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vad 37 05-03-2017
 
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प्रदेश 
 
सरकारी शिक्षा से सौतेला व्यवहार

प्राइवेट स्कूलों के उत्सवों में शामिल होना राज्य के विधायक मंत्री और नौकरशाह अपनी शान समझते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि पहाड़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी राज्य और देश का भविष्य हैं

 

आजादी मिले वर्षों बीत जाने के बावजूद जब सरकार ने उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में शिक्षा के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया तो ६०-७० के दशक में वहां के लोग अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए खुद खड़े हुए। पहाड़ की उस पीढ़ी के लोगों ने जगह-जगह अपने श्रमदान से स्कूलों का निर्माण किया। उन स्कूलों की मान्यता के लिए लखनऊ और दिल्ली की खाक छानी। कई लोगों का जीवन तो स्कूलों की मान्यता लेने में ही बीत गया। अंततः उन लोगों की सोच और मेहनत रंग लाई। गरीब से गरीब घर के बच्चे भी हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई करने में सफल हुए। अब उस पीढ़ी के लोगों ने उच्च शिक्षा के लिए विश्व विद्यालयों की मांग की। ७० के दशक में ऐतिहासिक विश्वविद्यालय आंदोलन चला और अंततः गढ़वाल और कुमाऊं नाम से  दो विश्वविद्यालय अस्तित्व में आए। इन विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के साथ ही क्षेत्रीय विकास की कल्पना भी की गई थी। लेकिन आज पहाड़ में शिक्षा की बुनियाद रखने वाले लोगों के सारे सपने धराशाई हो गए हैं।

 

पहाड़ में शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह चरमराई हुई है। बेसिक स्कूलों में ही शिक्षकों के ३० हजार से अधिक पद खाली हैं। कई स्कूल सिर्फ शिक्षा मित्रों के भरोसे चल रहे हैं। जब वे भी स्कूलों को छोड़कर चले जाते हैं तो सरकार को साल भर तक वहां अध्यापकों की नियुक्ति का ध्यान नहीं रहता। लोग चिल्लाते रहते हैंलेकिन अधिकारी विधायक और मंत्री कोई भी सुनने को तैयार नहीं। जहां कहीं शिक्षक हैं भी तो वहां स्कूल भवन बेहद जर्जर हो चुके हैं। अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित अभिभावक निरंतर इसकी शिकायतें करते रहे हैं। लेकिन शिक्षा विभाग बजट का रोना रोता रहता है। अकेले टिहरी जिले के थौलदार ब्लॉक में ३३ स्कूल भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि उनमें कक्षाएं लेना खतरे से खाली नहीं है। स्कूल आते-जाते वक्त भी खतरे कम नहीं हैं। आज भी गाड-गदेरों में पुल न होने के चलते बच्चे बरसात के दिनों में बह जाते हैं। इस बार भी बरसात में कई बच्चे बहे। इसके अलावा वे पहाड़ियों से आने वाले पत्थरों से भी असामयिक मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। लेकिन सरकार उनकी सुरक्षा को लेकर उपाय नहीं कर पाई है। उनके परिजनों को क्षतिपूर्ति या सहानुभूति के रूप में कोई राशि नहीं दी जाती। जबकि कायदे से पर्वतीय क्षेत्रों में बच्चों के लिए दुर्द्घघटना बीमा आवश्यक कर दिया जाना चाहिए।

 

आजादी के साढ़े छह दशक और राज्य निर्माण के १२ साल बाद भी पहाड़ में शिक्षा पूरी तरह उपेक्षित है। शिक्षा को मजबूत करने के वर्तमान सरकार के दावे भी खोखले ही साबित हुए। बोर्ड परीक्षाओं ने सरकारी के बदइंतजामी की पोल खोलकर रख दी है। स्कूलों में मेज कुर्सियों के अभाव में हाईस्कूल और इंटर के छात्रों को जमीन में बैठकर परीक्षाएं देनी पड़ रही हैं। इससे उन्हें लिखने में कठिनाई होती है। लेकिन परीक्षाओं के बेहतर परिणाम और बोर्ड का स्तर सुधारने का दावा करने वाले शिक्षा विभाग को इसकी परवाह नहीं है। परीक्षाओं के दौरान स्कूलों में सुरक्षा के इंतजाम भी महज खानापूर्ति हैं?

 

परीक्षाओं के वक्त भी बिजली की समस्या से जूझना पड़ रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में तो वैसे भी बिजली नहीं रहती। इसके बावजूद सरकार भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है कि प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। जिस राज्य में स्कूली बच्चों को परीक्षाओं के दौरान भी बैठने की व्यवस्था न मिले उस राज्य का शिक्षा बोर्ड किस हाल में होगा या उस राज्य के नौनिहालों का भविष्य क्या होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि बच्चों में टैलेंट की कमी है। इतिहास गवाह है कि अभावों में पढ़कर भी यहां के छात्र-छात्राओं ने देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। लेकिन आज दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ रही है उसे देखते हुए बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलनी जरूरी है। शिक्षा के अभाव में पहाड़ खाली होता गया। लोग अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए पहाड़ छोड़ रहे हैं।

 

सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद इन स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को यहां नहीं पढ़ाना चाहते। उनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। राज्य के जो लोग किन्हीं कारणों से पलायन नहीं कर पाए या जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है सिर्फ उन्ही के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। जो लोग विषम परिस्थितियों में पहाड़ पर ठहरे हुए हैं उनके बच्चों की शिक्षा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। विडंबना ही है कि राज्य में सरकारी शिक्षा दम तोड़ रही है। लेकिन राज्य के तमाम छोटे-बड़े नेता मंत्री और नौकरशाह धूम-धाम से मनाए जाने वाले प्राइवेट स्कूलों के वार्षिक उत्सवों में शामिल होकर ही फूले नहीं समाते कि बच्चे उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि ग्रामीण स्कूलों के बच्चे भी राज्य और देश का भावी भविष्य हैं। इन स्कूलों के चिरागों को रोशन करना भी उन्हीं का दायित्व है। समझ में नहीं आता है कि सरकारी शिक्षा से सरकार का यह सौतेला व्यवहार क्यों है?

 

 

विकास को तरसती घाटी

प्राकृतिक सौंदर्र्य और वन संपदा की धनी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अलकनंदा घाटी का एक बड़ा क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी जनपद चमोली की यह घाटी विकास के लिए तरस रही है। एक दर्जन से ज्यादा गांवों तक न तो सड़क पहुंची है न ही बिजली पानी स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं यहां के लोगों को मिल पाईं हैं। यहां के कई गांव सड़क मार्ग से १५ से २० किलोमीटर दूर हैं। कई ग्रामीण तो अस्पताल तक पंहुचते हुए रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। पृथक राज्य बनने के बाद इस घाटी के गांव वालों में विकास की उम्मीद जगी थी लेकिन बारह साल बीत जाने के बाद अब इनकी उम्मीदों पर धूल जम गई है।

 

इस घाटी की बजनी मठ झड़ेता कांडाकुणखेत चंद्रनगर बेडुमाथल सुरेण्डा बेमरू गुनियाला लुदॉऊ ग्वाड मजौं स्यूण पौखनी डुमक कलगौठ उछौं ग्वाड़ पल्लाजखोला किमाणा द्विंग तपोण सहित उर्गम घाटी के दर्जन भर गांव सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाए हैं। परिणामस्वरूप यहां के लोग आज भी आदिम युगीन व्यवस्था में जीने को विवश हैं। इन गांवों तक सड़क नहीं होने के कारण यहां के लोग देश-दुनिया से कटे हुए हैं। छोटी-मोटी बीमारी का इलाज तो गांव के वैद्य कर देते हैं लेकिन बड़ी बीमारी का इलाज नहीं हो पाता। कई गांवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र २० किलोमीटर दूर हैं। यहां पैदल जाने में घटों लग जाते हैं। इस क्षेत्र के दर्जनों गांवों को जोड़ने के लिए गोपेश्वर-द्घिंघराण-उर्गम-विष्णुप्रयाग मोटर मार्ग का निर्माण यहां के लोगों के लिए अभी तक सपना बना हुआ है। सड़क निर्माण में देरी को लेकर यहां के निवासी लोकसभा चुनाव २००९ का बहिष्कार तक कर चुके हैं। लेकिन इस क्षेत्र के ग्रामीणों की सुध लेने के लिए अभी तक सरकार तैयार नही हैं।

 

इसी तरह हेलंग-उर्गम मोटर मार्ग की हालत भी बहुत खराब है। सड़क निर्माण का कार्य लगातार होने के बावजूद भी मार्ग की हालत सुधर नहीं पा रही है। हालत इस कदर खराब हैं कि लोग आज भी अपनी दैनिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए मीलों पैदल चलने को विवश हैं। किसी दुर्द्घघटना अथवा प्रसव जैसी स्थितियों में तो महिलाओं को रास्ते में ही जान तक गंवानी पड़ जाती है। यह स्थिति मौजूदा विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। स्वास्थ्य सेवा के नाम पर एक मात्र उपकेन्द्र उर्गम में बना तो है लेकिन डॉक्टर के अभाव में इससे कोई राहत नही मिल रही। यही वजह है कि इस क्षेत्र के लोगों को १५ से २० किलोमीटर पैदल चल कर जोशाीमठ पीपलकोटी अथवा जिला मुख्यालय गोपेश्वर की शरण लेनी पड़ती है। यही हाल शिक्षा का भी है। शिक्षकों के अभाव में नौनिहालों का भविष्य चौपट हो रहा है। विद्युत एवं दूरसंचार व्यवस्था भी इस क्षेत्र के लोगों का कोई राहत देती नजर नही आ रही है। पर्यटन की दृष्टि से यह क्षेत्र समृद्ध है। हर तरफ बांज बुरांश मोरू देवदार खर्सू पंया काफल समेत अन्य प्रजाति के वृक्षों से सुसज्जित पहाड़ियों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने का माद्दा रखती है। पंचकेदारों में प्रसिद्ध चतुर्थ व पंचम केदार भी इसी क्षेत्र में विराजमान हैं। चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ के दर्शन जहां श्रद्धालुओं को छह माह होते हैं। वहीं पंचम केदारों में प्रसिद्ध कल्पेश्वर महादेव के दर्शन श्रद्धालुओं को वर्ष भर होते हैं। यहां वर्ष भर तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों का जमावड़ा लगा होता है। सरकारी मशीनरी हो या जनप्रतिनिधि सभी इन क्षेत्रों के गांवों तक दस्तक नही दे पाते हैं। परिणामस्वरूप ज्यादातर विकास योजनाएं कागजों पर ही निर्मित होती हैं अथवा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।

 

इस क्षेत्र के लोगों को पूछने वाला कोई नहीं है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यह क्षेत्र नकदी फसलों का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र भी है। इसी पर यहां के लोगों की आर्थिकी और जीवन-यापन भी निर्भर करता है। सड़क के अभाव में पीठ के सहारे ग्रामीण नकदी फसलों को मुख्य रास्ते तक पहुंचाते हैं। फलतः ज्यादातर फसलें रास्ते में ही सड़-गल जाती हैं और बाजार तक नही पहुंच पाती हैं। इससे उनकी मेहनत का काफी पैसा ढुलाई में ही खर्च हो जाता है। काश्तकारों को इस से निराशा ही हाथ लगती है। कृषि मंडी के रूप में विकसित किए जाने की कवायद भी यहां परवान नहीं चढ़ पा रही है। यही वजह है कि बाजार के अभाव में काश्तकार बिचौलियों के हाथ लुटने को विवश हो जाते हैं। क्षेत्र में अलकनंदा पर बन रही विष्णुगाड़ जल विधुत परियोजना से अभी तक रोजगार न मिलने से मायूसी ही हाथ लगी है। 


रोजगार के उचित अवसर न मिलने से लोग अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। जनता के प्रतिनिधि भी वोट के लिए गांवों का दौरा कर लेते हैं। किन्तु कुर्सी मिलते ही वे इन गांवों को भूल जाते हैं। उन्हे तब उनकी याद आती है जब उन्हें फिर वोट की जरूरत महसूस होती है। कहा जा सकता है कि यहां के जनप्रतिनिधि भी इन भोले और सीधे लोगों को आश्वासन का झुनझुना थमा कर अपना उल्लू ही सीधा करते हैं। आज २१वी सदी में जब लोग याद की सैर कर रहे हैं वहीं आज भी घाटी के ४ दर्जन से अधिक गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। इन के लिए आज भी आजादी के कोई मायने नहीं हैं।

 

बात अपनी-अपनी

उर्गम मोटर मार्ग छह माह से बंद पड़ा हुआ है। लोगों को ८ किमी पैदल चलकर अपनी मूलभूत आवश्कताओं की पूर्ति करनी पड़ती है। छोटे से इलाज के लिए भी लोगों को जोशीमठ का रूख करना पड़ता है। नेताओं का भी इस ओर कोई ध्यान नहीं है। 

गजेंद्र सिंह समाजिक कार्यकर्ता उर्गमघाटी गोपेश्वर

द्घिंघराण-स्यॅूण मोटर मार्ग का निर्माण जिस गति से चल रहा है उससे तो नहीं लगता कि जिन लोगों ने सड़क के लिए जिला मुख्यालय में प्रर्दशन तक किया वे इस सड़क के दर्शन कर भी पायेंगे। अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत के कारण तीन साल में तीन किमी मोटर मार्ग भी नहीं बन पाया है। जिस से लोग मायूस हैं।

प्रताप सिंह राणा पूर्व प्रधान स्यूॅण

 
         
 
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  • आकाश नागर

उत्तराखण्ड में हर साल कृषि उपकरणों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते रहे हैं। लेकिन अब किसानों में लकड़ी की जगह लोहे का हल लोकप्रिय हो रहा

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