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उत्तराखण्ड के बारह साल

 

 

उत्तराखण्ड के नेता लोकप्रियता और वाहवाही लूटने के लिए चुनाव के वक्त वोट के वास्ते वादों- घोषणाओं की झड़ियां लगा देते हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश हवाई ही साबित होती हैं। राज्य गठन के बाद विजय बहुगुणा सरकार बनने तक प्रदेश में विकास के नाम पर ४९४२ घोषणाएं की गर्ईं। हैरानी की बात है कि इनमें से धरातल पर सिर्फ १९२० ही उतर पाईं

 

बयानबाजी और वादाखोरी देश के जनप्रतिनिधियों में कूट-कूट कर भरी हुई है। विकास और कल्याण के नाम पर जनता को बरगलाने के लिए हर सरकार उसे घोषणाओं का पुलिंदा थमा देती है। इसी तरह उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद से ही सूबे के समग्र विकास के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं। 

 

प्रदेश में पहली निर्वाचित सरकार नारायण दत्त तिवारी की बनी। तिवारी सरकार ने अपने कार्यकाल में कुल २३८६ वादे किए। जिनमें से ९३२ वादे ही पूरे हो पाए। बाकी १४५४ वादे अधर में लटके रह गए हैं। इन वादों का सच साल दर साल देखा जाए तो वर्ष २००३ में किए गए ११८ वादों में से ९३ ही पूरे हो पाए। वर्ष २००४ में की गई ६६७ घोषणाओं में से ४८१ ही पूरी हुईं तो वर्ष २००५ में ५५१ में से २१८ वादे ही पूरे किए जा सके। इसी तरह वर्ष २००६ में किए गए १०५० वादों में से मात्र ११८ वादों को ही अमलीजामा पहनाया जा सका।

 

तिवारी के बाद प्रदेश में मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी के नेतृत्व में भाजपा सरकार आई। यह भी घोषणाओं के पुल बांधने में पीछे नहीं रही। खण्डूड़ी प्रदेश में दो बार मुख्यमत्री रहे। इनके दोनों कार्यकालों में कुल ६१७ घोषणाएं की गईं। पहले कार्यकाल में की गई ५८४ घोषणाओं में से ३०२ घोषणाएं ही पूरा की जा सकीं जबकि दूसरे कार्यकाल में की गई ३३ घोषणाओं को शत-प्रतिशत पूरा कर लिया गया। 

 

खण्डूड़ी के दोनों कार्यकालों के बीच रमेश पोखरियाल निशंक प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। निशंक ने अपने २६ महीने के कार्यकाल में विकास के लिए १९३९ घोषणाएं कर डालीं। इनमें से मात्र ६५३ घोषणाएं ही पूरा की जा सकीं। इन सभी पूरी और अपूर्ण घोषणाओं को विभाग दर विभाग के हिसाब से दिए विवरण तालिका और ग्राफ से समझा जा सकता है।

 

 

बहुगुणा की विकास घोषणाएं

एक वर्ष से अधिक के कार्यकाल में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य के विकास के लिए ८५८ घोषणाएं की है। जिसमें से मात्र ११ घोषणाएं ही अभी तक पूरी की जा सकी है। शेष घोषणाएं हकीकत में बदलने की बाट जो रही हैं। आरटीआई से मिली जानकारी से पता चलता है कि वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपनी कुल जमा घोषणाओं का ६७ फीसदी हिस्सा टिहरी लोकसभा चुनाव के दौरान की। जहां से उनके पुत्र साकेत बहुगुणा लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे जिनको राजनीतिक पायदान चढ़ाने की कोशिश ने मुख्यमंत्री पिता को आज कटरे में खड़ा कर दिया है। इस प्रकरण में दुखद यह है कि मुख्यमंत्री अपने ही कार्यालय द्वारा दी गयी इस सूचना को गलत बता रहे हैं और दोष लोकसूचना अधिकारी पर मढ़ रहें है। उनका कहना है कि उसने गलत सूचना दी है। बाद में इस मामले पर मुख्यमंत्री ने जबाब दिया है कि ये घोषणाएं आगामी पांच वर्षों में पूरा करने के लिए की गयी हैं।

 

 

उत्तराखण्ड के राज्य गठन होने से लेकर अब तक (यानी बहुगुणा सरकार से पहले की सरकार तक विकास के नाम पर कुल ४९४२ घोषणाएं की गईं। इन घोषणाओं में से १९२० घोषणाएं ही पूरी की जा सकीं। बाकी ३०२२ घोषणाओं का अब अता-पता नहीं। राज्य में बनी सभी सरकारों में विभाग दर विभाग घोषणाएं करने की प्रतियोगिता सी दिखती है। दिलचस्प बात यह है कि तिवारी सरकार में महिला सशक्तीकरण के लिए कुल ११ वादे किए गए थे। लेकिन ये वादे अमल में कभी नहीं लाये गये। इनके पूरे न होने के पीछे तिवारी की छवि भी सामने आती है। जबकि खण्डूड़ी सरकार में सशक्तीकरण से संबंधित दो वादे किए गए थे और दोनों पूरे किए गए। 

 

इसी तरह युवा कल्याण की बात की जाय तो इसके लिए वादों का पुल बांधने में सबसे आगे खण्डूड़ी की सरकार रही। खण्डूड़ी ने अपने कार्यकाल में युवाओं को भरमाने के लिए २२ वादे किए और उसमें से किसी वादे को पूरा नहीं किया जा सका। घपलों और घोटालों का विभाग कहे जाने वाले लोक निर्माण विभाग में वादों को पूरा न करने की दृष्टि से रमेश पोखरियाल निशंक की सरकार सबसे आगे रही। निशंक सरकार ने लोक निर्माण विभाग से संबंधित १३४ वादे किए लेकिन उनमें से मात्र चार वादों को ही पूरा कर सके। जबकि तिवारी सरकार ने इस विभाग से संबंधित सबसे अधिक ७४५ वादे किए थे लेकिन प्रतिशत की दृष्टि से निशंक सरकार से कई गुना अधिक वादों को पूरा किया। यही हाल खण्डूड़ी का भी रहा। 

 

आये दिन राज्य में अपराध की घटनाएं सुर्खियों में रहती हैं। इन पर नकेल कसने के लिए न्याय से संबंधित कई घोषणाएं की गईं। इस मामले में सबसे खरी खण्डूड़ी की सरकार रही। क्योंकि खण्डूड़ी अपने शासन काल में न्याय से संबंधित केवल एक वादा किया था और वह भी समय रहते पूरा कर दिया। बाकी तिवारी सरकार तो न्याय के वादों में भी अन्याय करती रही। कुल ग्यारह वादों में से केवल ४ वादों को ही पूरा करने में तिवारी सरकार सफल रही। इस मामले में निशंक सरकार फिफ्टी-फिफ्टी रही। सामाजिक कल्याण की बात की जाय तो खण्डूड़ी सरकार ने ही पहाड़ और तराई दोनों क्षेत्रों को समान दृष्टि से देखा। इस मामले खण्डूड़ी का अभी तक कोई सानी नहीं। सामाजिक कल्याण के लिए खण्डूड़ी सरकार ने जितने भी वादे किए सबको निभाया। जबकि अन्य जैसे तिवारी और निशंक सरकार इसमें भी घोषणाओं की प्रतियोगिता करती रही। यह अलग बात है कि इन वादों को पूरा करने में उन्होंने रजत हासिल किया। लेकिन सामाजिक कल्याण में खण्डूड़ी को तो स्वर्ण ही हासिल हुआ।

 

उत्तराखण्ड राज्य की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का महत्वपूर्ण योगदान है। पर्यटन से ही यहां रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। राज्य में इसका बकायदा एक मंत्रालय है जिसके तहत पर्यटन को बढ़ावा दिया जाता है। पर्यटन जैसे मुख्य आय के स्रोत के कारण ही उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश से पृथक राज्य बना। लेकिन इसके बाद सत्ता में आईं सरकारों ने वादों का पुलिंदा ऐसे बांधा कि सूबे की आम जनता में लगतार नई उम्मीदें जगती रहीं। पर्यटन की जमीनी हकीकत भी कुछ इसी तरह है। तिवारी सरकार अब तक बनी सरकारों में से पर्यटन पर सबसे अधिक घोषणा करनें में शुमार है। इस सरकार ने अपने कार्यकाल में ५४ पर्यटन से जुड़े लेकिन पूरे मात्र १९ वादे ही किए जा सके। अर्थात्जि सके दम पर तिवारी सरकार बनी उसी में कोताही बरती गई। इस सरकार के बाद खण्डूड़ी नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई। इसने भी वादे किए लेकिन उसी हिसाब से उन्हें पूरा भी किया। बीच में निशंक सरकार बनी। उसने १९ वादे किए जिनमें से ७ वादों को पूरा करने में सफल रही।

 

साक्षरता के मामले में उत्तराखण्ड भले ही देश की साक्षरता दर से ऊपर हो लेकिन यहां के प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति अभी भी बदहाल है। बुनियादी शिक्षा के नाम पर तिवारी सरकार से लेकर खण्डूड़ी सरकार तक खूब घोषणाएं की जाती रहीं। हालांकि उनमें से कई घोषणाएं अमल में भी लाई गईं लेकिन सरकार दर सरकार बुनियादी शिक्षा से संबंधित इन घोषणाओं का हिसाब किया जाय तो तिवारी सरकार ने अपने सबसे ज्यादा वादों को तरजीह दी। यानी अब तक की सरकार में सबसे ज्यादा बुनियादी शिक्षा पर वादे पूरे करने वाली तिवारी सरकार ही रही। इसने शिक्षा संबंधी कुल पांच सौ वादे किए जिसमें से २२० वादों को पूरा करते करते हांफ गए। खण्डूड़ी सरकार इस मामले में भी खरी उतरी। इसने शिक्षा सुधार के लिए ८४ वादे किए। इसमें से ८३ वादों को पूरा किया गया। बीच में निशंक सरकार ने २१३ वादों का आडम्बर रचा लेकिन उसने ३८ वादों को ही पूरा करने में समय बिता दिया। 

 

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गावों में रहता है। अर्थात भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि और ग्रामोद्योग पर आधारित है। उत्तराखण्ड में भी कृषि और ग्रामोद्योग को सत्तासीन सरकारों द्वारा समय-समय पर तरजीह दी गई। लेकिन कृषि के लिए यह महत्व सरकारी घोषणाओं तक ही सीमित रह गया। नारायण दत्त तिवारी सरकार में कृषि और ग्राम्य विकास को मिलाकर ३६ घोषणाएं की गईं थीं। जिनमें से मात्र ११ घोषणाओं को ही अमली जामा पहनाया गया। खण्डूड़ी सरकार कृषि और ग्राम्य विकास के मामले में भी अव्वल रहीं। इसने जितनी घोषणाएं कीं उन्हें पूरा करने में पूरा प्रयास किया और सफल भी रही। जबकि निशंक सरकार इस मामले में सबसे पीछे रह गई। 

(लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

 
         
 
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