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vad 46 07-05-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
कुहासे भरे बारह साल

 

उत्तराखण्ड गठन की मांग के मूल में जो सबसे प्रमुख बात थी उसे हिमालय पुत्र की ख्याति पाए स्व ़ हेमवती नंदन बहुगुणा ने एक ही वाक्य में आज से तीन दशक पूर्व टिहरी में एक आमसभा को संबोधित करते हुए बयां किया था। उन्होंने कहा उत्तराखण्ड का आदमी स्वाभिमानपूर्वक जिंदगी गुजारने के लिए रास्ते की खोज कर रहा है। १९८३ में उन्होंने यह बात कही थी और आज २०१३ है नई शताब्दी के तेरह बरस और राज्य गठन के बारह बरस बीतने के बाद भी उत्तराखण्ड के आम आदमी को वह रास्ता नहीं मिल पाया है। अलग राज्य बनने के बाद स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीने का जो मार्ग उसे मिल जाना चाहिए था वह नवगठित राज्य के नीति निर्धारकों की संकुचित दृष्टि कुप्रबंधन और लूट के चलते एक ऐसी अंधी गली में गुम हो गया है जहां उसे खोज पाना वर्तमान हालातों में असंभव सा प्रतीत होता है। इन बारह सालों में उत्तराखण्ड अपनी मंजिल के कितना करीब पहुंचा उसकी क्या उपलब्धियां रहीं और क्या खामियांआम आदमी तक विकास की रोशनी कितनी पहुंची और कितनी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई क्या पहाड़ के पानी और जवानी का पलायन रुका या फिर उसका मैदान की तरफ भागना बदस्तूर जारी है बड़े बांधों वाली मेगा परियोजनाएं इन परियोजनाओं से हमें कुछ लाभ होगा या फिर जैसा पर्यावरणविद् कह रहे हैं इनसे विनाश के सिवाए कुछ हासिल होने वाला नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में कितनी तरक्की इन बारह सालों में हुई और क्या किया जाना अभी बाकी है जिस मातृ शक्ति ने इस राज्य निर्माण आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और कुर्बानी दी उसका अपने ही राज्य में क्या हाल है क्या जिस नशे की लत के चलते पहाड़ की पीढ़ी दर पीढ़ी बर्बाद हुई उससे कुछ निजात मिली या नहीं देवभूमि क्या वास्तव में अपने नाम को चरितार्थ कर पाई या फिर अपराध और भ्रष्टाचार का जो बोलबाला उत्तर प्रदेश में था उसका जलवा नए राज्य में भी कायम रहा मात्र कुछ सौ करोड़ के पहले बजट से २५ हजार करोड़ के नवीनतम वार्षिक बजट तक का सफर हमारे पहाड़ों को कितनी आर्थिक मजबूती दे पाया और कितना स्वावलंबी बना पाया इन और इन जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण एवं बुनियादी सवालों के जवाब तलाशने और उनके आलोक में अपने प्रदेश की इस बारह बरस की यात्रा का लेखा-जोखा तैयार करने का हमारा प्रयास इस विशेषांक के रूप में आपके सामने है।

यह भयावह सच है कि जिन प्रश्नों का उत्तर तलाशने हम निकले उनमें से सभी के नकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। स्वप्न तो जन्नत का देखा था हकीकत में नरक मिला यह कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिस स्वाभिमान के साथ जीने की ललक में पृथक राज्य के सपने और उसे पाने के लिए लंबा आंदोलन लंबी लड़ाई लड़ी गई उसे इन बारह सालों में पाना तो दूर हम उससे और दूर चले गए हैं। पहले लखनऊ सचिवालय के धक्के खाने को पहाड़ी अभिशप्त था अब देहरादून के चक्कर काटते-काटते उसका दम निकल जाता है लेकिन उसके मर्ज की दवा उपलब्ध नहीं हो पाती। भ्रष्टाचार ने इन बारह सालों में दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति की। फर्क इतना भर है कि पहले रिश्वत लखनऊ बैठे बाबुओं और नौकरशाहों की जेब में जाती थी अब अपने पर्वतपुत्रों की जेब में। मुझे हंसी आती है उन पर जो आज भी मानते हैं कि पहाड़ी आदमी सीधा और ईमानदार होता है। सच यह है कि पहले उसके पास चालाकी और बेईमानी करने के मौके नहीं के बराबर थे इसलिए उसको ईमानदार और सीधा मान लिया गया। आज जब अपने राज्य का भाग्य विधाता वह स्वयं है तो उसकी चाल में नजाकत और नफासत दोनों आ गई है। देहरादून सचिवालय में कब्जा पहाड़ियों का ही तो है। राज्य का सीएम पहाड़ी अधिकांश मंत्री पहाड़ी और कुछेक आईएएस अफसरों को छोड़ तमाम नौकरशाह पहाड़ी। फिर क्यों उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार का ग्राफ इतनी तेजी से बढ़ा सीधी सी बात है कि इस लूट में सभी शामिल हैं चाहे पहाड़ी हो या मैदानी। ठीक इसी प्रकार टिहरी परियोजना का सत्तर के दशक से ही जमकर विरोध हुआ। उत्तर प्रदेश की सरकार ने पहाड़ी मानस की आशंका को दरकिनार कर इस परियोजना को जारी रखा। तब हम सुनते थे कि लखनऊ बैठे नीति निर्धारक पहाड़ की भौगोलिक स्थिति से बिल्कुल नासमझ हैं इसलिए ऐसे जनविरोधी- पर्यावरण विरोधी फैसले लेते हैं। लेकिन अब जबकि अपनों का राज है तब ज्यादा जन विरोधी फैसले हो रहे हों तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए पहली निवार्चित सरकार नारायण दत्त तिवारी की बनी। हालांकि एनडी ने उद्योग धंधों को राज्य में लगाने और बड़े उद्योगपतियों को उत्तराखण्ड में पूंजी निवेश कराने के लिए बड़ा काम किया लेकिन इससे आम उत्तराखण्डी को खास लाभ पहुंचा हो ऐसा नजर नहीं आता। सिडकुल क्षेत्र में स्थापित उद्योग धंधों ने बाहरी चमक तो पैदा की लेकिन ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दे स्थाई रोजगार नहीं देने दिया। नतीजा श्रमिक असंतोष का दिनों दिन बढ़ना है। इतना ही नहीं एनडी ने जो जमीन उद्योग के लिए सिडकुल संस्था के हवाले की उसे बाद की सरकारों ने बिल्डरों के हाथों बेचने की शुरुआत कर दी। ऐसा बिल्डर लॉबी से कालाधन कमाने की नीयत से किया गया। बाजार भाव से बहुत कम कीमत पर जमीन बेच कर नेताओं ने खुद के लिए और अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए अवैध धन जम कर कमाया। वर्तमान बहुगुणा सरकार इन दिनों इस काम को तेजी से करने में जुटी है जिससे कि राज्य की बची-खुची जमीन को भी खुर्द-बुर्द किया जा सके। कुछ ऐसा ही राज्य की जल संपदा के साथ किया गया। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के समय में जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में जमकर धांधली की गई। करोड़ों की दलाली इस आवंटन प्रक्रिया में तत्कालीन सरकार के दलालों ने खाई और अपने आकाओं को खिलाई। अवैध तरीके से धन उगाही के लिए किस स्तर तक हमारे राजनेता और नौकरशाह जा पहुंचे इसे पटवारी और दारोगा भर्ती घोटालों से समझा जा सकता है। पिछली निशंक सरकार के कार्यकाल में हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का तेजी से विस्तार हुआ था। उनके शिक्षा मंत्री पर शिक्षकों के तबादलों में सीधे धंधेबाजी करने के आरोप लगे थे। बहुगुणा सरकार पर भी ऐसे ही आरोप रोज लग रहे हैं। सरकारों की कुनीतियों  के चलते पृथक राज्य गठन के बावजूद हमारे गांव खाली होते जा रहे हैं और स्थाई तौर पर लोग पहाड़ छोड़ चुके हैं। अपराध ने जबरदस्त बरकत देखी है। जहां कभी बलात्कार शब्द सुना-बोला तक नहीं जाता था उस देवभूमि में यह जघन्य अपराध तेजी से बढ़ा है। पलायन से उपजी एक त्रासदी और जो हमने पाई वह है रोजगार की तलाश में पहाड़ से दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में पहुंचे नौजवानों का अपराध की राह पकड़ना। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी भयावह है जो बताती है कि अकेले दिल्ली में उत्तराखण्डी मूल के लोगों पर हत्या लूट अपहरण से लेकर डराने-धमकाने जैसे कई संगीन मामले दर्ज हैं। कहने का अर्थ यह कि इन बारह सालों में हमने खोया ज्यादा है पाया कम। हालांकि यह कहना मेरी दृष्टि में गलत होगा कि अलग राज्य बनने के बाद सब कुछ गलत ही हुआ है। पिछले बारह साल में राज्य की परिवहन स्वास्थ्य शिक्षा और अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं में निश्चित तौर पर सुधार आया है। कुछ हजार किलोमीटर की सड़कों वाले राज्य में आज लगभग तीस हजार किलोमीटर तक सड़कों का जाल बिछ चुका है। १०८ एम्बुलेंस सेवा भी आमजन को राहत पहुंचाने में काफी हद तक सफल रही है। राज्य में बड़ा पूजी निवेश भी हुआ और गढ़वाल विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा भी उत्तराखण्ड बनने के बाद ही मिला। छह निजी विश्वविद्यालयों समेत निजी शिक्षण संस्थान भी इन बारह बरसों में बड़ी तादाद में खुले। अल्मोड़ा में मेडिकल कॉलेज की बुनियाद रखी गई तो श्रीनगर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना भी इसी दौरान हुई है। और भी कई विकासपरक रोजगारपरक योजनाओं का शुभारंभ राज्य गठन के बाद ही हुआ। लेकिन इस सबके बावजूद यदि आम उत्तराखण्डी स्वयं को ठगा हुआ और पराजित सा महसूस करता है तो निश्चित तौर पर राज्य निर्माण के बाद भी उसकी स्थिति में गुणात्मक सुधार नहीं आया है। तब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे राज्य के गठन का क्या औचित्य और क्या भविष्य में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है हमने इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर को अपने इस विशेषांक के जरिए तलाशने का प्रयास किया है। स्व ़ हेमवती नंदन बहुगुणा कहते थे कि उत्तराखण्ड का भविष्य जुड़ा है इस बात से कि उसकी खेती जड़ी-बूटी फल वनस्पति आदि से कितना जुड़ती है। उसका पशुधन डागंर से कामधेनु का रूप कब पकड़ता है। उसका सैलानी उद्योग कब उभरता है सरकारी तंत्र के दलाल से। उसकी शिक्षा कब जुड़ती है उसके भविष्य की संभावनाओं से। उसका प्रशासन तंत्रलोक से लोकतंत्र में कब पहुंचता है। संजीवनी बूटी का यह इलाका साधारण खेती से कब छुटकारा पाता है। धुएं और धूल से इसका वायुमंडल कब निजात पाता है। यहां कि मां-बहिनों को घास लकड़ी और पानी की समस्याओं से कब छुटकारा मिलता है। जाहिर है जैसा हम देख-समझ रहे हैं दशकों बाद और अपना राज्य बनने के बारह साल बाद भी हम इन्हीं प्रश्नों से दो चार हो रहे हैं। ऐसे में यह कह पाना बेहद कठिन है कि आखिर कब तक उत्तराखण्ड का आदमी स्वाभिमानपूर्वक जिंदगी गुजारने के रास्ते को खोजता रहेगा और कब उसे यह रास्ता मिलेगा।

 
         
 
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  • जीवन सिंह टनवाल

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