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दि संडे पोस्ट और आईएमआईएस का सर्वेक्षण

 

  • कृष्ण कुमार

विजय बहुगुणा अपने नीतिगत फैसलों और घोषणाओं से जिस तरह पलटी मारते रहे हैं, उससे उनकी छवि एक अक्षम और अपरिपक्व मुख्यमंत्री के रूप में सामने आई है। चीनी मिलों को पीपीपी मोड पर देने फास्ट टै्रक कोर्ट न बनाए जाने के अलावा एफडीआई जैसे कई अन्य मसलों पर उन्होंने सरकार की फजीहत कराई। टिहरी उपचुनाव के समय पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट कम करने और अपने पुत्र साकेत की हार के बाद इसे फिर से लागू करने का संदेश यह गया कि बहुगुणा एक खांटी राजनीतिक बाजीगर हैं जो महज वोट पाने के लिए राज्य की नीतियों को बना और बिगाड़ सकते हैं

 

कांग्रेस सरकार के मुखिया विजय बहुगुणा की सरकार एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। इस दौरान मुख्यमंत्री ने लोकलुभावन द्घोषणाओं की झड़ी लगाकर खूब वाहवाही लूटी। लेकिन अपने नीतिगत फैसलों से चर्चाओं में रहकर मुख्यमंत्री ने रोलबैक का तमगा भी हासिल किया है। शायद वह अपने ही निर्णयों से रोलबैक करने का रिकार्ड बनाने वाले पहले मुख्यमंत्री हैं।

 

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने बयानों से हमेशा चर्चाओं में रहे हैं। वह कभी खुद को बंगाली कभी जौनसारी तो कभी गढ़वाली बताकर चर्चा में रहे तो कभी उन्होंने उत्तर प्रदेश के नवयुवक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से राज्य की परिसंपत्तियों के बंटवारे के नाम पर भिक्षा मांगने की बात कहकर अपनी किरकिरी करवाई। 

 

नीतिगत फैसलों पर पलटी मार जाने से उनकी सरकार पर ठीक से होमवर्क न करने के आरोप लगने के साथ ही इस संभावना को भी बल मिल रहा है कि सरकार या तो अभी भी कांग्रेस आलाकमान के इशारों पर चल रही है या मुख्यमंत्री में राजनीतिक परिपक्वता अब तक नहीं आ पाई है।

 

सरकार के रोलबैक करने का ताजा प्रमाण महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने से संबंधित है। दिल्ली रेप केस के चलते जब देश भर में बलात्कारियों को कठोर दण्ड दिए जाने के लिए कानून में बदलाव किए जाने और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये जाने की मांगें उठ रही थीं तब स्वयं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य में फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा। लेकिन दूसरे ही दिन वह अपने ही बयान से पलट गए। उन्होंने कहा कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध अन्य राज्यों की अपेक्षा कम हैं। इसलिये यहां फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की जरूरत नहीं है। जबकि हकीकत में राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक राज्य में महिलाओं के खिलाफ संगीन अपराधों में भारी इजाफा हुआ है। 

 

बहुगुणा सरकार के अपने नीतिगत निर्णयों पर पलटी मारने का सबसे बड़ा प्रमाण राज्य की चार चीनी मिलों को पीपीपी मोड में दिए जाने का रहा है। जिस पीपीपी मोड को बहुगुणा राज्य के विकास और चीनी मिलों को बदहाली से उबारने के लिए अब तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर कह रहे थे उसी फैसले को वापस ले लिया गया। गौरतलब है कि किच्छा, गदरपुर, डोईवाला और काशीपुर की चीनी मिलों को पीपीपी मोड में दिये जाने के निर्णय से कई सवाल भी खड़े हुए। डोईवाला चीनी मिल जो कि लाभ में चल रही थी उसको भी पीपीपी मोड में दिये जाने पर राज्य भर में बवाल खड़ा हो गया। 

 

भाजपा और अन्य दलों ने सरकार के इस निर्णय को राज्य के हितों के खिलाफ बताकर मोर्चा खोल दिया, तो कांग्रेस के कई नेताओं ने भी सरकार के इस निर्णय का भारी विरोध किया। मजबूरी में सरकार को रोलबैक करना पड़ा। मुख्यमंत्री पर आरोप तक लगे कि इतने महत्वपूर्ण द्घोषणाओं को लागू करने से पहले कैबिनेट और राजनीतिक दलों से कोई सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया। इससे भाजपा को सरकार को घेरने का मौका मिला। उसने यह साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि सरकार जनविरोधी के साथ-साथ राज्य विरोधी भी है। राज्य के निवासियों के रोजगार को छीनने का काम कर रही है। सरकार की किरकिरी होने के साथ ही उसके निणर्य लेने की क्षमता पर भी कई सवाल खड़े हुए। बहुगुणा की राजनीतिक अपरिपक्वता और प्रशासनिक क्षमता की कलई भी खुल कर सामने आई। 

 

राज्य में अनिश्चितता के माहौल को कम करने के बजाय बहुगुणा सरकार ने इसको बढ़ावा ही दिया है। टिहरी लोकसभा क्षेत्र के उप चुनाव में अपने पुत्र को जीत दिलवाने के लिए पदोन्नति में आरक्षण को लागू करने का निर्णय सरकार के साथ-साथ कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा पर भी भारी पड़ा। पूरे राज्य में कर्मचारी वर्ग के बीच गहरी खाई बन गई। आरक्षण विरोधियों और समर्थकों के मोर्चे खुले और हड़तालों का दौर आरम्भ हुआ। इससे बचने के लिए सरकार चाहती तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का पालन करती जिसमें पदोन्नति में आरक्षण को संविधान के विपरीत बताकर इसे खत्म करने का निर्णय दिया गया है। लेकिन उप चुनाव में जीत पाने की हसरत पाले हुए बहुगुणा ने पदोन्नति में आरक्षण को उत्तराखण्ड में लागू करने का निर्णय लिया। इसके लिए बकायदा एक्स काडर का नियम बनाया जो कि किसी भी तरह लागू नहीं हो सकता था। एक्स काडर को लागू करने में इतनी हड़बड़ी दिखाई गई कि इस पर कोई होमवर्क नहीं किया गया। जब विवाद होने पर सरकार ने एक सदस्यीय इरशाद हुसैन आयोग का गठन किया। हुसैन आयोग ने एक्स काडर को संविधान के विरोध में बताया तो सरकार को अपने ही निर्णय से पलटी मारते देर नहीं लगी। 

 

विदेशी खुदरा निवेश (एफडीआई के मामले में भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपने बयानों से सरकार और अपनी फजीहत करवाई। देहरादून में हुए राहदूतों के सम्मेलन में बहुगुणा ने कहा कि उत्तराखण्ड में एफडीआई को लागू करवाने के लिए वह भारत सरकार को कहेंगे और वह चाहते हैं कि उत्तराखण्ड में भी एफडीआई लागू हो । मुख्यमंत्री के इस सम्बोधन के बाद विपक्षी दल भाजपा ने सरकार को आड़े हाथ लेना शुरू कर दिया तो मुख्यमंत्री ने पलटी मार कर कहा कि उत्तराखण्ड का कोई भी शहर एफडीआई को लागू करने के मानकों पर नहीं है। 

 

जनता से वादे करने में बहुगुणा आगे रहे हैं। टिहरी लोकसभा उप चुनाव में तो उन्होंने वादों की झड़ी ही लगा दी। लेकिन चुनाव के बाद इन वादों से पल्ला भी झाड़ लिया। महंगाई के मुद्दे पर बहुगुणा सरकार अपना रुख मजबूती से नहीं रख पाई। रसोई गैस सिलेण्डरों में सब्सिडी को वापस लेने और सिलेण्डरों की संख्या छह करने के फैसलों से भी जनता खासी नाराज थी और इसका असर टिहरी लोकसभा उप चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी साकेत बहुगुणा की जीत और हार के ऊपर पड़ना तय था। इसी के चलते बहुगुणा ने सब्सिडी वाले सिलेण्डरों की संख्या ६ से बढ़ाकर नौ करने की द्घोषणा की, लेकिन जब साकेत बहुगुणा की चुनाव में करारी हार हो गई तो उन्होंने अपने ही वादों और बयान से पलटी मारकर कहा कि वर्ष में ९ सिलेण्डर केवल बीपीएल परिवारों को ही दिये जायेंगे। 

 

महंगाई से निपटने के लिए बहुगुणा सरकार ने राज्य में पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट को हटाने का भी फैसला किया जो कि साफ तौर पर राजनीति से प्रेरित था। टिहरी उपचुनाव के समय वैट कम करने और हार के बाद फिर से लागू करने का संदेश यह गया कि बहुगुणा एक खांटी राजनीतिक बाजीगर हैं जो महज वोट पाने के लिए राज्य की नीतियों को बना और बिगाड़ सकते हैं।

 

रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखण्ड में बीच कैंपिंग नीति को लागू कर सरकार ने खूब बाहवाही लूटी। लेकिन कुछ ही समय के बाद इसको भी वापस ले लिया। इसका प्रमुख कारण यही था कि इस नीति को लागू करने से पहले इसका कोई भी परीक्षण और अध्ययन नहीं किया गया। जबकि यह मामला राज्य कैबिनेट की बैठक में पास हुआ था। इसका शासनादेश तक जारी कर दिया गया था। उत्तराखण्ड में रॉफ्टिंग व्यवसाय चलाने वालों की मानें तो सरकार और पर्यटन विभाग को इस नीति का  ज्ञान तक नहीं है कि इसे कैसे लागू किया जाए। 

 

अपने बयानों से पलटते रहे मुख्यमंत्री ने विवादों को भी जन्म दिया। सहसपुर की खण्ड शिक्षा अधिकारी दमयंती रावत को बीज प्रमाणीकरण संस्थान में निदेशक बनाने के लिए स्वंय मुख्यमंत्री ने अनुमोदन किया जबकि मामला शिक्षा विभाग से जुड़ा होने के बावजूद शिक्षा मंत्री से इस पर कोई राय तक नहीं ली गई। इस प्रकरण में राज्य के शिक्षा मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी और कृषि मंत्री हरक सिंह रावत के बीच लंबे समय तक शीतयुद्ध तक चला। इस पर भी सरकार की खासी फजीहत हुई। एक मुख्यमंत्री के द्वारा किए गए अनुमोदन को शिक्षा मंत्री ने नियम कायदों के विपरीत बताकर इस प्रकरण में कड़ा रुख अख्तियार किया जिसके चलते सरकार की कार्यशैली पर उंगलियां उठीं। साथ ही इस प्रकरण ने सरकार के मंत्रियों और विभागों के बीच कामकाज को लेकर चल रहे घमासान को भी जनता के सामने लाकर रख दिया।

 

शिक्षकों के स्थानांतरण नीति पर भी मुख्यमंत्री ने पलीता लगाया। नीति में स्पष्ट किया गया कि बीमार और शारीरिक तौर पर अक्षम शिक्षकों और कर्मचारियों के स्थानांतरण किए जाएंगे जबकि अन्य के स्थानांतरण रोक दिये गये। बावजूद इसके स्वयं मुख्यमंत्री ने कई शिफारिशी पत्र शिक्षा विभागों में दिए। इनमें से कइयों के गुपचुप तरीके से स्थानांतरण तक कर दिए गए। मामलों के सामने आने पर इन पर हड़बड़ी में रोक लगा दी गई। इन फैसलों से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की कार्यशैली निर्णय लेने और प्रशासनिक क्षमता पर कई सवाल उठ खड़े हो रहे हैं। राज्य के हितों के लिए नीतियों के क्रियान्वयन होने पर भी आंशका के बादल छाने लगे हैं। 

 

 
         
 
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