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vad 15 30-09-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
आंकड़े झूठे दावे किताबी हैं
  • अपूर्व जोशी

 

भ्रष्टाचार पहले भी जमकर था अब भी जमकर हो रहा है। उत्तराखण्ड की नौकरशाही देश की निकृष्टतम-भ्रष्टतम नौकरशाही में से एक है। यहां दो प्रकार के नौकरशाह हैं। एक वे जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के जरिए उत्तराखण्ड कैडर पा अपनी सेवा दे रहे हैं और दूसरे वे जो इसी राज्य के मूल निवासी हैं। इन दोनों में राज्य के संसाधनों को लूटने-खसोटने की होड़ मची है। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर राज्य के राजनेता खड़े हैं। बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को एक ही उल्लू काफी था हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा की तर्ज पर उत्तराखण्ड को बदहाली के मुकाम तक पहुंचाने वालों में यहां के मूल निवासी नौकरशाहों का बड़ा हाथ है। यदि कोई सारंगी या शर्मा राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का मार्ग बनाता है तो उसको सहारा देने वाले यहां के पंतपांडे रावत नेगी जोशी ही तो हैं जो बहती गंगा में हाथ धो मौज कर रहे हैं। आज विजय बहुगुणा और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाली भाजपा क्यों भूल जाती है कि जब उसकी सरकार थी तब हालात इससे भी खराब थे। भाजपा नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट इन दिनों बहुगुणा सरकार के भ्रष्टाचार पर लगातार प्रखर हैं। सिडकुल की करोड़ों की जमीन को बिल्डरों के हवाले कौड़ियों के भाव कर चुकी बहुगुणा सरकार पर तीखे प्रहार करने वाले अजय भट्ट तब क्यों खामोश थे जब उनकी सरकार ने ऋषिकेश स्थित सिटुरजिया कंपनी को लीज पर दी गई जमीन ऐसा ही षड्यंत्र रच बेच डाली थी


 

घिसते घिसाते विजय बहुगुणा ने बतौर मुख्यमंत्री एक बरस काट ही लिया। आगे कितने दिनों तक बने रहेंगे यह कहना कठिन है। कांग्रेस आलाकमान समय रहते चेत गया और यदि कौसानी से प्रेम करने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक इस पहाड़ी राज्य की अवाम की कराह पहुंच पाई तो शायद २०१३ में विजय पूर्व मुख्यमंत्रियों की लंबी जमात में शामिल हो जाएंगे। लेकिन प्रश्न उनके सीएम पद से हटने अथवा बने रहने का नहीं बल्कि जनता की मनमर्जी खिलाफ थोपे गए मुख्यमंत्री के उन निर्णयों का है जिसके चलते पहले से ही लुटा-पिटा अपना उत्तराखंड बदहाली के ऐसे मुकाम पर आ खड़ा हुआ है जहां से वापसी तब तक संभव नहीं जब तक एक प्रज्ञावान नेतृत्व की सरकार राज्य की बागडोर अपने हाथ में न ले। पर क्या ऐसा अपने राज्य में होना संभव है कुमाऊं-गढ़वाल पहाड़ी-मैदानी ब्राह्मण-ठाकुर इत्यादि अनेकानेक वाद जहां हावी हों वहां क्या ऐसा नेतृत्व और ऐसी सरकार का गठन हो सकता है


जनता यानी वह शक्ति जिसके वोट में ऐसी सरकार के गठन की संभावना छिपी है जब खुद जनता ही धर्म जाति क्षेत्र आदि के आधार पर अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करती हो तब दोष किसे दिया जाए भ्रष्ट सरकार और भ्रष्ट मंत्री-मुख्यमंत्री इसी जनता जनार्दन के जनादेश से  सत्ता पाते हैं। हिमालय पुत्र के नाम से विख्यात हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र होने मात्र से राजनीति में चमके विजय बहुगुणा को आखिरकार संसद तक चुन कर तो पहाड़ ने ही भेजा। किस योग्यता के आधार पर न तो विजय गढ़वाल में पले-बढ़े न ही उनका उत्तराखंड के साथ कोई भावनात्मक लगाव-संबंध रहा। यहां तक की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने स्वयं स्वीकारा कि वे बंगाली पहले हैं उत्तराखण्डी बाद में। पिछले एक बरस के दौरान उन्होंने मुझ जैसों की आशंका को सही साबित किया कि वे भले ही कांग्रेस आलाकमान द्वारा चयनित हों राज्य सरकार के सर्वेसर्वा बन गए हों उनका दिल दिल्ली में ही बसता है देहरादून उन्हें नहीं सुहाने वाला। पिछले ३६५ दिनों में उन्होंने देहरादून कम दिल्ली में ज्यादा समय बिताया। जिस राज्य की मातृशक्ति की सबसे बड़ी पीड़ा उसके पति-पुत्र की शराबखोरी हो जिस राज्य में इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन हुआ हो उसी राज्य में घर-घर शराब पहुंचाने का जिम्मा पहले भाजपा सरकार ने उठाया अब कांग्रेस सरकार विजय बहुगुणा के नेतृत्व में उसे मजबूती देने की नीयत से टैक्स में रियायत दे चुकी है। हिमालयपुत्र के सुपुत्र पहाड़ के प्रति कितने संवेदनशील हैं यह उनके इस एक निर्णय से ही साफ झलक जाता है। पिछले एक बरस के दौरान विजय बहुगुणा सरकार ने लगातार ऐसे निर्णय लिए जिनसे साफ होता है कि उनका उद्देश्य जनहित में न होकर स्वहित है। हालांकि गैरसैंण के मुद्दे पर जरूर इस सरकार की पहल ठीक रही भले ही इसके पीछे उनका उद्देश्य राजनीतिक लाभ उठाना ही क्यों न हो गैरसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण आने वाले समय में इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की संभावना को जन्मता है। इस एक निर्णय के अतिरिक्त यह सरकार हर मोर्चे पर विफल नजर आती है। भ्रष्टाचार पहले भी जमकर था अब भी जमकर हो रहा है। राज्य की नौकरशाही देश की निकृष्टतम-भ्रष्टतम नौकरशाही में से एक है। यहां दो प्रकार के नौकरशाह हैं। एक वे जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के जरिए उत्तराखंड कैडर पा अपनी सेवा दे रहे हैं और दूसरे वे जो इसी राज्य के मूल निवासी हैं। इन दोनों में राज्य के संसाधनों को लूटने-खसोटने की होड़ मची है। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर राज्य के राजनेता खड़े हैं। बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को एक ही उल्लू काफी था हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा' की तर्ज पर उत्तराखंड को बदहाली के मुकाम तक पहुंचाने वालों में यहां के मूल निवासी नौकरशाहों का बड़ा हाथ है। यदि कोई सारंगी या शर्मा राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का मार्ग बनाता है तो उसको सहारा देने वाले यहां के पंत पांडे रावत नेगी जोशी ही तो हैं जो बहती गंगा में हाथ धोमौज कर रहे हैं। आज विजय बहुगुणा और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाली भाजपा क्यों भूल जाती है कि जब उसकी सरकार थी तब हालात इससे भी खराब थे। भाजपा नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट इन दिनों बहुगुणा सरकार के भ्रष्टाचार पर लगातार प्रखर हैं। सिडकुल की करोड़ों की जमीन को बिल्डरों के हवाले कौड़ियों के भाव कर चुकी बहुगुणा सरकार पर तीखे प्रहार करने वाले अजय भट्ट तब क्यों खामोश थे जब उनकी सरकार ने ऋषिकेश स्थित सिटुरजिया कंपनी को लीज पर दी गई जमीन ऐसा ही षड्यंत्र रच बेच डाली थी तब पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करते हुए अजय भट्ट ने निशंक और उनकी सरकार का जबर्दस्त बचाव किया था। अजय भाई क्या पार्टी और संघ मातृभूमि से ज्यादा महत्वपूर्ण है पिछले १२ बरस में हमने न जाने कितने सर्वेक्षण कराए होंगे। हर सर्वेक्षण ने कांग्रेस से हरीश रावत को सबसे योग्य नेता माना मुख्यमंत्री पद के लिए। जाहिर है जनता हरीश रावत से आस लगाए बैठी है कि रावत यदि मुख्यमंत्री बनते हैं तो सुशासन देंगे विकास पथ से उतर चुकी उत्तराखंड की गाड़ी को वापस ट्रेक पर लाएंगे। पर क्या वाकई ऐसा संभव है क्या हरीश चंद्र सिंह रावत ऐसा करने की नीयत रखते हैं क्या वाकई वे अपनी मातृभूमि के प्रति इतने संवेदनशील हैंजितना जनता उन्हें समझती है मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहता क्योंकि मैं जानता हूं जन्नत की हकीकत लेकिन बकौल गालिब दिल बहलाने के लिए यह खयाल अच्छा है। यदि हरीश को सच में पहाड़ का दर्द होता तो वे कांग्रेस को नमस्कार तभी कह चुके होते जब २००२ में उनकी दावेदारी को दरकिनार कर नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बनाए गए थे। रावत कांग्रेस में ही रहे और लगातार अपनी ही सरकार के खिलाफ काम करते रहे। नतीजा यह रहा कि कुमाऊं के ठाकुर और ब्राह्मण की लड़ाई का खामियाजा राज्य की आम जनता को झेलना पड़ा। २०१२ में फिर एक बार कांग्रेस आलाकमान ने जनादेश को किनारे लगा विजय बहुगुणा का चयन किया तब भी रावत ने मंत्री पद छोड़ने कांग्रेस से विदा लेने का साहस नहीं किया। वे शाश्वत असंतुष्ट बने रहे। अपने आलाकमान से रूठे डील की खुद कैबिनेट मंत्री बन गए और अपने एक करीबी को राज्यसभा भिजवा दिया। इससे पहाड़ का क्या भला हुआ खाक नहीं। तब बात वहीं पर आकर रुक जाती है जहां से शुरू हुई थी कि क्या एक प्रज्ञावान नेतृत्व अपने बीच से उठेगा जिसे राज्य की जनता बगैर किसी 'वाद' के किंतु-परंतु के चुनेगी और जो ऐसी सरकार दे पाएगा जिसका लक्ष्य स्वहित के लिए धनोपार्जन करना नहीं बल्कि बर्बाद-बदहाल देवभूमि को सुखी-संपन्न बनाना होगा इतना तो तय है अब चाहे कोई बहुगुणा सीएम रहे या कोई रावत बगैर आमूल-चूल परिवर्तन के कुछ होने वाला नहीं। यदि इन्हीं राजनीतिक दलों की सरकारें बनती-बदलती रहीं तो केवल चेहरे और नाम बदलेंगे राज-काज में कुछ नहीं बदलेगा। खण्डूड़ी थे तो प्रभात थे निशंक थे तो सुभाष थे बहुगुणा हैं तो राकेश हैं। आने वाला समय भी ऐसे ही प्रभात-सुभाष और राकेश के नाम रहेगा। पहाड़ दरकते रहेंगे बादल फटते रहेंगे दैवीय आपदाएं आती रहेंगी और मुझ जैसे दिलजले यूं ही लिखते रहेंगे। 


स्वर्गीय हेमवती नंदन के पुत्र ने एक बरस की सरकार का कार्यकाल पूरा होने की खुशी भू-अध्यादेश कानून में रद्दोबदल कर मनाई है। यदि अभी भी हम नहीं जागे तो आने वाले समय में अपनी ही जमीन के चौकीदार मात्र रह जाएंगे। पहाड़ की संस्कृति नष्ट हो जाएगी। बहरहाल हर सरकार की तरह इस सरकार ने भी अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने की खुशी में मीडिया को बड़ा विज्ञापन दिया है। सुशासन और विकास के दावे करता बहुगुणा सरकार का विज्ञापन मुझे स्व  अदम गोंडवी की भूली-बिसरी कविता याद दिला गया। आपको भी पढ़ा दूं-

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी हैं

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो

इधर पर्दे के पीछे बबर्रता है नवाबी है

लगी है होड़-सी देखो अमीरी और गरीबी में

ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज चांदी की तुम्हारे जाम सोने के

यहां जुम्मन के र में आज भी फूटी रकाबी है

 

 
         
 
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  • जीवन सिंह टनवाल

भारत और ऑस्टे्रलिया के बीच पांच वनडे मैचों की सीरीज सत्रह सितंबर से शुरू हो हो रही है। हाल ही में श्रीलंका को उसकी धरती पर क्लीन स्वीप

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