fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 2 02-07-2017
 
rktk [kcj  
 
 
उत्तराखण्ड के बारह साल

 

आज भी उत्तराखण्ड के विकास की नीतियां लखनऊ और दिल्ली से तय हो रही हैं। अपवाद को छोड़ दें तो यहां के मुख्यमंत्रियों की भूमिका अपने पार्टी आलाकमान के एजेंट से अधिक की नहीं रही है। राज्य में राष्ट्रीय दलों को पटखनी दे सकने वाली क्षेत्रीय शक्ति की जरूरत हमेशा महसूस की गई। इसके लिए अनुकूल स्थितियां भी पैदा हुईं लेकिन नेताओं की अक्षमता स्वार्थ लोलुपता और अदूरदर्शिता के चलते क्षेत्रीय विकल्प के जो मौके उभरे थे वे भी हाथ से चले गए

 

उत्तराखण्ड की उम्र के इन बारह बरसों में या इससे पहले के राजनीतिक कालखण्ड की किसी खिड़की से क्या कभी ग्लासनोस्त का कोई झोंका लहराया जिसे हम एक क्षेत्रीय उफान में बदल सकते थे? आज यह सवाल इसलिए भी अहम है कि हम सब यही सोचते रहे कि छोटा सूबा हागा तो स्वस्थ राजनीति होगी। चुनाव क्षेत्र छोटे होगा तो बेहतर प्रतिनिधि सामने आएंगे। अपने ही साथ उठने-बैठने वाले लोग सत्ता संभालेंगे और पर्वतीय विकास की अवधारणा को अधिक संवेदना के साथ समझेंगे। उनकी जवाबदेही भी दृढ़ता के साथ सुनिश्चित की जा सकेगी। लेकिन हुआ उल्टा। घोटालों में डूबे नेताओं-नौकरशाहों ने पिछले बारह सालों में उत्तराखण्ड में लोकतंत्र को परिमार्जित नहीं ;विसर्जित करने का काम किया है। छोटा सूबा होने के कारण इस विसर्जन की बारीकियां अधिक विद्रूप ढंग से सामने आई हैं। नेताओं-ठेकेदारों के इस खर-पतवार के बीच बरगद बनने लायक  कोई नहीं दिखाई देता। राज्य बनने से पहले के राजनीतिक इतिहास में जाएं तो उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय शक्ति की एक बड़ी संभावना अस्सी के दशका में उभरी थी जब हेमवतीनंदन बहुगुणा ने लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के झंडे पर १९८२ में बहुचर्चित गढ़वाल लोकसभा उपचुनाव लड़ा था। बेशक १९८४ में चरण सिंह के साथ मिलकर दमकिपा और फिर १९८५ में लोकदल के अध्यक्ष के रूप में बहुगुणा कर्पूरी ठाकुर जैसे क्षत्रपों के साथ मिलकर देश की राजनीति कर रहे थे लेकिन उत्तराखण्ड में उनके दल की उपस्थिति कांग्रेस व भाजपा से इतर एक तीसरी शक्ति का ही प्रतिनिधित्व कर रही थी। उत्तराखण्ड में बहुगुणा की राजनीति जमीन की किसी तीसरी ताकत में बदलने की सबसे प्रबल संभावना मार्च १९९८ में उनके निधन के बाद उभरी। लेकिन बहुगुणा की विरासत को संभालने वाले उनके परिवार खासकर पत्नी कमल बहुगुणा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस पर पूरी तरह पानी फेर दिया। न सिर्फ उत्तराखण्ड बल्कि देशभर में बहुगुणा के समर्थकों का बड़ा तबका सीएफडी को जिंदा करने के पक्ष में था लेकिन कमला बहुगुणा ने पति की तेरहवीं निपटते ही अपने बेटों के साथ कांग्रेस का दामन थाम लिया। यह पहाड़ में बहुगुणा ब्रिगेड के लिए बहुत बड़ा झटका था। कांग्रेस में बहुगुणा समर्थकों की हैसियत मुहाजिरों जैसी रही। वे चुन-चुन कर हाशिए में डाले जाते रहे और धीरे-धीरे राजनीतिक कुहासे में खो गए। इस परिस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान उत्तराखण्ड को हुआ जहां एचएन बहुगुणा की विरासत के रूप में क्षेत्रीय ताकत की एक विराट संभावना ने दम तोड़ दिया।

 

उत्तराखण्ड क्रांति दल को एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में फलने-फूलने के कम मौके नहीं मिले। लेकिन उसकी तमाम ऊर्जा और उम्र अलग राज्य की लड़ाई में ही बीती। उक्रांद की स्थापना ही इसी उद्देश्य के लिए हुई थी और यह उसके वजूद की अनिवार्य शर्त भी थी। हालांकि उत्तराखण्ड के लोगों ने अविभाजित उत्तर प्रदेश के उस दौर में उक्रांद के तीन-तीन विधायक जिताकर लखनऊ भेजे लेकिन उक्रांद ने इस जनमत का इस्तेमाल क्षेत्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देने में कम और सत्ताधारी दलों के स्वार्थी पिछलग्गू के रूप में अधिक किया। उक्रांद ने एक बड़ा मौका १९९६ के लोकसभा चुनावों में बहिष्कार की लाइन लेकर खोया। मुजफ्फरनगर कांड के बाद अंदर से बुरी तरह आहत उत्तराखण्डी मतदाता का गुस्सा उक्रांद के पक्ष में वोटों की बारिश के रूप में फूट सकता था लेकिन बहिष्कार के मूढ़ निर्णय ने पहाड़ में मौकापरस्तों के लिए राजनीतिक राहें खोल दीं जो धन-बल के सहारे आज भी उत्तराखण्ड की राजनीति के पुरोधा बने हुए हैं। लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में जब तक उक्रांद संभला तब तक उत्तराखण्ड राज्य का मुद्दा राष्ट्रीय दलों के सुरसाई जबड़े में जा चुका था। उसे एक भी सीट नहीं मिली। काशी सिंह ऐरी को उन्हीें की मांद में भाजपा ने छह हजार से अधिक मतों से पटक दिया। उत्तराखण्ड आंदोलन के बाद विधानसभा चुनावों में उक्रांद में बंटा होने से उत्तराखण्ड का मुद्दा उससे दूर ठिठक गया था। 

 

राजनीतिक रूप से सबसे मुफीद मौके पर उसकी दावेदारी सबसे कमजोर सिद्ध हुई। भाजपा तो उत्तराखण्ड का मुद्दा हड़पने के लिए १९८९ के विधानसभा चुनावों से ही ताक में थी। तब उक्रांद ने पहाड़ से विधानसभा की दो सीटें निकाली थीं। ११ जगहों पर उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। इससे भाजपा को लगा कि पहाड़ में आधार मजबूत करने के लिए उत्तराखण्ड का मुद्दा ही कारगर हो सकता है। शुरू में उसने उक्रांद से मेल-मिलाप की संभावना टटोलीं मगर जब उसे लगा कि अंदरूनी फूट और वैचारिक राजनीति का अभाव उक्रांद को हाशिए पर धकेलता जा रहा है तो उसने 'उत्तराखण्ड' के नए झुनझुने के साथ पहाड़ में अपने कदम मजबूत किए। अब उत्तराखण्ड का सवाल उत्तराखण्ड के नए रूप में सत्ता की दौड़ में शामिल एक राष्ट्रीय पार्टी का मुद्दा था। जाहिर है लोगों को यह अधिक लुभावना लगा। सन् ९१ का चुनाव आते-आते यह पहाड़ में भाजपा का एकमात्र मुद्दा बन गया और इसका लाभ उसे चुनावों में शानदार सफलता के रूप में हासिल हुआ। उक्रांद की अपनी कमजोरियों के कारण ही उसकी वोटों की फसल भाजपा काट ले गई। उक्रांद के हिस्से अब भी आंदोलन ही रहा।कच्ची नींव पर किले का ख्वाब देखने के आदी उक्रांद ने राज्य बनने के बाद भी अतीत की गलतियों से कोई सबक नहीं लिया। वह राजनीतिक रूप से परिपक्व होने की बजाय लचर होता चला गया। विधानसभा में उसकी छिटपुट उपस्थिति रही जरूर लेकिन उसका सारा राजनीतिक सौष्ठव भाजपा और कांग्रेस के आगे छिा रहा। दोनों सरकारों में उसकी भागीदारी रही। वह चाहता तो अपना एजेंडा चुपचाप आगे बढ़ा सकता था। लेकिन सत्ता का पिछलग्गू रहते वह कोई बड़ा आंदोलन भला कैसे खड़ा कर पाता। परिसीमन धारा ३७१ और गैरसैंण जैसी लड़ाइयां वह जल्द ही हार बैठा। मुजफ्फरनगर कांड के द्घाव तो उसके शीर्ष नेताओं के स्मृति पटल पर कब के मिट चुके थे। उसके नेता भी उत्तराखण्ड में जमीन लकड़ी शराब और खनन माफियाओं के गठजोड़ का हिस्सा बनते चले गए। आज एक परिवर्तनकारी ताकत के रूप में उक्रांद बुरी तरह पिट चुका है। हाल के टिहरी लोकसभा उपचुनाव में उसके तेज तर्रार अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार मात्र ६९३९ वोट पा सके। इधर राज्य के राजनीतिक मुक्ताकाश पर उत्तराखण्ड जनता मोर्चा उत्तराखण्ड विकास पार्टी परिवर्तन पार्टी और रक्षामंच जैसी उल्काएं भी नजर आईं लेकिन जरा भी चकमा पैदा नहीं कर सकीं।

 

यदि हम उत्तराखण्ड में किसी परिवर्तनकारी क्षेत्रीय ताकत की बात करें तो फरवरी २००२ में उत्तराखण्ड के पहले विधानसभा चुनावों के दौरान या इससे तुरंत बाद इस दिशा में बहुत कुछ तय हो जाना चाहिए था। तब चुनाव में उठने वाले मुद्दों की शक्ल-सूरत काफी बदली हुई थी और पहली बार था कि चुनावी फसल काटने के लिए राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय धार वाले हंसुए की बजाय स्थानीयता से जूझ सकने लायक बख्तरबंद की जरूरत थी। चुनाव के बाद ऐसी परिस्थितियां बनीं भी कि कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत बगावत कर क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वर देते। उनकी थाली नारायण दत्त तिवारी हथिया गए थे। इसे लेकर उत्तराखण्ड का आम आदमी हतप्रभ और गुस्से में था क्योंकि तिवारी उत्तराखण्ड राज्य के सबसे मुखर विरोधियों में थे। रावत यदि तब बगावत कर देते तो संभव है उनके नेतृत्व में उत्तराखण्ड में एक बड़ी क्षेत्रीय ताकत जन्म ले लेती। लेकिन नंदीग्राम जैसी सवालों पर टाटा से टकराने और लोगों की आकांक्षाओं पर मर मिटने का ममता बनर्जी सा जज्बा हर किसी के पास नहीं होता। हरीश रावत को इतिहास ने दूसरा मौका २०१२ में भी दिया जब विजय बहुगुणा को ताज पहनाकर कांग्रेस नेतृत्व ने एक बार फिर उनका हक मारा। इस बार तो वह केंद्र में मंत्री थे और परिस्थितियां २००२ के मुकाबले उनके पक्ष में कहीं अधिक अनुकूल थीं। लेकिन रावत चुप लगाने की कीमत वसूल कर कागजी शेर साबित हुए। लगभग यही स्थिति इस दौर में जनरल साब यानी भुवन चन्द्र खण्डूड़ी की भी रही। भाजपा ने उनकी सदरी से खजाने की चाबी छीनकर राजनाथ के दरबारियों को क्या थमाई कि जनरल मन मसोस कर रह गए। उत्तराखण्ड के भाग्य विधाता बनाए गए राजनाथ के दरबारियों ने उत्तराखण्ड को कहां-कहां नहीं बेचा। इस बीच 'नौछमी नारेण' से लेकर अब 'कतगा खैल्यू' तक की भ्रष्ट अनुगूंजें भी पहाड़ के चप्पे-चप्पे पर सुनाई देती रहीं। ऐसे में निश्चित ही खण्डूड़ी और टीपीएस दो जनरलों का गठजोड़ उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय राजनीति को एक नया मोड़ दे सकता था। २०११ के मध्य तक ऐसे हालात बन भी गए थे लेकिन फरवरी २०१२ के चुनावों से ऐन पहले मुख्यमंत्री पद के लालच में जनरल साब फिसल गए।

 

सवाल है कि सबसे अनुकूल और उर्वरक संभावनाओं के बावजूद उत्तराखण्ड में कोई क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत क्यों नहीं पनपी? दरअसल अविभाजित उत्तर प्रदेश का अंग रहते उत्तराखण्ड में हर चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों से ओत-प्रोत लड़ा जाता रहा। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि यहां चुनावी मुद्दों में ढलने लायक क्षेत्रीय आकांक्षाएं नहीं थीं। बल्कि कहना चाहिए कि अभावों में पलते पहाड़ों में आजादी के बाद से ही क्षेत्रीय मुद्दों का एक पूरा पिटारा मौजूद था। इससे भी बढ़कर एक महत्वपूर्ण आकांक्षा के रूप में यहां एक सर्वमान्य विचार लोगों को हमेशा उद्वेलित किए रहा जिसकी परिणति उत्तराखण्ड राज्य के रूप में सामने आई। लेकिन यह आश्चर्यजनक था कि मुद्दों के इस पिटारे को वोट की राजनीति के बहाने खोलने की कोशिश कभी सिरे नहीं चढ़ सकी। यहां तक कि उत्तराखण्ड राज्य के सर्वमान्य मुद्दे पर भी यहां चुनावों का भविष्य कभी तय नहीं किया जा सका। तब भी नहीं जब १९९४ में उत्तराखण्ड आंदोलन चरम पर था और लोगों ने शहादतें तक दीं। उस दौर के चुनावों में भी राज्य का मुद्दा स्थानीयता का वैसा बाना नहीं ओढ़ सका। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने इसे अपने घोषणापत्रों के जरिए खूब भुनाया लेकिन आम मतदाता ने 'वाजपेयी की छवि' की राष्ट्रीय बयार में बहकर ही वोट डाले। दरअसल आजादी के बाद से अस्सी के दशक की शुरुआत तक यह क्षेत्र कांग्रेस का मजबूत किला रहा। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार इस क्षेत्र के प्रतिनिधि हमेशा यहां के आम मतदाता के दिलो-दिमाग में छाए रहे। पहाड़ का आम आदमी इनमें पहाड़ियत की खुशबू महसूस करता था। लेकिन वे देश के नेता थे और उन्होंने पहाड़ियत को अपने व्यक्तित्व का अंग कभी नहीं बनने दिया। यहां तक कि राज्य पुनर्गठन के जब-जब भी मौके आएउत्तराखण्ड को अलग राज्य का दर्जा देने का सबसे प्रबल विरोध करने वालों में यही नेतागण थे। उन्हें लगता था कि कहीं वे क्षेत्रवाद की विष बेल के जनक न कहलाए जाने लगें। हालांकि चुनावों के दौरान पहाड़ी सीटों के टिकट तय करने और उम्मीदवारों के हक में सभाओं के दौरान अपनी पर्वतीय छवि को प्रस्तुत करने में उन्हें कभी संकोच नहीं हुआ। लेकिन यह सच है कि इन मौकों पर भी उनके मुद्दे राष्ट्रीय ही हुआ करते थे। बल्कि एक हद तक उनका व्यक्तित्व ही सबसे भारी मुद्दा बन जाया करता था। तब स्थानीयता के बहाने चुनाव को प्रभावित करने लायक कुछ नहीं बचता था।

 

देश में जनता पार्टी जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चा जैसे राजनीतिक भूस्खलनों और इसके बाद आई राजनीतिक अस्थिरता ने नेताओं के राजनीतिक कद को आश्चर्यजनक ढंग से विकेंद्रित किया। केंद्र की राजनीति में सक्रिय कई सूरमा अपनी क्षेत्रीय सूरमा के बूते ही टिके रहे। दुर्भाग्य से पहाड़ की राजनीतिक विरासत को कोई क्षेत्रीय सूरमा नहीं मिल सका। दिल्ली-लखनऊ की समीपता मैदानों में पलायन और सशस्त्र बलों में संख्या जेसे पहलुओं ने पहाड़ को राजनीति की केंद्रीय धारा से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन हमारे दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं व प्रबुद्धों ने हमेशा से स्थानीयता को संकीर्ण क्षेत्रवाद कहकर हतोत्साहित किया। इस कारण भी चुनाव स्थानीयता से नहीं जुड़ सके। जाहिर है कोई ईमाइनदार क्षेत्रीय दल ही स्थानीयता से जुड़े मुद्दों को उठाने की क्षमता रख सकता है। नए राज्य से यहां के हर तबके की आशाएं और अपेक्षाएं जुड़ी हैं। अब तक यहां शासन में रहे भाजपा और कांग्रेस जैसे दल इस मोर्चे पर बुरी तरह फेल रहे हैं। ये सरकारें लोगों की शिकायतों से द्घिरी रहीं। भ्रष्टाचार दुराचार और घोटालों के दर्जनों किस्से मंत्रियों और नौकरशाहों के दामन पर चिपके रहे। आज भी उत्तराखण्ड के लिए लखनऊ और दिल्ली में बैठकर नीतियां बन रही हैं। बाहरी शक्तियां और धनबल पूरी तरह पहाड़ पर हावी है। महत्वपूर्ण नियुक्तियों में पहाड़ियों को दरकिनार किया जा रहा है। अपवाद को छोड़ दें तो यहां के मुख्यमंत्रियों की भूमिका अपने पार्टी आलाकमान के एजेंट से अधिक नहीं रही है। वह समय-समय पर अपने आकाओं को जल-जंगल-जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े उपहार दे रहा है। जिन उद्देश्यों के लिए राज्य मांगा गया वह निरापद साबित हो रहे हैं। विडंबना देखिए कि उत्तराखण्ड में परिवर्तनकारी क्षेत्रीय शक्तियों के धु्रवीकरण की सबसे अधिक जरूरत के समय इसकी संभावना सबसे अधिक धूमिल

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 65%
uk & 13%
 
 
fiNyk vad

  • आकाश नागर

आम जनता में पुलिस की छवि बेशक संवेदनहीन खाकी वर्दी वाले की हो। लेकिन लोकप्रिय आईपीएस अधिकारी डॉ + सदानंद दाते ने अपने काम और व्यवहार से जताया

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1691250
ckj