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राजनीति

 

गैरसैंण में विधानसभा भवन का शिलान्यास स्वागत योग्य है। लेकिन यदि बहुगुणा सरकार वहां स्थाई राजधानी निर्माण की दिशा में प्रयास नहीं करती है तो यह सिर्फ नौटंकी माना जाएगा

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण से १४ किलोमीटर दूर भराड़ीसैंण में चौदह जनवरी २०१३ को विधानभवन की स्थापना के लिए आधारशिला पट्टिका का अनावरण कर तीन नवम्बर २०१२ को वहां अपने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद किए वादे को निभाया। उन्होंने इस मौके पर कहा कि उनकी सरकार का यह कदम उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगा। विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि विधानसभा भवन की आधारशिला रख जो वृक्ष लगाया गया है वह भविष्य में फलदाई होकर उत्तराखंड के विकास में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। उधर नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने की मांग रखते हुए कहा कि सरकार को इस पर भाजपा का पूरा समर्थन मिलेगा। 

 

कुल मिलाकर गैरसैंण में विधानसभा भवन के शिलान्यास को जनता ने अपनी लम्बी लड़ाई की पहली जीत के तौर पर देखा है। लोग मानते हैं कि कल वहां परिस्थितियां स्थाई राजधानी भी बना देंगी। चीनी दार्शनिक लाओत्शे ने ठीक ही कहा था कि हजार मील का सफर भी एक कदम से ही शुरू होता है। 

 

भराड़ीसैंण में विधानभवन बनने से उस सपने की दिशा में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा जो जनता ने राज्य के लिये संद्घर्ष करते समय देखा था। लेकिन सर्दियों में शून्य और गर्मियों में अधिकतम २८ डिग्री तापमान वाली इस जगह पर विधानभवन की कल्पना क्या केवल गर्मियों के लिए ही की गयी है, यह प्रश्न बार-बार जेहन में उठता है। इस स्थल को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किये जाने की नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट की मांग कहीं उस सपने को पलीता लगाने का काम तो नहीं जिसमें हम सब गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी के रूप में देखते हैं? अजय भट्ट की मांग और देहरादून में जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि राज्य की अस्थाई राजधानी में स्थाई निर्माण किसी साजिश को अंजाम देने के लिये ही कराया जा रहा हैं। भराड़ीसैंण के साथ-साथ देहरादून में विधानसभा भवन के लिये स्थल तय किए जाने का क्या मतलब है? इससे यह बात साफ नजर आती है कि वर्तमान कांग्रेसी सरकार न तो पहाड़ी जनता को नाराज करना चाहती है और न ही उस मैदानी जनता को जिसके एक बहुत ही छोटे हिस्से ने राज्य आंदोलन में शिरकत की थी पर आज वोटर के तौर पर वह बड़ा और प्रभावशाली समूह है। 

 

यह बात कहने से परहेज नहीं है कि राज्य आंदोलन मूल और मुख्य रूप से पहाड़ी जनता का आंदोलन था और उसी ने बलिदान भी दिया लिहाजा यह बात हमारे मैदानी भाइयों को सहज स्वीकार करनी चाहिये कि नये राज्य पर पर्वतीय जनता का ज्यादा हक बनता है। आज राज्य सरकार मैदानी जनता के तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है। दो-दो स्थान पर राज्य की विधानसभा होगी तो कौन सा स्थान मुम्बई बनेगा और कौन सा नागपुर? आने वाले समय में जब फिर परिसीमन होगा और पहाड़ की जनता अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जायेगी, तब क्या होगा? जिन शरणार्थियों को उत्तराखंड ने अपने यहां स्थान दिया उन्हीं में से कोई आज पहाड़ की जनता को बोझ कह रहा है तो कोई शराब या भू-माफिया बनकर लूट रहा है। ऐसे में पहाड़ी क्या सिर्फ सीमाओं पर बलिदान करने के लिए रह जायेंगे?  

 

पर्वतीय अस्मिता को बचाने के लिये हमें उत्तराखंड की स्थाई राजधानी केवल और केवल गैरसैंण में चाहिये. इस विषय पर कोई समझौता होने की गुंजाइश नहीं है। जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों को सरकार बनाने का मौका दिया है, इसलिये जनता की भावनाओं का सम्मान रखने की जिम्मेदारी इन दो पार्टियों पर विशेष रूप से है। वैसे तो यदि ९ नवम्बर वर्ष २००० के दिन राज्य स्थापना के साथ ही गैरसैंण में नये राज्य की स्थाई राजधानी बनाने की घोषणा केंद्र में तत्कालीन भाजपा सरकार कर देती तो राजधानी स्थल चयन आयोग को न तो ११ बार विस्तार देकर सरकारी धन की बर्बादी होती और न ही आंदोलन की शक्तियों को अपनी अतिरिक्त ऊर्जा इसमें लगानी पड़ती। 

 

फिर भी यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि गत वर्ष तीन नवम्बर को गैरसैंण में विजय बहुगुणा मंत्रिमंडल की ऐतिहासिक बैठक के बाद बहुगुणा ने वहां विधानसभा भवन की स्थापना की घोषणा कर जो साहस दिखाया था, वह उत्तराखंड में अब तक का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं दिखा पाया है। यहां यह रेखांकित करना भी आवश्यक है कि जिस प्रकार गैरसैंण एक विचार है, उसी प्रकार गैरसैंण में मंत्रिमंडल की बैठक करना भी एक विचार था। जिस प्रकार गैरसैंण एक अवधारणा है, ठीक उसी प्रकार गैरसैंण क्षेत्र में विधानसभा भवन की स्थापना की घोषणा भी एक अवधारणा है। गैरसैंण नामक विचार और अवधारणा को राजनीतिक और शासकीय स्तर पर बहुगुणा सरकार ने स्वीकार किया और साथ ही इस प्रासंगिकता को भी कि गैरसैंण में विधानभ्ावन बनना चाहिये। इस स्वीकारोक्ति के अवचेतन में यह स्पष्ट है कि गैरसैंण उत्तराखंड की स्थाई राजधानी के तौर पर एक उत्तम विचार और अवधारणा है। 

 

यहां यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा कि विजय बहुगुणा ने आसानी से गैरसैंण में विधानभवन बनाने का लक्ष्य हासिल नहीं किया होगा। सरकार में भागीदार बीएसपी गैरसैंण में स्थाई राजधानी के बिल्कुल खिलाफ रही है और भले ही यूकेडी गैरसैंण में राजधानी की प्रबल समर्थक हो, बहुगुणा सरकार में यूकेडी मंत्री इसके पक्ष में न तो पहले था और न अब है। इसके अलावा कांग्रेस के भीतर ही एक बडा वर्ग ऐसा है, जो राजधानी देहरादून में ही या गैरसैंण के अलावा कहीं और चाहता है। और हां, कांग्रेस ही क्यों, भाजपा के भीतर भी आंदोलनकारियों वाले वर्ग के अलावा शायद ही कोई वर्ग राजधानी गैरसैंण में चाहता हो। कुछ अन्य पार्टियों का भले ही राज्य में कोई राजनीतिक वर्चस्व न हो, लेकिन वे भी गैरसैंण में राजधानी निर्माण के खिलाफ तो बोलती ही रहती हैं। कुल मिलाकर, विजय बहुगुणा ने अंदर-बाहर के विरोध के बावजूद कुछ खास कर दिखाया है। 

 

थोड़ा पीछे चलकर देखें तो राज्य स्थापना से ठीक पहले तक गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाने को लेकर कोई विवाद नहीं था। राज्य बना तो उसे जबरन 'उत्तरांचल' नाम दे दिया गया और अंतरिम राजधानी देहरादून में बना दी गयी। ये दोनों ही निर्णय जनविरोधी थे। राज्य का नाम तो जनदबाव में एक जनवरी २००७ से 'उत्तराखण्ड' हो भी गया, पर राजधानी गैरसैंण में बनाये जाने का मुद्दा लटका ही रह गया। अब तक दो पार्टियों की सरकारों ने इस मुद्दे को बर्फ की सिल्ली में लगाए रखा। ऐसा इसलिये किया जाता रहा ताकि क्षेत्रीय पार्टियों और संगठनों के राज्य आंदोलन के इतिहास को समाप्त कर इसे तथाकथित बड़ी पार्टियों की उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा सके।

 

सबसे पहले कदम के तौर पर राजधानी स्थल चयन के लिये नित्यानंद स्वामी की अंतरिम सरकार ने न्यायमूर्ति वीरेंद्र दीक्षित आयोग का गठन कर दिया। अर्थात एक समाधान को जबरन समस्या में बदल दिया। ऐसा इसके बावजूद किया गया कि वर्ष १९९४ में ही रमाशंकर कौशिक समिति राय दे चुकी थी कि उत्तराखण्ड की ६८ प्रतिशत जनता गैरसैंण में राज्य की राजधानी के पक्ष में है। इससे पहले, १९९२ में उक्रांद ने गैरसैंण में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर राजधानी बनाने की घोषणा की थी और तब किसी ने भी इस विचार का विरोध नहीं किया था। 

 

गैरसैंण को भौगोलिक और भूगर्भीय आधार पर जाने-माने भूगर्भवेता खड़क सिंह वल्दिया सुरक्षित बता चुके हैं। इसके अतिरिक्त दीक्षित आयोग को जो २६८ सुझाव मिले थे उनमें से १२६ में गैरसैंण को राजधानी बनाने की स्पष्ट बात थी। गढ़वाल-कुमाऊं के बीच में राजधानी बनाये जाने के सुझावों को भी गैरसैंण के पक्ष में ही मान लिया जाय तो सर्वाधिक १४२ प्रस्ताव गैरसैंण के पक्ष में थे। इसके बावजूद आयोग की रिपोर्ट में उत्तराखंड आंदोलन और राज्य के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और पारिस्थितिक पक्षों को गम्भीरता से कतई नहीं लिया गया। जिस वीरेंद्र दीक्षित राजधानी स्थल चयन आयोग को भाजपा की अंतरिम सरकार ने बनाया था, उसे अनेक बार किस सरकार ने विस्तार दिया? कांग्रेस सरकार ने। और जब किसी तरह से दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट दे दी तो उसे भूमिगत किसने किया?

 

दूसरी ओर जनता ने तो राज्य की स्थाई राजधानी गैरसैंण में बनाये जाने के पक्ष में अपना मत राज्य आंदोलन के दौरान ही दे दिया था। गैरसैंण गढ़वाल और कुमाऊं के मध्य में ही नहीं बल्कि साझी संस्कृति का प्रतीक और भौगोलिक दृष्टि से भी दोनों क्षेत्रों के लिए सुगम्य है। गैरसैंण में राजधानी इसलिये भी चाहिये क्योंकि जनता अपने शासन के हर पक्ष में भागीदार बनना चाहती है। हर नीति के निर्माण और हर निर्णय में हिस्सेदार होना चाहती है। अब बहुगुणा यह बात समझें कि राज्य के सवार्ंगीण विकास और गैरसैंण में राजधानी बनाये जाने के बीच सीधा संबंध है। यह केवल भावनात्मक नहीं, ठेठ राजनीतिक मुद्दा है। गैरसैंण में राज्य की स्थाई राजधानी बनने से ही पहाड़ों का सही विकास होगा। संक्षेप में, यदि बहुगुणा सच में उत्तराखंड की बहुसंख्यक जनता की तरह राज्य की स्थाई राजधानी गैरसैंण में देखना चाहते हैं तो वह घोषणा करें कि गैरसैंण को एक साल के भीतर स्थाई राजधानी बनाया जायेगा। यह मामला राजनीतिक लाभ लेने का भी है। यदि बहुगुणा सरकार ऐसा नहीं करती है तो गैरसैंण में मंत्रिमंडल की बैठक को वैसे ही टांय-टांय फिस्स माना जायेगा। जिस प्रकार नेपाल मंत्रिमंडल ने पारिस्थितिकी संरक्षण के उद्देश्य से माउंट एवरेस्ट की तलहटी में और मालदीव की सरकार ने इसी उद्देश्य से सागर के जल के अंदर बैठकें कर नौटंकी की थी। 

 

सरकार की सोची-समझी लापरवाही के चलते आज एक ऐसा वर्ग अवश्य बन गया है जो मानता है कि गैरसैंण में राजधानी बनाने का मतलब होगा राज्य को सालों-साल पीछे ले जाना। असल में ये वे लोग हैं जिनके कोई न कोई हित देहरादून से जुडे हैं। चाहे किसी रिश्तेदार का प्रॉपर्टी का धंधा हो या कुछ और काम। सबसे बड़ा वर्ग आज भी उन लोगों का है जो राज्य के सवार्ंगीण विकास और गैरसैंण में राजधानी बनाये जाने के बीच सीधा सम्बंध देखते हैं। यह वर्ग मानता है कि गैरसैंण में राज्य की स्थाई राजधानी बनने से ही पहाड़ों का सही विकास होगा। इस वर्ग की मांग है कि केंद्र सरकार ने उत्तराखंड राज्य को राजधानी निर्माण के लिये ८८ करोड़ रुपये की जो राशि दी है, वह भी गैरसैंण में राजधानी बनाने पर ही खर्च की जाय। ऐसा करने से शहीद बाबा मोहन उत्तराखंडी जैसे आंदोलनकारियों की शहादत का बेहतर स्मरण भी किया जा सकेगा।

 

अब यदि बहुगुणा सच में उत्तराखंड की बहुसंख्यक जनता की तरह राज्य की स्थाई राजधानी गैरसैंण में देखना चाहते हैं तो वह वहां फिर से अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलायें और उसमें निर्णय लें कि गैरसैंण को एक साल भर के भीतर स्थाई राजधानी बनाया जायेगा। साल भर इसलिये क्योंकि ११ साल से जनता को दीक्षित आयोग के नाम पर बेवकूफ बनाया जाता रहा हैं। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति होगी तो सब कुछ संभव है। पंजाब की राजधानी जब शिमला से चंडीगढ़ लायी गयी थी तो तमाम ऑफिस टेंटों से चलाये गये थे। अब तो टेक्नोलॉजी ने काफी विकास कर लिया है। गैरसैंण में इसका उपयोग आसानी से किया जा सकता है।

 

अंत में इतना ही कि गैरसैंण उत्तराखंड में लोकतंत्रीय संरचना की बुनियादी समझ का प्रतीक है और वहां राजधानी बनाने से जनता की आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और आशाओं को पूरा करने का रास्ता बनेगा। यहां यह याद दिलाना भी आवश्यक है कि गैरसैंण को पूरे राज्य का सांस्कृतिक केंद्र और भावी राजधानी मानते हुए ही गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक के दूरस्थ क्षेत्रों की जनता ने राज्य आंदोलन में ईमानदारी से सहभागिता की थी। और अब देखना है कि इस सपने को सच विजय बहुगुणा करते हैं या और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और ग्रीन डेमोक्रेसी इंटरनेशनल संस्था के बोर्ड मेम्बर हैं।

 

 
         
 
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