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अब भी बहुगुणा पर भारी हरीश
  • दाताराम चमोली

कांग्रेस आलाकमान ने विजय बहुगुणा की ताजपोशी अवश्य करा दी, लेकिन वह आज तक जनता के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए हैं। राज्य के १३ प्रतिशत लोग ही उन्हें इस कुर्सी पर देखना चाहते हैं जबकि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत को ५२ प्रतिशत से अधिक लोग मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखने को लालायित हैं। जाहिर है कि बहुगुणा लोगों के दिलों में जगह बनाने में बुरी तरह असफल रहे हैं

 

 

कांग्रेस आलाकमान ने जन भावनाओं को आहत कर और पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतोष को दबाकर विजय बेंहुगुणा को बेशक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया लेकिन सच यही है कि जनता उन्हें आज तक अपना मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं कर पाई है। आश्चर्य की बात है कि १३ प्रतिशत लोग ही उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। जबकि ५२ ़३ प्रतिशत लोग आज भी चाहते हैं कि केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत को ही राज्य का मुख्यमंत्री होना चाहिए। यशपाल आर्य को ११, इंदिरा हृदयेश को १० ़४ प्रतिशत लोग मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं। सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत इस लिहाज से काफी पीछे हैं। महाराज के पक्ष में महज ८ प्रतिशत तो हरक सिंह रावत के पक्ष में ५ ़२ प्रतिशत लोग ही हैं।

 

दि संडे पोस्ट और आईएमआईएस की ओर से विजय बहुगुणा सरकार के एक वर्षीय कार्यकाल को लेकर कराये गए सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आए हैं।

 

राज्य के मैदानी क्षेत्रों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक कराए गए सर्वेक्षण में विभिन्न आयु वर्ग के लोगों से सरकार के एक वर्षीय कार्यकाल को लेकर तमाम सवाल पूछे गये थे। इनमें एक सवाल यह भी था कि 'कांग्रेस की सरकार के बेहतर मुख्यमंत्री के रूप में आप किसे देखना चाहेंगे' ५२ ़३ प्रतिशत लोगों ने हरीश रावत और महज १३ प्रतिशत लोगों ने विजय बहुगुणा के पक्ष में राय दी। इससे स्पष्ट होता है कि विजय बहुगुणा साल भर बाद भी जनता का दिल जीतने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। लोग विकास के लिए छटपटा रहे हैं और मुख्यमंत्री का पूरा ध्यान मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों को उनके मनमुताबिक सुविधाएं देकर अपनी कुर्सी बचाये रखने पर केंद्रित है। राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है। अपराधों का ग्राफ बढ़ रहा है और दिन-दहाड़े हत्या, बलात्कार और अपहरण की वारदातें हो रही हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री निरंतर जनविरोधी फैसले लेकर जनभावनाओं को आहत कर रहे हैं। मंत्रियों के विदेश दौरे और मुख्यमंत्री के हवाई दौरों को लोग फिजूलखर्ची मानकर सरकार से नाराज हैं। जनता का यह असंतोष आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए बेहद द्घातक साबित हो सकता है। 

 

 

उल्लेखनीय है कि विजय बहुगुणा जिस पृष्ठभूमि से आते हैं या आम आदमी से जिस प्रकार दूरियां बनाकर रखते हैं उससे जनता कभी भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाये जाने के पक्ष में नहीं रही। यह अलग बात है कि भाजपा का कमजोर प्रत्याशी होने के चलते उन्हें टिहरी में सांसद बनने का मौका मिल गया, लेकिन इस बार तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते टिहरी सीट पर भी हार गए। यह न सिर्फ उनके पुत्र साकेत की हार थी बल्कि बहुगुणा सरकार के खिलाफ जनाक्रोश भी था।

 

दि संडे पोस्ट और आईएमआईएस ने विधानसभा चुनाव से पहले भी मतदाताओं का मिजाज टटोलने के लिए एक सर्वेक्षण कराया था। उस सर्वेक्षण के नतीजे लगभग पूरी तरह सही निकले थे। सर्वेक्षण में भाजपा को ३१ तो कांग्रेस को  ३४ सीटें मिल गई थी। कांटे के मुकाबले में भाजपा को ३० तो कांग्रेस को ३३ सीटें मिली। इसी तरह सर्वेक्षण में ५२ ़६ प्रतिशत लोगों ने तब भी हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाये जाने के पक्ष में राय दी थी। रावत का ग्राफ आज भी अपनी जगह पर यथावत है। चुनाव पूर्व हुए सर्वेक्षण में इंदिरा हृदयेश को १३ ़८, हरक सिंह रावत को १० ़६, सतपाल माहाराज को ९ ़८ यशपाल आर्य को ८ और सबसे कम ४ ़९ प्रतिशत लोग विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने ५२ ़६ प्रतिशत लोगों के चहेते हरीश रावत को दरकिनार कर महज ४ ़९ प्रतिशत लोगों की पसंद का ध्यान रखा। विजय बहुगुणा को जबर्दस्ती राज्य की जनता पर थोप दिया गया। इससे पहले २००२ के पहले विधानसभा चुनाव के दौरान भी हरीश रावत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। कांग्रेस को प्रदेश में पुनर्जीवित कर उन्होंने सत्ता में पहुंचा दिया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने उनकी जगह नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया। तिवारी का शुरू से लेकर अंत तक भारी विरोध होता रहा, लेकिन उनकी वारिष्ठता ने उनके लिए कवच का काम किया।

 

वर्ष २०१२ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को फिर सरकार बनाने का मौका मिला तो इस बार भी रावत का हक मारकर बहुगुणा के नाम की द्घोषणा कर दी गई। जिसका प्रदेश की जनता में बहुत गलत संदेश गया। कांग्रेस आलाकमान के फैसले के विरोध में सुदूर पहाड़ों से लेकर राजधानी दिल्ली तक लोगों ने गोलबंद होकर आक्रोश जताया। कांग्रेस के अधिकांश विधायक रावत के पक्ष में एकजुट हुए। काफी दिनों की ऊहापोह के बाद अंततः कांग्रेस आलाकमान विजय बहुगुणा को शपथ दिलवाने में सफल तो रहा लेकिन विजय जनता का दिल जीतने में बुरी तरह असफल रहे हैं। उन्हें जनता का मुख्यमंत्री नहीं कहा जा सकता।

 

खास बात यह है कि विपक्ष के साथ ही अब हरीश रावत ने भी मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलने के संकेत दिए हैं। हाल में रुड़की में आयोजित कृषि विज्ञान संगोष्ठी एवं किसान मेले के अवसर पर उन्होंने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वह केंद्र से मिले धन को खर्च नहीं  कर पा रही है। यानी सरकार केंद्र से मिले पैसे का सदुपयोग नहीं कर पा रही है। इसके बाद उन्होंने गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाए जाने की मुख्यमंत्री की पहल पर भी सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में विधानसभा भवन के निर्माण का फैसला लिया है तो उनके पास इसके लिए कोई रोडमैप जरूर होगा। ऐसे में भावनात्मक मुद्दे पर पार्टी के भीतर एवं बाहर आम सहमति से निर्णय लिया जाना चाहिए। रावत की बात से स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री ने गैरसैंण को लेकर न तो कोई रोडमैप तैयार किया है और न ही इस मुद्दे पर पार्टी संगठन के भीतर व बाहर कोई सहमति बनाने का काम हुआ है। जाहिर है कि राज्य सरकार के मुखियमंत्री के साथ ही उन्होंने प्रदेश कांग्रेस संगठन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। रावत का यह रुख स्पष्ट करता है कि वह अब चुप नहीं बैठने वाले हैं। अगर उन्होंने जरा भी सक्रियता दिखाई तो बहुगुणा के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं। 

 
         
 
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