कौशिक को मंत्री बनाया। दोनों ही सरकारों में तराई से एक ही मंत्री बनाया गया। नए परिसीमन के बाद उत्तराखण्ड में कुल ७० सीटों में से ३६ सीटें मैदान और ३४ सीटें पहाड़ी इलाके में रह गई हैं। इससे पहले ३८ सीटे पहाड़ के खाते में और ३२ सीटें मैदानी क्षेत्रों में थीं। हरिद्वार जिले में पहले ९ सीटें होती थी अब वहां ११ हो गईं। यहां लंढौरा और लालढ़ांग दो नई सीटें जुड़ी। इसी प्रकार ऊधमसिंह नगर जिले में किच्छा और नानकमत्ता दो सीटें जुड़ीं। देहरादून में रायपुर और नैनीताल में कालाढूंगी दो सीटे मैदान के खाते में आई। पहाड़ की जो सीटें कम हुई उनमें पौड़ी की बीरोंखाल और धुमाकोट पिथौरागढ़ की कनालीछीना बागेश्वर की कांडा और अल्मोड़ा की भिकियासैंण सीट है। यहां और मैदान पर नेता किस तरह राजनीति करते हैं। इसका एक मामला उस समय सामने आया जब समूह ग की परीक्षाओं में कुमाऊंनी गढ़वाली और जौनसारी भाषा का मुद्दा उठा। अगर इन भाषाओं को अनिवार्य करने की बाध्यता हो जाती तो इसके बाद एक बार फिर पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा तूल पकड़ते देर नहीं लगती। स्वाभाविक था कि तब पंजाबी बंगाली आदि भाषाओं पर भी वाद-विवाद शुरू होता। बंगाली बांग्ला भाषा को तो सिख पंजाबी भाषा को लेकर आमने-सामने आ जाते।

 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्या कहते हैं तराई-पहाड़ को अलग-अलग दृष्टि से देखने का सवाल ही नहीं है। कांग्रेस पूरे उत्तराखण्ड को एक समझती है। पार्टी की सरकार बनने पर उपमुख्यमंत्री बनना चाहिए या नहीं यह केंद्रीय नेतृत्व फैसला करता है। इसलिए किसी के कहने से कुछ नहीं होता है।

 

उक्रांद (पी) के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार का मानना है कि प्रदेश के विरोधी लोग इस प्रकार के घटिया बयान देते रहते हैं। बेहड़ राज्य आंदोलन के समय विरोध करने वालों में से रहे हैं। उन्हें प्रदेश की नहीं अपनी चिंता है। प्रदेश में अधिकांश क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। ९० फीसदी क्षेत्रों में विकास की किरण नहीं दिखती। ऐसे में उन्हें सिर्फ तराई की चिंता है। ऐसे बयानों से ही लोग पहाड़ और मैदान को अलग-अलग करके देखने लगते हैं जो गलत है। 

 

प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने बताया कि प्रदेश को गढ़वाल कुमाऊं और तराई में बांटना अच्छी बात नहीं है। उत्तराखण्ड की पहचान एक पहाड़ी प्रदेश के रूप में है। जहां दो जिले मैदान के भी हैं। लेकिन सभी एक हैं। कांग्रेस की रणनीति शुरू से ही बांटने की रही है। उनका विकास से कोई नाता नहीं रहा है। भाजपा सरकार ने सभी क्षेत्रों का समान विकास किया है।

 

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी कहते हैं कि तराई को मजदूर किसानों ने बसाया है न कि किसी एक जाति विशेष के लोगों ने। कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता मैदान और पहाड़वाद के सहारे अपनी राजनीतिक वैतरणी पार करने में लगे थे। इनका इस मुद्दे को हवा देने का एक ही मकसद था कि येन-केन प्रकारेण कुर्सी हासिल की जाए। पहाड़ में भू-माफियाओं के खिलाफ जनचेतना बढ़ी है उससे भी लोगों का ध्यान बांटने के लिए पहाड़ और मैदान का राग अलापा जाता है।

 

नैनीताल के सांसद केसी सिंह बाबा का कहना है कि मैदान तो पहाड़ का  वह आंगन है जिसमें तरह-तरह की फुलवारियां खिली हैं। इसके चलते ही ये गुलशन आबाद है। एक तरह से देखा जाय तो यह मिनी इंडिया है। जहां पहाड़ के ही नहीं बल्कि देश के सभी संप्रदाय के लोग रहते हैं। यहां वाद-विवाद कोई मायने नहीं रखता।

 

प्रदेश बसपा अध्यक्ष सूरजमल के मुताबिक कांग्रेस में कुर्सी की लड़ाई चलती रहती है। चुनाव पूर्व ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर लड़ाई हो रही थी। वह अब भी जारी है। हमें कुर्सी से पहले विकास की बात करनी चाहिए। इस बात की चिंता होनी चाहिए कि पहाड़ और मैदान को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

 

लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

 
         
 
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  • सिराज माही

जफर गोरखपुरी बहुमुखी प्रतिभा वाले शायर हैं। वह ऐसे कामयाब शायर हैं कि पिछले पचास सालों से उनकी रचनाएं महाराष्ट्र सरकार के स्कूली पाठ्यक्रम
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