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जनपदों से 
 
उपेक्षित तीर्थस्थल

  • संजय कुंवर

 

चमोली। सीमांत विकासखण्ड जोशीमठ में तीर्थाटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कई धार्मिक स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। ये तीर्थस्थल वर्ष भर तीर्थयात्रियों श्रद्धालुओं और देश-विदेश के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। लेकिन इनमें से कई उचित देखभाल के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच गए हैं। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आ रही है। सरकारी उदासीनता के चलते प्रदेश की यह सांस्कृतिक विरासत खतरे में है।

बदरीनाथ यात्रा मार्ग पर हेलंग के समीप वृद्ध बद्री से लेकर बंशी नारायण, कल्पेश्वर रुद्रेश्वर आदि पौराणिक मंदिरों के दर्शनों के लिए आज भी तीर्थयात्री और पर्यटक उतावले रहते हैं। पौराणिक काल के इन तीर्थ स्थलों में सबसे खराब हालात पंचबद्री में से एक महत्वपूर्ण भविष्य बद्री का है।

समुद्र तल से लगभग २७४४ मी की ऊंचाई पर देवदार और सुराई के घने जंगलों के बीच भगवान भविष्य बद्री का अद्भुत मंदिर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए जोशीमठ से १९ किमी मोटर मार्ग की दूरी तय कर सलधार से पैदल चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर और भी महत्वपूर्ण है। यहां पर बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। एक छोटी सी आश्रमनुमा कुटिया बनाकर रहने वाले बाबा स्वामी सरस्वती कहते हैं कि यहां चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही पर्यटक भी आते हैं लेकिन यात्रा मार्ग के अभाव और विकट चढ़ाई के कारण सिर्फ वह यात्री ही यहां आ पाते हैं जो शारीरिक रूप से फिट हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने तपोवन से शिरगी होकर सुंभाई, भविष्य बद्री तक मोटर मार्ग की स्वीकृति देकर इसका शिलान्यास भी किया था। लेकिन आज तक शुरुआती सौ मीटर तक भी सड़क कटिंग पूरी नहीं हो पायी है। सुंभाई ग्रामसभा की प्रधान मंगसीरी देवी बताती हैं कि इस मोटर मार्ग के लिए तपोवन से शिरगी गांव तक लोनिवि को लगभग ६० लाख से अधिक की धन राशि स्वीकृति हो गयी थी। लेकिन अभी तक पहाड़ कटान का कार्य शुरू नहीं हो सका है। ऐसे में सुंभाई तक कैसे सड़क आ पायेगी। शासन-प्रशासन और लोनिवि की उदासीनता का खामियाजा इस इलाके के लोग और यहां पहुंचने वाले पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों को भुगतना पड़ रहा है।

सुंभाई गांव के ठेकेदार कलम सिंह लोनिवि के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि तपोवन से सुंभाई तक स्वीकृत होने वाले इस मोटर मार्ग को शुरुआती स्वीकृति शिरगी गांव तक मिली है। पीडब्ल्यूडी की स्वीकृत लागत के सापेक्ष ठेकेदारों को कम लागत बताकर निविदाए निकाली गयी हैं। जिसमें लागत काफी कम रखी गई और कार्य ज्यादा। जिसके चलते कोई भी ठेकेदार काम लेने को तैयार नहीं है। अब विभागीय टालमटोल और प्रशासन की क्षेत्र के प्रति बेरुखी के चलते टेंडर बंद कर दिया गया है। ग्रामीणों का मानना है कि इस कार्य में लोनिवि के अधिकारियों को ज्यादा कमीशन और रेट नहीं मिल पा रहा है, जिस कारण आज तक इस मोटर मार्ग का कार्य शुरू करवाने की जहमत विभाग नहीं उठा रहा है। कइयों का मानना है कि विभागीय कमीशनखोरी और बदहाली के कारण आस्था का प्रतीक भविष्य बदरी उपेक्षित हो कर रह गया है। 

 

 

तीन दशकों से नसीब नहीं भवन

  • दिनेश पंत


पिथौरागढ़। प्रदेश को आयुष राज्य बनाने का सरकारी दावा खोखला साबित हो रहा है। किसी भी, छोटे-बड़े, राजकीय अस्पताल में डॉक्टर की संख्या के साथ-साथ कोई सुविधाएं पूरी नहीं हैं। राज्य के आयुर्वेदिक अस्पतालों की स्थिति और भी दयनीय है। पिथौरागढ़ जनपद के अधिकांश आयुर्वेदिक अस्पताल एवं पंचकर्म यूनिटों के पास अपना भवन नहीं है। जिला मुख्यालय में १९७७ में स्थापित आयुर्वेदिक विभाग भी ३६ वर्षों से किराए के भवन में चल रहा है। यही नहीं विभाग में प्रशासनिक अधिकारी और प्रवर सहायकों के पद वर्षों से खाली पड़े हैं।

जिले में आयुर्वेद के अधिकांश अस्पताल किराए के भवनों में चल रहे हैं। जनपद के सुदूरवर्ती क्षेत्रों की स्थिति को देखें तो मुनस्यारी में ७ चिकित्सालय पांच चिकित्साधिकारियों के हवाले है। यहां चिकित्सालय के लिए पांच भवन किराए पर लिए गए हैं। धारचूला में सात चिकित्सालय हैं यहां पर डॉक्टर तो सातों चिकित्सालयों में हैं लेकिन इनमें तीन किराए के भवन में। यही हाल जनपद के अन्य आयुवैदिक चिकित्सालयों का भी है। जिले में स्थापित १५ अस्पतालों के पास ही अपने भवन हैं। ४४ आयुर्वेदिक अस्पताल किराए के भवनों में चल रहे हैं। दो केन्द्रों में निर्माण कार्य चल रहा है। तीन केन्द्रों में भवन अगले वित्त वर्ष के लिए प्रस्तावित किए गए हैं। लाखों रुपए की धनराशि हर साल किराए में ही विभाग को खर्च करनी पड़ रही है। जनपद के ५९ आयुर्वेदिक अस्पतालों में ६१ पद सृजित हैं जिसके सापेक्ष ४६ पद ही भरे गए हैं। चिकित्सकों की कमी के चलते कई अस्पताल फार्मासिस्टों के हवाले चल रहे हैं। इन चिकित्सालयों में वार्ड ब्वाय और स्वच्छकों के भी ४३ पद खाली पड़े हुए हैं।

आयुर्वेद चिकित्सा पर लोगों का भरोसा है लेकिन आधारभूत ढांचे के अभाव में यह विभाग लोगों का भरोसेबंद साथी नहीं बन पा रहा है। लोगों का भरोसा इस वर्ष जनपद के आयुर्वेदिक अस्पतालों में हुई ओपीडी से समझा जा सकता है। जनपद में इस वर्ष तीन लाख ३८ हजार ९९ ओपीडी हुई। लेकिन आधारभूत ढांचे एवं चिकित्सकों की कमी आयुर्वेद चिकित्सा के विस्तार में आड़े आ रही है। विभागीय अधिकारी भले ही दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक होना स्वीकार करते हैं लेकिन यहां आने वाले मरीजों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त दवाएं नहीं के बराबर मिलती हैं। प्रायः बाजार से दवाई खरीदनी पड़ती है। वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी जुगल किशोर पांडेय कहते हैं, 'हर रोज बड़ी तादाद में लोग चिकित्सालयों में आते हैं। यह प्रवृत्ति गुणकारी एवं लाभकारी है लेकिन इन चिकित्सालयों में दवाइयां विशेषकर टॉनिक उपलब्ध न होने से लोगों को मायूसी ही हाथ लगती है। यह गरीब और आम आदमी के लिए सुलभ एवं सस्ता ईलाज है।' जिला आयुर्वेद एवं यूनानी अधिकारी डीसी कांडपाल कहते हैं, जिस तरह से संसाधनों और अन्य सुविधाओं की जरूरत है वह पूरी नहीं हो पा रही है। पर्याप्त आधारभूत ढांचा उपलब्ध न हो पाने के चलते आयुर्वेदिक चिकित्सा का भरपूर लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

पर्याप्त आधारभूत ढांचा उपलब्ध न होने के चलते भी जनपद में आयुर्वेदिक चिकित्सा लड़खड़ा गई है। आपातकाल जैसी सुविधा न होने के चलते भी लोग आयुर्वेदिक अस्पतालों का रुख कम करते हैं। आयुर्वेद के लिए बजट कम होना भी इसके आधारभूत ढांचे को खड़ा न कर पाने का बड़ा कारक रहा है। दूसरी ओर आयुर्वेदिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए खोले गए पंचकर्म यूनिट भी भवनहीन चल रहे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों का पद सृजित नहीं हो सका है। प्रत्येक जिले में पंचकर्म यूनिट खोलने की योजना के तहत यहां तीन यूनिट वड्डा महरखोला और बलुवाकोट में खोली गई है। यहां चिकित्सक एमडी तो हैं, लेकिन अन्य यूनिटों में विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव है। इनके पास भी अपना भवन नहीं हैं। पर्याप्त जगह उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को भर्ती करने की व्यवस्था नहीं है। वड्डा स्थित पंचकर्म यूनिट के चिकित्सक एमडी नवीन जोशी कहते हैं, 'आयुर्वेद में बहुत बदलाव आया है लेकिन पंचकर्म यूनिट में जिस तरह से मरीज आते हैं उस तरह के पद सृजित नहीं हैं। सरकारी स्तर पर इसके लिए प्रयास किया जा रहा है।

 चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी कहते हैं, 'साल भर में सारी व्यवस्थाएं चुस्त हो जाएंगी। नए चेहरों के साथ ही आयुर्वेदिक अस्पताल भी नए नजर आएंगे। ४०० के करीब डॅाक्टर हमें शीद्घ्र मिल जाएंगे। हमने पूर्व में ही लोक सेवा आयोग के तहत ५०० डॉक्टरों की चयन प्रक्रिया पूरी कर ली थी। कैबिनेट की अगली बैठक में हम ऐसा प्रस्ताव ला रहे हैं कि आयुर्वेदिक डाक्टरों को ऐलोपैथिक दवाइयों को लिखने का अधिकार हो।

 

 

चुकम गांव का विस्थापन

 

  • शंकर सिंह मनराल

रामनगर (नैनीताल। चुकम गांव के लोगों के चेहरे पर खुशी दिखाई पड़ने लगी है। क्योंकि जल्द ही ग्रामीणों को कोसी नदी की बाढ़ एवं जंगली जानवरों के आतंक से राहत मिल सकेगी। प्रशासन ने लोगों का विस्थापन नजदीक ही आमपोखरा रेंज में करने का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज दिया है। जिस पर शासन ने कार्यवाही तेज कर दी है। अगर कोई बाधा नहीं आई तो सैकड़ों ग्रामीणों को बड़ी राहत मिलेगी।  

 

रामनगर तहसील के अंतर्गत राजस्व ग्राम चुकम के लोग कोसी नदी का प्रकोप वर्षों से झेल रहे हैं। यह गांव कार्बेट पार्क के धनगढ़ी गेट की पूरब दिशा में घने जंगलों के बीच बसा है। लगभग ११५.१७४ एकड़ क्षेत्रफल में बसे इस गांव का एक छोर कार्बेट के जंगलों से जुड़ा है तो दूसरा छोर कोसी नदी से सटा है। ग्रामीण के खेतों में लगा फसल जंगली जानवर चट कर जाते हैं। वहीं प्रत्येक साल कोसी नदी में आने वाले बाढ़ से भी ग्रामीणों को नुकसान होता है। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए वर्षों से ग्रामीण पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। पुनर्वास प्रस्ताव पर प्रशासन ने गहन अध्ययन करने के बाद पुनर्वास स्थल आमपोखरा रेंज का प्लान-५० चयनित किया। इसमें ग्राम चुकम के ९२ और आंशिक रूप से प्रभावित अमरपुर के ३२ परिवारों को पुनर्वासित किया जाएगा। जिन ग्रामीणों के रिहायशी मकान आपदा से नष्ट हो गए हैं, उन्हें तीन लाख रुपये, पशुओं के गोशाला निर्माण को १५ हजार रुपये तथा काश्तकारों को व्यवसाय शुरू करने के लिए २५ हजार रुपये मदद देने का प्रस्ताव बनाया गया है। डीएम निधिमणि त्रिपाठी ने बताया कि चुकम गांव के पुनर्वास के लिए शासन को विस्तार से प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है। स्वीकृति मिलने पर आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी।

 
         
 
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