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न्यूज़-एक्सरे 
 
किसने कराई रिपोर्ट लीक

सिडकुल भूमि घोटाले को लेकर विपक्ष के तीखे हमलों से घिरी कांग्रेस सरकार ने तुरुप के रूप में भाटी आयोग का पत्ता खेला। लेकिन रिपोर्ट का विधानसभा में रखने से पहले ही लीक हो जाना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। इससे भाजपा को सरकार पर हमला बोलने का एक और मुद्दा मिल गया है

 

 

उत्तराखंड के पूर्ववर्ती भाजपा शासन में हुए घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में रखने से पहले ही लीक हो गई। इसे मुद्दा बना भाजपा -कांग्रेस सरकार को आड़े हाथों ले रही है। १८ मार्च को प्रतिपक्ष के नेता अजय भट्ट के नेतृत्व में भाजपा विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल से मुलाकात कर रिपोर्ट को निरस्त करने की मांग की। हालांकि चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भाजपा शासन के घोटालों की जांच कराने का वादा किया था, लेकिन भाटी आयोग की रिपोर्ट को सदन में रखने का जो समय सरकार ने चुना और रिपोर्ट जिस प्रकार सदन में रखने से पहले ही लीक हो गई उससे सरकार की मंशा पर सवाल उठने लाजमी हैं। विधानसभा में विपक्ष सिडकुल भूमि घोटाले पर सरकार को घेरने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। 

 

अठारह मार्च को रात्रि करीब नौ बजे विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के आवास पर भाजपा विधायकों के प्रतिनिधिमंडल ने रिपोर्ट लीक होने पर विरोध दर्ज करवाया। तब विधानसभा अध्यक्ष ने भी रिपोर्ट लीक होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिस रिपोर्ट को सदन पर रखा जाना था, उसका पहले ही लीक होना एक गंभीर मसला है। अब रिपोर्ट देखने के बाद ही तय किया जाएगा कि आगे क्या कार्यवाही की जाए। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के लीक होने के बाद इसके सदन में रखने का औचित्य प्रतीत नहीं होता। सब पहलुओं को देखने के बाद जो भी संवैधानिक स्थिति बनेगी उस पर विचार किया जाएगा। इस दौरान नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ ़ रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने कहा कि जिस रिपोर्ट को सदन में रखा जाना था उसे सार्वजनिक नहीं होना चाहिए था। ऐसा होना सदन का भी अपमान है। गौरतलब है कि पिछली भाजपा सरकार में भी कई घोटाले हुए थे। इनमें सिटुरजिया भूमि घोटाला, जलविद्युत परियोजना घोटाला, कुम्भ घोटाला और तराई बीज निगम के घोटाले प्रमुख थे। इन घोटालों से प्रदेश में भाजपा के गिरते ग्राफ को सुधारने के लिए ही चुनाव पूर्व भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्री बदल दिया था। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव में भाजपा सरकार के इन घोटालों को मुद्दा बनाया था। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में इन घोटालों की जांच कराने का वादा किया था। निर्दलीय विधायकों, बसपा और उक्रांद (पी) के समर्थन से बनी कांग्रेस सरकार ने पिछले साल जून माह में सेवानिवृत आईएएस अधिकारी केएस भाटी की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। भाटी आयोग को कुंभ घोटाला, सिटुरजिया घोटाला, आपदा राहत घोटाला, तराई बीज एवं विकास निगम में अनियमितता और लद्घु एवं सूक्ष्म जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन में गड़बड़ी की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। पिछले साल नवंबर में आयोग का कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व छह माह के लिए बढ़ा दिया गया था। आयोग अभी सभी मामलों की जांच कर रहा है। विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष सरकार को सिडकुल मामले में घेर रहा था। कई दिनों तक सदन नहीं चलने दिया गया। इसी बीच भाटी आयोग की रिपोर्ट लीक हो गई। अब विपक्ष सिडकुल के साथ-साथ भाटी आयोग की रिपोर्ट लीक होने को मुद्दा बना रहा है।

 

 

इन दिनों विधानसभा के अन्दर सिडकुल जमीन घोटाले और बाहर भाटी आयोग की जांच रिपोर्टं पर हो हंगामा हो रहा है। भाजपा राज्य सरकार पर सिडकुल में जमीन आवंटन घोटाले का आरोप लगाते हुए इसकी जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रही है। सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी जा रही है। वहीं कांग्रेस सरकार ने पिछली भाजपा सरकार के समय तराई बीज विकास निगम से जुड़े एक कथित घोटाले की जांच कर रही भाटी आयोग की रिपोर्ट लीक करवाकर भाजपा को आईना दिखाने की कोशिश की है। इतना ही नहीं सरकार ने इस मामले में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराने की घोषणा तक कर दी। आगे की जांच और कार्रवाई विजिलेंस करेगी। एक तरह से भाजपा को उसी की तर्ज पर सरकार ने जवाब दिया है। राज्य में पिछले बारह सालों के दौरान सामने आए किसी भी घपले-घोटाले की जांच अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकी है। तिवारी सरकार के कार्यकाल के ५६ कथित घोटालों का मामला हो या फिर पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए कथित घोटाले, अब तक सब कुछ ठंडे बस्ते में ही है। पहली दफा राज्य की कांग्रेस सरकार ने पिछली भाजपा सरकार के समय के एक घोटाले का मामला दर्ज कराने की पहल की है। लेकिन जिन परिस्थितियों में ये सब हो रहा है, उसने इस पहल पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं।

 

 

यह संयोग है या सरकार की राजनीतिक चाल कि सिडकुल घोटाले पर घिरने के बाद तराई बीज निगम घोटाले की रिपोर्ट पर कदम आगे बढ़ाने का फैसला किया गया। अगर इस पृष्ठभूमि में यह सवाल उठ रहा है कि सरकार ने विधानसभा में विपक्ष के हमलों से बचने के लिए यह रणनीतिक कदम उठाया तो इसमें कुछ गलत भी नहीं। स्वयं मुख्यमंत्री ने बयान दिया था कि भाटी आयोग की रिपोर्ट भाजपा का भट्टा बिठा देगी। उनका बयान सरकार की चाल को बल दे रहा है। साथ ही सरकार की मंशा इसलिए भी कठघरे में आ रही है क्योंकि विजिलेंस के पास महीनों से लंबित पड़े पिछली कांग्रेस सरकार के समय के लगभग डेढ़ दर्जन मामलों की जांच अब तक किसी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में विजिलेंस को नया मामला देना उचित नहीं लगता है। राजनीतिक विश्लेषक भाटी आयोग की रिपोर्ट को विपक्ष के तेवर को कुन्द करने की कूटनीति बताते हैं। यही कारण है कि सरकार इसको लेकर जितनी भी सफाई दे, उसकी बातों को लोग गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं। कुछ लोग इसे एक ईमानदार अधिकारी की जांच रिपोर्ट को पलीता लगाने का सरकारी प्रयास भी बता रहे हैं।

 

 

नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने भाटी आयोग की रिपोर्ट को झूठ करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि द कमीशन आफ इन्क्वायरी एक्ट १९५२ की धारा ८ के आधार पर किसी भी व्यक्ति को आयोग ने नहीं बुलाया और न ही इस संबंध में उनको सूचित किया गया। उन्होंने कहा कि इस धारा में आरोपित व्यक्ति को बुलाना अनिवार्य होता है। टीडीसी के पूर्व एमडी को भाटी आयोग का सचिव बनाया जाना भी पूरी तरह से संदेह के घेरे में है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की यह कार्यवाही भाजपा को बदनाम करने की साजिश है। लिहाजा, इस मामले की भी सीबीआई जांच की जानी चाहिए।

 

 

विधानसभा अध्यक्ष गोविद सिंह कुंजवाल इस पर कहते हैं कि नियमानुसार किसी भी जांच आयोग की रिपोर्ट मिलने पर सरकार को छह माह के भीतर उसे सदन में पेश करना होता है। भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट सदन में रखने से पूर्व ही सार्वजनिक होने के संबंध में भाजपा ने सदन की अवमानना का नोटिस दिया है। इस शिकायत का परीक्षण कराया जा रहा है। जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर नियमानुसार कार्यवाही भी की जाएगी।

 

 

 

भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

 

 

  • निगम में गैर सरकारी अध्यक्ष के रूप में हेमंत द्विवेदी की नियुक्ति
  • नवनियुक्त अध्यक्ष के कार्यकाल में सीधी भर्ती के माध्यम से १७ अधिकारियों की नियमित नियुक्ति एवं तदर्थ आधार पर ३० अधिकारियों एवं सहायक की तदर्थ नियुक्तियां
  • बीज खरीद में अनियमितता
  • मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव की ओर से वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकारों का उल्लंघन निगम अध्यक्ष की नियुक्ति का अवैधानिक आदेश जारी करना दो प्रमुख सचिवों की कार्यप्रणाली में भिन्नता।
  • गनी बैग ट्रेडर्स एसोसिएशन द्वारा जारी दैनिक मूल्य बुलेटिन में वर्णित बाजार कीमत और वायदा सौदों की गलत व्याख्या।
  • निगम में लागत लेखा प्रणाली के अभाव में टेंडर संरचना का त्रुटिपूर्ण होना।
  • पंतनगर बीज ब्रांड की छवि को हानि और इसके परिणाम स्वरूप निगम को वित्तीय नुकसान।
  • जूट बैग के क्रय में अनियमितता का प्रकरण वर्ष २०१० में ४० किलो के जूट के बोरों की रुपये ३७ .५९ की ऊंची दर से खरीद की गई, जबकि वर्ष २००८ और २००९ में जूट के बोरों के क्रय का भुगतान का भुगतान क्रमशः २० .५० रुपये एवं २५. ७७ रुपये किया गया। दस लाख जूट के बोरों की खरीद में लगभग एक करोड़ का नुकसान निगम को पहुंचाया गया।
  • अधिप्राप्ति की निविदा प्रक्रिया में भी अनियमितताएं की गई।
  • निजी बीज कंपनियों से बीज की खरीद में अनियमितताएं वर्ष २०१० में १६२० रुपये प्रति कुंतल की दर से निजी बीज कंपनियों से बीज की खरीद की गई, जबकि अंशधारक  कृषकों से १२३० रुपये प्रति कुंतल की दर से खरीद की गई, जो करीब रुपये ३९० रुपये कम थी। वर्ष २००९ में यह अंतर मात्र ६० रुपये था। निजी बीज कंपनियों से ९० हजार कुंतल बीज की खरीद की गई, जिससे निगम को ३ ़५ करोड़ ेंेंका नुकसान हुआ।

 

 

 

कथा जांच आयोग की 

 

वर्ष २००७ में सत्ता में आई भाजपा ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कथित ५६ घोटालों की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एएन वर्मा की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय आयोग गठित किया था। बाद में सितंबर २००८ में रिटायर्ड जस्टिस आरए शर्मा को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जस्टिस शर्मा के निधन के कारण अक्टूबर २०१० में रिटायर्ड जस्टिस बीसी कांडपाल को आयोग का जिम्मा सौंपा गया। आयोग को जिन कथित ५६ घोटालों की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उनकी संख्या बाद में बढ़ाकर ६८ कर दी गई, लेकिन इनमें से एक भी मामले पर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हो सकी। नवंबर २०११ में शासन ने ५६ में से १७ मामलों की जांच विजिलेंस को सौंप दी। जिनमें उद्यानों का लीज, शीतगृह मटेला, आईटीआई उपकरण, बगैर नहर बनाए फर्जीवाड़ा, दवा खरीद, फार्मासिस्टों एवं वाहन चालकों की भर्ती वरुणावत मामले में अनियमितता शिक्षा गारंटी केंद्रों और मकतब मदरसों को सहायता, पूर्व प्रभागीय वनाधिकारी टोंस वन प्रभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप, नगर पंचायत दिनेशपुर द्वारा अनुदान का दुरुपयोग, खेल विभाग एवं स्पोर्ट्स कॉलेज में अनियमितता, फर्जी गूलों के निर्माण में करोड़ों का घपला, वर्ष २००२ के बाद आईटी विभाग द्वारा कंप्यूटर खरीद में भ्रष्टाचार, करोड़ों की कंप्यूटर खरीद कर विभागों पर लादने का मामला, सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग में कंप्यूटर खरीद में अनियमितता, आपदा प्रबंधन बजट का मनमाना आवंटन, सरकारी धन के दुरुपयोग आदि शामिल थे। वर्ष २०१२ में कांग्रेस ने सत्ता में आने पर पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए करीब आधा दर्जन कथित घोटालों की जांच के लिए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के आर भाटी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया।

 

 
         
 
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