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सर्वेक्षण रिपोर्ट
 
बहेगी शराब की गंगा

 

  • दाताराम चमोली

उत्तराखण्ड में लोग शुरू से ही शराब के विरोधी रहे हैं। राज्य के ७६ प्रतिशत लोग आज भी इसे बढ़ावा न दिये जाने के पक्ष में हैं। ७३ प्रतिशत लोग शराब से टैक्स हटाकर इसे सस्ता किये जाने के खिलाफ हैं। लेकिन राज्य की बहुगुणा सरकार उनकी भावनाओं को आहत कर शराब की नदियां बहाने को आतुर हैं

 

उत्तराखण्ड में शराब विरोधी आंदोलन का इतिहास काफी पुराना रहा है। साठ के दशक से लेकर आज तक यहां की जनता खासकर मातृशक्ति समय-समय पर शराब के खिलाफ आंदोलन करती रही है। आंदोलन के दौर में शासन-प्रशासन ने जनता पर बेलगाम जुल्म ढाये। बच्चों तक को उत्तर प्रदेश में जेलों में ठूंस दिया गया। आज भी जनता शराब के खिलाफ डटकर खड़ी है। दि संडे पोस्ट और आईएमआईएस की ओर से राज्य की विजय बहुगुणा सरकार के एक साल के कार्यकाल को लेकर कराये गए सर्वेक्षण में ७६ प्रतिशत लोगों ने राशन और चाय की दुकानों पर शराब की बिक्री को गलत फैसला करार दिया है। इतना ही नहीं ७३ प्रतिशत लोग मानते हैं कि शराब से टैक्स कम कर उसे सस्ता करना सरकार का सही फैसला नहीं है।

 

राज्य के लोग सरकार की आबकारी नीति से पूरी तरह असहमत हैं। वे नहीं चाहते कि राज्य में शराब को बढ़ावा मिले। सोचने-विचारने वाले लोग भी सरकार की आबकारी नीति से चिंतित हैं। राज्य की जनआंदोलनों से जुड़ी रही सर्व सेवा संघ (अखिल भारत सर्वोदय मंडल) की अध्यक्ष राधा भट्ट ने तो बाकायदा मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध भी किया है कि होटलों ढाबों और चाय की दुकानों में खुलेआम शराब बेचने का फैसला पर्वतवासियों की नस्ल को बर्बाद करने वाला है। लेकिन बहुगुणा सरकार कहां मानने वाली है। पहले से चल रही लाइसेंसधारी दुकानों के अलावा सरकार उन होटलों और रेस्टोरेंट्स जिनकी वार्षिक बिक्री तीन लाख रुपए की हो को सीजनल बीयर एवं वाइन बार लाइसेंस देने का निर्णय ले चुकी है। राज्य में लगभग ऐसा हर ढाबा होटल या रेस्टोरेंट मिल जाएगा जिसकी बिक्री तीन लाख से अधिक हो। जाहिर है कि हर होटल ढाबा या रेस्टोरेंट का मालिक शराब की बिक्री करना चाहेगा। जिन होटलों और रेस्टोरेंटों की बिक्री ५ ़५ लाख या उससे अधिक हो वे तो साल भर बीयर और शराब बेच सकेंगे। साफ है कि सरकार की नीति सदानीरा नदियों को बांधों से बांधकर उनकी जगह शराब की नदियां बहा देने की है।

 

शराब को बढ़ावा देने की सरकार की नीयत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीयर और वाइन के सीजनल लाइसेंस (छह माह) की आवेदन फीस मात्र १५ हजार रुपये और वार्षिक लाइसेंस की फीस ५० हजार रुपए रखी गई है। गढ़वाल मंडल के पौड़ी टिहरी उत्तरकाशी रुद्रप्रयाग चमोली जिलों में १० कमरों (२० शैय्या) वाले होटल और रिसोर्ट्स में भी बीयर बार चलेंगे। हालांकि बहुगुणा सरकार बड़ी चालाकी से कहती है कि गढ़वाल मंडल के इन जिलों में उन्हीें होटल रिसोर्ट्स में बीयर बार खुल सकेंगे जो यात्रा मार्ग पर स्थित न हों। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सरकार किस यात्रा मार्ग की बात कर रही है? गढ़वाल मंडल के हर जिले में पर्यटन और तीर्थ स्थल हैं। लगभग हर मार्ग पर तीर्थयात्री और पर्यटक जाना चाहते हैं। सरकार कहां-कहां उन्हें जाने से रोकेगी? हैरानी की बात है कि सरकार राज्य में न सिर्फ बीयर और वाइन की नई-नई दुकानें खोलने पर आमादा है बल्कि उसने बियर उत्पादन की भी छूट देने का निर्णय लिया है। शराब संस्कृति को बढ़ावा देने की बहुगुणा सरकार की नीति का एक और उदाहरण यह है कि जहां राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में शराब की दुकानें दोपहर एक बजे से रात्रि दस बजे तक खुली रहती हैं वहीं देवभूमि में शराब की दुकानें सुबह १० बजे  ही खुल जाएंगी और रात ११ बजे तक खुली रहेंगी।

 

 दरअसल विजय बहुगुणा कांग्रेस आलाकमान की कृपा से मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठ तो गए हैं लेकिन वास्तव में वह सही अर्थों में जनता के मुख्यमंत्री नहीं हो पाए हैं। यही वजह है कि वह जनभावनाओं के विरुद्ध ऐसे फैसले लेते जा रहे हैं जिनसे पूरे उत्तराखण्ड खासकर पहाड़ की जनता आहत हो रही है। राज्य में शराब को बढ़ावा देने के लिए कमर कस चुके मुख्यमंत्री को अगर जनभावनाओं को समझना है तो उन्हें ६० के दशक से राज्य में समय-समय पर चले शराब विरोधी आंदोलन की तह में जाना चाहिए। सन्‌ १९४०-५० तक उत्तराखण्ड के किसी भी संभ्रात निर्धन या गरीब परिवार में शराब का सेवन नहीं होता था। तब इसे गुलामी की मानसिकता का प्रतीक माना जाता था। खुद १८६१ में कुमाऊं के सीनियर कमिश्नर गाइल्स ने आबकारी प्रशासन की रिपोर्ट में कहा था कि पर्वतीय लोग नशे के व्यसन से मुक्त हैं। केदारनाथ के नीचे भोटिया या मार्छा लोग मार्छापाणी नाम से एक पेय का उपयोग अवश्य करते थे लेकिन पहाड़ में नशे का प्रचलन नहीं था। 

 

पहाड़ के जो लोग शराब को गुलामी की मानसिकता कहते थे उनकी भावी पीढ़ी को शराब संस्कृति ने इस कदर जकड़ा कि ६० के दशक में गढ़वाल मंडल को टिंचरी एवं कुमाऊं मंडल को कच्ची शराब ने पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। शासन-प्रशासन की शह पर नशे के धंधेबाजों ने पहाड़ में इसका प्रचलन बढ़ा दिया गढ़वाल मंडल में मातृशक्ति इसके विरोध में प्रचंड होकर आगे आई। महिलाओं ने जगह-जगह शराब की अवैध दुकानें बंद करवाईं शासन-प्रशासन ने आंदोलन को कुचलने के हर हथकंडे अपनाए। ६ से १२ साल तक के स्कूली बच्चों को टिहरी और सहारनपुर की जेलों में ठूंस दिया। जो ८० गिरफ्तारियां हुईं उनमें ३० महिलाएं थीं। टिंचरी का प्रचंड विरोध करने वाली कोटद्वार की इच्छागिरी माई को लोग टिंचरी माई के नाम से जानने लगे। इसी श्रीनगर पौड़ीपैडुलस्यूं बादशाही थौल टिहरी कोटद्वार आदि स्थान आंदोलन का केंद्र रहे। इसी दौर में मातृशक्ति ने कुमाऊं मंडल के भीतर भी प्रचंड आंदोलन कर शराब की दुकानें बंद कराईं। गरुड़ घाटी में महिलाओं ने विशाल प्रदर्शन किया। अल्मोड़ा में ५१ लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें १५ महिलाएं थीं।

 

मुख्यमंत्री बहुगुणा को जानना चाहिए कि शराब के विरोध का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। सन् १९८० में जब सुरा मृत संजीवनी शर्बत और अशोका लिक्विड के रूप में नशे ने फिर पहाड़ में पैर फैलाए तो मातृशक्ति एक बार फिर गोलबंद हुई। समूचे पहाड़ में शराब के अड्डों को तहस-नहस किया गया। १ फरवरी १९८४ को आंदोलनकारियों ने अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया में आबकारी निरीक्षक को अपनी जीप में शराब ले जाते रंगे हाथों पकड़ा। इसके अगले दिन बसभीड़ा से 'नशा नहीं रोजगार दो' आंदोलन का शंखनाद हुआ। शासन-प्रशासन ने गुंडों और नशे के धंधेबाजों के माध्यम से जनता को धमकाने और आंदोलन को कुचलने के हर हथकंडे अपनाए गए लेकिन अंततः उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। आंदोलनकारियों ने जगह-जगह अनशन शराब की दुकानें बंद करवाने शराब की नीलामी रुकवाने और विशाल धरने प्रदर्शन आयोजित करने जैसे कार्यक्रमों के जरिए शासन-प्रशासन और शराब माफिया को हिलाकर रख दिया। शराब के खिलाफ पहाड़ की महिलाओं में आज भी विरोध की ज्वाला धधक रही है। यदि बहुगुणा सरकार ने इसे भड़काने का काम किया तो निश्चित ही उसके हाथ जलेंगे। लेकिन लगता है कि पहाड़ में शराब पहुंचाने पर आतुर सरकार अतीत के नशा विरोधी आंदोलनों से कोई सबक नहीं लेना चाहती। इसके विपरीत वह ऐसा संदेश देना चाहती है कि पहाड़ में लोग गांव-गांव तक शराब की दुकानें चाहते हैं।

 

 
         
 
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