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राजनीति
 
सीमाओं तक नहीं पहुंचा विकास

 

उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्तंभ माने जाने वाले भगत सिंह कोश्यारी भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। अविभाजित उत्तर प्रदेश में विधान परिषद सदस्य रहने के बाद उन्हें उत्तराखण्ड सरकार में मंत्री और मुख्यमंत्री बनने का भी अवसर मिला। वर्तमान में वह राज्यसभा सदस्य हैं। कोश्यारी से राज्य निर्माण के बाद की स्थितियों पर गुंजन कुमार की विशेष बातचीत के प्रमुख अंश

 

राज्य गठन के बारह साल बाद विकास की स्थिति से आप कितने संतुष्ट हैं?

उत्तराखण्ड राज्य का गठन भारतीय जनता पार्टी ने किया। गठन के एक महीने के अंदर इसे विशेष राज्य का दर्जा और डेढ़ साल में औद्योगिक पैकज केंद्र की भाजपा सरकार ने ही दिया। इसके परिणामस्वरूप प्रदेश की जीडीपी बढ़ी। राज्य में उद्योग-धंधे लगे। उत्तराखण्ड में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ। लोगों को रोजगार मिला। यह सब अलग राज्य बनने के बाद ही हुआ। उत्तर प्रदेश में रहते तो यह सब नहीं होता। राज्य गठन के पहले सवा साल में ही कई रुके हुए विकास कार्योर्ं को गति दी गई। टिहरी और मनेरी-भाली चरण-दो पर जो काम २०-३० सालों से रुका हुआ था उसे मैंने शुरू करवाया। पिछले एक साल को छोड़ दें तो उससे पहले के पांच सालों में प्रदेश में कई सड़कें बनीं। हमारे वयोवृद्ध नेता एनडी तिवारी जी ने भी कुछ कार्य करवाए। औद्योगिक पैकेज लाने में उनका भी हाथ था लेकिन वह ज्यादा वृद्ध थे इसलिए शासन पर उनकी पकड़ थोड़ी कमजोर थी। जिसके कारण शासन के निचले स्तर पर भ्रष्टाचार शुरू हुआ। निचले स्तर के भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग पायी। पिछले एक साल से तो ऐसा लग रहा है मानो सभी विकास कार्यों पर ब्रेक लग गया है। यह कालखण्ड उत्तराखण्ड के लिए काला अध्याय होगा। मुख्यमंत्री पहाड़ के नहीं हैं। वह पहाड़ की बुनियादी समस्याओं से वाकिफ नहीं हैं उनका प्रदेश से लगाव नहीं है इसलिए वे जितना लूट सकते हैं लूट रहे हैं। मुख्यमंत्री की हालत यह है कि उनकी पार्टी के नेता ही उनका विरोध कर रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी के विधायकों को ही अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए धरने पर बैठना पड़ता है। वे विधानसभा में काली पट्टी लगाकर जाते हैं। इससे वर्तमान सरकार की कार्य क्षमता को समझ सकते हैं। 

 

भाजपा ने अपने साढ़े छह साल के शासनकाल में पांच बार मुख्यमंत्री बदले हैं। एक नए राज्य के लिए क्या इसे सही मान सकते हैं?

प्रदेश का विकास और वहां कौन सी धारा फैली यह अलग विषय है और मुख्यमंत्री बदलना अलग विषय है। पार्टी हमेशा सोचती विचारती है कि किस नेता के नेतृत्व में कैसा कार्य हो रहा है? उदाहरण के लिए हमारे मुख्यमंत्री खण्डूड़ी पर किसी प्रकार का कोई आरोप नहीं था। किसी ने यह नहीं कहा कि वे अच्छे प्रशासक नहीं हैं। फिर भी पार्टी ने उन्हें बदला। पार्र्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने पार्टी हित में फैसला लिया। भाजपा एक व्यक्ति के फैसले और निर्णय पर चलने वाली पार्टी नहीं है। हमारी पार्टी में यह भी नहीं है कि जिसे एक बार बना दिया उसे ही जीवन भर रखा जाए। लोकतांत्रिक पार्र्टी को कभी-कभी फायदा होता है तो कभी नुकसान भी होता है। मध्य प्रदेश में पहले उमा भारती और फिर गौड़ साहब को हटाकर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया। शिवराज सिंह सफल हो गए। इसलिए वहां उन्हें कंटिन्यू कर दिया गया। राजनीतिक पार्टी में इस प्रकार का बदलाव होता रहता है। इसमें किसी विद्वेष की बात नहीं होती।

 

इसका मतलब यह हुआ कि नित्यानंद स्वामी खण्डूड़ी और निशंक सफल मुख्यमंत्री नहीं बन पाए इसलिए उन्हें हटाया गया?

नहीं ऐसा नहीं कि वह सफल नहीं थे। सफल और असफल दूसरी चीज है। हमारे किसी मुख्यमंत्री पर कोई आरोप नहीं था। पार्टी राज्य में और उत्तम करना चाहती थी। हो सकता है उस कारण केंन्द्रीय नेतृत्व ने यह फैसला लिया होगा। उस फैसले के बारे में केन्द्रीय नेता ही सही बता सकते हैं। मैं तो कह नहीं सकता। हां कांग्रेस जैसी स्थिति भाजपा में नहीं है। अभी देखिए वर्तमान मुख्यमंत्री को कांग्रेस का कोई नेता पंसद नहीं करता। कोई विधायक उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता लेकिन चूंकि पार्टी आलकमान चाहता है तो विजय बहुगुणा को कोई हटा नहीं सकता। ऐसी स्थिति हमारे यहां नहीं है।

 

आपने कहा आपके किसी मुख्यमंत्री पर कोई आरोप नहीं था। निशंक पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। पार्टी हाईकमान को मजबूरन चुनाव से पहले उन्हें हटाना पड़ा। इस पर आप क्या कहेंगे?

निशंक जी पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित नहीं हुआ। उन पर लगे आरोप की न्यायिक जांच हुई। लेकिन उसमें भी उन्हें दोषी नहीं पाया गया। कभी-कभी कुछ लोग किसी बात पर हल्ला मचाने लगते हैं। ज्यादा हल्ला मचाने से माहौल खराब होता है। इसलिए पार्र्टी उस खराब माहौल को ठीक करने के लिए कोई निर्णय लेती है। उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। बिना सबूत आप किसी को कैसे दोषी कह सकते हैं? उनके मामले में हल्ला मचाने पर निशंक जी ने खुद कहा कि यदि हमारे हटने से पार्टी अच्छा करती है तो मैं इस्तीफा देता हूं। कहीं कुछ गलत नहीं है।

 

हाईकोर्ट ने बेशक उन्हें दोषी नहीं माना लेकिन उनके कार्यकाल में द्घोटाला हुआ है। क्या इसके लिए वह दोषी नहीं है?

हाईकोर्ट ने उक्त मामले में कुछ अधिकारियों को संलिप्त पाया। इसी के आधार पर अपना फैसला सुनाया। मैंने आपको पहले ही कहा है कि जिस तरह खण्डूड़ी जी पर कोई आक्षेप नहीं था और कुछ अधिकारी माहौल खराब कर रहे थे उसी प्रकार उक्त मामले में हुआ। अधिकारियों के भ्रष्टाचार का ठीकरा मुख्यमंत्री पर फूटता है। हम लोगों को अधिकारियों पर कंट्रोल रखना चाहिए। भविष्य में जब कभी भाजपा की सरकार बनेगी तो इन सब कमियों से सीख लेकर उसमें सुधार करेंगे।

 

सिडकुल में सैकड़ों-हजारों किसानों की जमीनें गईं। लेकिन वहां के उद्योगों में सरकार की योजना के मुताबिक ७० फीसदी स्थानीय लोगों को आज तक रोजगार नहीं मिला। क्या यह अब तक की सरकारों की कमी नहीं हैं?

नहीं ऐसा नहीं है। राज्य में निवेश होने से प्रदेश के लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ढंग से रोजगार मिला है। किसी का ट्रक चल रहा है किसी की जीप चल रही है। किसी को छोटी नौकरी मिली तो किसी को बड़े रूप में रोजगार मिला है। हां और ज्यादा रोजगार मिल सकता है। इसके लिए सरकार को कोशिश करनी चाहिए। यदि हमने इसके लिए कोई नीति बनाई है तो उसके अनुरूप कार्य होना चाहिए। वर्तमान सरकार इस दिशा में कदम उठाए।

 

आपकी पार्टी ने औद्योगिक पैकेज लाने का खूब ढिंढ़ोरा पीटा है लेकिन सभी उद्योग तीन मैदानी जिलों में सिमट कर रह गये। प्रदेश के पर्वतीय जनपदों में उद्योग क्यों नहीं पहुंच पाये?

अटल जी ने प्रदेश को औद्योगिक पैकेज दिया जिस कारण हरिद्वार ऊधमसिंहनगर में बड़े-बड़े उद्योग लगे। हमारे मुख्यमंत्री खण्डूड़ी जी अपने कार्यकाल में पहाड़ पर उद्योग ले जाने की नीति बना रहे थे। लेकिन २०१० में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने औद्योगिक पैकेज को नहीं बढ़ाया उसके बाद से प्रदेश में कोई नया उद्योग नहीं आया। वर्तमान मुख्यमंत्री इलाहाबाद से हैं। उन्हें वैसे भी पहाड़ से कोई लगाव नहीं है। इसलिए उनके कार्यकाल में पहाड़ पर उद्योग लगना नामुमकिन लगता है। जब हमारी सरकार बनेगी तो हम इस पर काम करेंगे। हमारे पास लोग भी हैं समझ भी और विचार भी। कांग्रेस के पास न समझ है न विचार और न ही लोग हैं। जो लोग हैं वे भटक रहे हैं। जो योग्य नहीं वे कुर्सी पर बैठे हैं।

 

क्या राज्य में बड़े बांध बनने चाहिए?

जहां तक हो सके बड़े बांध कम से कम बनने चाहिए। यदि जरूरी ही हैं तो जहां कम से कम नुकसान हो लोगों का विस्थापन कम से कम हो उन्हीं जगहों पर ऐसे बांध बनाये जा सकते हैं। मैं स्वयं टिहरी बांध का विरोधी था लेकिन जब मैं मंत्री बना और देखा कि उसमें ७ हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं तो महसूस किया कि ऐसे में उसे बंद करना उचित नहीं है। इसलिए मैंने कहा कि बेशक गंगा मैय्या मुझे मुख्यमंत्री पद से हटा ले लेकिन टिहरी बांध शुरू होना चाहिए। मैंने काम शुरू करवाया। मेरा स्पष्ट मानना है कि बांध के बजाए रन ऑफ द रिवर के आधार पर परियोजना लगे और जहां एक हजार मेगावाट की परियोजना लग रही हो उसे ५०० मेगावाट कीजिए और आधा पानी नदी में बिना रुकावट के बहने दीजिए। इससे स्थानीय लोगों को पानी की समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा। हमारे राजनेताओं से गलती यह हुई कि वह वैज्ञानिकों की बातों पर चले। जबकि हमें अपनी संस्कृति धर्म आदि का भी ख्याल रखना है। जहां ५०० मेगावाट की क्षमता है वहीं हम ३००-४०० मेगावाट बिजली उत्पादन करें। गाड-गदेरों और किसानों के लिए भी पानी छोड़ना सुनिश्चत करना चाहिए। वैेसे भी अब प्रदेश में बड़े बांधों की संभावनाएं कम हैं। अब ज्यादातर रन ऑफ द रिवर परियोजनाएं बन रही हैं टनल के माध्यम से पानी ले जाया जाता है। वहां भी ज्यादा से ज्यादा पानी स्थानीय लोगों के लिए छोड़ना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो विरोध अपने आप कम होगा। इससे स्थानीय लोगों खेतों और जानवर के साथ ही पेयजल की समस्या नहीं रहेगी।

 

रन ऑफ द रिवर में भी कई कमियां सामने आई हैं। आस-पास के गांवों के लिए खतरा बना रहता है?

जब आप कोई कार्य करेंगे तो कुछ न कुछ नुकसान होगा ही इसलिए मेरा मानना है जिनका नुकसान हो रहा है उनका पुनर्वास करें। उनका खयाल रखें। हमने अपने कार्यकाल में चमोली में जेपी वालों को अनुमति दी थी। वहां कोई नुकसान नहीं हुआ। उत्तरकाशी में मनेरी-भाली चरण-दो उतनी बड़ी परियोजना बनीवहां कुछ नहीं हुआ।

 

पिछले साल उत्तरकाशी में बादल फटने के बाद जो भारी तबाही हुई उसमें असीगंगा परियोजना का टूटना एक बड़ा कारण बताया गया फिर आप कैसे कह सकते हैं कि कुछ नहीं हुआ?

असीगंगा फेज-एक दो तीन में तो टनल है नहीं। वहां नुकसान ज्यादा इसलिए हुआ क्योंकि बादल वहीं फटा। बादल फटने से हम और आप रोक नहीं सकते। वह जहां फटता है तबाही होती है। हिमालयी क्षेत्र में यह होता रहता है। बड़कोट कपकोट चमोली आदि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटते हैं। प्रकृति के इस वीभत्स रूप पर इंसान का वश नहीं है।

 

प्रदेश अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पहाड़ से पलायन सामरिक दृष्टि से कितना खतरनाक है? पलायन पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है?

चीन भारतीय सीमाओं तक सड़क ले आया है। रेल की लाइन भी बिछा दी है। हम इसमें पिछड़े हुए हैं। हमारा मानना है कि जब तक आप सीमा तक सड़क नहीं ले जाएंगे रेल लाइन नहीं ले जाएंगे डॉक्टर और शिक्षक नहीं ले जायेंगे तो पलायन होगा ही इन सबका सीमा क्षेत्र में होना सामरिक दृष्टि से जरूरी है। सीमा क्षेत्र या पहाड़ से पलायन होना अपने आप में खतरनाक तब होता है कि बाहर गए लोग अपने गांव वापस नहीं आते उनका संबंध अपने गांव-समाज से टूट जाता है। केरल में तो आधा से ज्यादा पलायन हुआ। लेकिन वहां कोई इसे बड़ी समस्या नहीं कहता है। वहां के लोग दुबई मुंबई यूरोप सभी जगह मिलेंगे। वामपंथी मनी ऑर्डर इकॉनोमी का विरोध करते हैं। मैं कहता हूं यदि लोग बाहर जाते हैं वहां कमाते हैं और पैसा घर भेजते हैं तो अच्छा ही तो है। गांव-प्रदेश में पैसा तो आ रहा है। हां लोग गांव छोड़कर जहां जा रहे हैं वहीं बस जा रहे हैं तो यह खतरनाक है। इसके लिए हमें सभी लोगों को हर प्रकार की सुविधाएं देनी होंगी और यह काम सरकार का है।

 

बारह साल में भी स्कूलों में शिक्षक अस्पतालों में डॉक्टर नहीं पहुंच पाये। यह समस्या कब तक दूर होगी?

जब तक यह सरकार है तब तक तो नहीं होगी। इसलिए अभी इस सवाल का जवाब नहीं दे सकते। सरकार जाएगी तभी कुछ कह पाएंगे।

 
         
 
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