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सर्वेक्षण रिपोर्ट
 
सिंहासन हिलाने वाले संकेत
  • प्रेम भारद्वाज

संकेतों से हिलता सिंहासन सर्वेक्षण अगर सिर्फ संकेत भर ही हैं तब भी उत्तराखण्ड की वर्तमान विजय बहुगुणा सरकार के लिए कुछ भी सुखद या सुहाना नहीं है। सर्वेक्षण के मुताबिक वे खराब शासन देने वाले शायद अब तक के सबसे अलोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं जिन्हें प्रदेश की जनता बेहद नापसंद करती है। ५० फीसदी जनता ने उनको बतौर मुख्यमंत्री फेल कर दिया है तो लगभग ८० प्रतिशत उनकी सरकार के कामकाज से असंतुष्ट है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के साल भर पूरे होने पर उनके कामकाज को जनता के नजरिये से (सर्वेक्षण के जरिये पेश करती यह आवरण-कथा

 

समय को हम अपनी सुविधा अनुसार बांट लेते हैं। उसी सुविधा के तहत एक खास अवधि में किसी को परखने की पत्रकारीय परंपरा भी रही है। उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए हम उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के एक साल के शासन की समीक्षा कर रहे हैं।

 

सर्वेक्षण सत्य नहीं होता। लेकिन उसे असत्य भी नहीं माना जा सकता। अलबत्ता सर्वेक्षण वे संकेत हैं जिनके जरिए सच तक पहुंचा जा सकता है या वह एक ऐसा आईना है जिसमें हकीकत के अक्स को साफतौर पर देखा जा सकता है। इस बाबत विजय बहुगुणा सरकार की पहली वर्षगांठ पर सर्वेक्षण जो संकेत देते हैं वे सुखद नहीं हैं-न सूबे के लिए न ही सूबे के सूबेदार के लिए। अगर ये संकेत सही के अंशमात्र भी हैं तो राज्य का रसातल में जाना तय है। लेकिन एक दूसरा भी प्रश्न है जो राज्य के मुखिया यानी मुख्यमंत्री से जुड़ा है और वह यह कि क्या अब भी इन सबका उनकी सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा? इस फर्क की बाबत किसी किस्म की कयासबाजी से पहले उनकी खूबियों से बावस्ता होना जरूरी है।

 

विजय बहुगुणा उन खुशनसीब लोगों में शुमार हैं जिन्हें तख्त तोहफे में मिला है। भारतीय राजनीति और कांग्रेस में उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा जो नेकी की फसल बो गए थे उसे बतौर मुख्यमंत्री की गद्दी पर आसीन होकर काट रहे हैं ये साहब। हेमवती नंदन की विजय बाबू की राजनीति में क्या हैसियत हो सकती है इसकी कल्पना राजनीति का ककहरा जानने वाला अदना सा आदमी भी बखूबी कर सकता है। राजनीति में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। कानून पढ़ा और वकालत की। जज बने तो अपने फैसलों के कारण विवादों में रहे। फिर चुनाव लड़ा। पिता की बदौलत मिली पहचान के साथ मिले वोटों ने जीत दिलाई और संसद पहुंच गए। इसी बीच उत्तराखंड में मंत्री-मुख्यमंत्री पद के लिए घमासान को शांत करने और सबसे प्रभावशाली नेता हरीश रावत के बागी तेवर को शीतल करने के मकसद से सोनिया गांधी ने अपने यस मैन के तौर पर विजय बहुगुणा के ललाट पर मुख्यमंत्री लिख दिया। उन्हें आलाकमान ने ही दिल्ली से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टपका दिया।

 

अब जो शख्स जिसे मुख्यमंत्री पद तोहफे में तश्तरी में सजाकर मिला हो जिसे जनता ने नहीं चुना उसे क्योंकर जनता की चिंता होगी। उनके लिए तो सियासत सत्ता पाने की सीढ़ी है और सत्ता सूबे का दोहन करने का जरिया। वह भी कुछ इस अंदाज में कि लूट सके जितना लूट। ये बातें एक व्यक्ति की धारणा विरोधियों का आरोप नहीं हैं बल्कि सर्वेक्षण के नतीजे भी इसकी पुष्टि करते हैं।

 

 

ये सर्वेक्षण उत्तराखंड की जनता की राय है जो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और उनके शासन के मुताल्लिक हैं। इसे विजय बहुगुणा का दुर्भाग्य माना जाएराज्य की बदनसीबी या जनता की नियति कि नए मुख्यमंत्री की बाबत कुछ भी अच्छा नहीं है कोई उम्मीद नहीं बंधती जिसकी उंगली थामकर भरोसे की परछाईं अगले चार साल तक सही दिशा में रेंग ही सके। सब कुछ फिसल रहा है सूख रहा है जल रहा है दूर हो रहा है बिखराव का आवेग है बर्बादी का धसान।

 

सर्वेक्षण के नतीजे इस बात की सरगोशी करते हैं कि बहुगुणा सरकार के कार्यकाल से जनता संतुष्ट नहीं है। बतौर मुख्यमंत्री जनता विजय बहुगुणा को फेल मानती है गैरसैंण में राजधानी बनने को राजनीतिक चाल समझती है। यहां तक कि उनके हाल ही में किए शराब संबंधी फैसलों से भी जनता में नाराजगी है। मंत्रियों और अधिकारियों के लिए महंगी कारें खरीदे जाने के पक्ष में भी जनता नहीं है। 

 

एक साल का वक्त किसी भी सरकार और शासन को समझने के लिए पर्याप्त होता है। अक्सर शासन की सफलता-असफलता को जनता के मन-मिजाज से ही आंका जाता है। लेकिन इसका क्या किया जाए कि बहुगुणा सरकार के साल भर के कार्यकाल से ७६ ़५ प्रतिशत जनता असंतुष्ट है। संतुष्टों की संख्या महज १९ ़१ फीसदी है जबकि ४ ़८ फीसदी दुविधा में हैं जो अब तक सरकार की कार्यशैली नहीं समझ पाए हैं। संतुष्ट और असंतुष्ट के दरमियान ५६ फीसदी का फासला है जो किंतु-परंतु की गुंजाइश को ही खत्म कर देता है। जनता की इस धारणा को एक दूसरे सवाल का जवाब और अधिक पुष्ट करता है। यह सवाल सीधे मुख्यमंत्री की काबिलियत से जुड़ा है। जब जनता से यह पूछा गया कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को दस में से कितने नंबर देंगे तो जवाब में ४८ ़२ फीसदी लोगों ने तीन से कम नंबर देकर उन्हें फेल कर दिया। कायदे से जो फेल हो गया उसे आगे बढ़ाने या बने रहने का कोई हक नहीं है। लेकिन यह हमारे >लोकतंत्र की विडंबना है कि जिसे जनता फेल कर देती है वह सियासी चालों और राजनीतिक आर्शीवादों की बदौलत पास ही नहीं होता बल्कि जनता की छाती पर भी सवार हो जाता है।

 

विजय बहुगुणा का मुख्यमंत्री बनना राज्यहित में नहीं है जैसा कि जनता भी मानती है। वह प्रदेश कांग्रेस के हित में भी नहीं है जिसे सर्वेक्षण के नतीजे साबित करते हैं। संकेत के नतीजे बताते हैं कि इनके मुख्यमंत्री बनने से प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी बढ़ी है ऐसा मानने वालों की तादाद ६६ ़६ फीसदी है। नहीं मानने वाले १५ ़८ फीसदी हैं तो दुविधा वाले ११ ़६ फीसदी हैं। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी अगले चुनाव में लुटिया डुबो सकती है जिसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी न जाने कब समझेंगी। विजय के लिए अब भी सबसे बड़ा खतरा हरीश रावत बने हुए हैं जिन्हें प्रदेश की ५२ ़३ प्रतिशत जनता आज भी मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। दूसरे नंबर पर विजय बहुगुणा १७ ़३ तीसरे नंबर पर यशपाल आर्या ११ ़१ चोथे पर इंदिरा हृदयेश १० ़४ हरक सिंह रावत ५ ़२ जबकि सतपाल महाराज को महज ८ प्रतिशत लोग ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

 

किसी भी शासक या मुख्यमंत्री के अच्छा या बुरे होने का आधार उसके लिए गए अहम फैसले होते हैं। यही फैसले द्घोटाले रचते हैं और विकास की लकीर भी खींचते हैं। विजय बहुगुणा के लिए गए कुछ फैसलों की बाबत जनता की जो राय उभरी है वह सुखद नहीं है गैरसैंण में विधानसभा भवन के शिलान्यास को ७४ ़८ प्रतिशत जनता एक राजनीतिक चाल मानती है जबकि इसे ईमानदार प्रयास मानने वाले महज २५ ़८ फीसदी ही हैं। विजय बहुगुणा गैरसैंण को ग्रीष्म कालीन राजधानी बनाना चाहते हैं जबकि प्रदेश की ५४ ़२ फीसदी जनता इसे स्थाई राजधानी के रूप में देखना पसंद करती है। शराब को लेकर इस प्रदेश में लंबा और प्रभावशाली आंदोलन चला। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री का इरादा प्रदेश में गंगा-अलकनंदा के समानांतर शराब की नदी प्रवाहित करने का है। उन्होंने शराब से टैक्स कम किया जिसे ३३ प्रतिशत जनता गलत मानती है। राशन चाय की दुकानों पर शराब की बिक्री के फैसले का भी ७६ प्रतिशत जनता विरोध करती है। इसी तरह महिलाओं के शाम से पहले घर लौटने की मुख्यमंत्री की सलाह को भी ५६ फीसदी जनता सुरक्षा तंत्र की कमी मानती है।

 

जिस ढर्रे पर देश प्रदेश की राजनीति चल पड़ी है उसमें जनता हाशिए पर है और जनप्रतिनिधि सुविधाओं की अट्टालिकाओं में मजे ले रहे हैं। इसी सोच ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के मंत्रियों अधिकारियों के लिए महंगी गाड़ी खरीदने का फैसला दिया। इस फैसले के खिलाफ प्रदेश की ९० प्रतिशत जनता है। यह अंक नहीं संकेत नहीं सीधे मुख्यमंत्री के प्रति तीव्र नाराजगी है।

 

एक प्रश्न सरकार में मौजूद मंत्रियों के कार्य संबंधी भी था । इस पर लोगों से अपनी पसंद के मुताबिक प्रथम द्वितीय और तृतीय श्रेणी रखने को कहा गया। जो नतीजे आए उसके अनुसार ४८ ़४ फीसदी के साथ हरक सिंह रावत प्रथम ४४ ़३ फीसदी के साथ इंदिरा हृदयेश दूसरे और तीसरे स्थान पर यशपाल आर्या के पक्ष में ४२ ़६ फीसदी लोग थे जबकि मंत्री प्रसाद नैथानी को बेहतर बताने वाले ४८ ़४ फीसदी है।

 

राजा को प्रजा के बीच लोकप्रिय होना चाहिए ऐसा भवभूति कह गए हैं। लोकप्रियता सत्ता दिलाती है और उसे बचाती भी है। लेकिन मामला एक अलोकप्रिय राजा का है जिसे प्रजा की तनिक परवाह नहीं। कुलमिलाकर यह संकेत विजय बहुगुणा के सिंहासन हिलाने वाले साबित हो सकते हैं।

 
         
 
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