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आवरण कथा
 
सौ साल से जारी भूमि घोटाला

 

  • कृष्ण कुमार

 

 

तीर्थनगरी ऋषिकेश में पौराणिक भरत मंदिर के महंत पिछले सौ साल से निरंतर भूमि घोटाले करते आ रहे हैं। अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर वे अब तक अरबों रुपये की जमीनें हड़प कर बेच चुके हैं। लेकिन शासन-प्रशासन में बैठे अधिकारी कोई कार्रवाई करने के बजाय हमेशा उनके सम्मुख नतमस्तक ही रहे। कभी किसी अधिकारी ने हिम्मत की भी तो उसके पर कतर दिए गए। जांच रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। महंत परिवार के लोगों और रिश्तेदारों का उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की सरकार में दबदबा रहा है...

 

उत्तराखण्ड में आए दिन एक से बढ़कर एक बड़े घोटाले सामने आते रहते हैं। जमीनों के फर्जीवाड़े के कई मामले उजागर हुए हैं। इस कड़ी में शामिल है तीर्थ नगरी ऋषिकेश में पिछले सौ बरस से चल रहा ऐसा भूमि घोटाला जो धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों से लेकर सरकारी अफसरों तक की मिलीभगत के चलते बेरोक-टोक जारी है। इस दौरान सैकड़ों एकड़ जमीन को खुर्द-बुर्द किया जाता रहा लेकिन शासन -प्रशासन ने कभी भी इस दिशा में कोई कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत तक नहीं समझी। कहीं से विरोध में आवाज उठी तो जांच कमेटी बनाकर मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। 


ऋषिकेश स्थित पौराणिक काल के प्रसिद्ध भरत मंदिर के रखवाले ही पिछले करीब १०० वर्षों से मंदिर की अरबों रुपये की भूमि को बेच-बेच कर अपना निजी खजाना भरते रहे हैं। आज हालात ये हैं कि वर्ष १८४८ में भरत मंदिर के पास २२८७ एकड़ यानी १२३४९ बीद्घा भूमि थी, जो १९३७-३८ के राजस्व अभिलेखों में  घटकर ११५६१ बीद्घा ही रह गई। १९६३ के बंदोबस्त में यह भूमि और घटकर लगभग ४०४ बीद्घा ही रह गई। भरत मंदिर की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने की शुरुआत १८७३ से लेकर १९०६ तक महंत रहे राम रतन दास ने की थी। उन्हें १८७३ में भरत मंदिर की गद्दी पर बैरागी अखाडे के संतों ने बिठाया था। गद्दी पर रहते उन्होंने नगर के कई आसामियों और अपने परिवार के लोगों को मंदिर की जमीनें लीज, पट्टा, दवामी पट्टा आदि के नाम पर बेची। इसके बाद गद्दी पर बैठे उनके चेले महंत परशुराम ने भी दिल खोलकर मंदिर की जमीनों को पट्टों के नाम पर दिया। भरत मंदिर की जमीनों को लुटाने के लिए उन्होंने सभी सीमायें पार कर दीं। अपने ही पुत्रों-रिश्तेदारों को सैकड़ों एकड़ जमीनें पट्टों के नाम पर दे दी। उनका नामांतरण तक करवा दिया। ऋषिकेश तहसील में इसके रिकॉर्ड के तौर पर पट्टा मौजूद है। इस पट्टे की २४ जून १९५२ को रजिस्ट्री करवाई गई। पट्टे के अनुसार महंत परशुराम ने भरत मंदिर के खसरा नम्बर ७४ में अपने पुत्र ज्योति प्रसाद शर्मा और ललित मोहन शर्मा के नाम भूमि कर दी और तहसील रिकॉर्ड के अनुसार महंत ने खसरा नंबर २७९/१ की भी सैकड़ों एकड़ भूमि अपने पुत्रों और परिजनों के नाम कर दी। उन्होंने अपने पुत्र ज्योति प्रसाद शर्मा और ललित मोहन शर्मा के नाम खसरा नम्बर ७८ में मंदिर की कुल  ६८ ़१४ एकड भूमि कर दी। इसके अलावा खसरा नम्बर २७९/१ में अपनी पौत्री विजया शर्मा पुत्री ज्योति प्रसाद शार्म के नाम भी १२ ़५० एकड़ भूमि कर दी गई। मंहत परशुराम यहीं नहीं रुके और खसरा नम्बर २७९/१ की १९३ एकड़ भूमि भी उन्होंने अपने तीनों पुत्रों शांति प्रपन्न शर्मा, ज्योति प्रसाद शर्मा और ललित मोहन शर्मा के नाम कर दी जो कि उन्होंने अपने- अपने नाम स्थानांतरित भी कर दी। इसके बाद इन तीनों पुत्रों ने समय-समय पर लाखों रुपये में यह भूमि अन्य लोगों को बेच दी। 


महंत परशुराम ने नगर के अन्य लोगों को भी मंदिर की भूमि पट्टे आदि के नाम पर बेची। पट्टा अभिलेख में वार्षिक लगान एक रुपये प्रति गज से भी अधिक के हिसाब से लिया गया। इस लिहाज से देखें तो एक एकड़ जो कि लगभग सवा पांच बीद्घा का होता है, का वार्षिक लगान ही ६ हजार के लगभग होता है। यह लगान लाखों में बैठता है। परशुराम ने वार्षिक लगान के नाम पर पट्टा देकर करोड़ों रुपये कमाए। उनके पुत्र भी निरंतर यही करते रहे। नगर के कई बुर्जुग लोगों को कहना है कि लगान केवल दिखावे के लिये होता था और जमीनों की असल कीमत गुपचुप तरीके से ले ली जाती थी जिसका मंदिर के रिकॉर्ड में कोई भी विवरण दर्ज नहीं किया गया। जांच रिपोर्टों में तो यहां तक उल्लेख है कि आजादी के बाद जब सरकार जमींदारी उन्मूलन कानून के तहत जमींदारों, राजा-रजवाड़ों, नवाबों और ग्रामसभाओं की बंजर जमीनों को अपने कब्जे में लेने लगी तो इस पर महंत परशुराम बेचैन हो उठे। मंदिर की जमीनों को अपने हाथों से जाता देखकर उन्होंने सबसे पहले अपने पुत्रों के नाम जमीनें कीं और कानून से बचने के लिये सभी हथकंडे अपनाये। इसमें उन्हें तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन का भी पूरा सहयोग मिलता रहा। 


शांति पपन्न उत्तर प्रदेश के पहले विधानसभा चुनावों में परवादून विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। वह उत्तर प्रदेश सरकार में कबीना मंत्री भी बने। उस वक्त ऋषिकेश परवादून विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था। शांति प्रपन्न शर्मा लगातार १९६७ तक विधायक रहे जिससे महंत परिवार का रसूख बढ़ता ही चला गया। महंत परशुराम शर्मा ने अपने पुत्र की राजनीतिक हैसियत का भरपूर फायदा उठाया। भरत मंदिर की जो जमीनें जमीदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत अधिग्रहित की जानी थी उन्होंने उन पर राजस्व और शासन-प्रशासन से मिलकर कब्जा कर लिया जिस किसी भी अधिकारी ने कभी उन्हें रोकने की कोशिश की भी तो उसका स्थानांतरण करवा दिया गया। राजस्व विभाग के अभिलेखों में छेड़खानी और रिकार्डों में भारी हेरा-फेरी करके जमीनों को अपने हक में करवाया जाता रहा।


दरअसल महंत परशुराम ने न सिर्फ मंदिर की जमीनों के मामले में जमींदारी उन्मूलन एक्ट को धता बताया, बल्कि इसका दुरुपयोग कर ऋषिकेश में तत्कालीन ग्राम सभा तापोवन की कई भूमियों पर भी अपना कब्जा बनाये रखा। इस मामले की कहानी भी बड़ी रोचक है। महंत के पुत्र शांति प्रपन्न शर्मा ने जमीन कब्जा करने के लिए अपने रसूख से कई बार ऋषिकेश नगर पालिका का सीमांकन करवाया। नगर पालिका ऋषिकेश की सीमा टिहरी के तपोवन और ढालवाला और मुनीकी रेती तक करवा दी गई। जिससे कि यहां की भूमि भी महंतों के कब्जे में बनी रहे। इसी सीमांकन के चलते महंतों ने टिहरी के तपोवन और मुनीकी रेती में कई लोगों पर मुकदमे भी किए जिनमें से अधिकतर वे हार गए। लेकिन आज भी मंहत परिवार इन क्षेत्रों की अधिकतर जमीनों को अपना ही बताता है।


असल में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत ग्रामसभा क्षेत्रों की जमीनें बगैर किसी मुआवजे के अधिग्रहित की गई। लेकिन नगर पालिका या नगर क्षेत्रों की भूमि का अधिग्रहण करने पर मुआवजा दिया जाता था। इसी मुआवजे को पाने के लिये मंहत परशुराम और उनके मंत्री पुत्र ने प्रशासन के साथ मिलकर गहरा षड्यंत्र रचा। बताया जाता है कि तत्कालीन समय में सड़क से लगी हुई जमीनों को २५ पैसे से लेकर दो रुपया प्रति गज के हिसाब से दिया गया, लेकिन पट्टों में केवल वार्षिक लगान लिए जाने की ही बातों का उल्लेख किया गया। ६० वर्ष पूर्व २ रुपया प्रति गज की कितनी कीमत रही होगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।


जमीनों के इस काले कारोबार को जानने के लिए ऋषिकेश के प्रशासनिक इतिहास को भी जानने की जरूरत है। आजादी से पूर्व ऋषिकेश में दो प्रशासनिक व्यवस्थाएं लागू थीं जिनमें ऋषिकेश नोटिफाइड एरिया और तपोवन ग्राम सभा ऋषिकेश नाम से एक बहुत विशाल भूभाग में बसी हुई ग्राम सभा थी। इसका क्षेत्रफल टिहरी के तपोवन गांव से लेकर वर्तमान आईडीपीएल के फैक्ट्री गेट वीरभद्र तक था। १९वीं सदी के कुछ दशक के बाद ब्रिटिश सरकार ने नोटिफाइड एरिया बनाकर ऋषिकेश नगर को अलग कर दिया जिसकी सीमा लक्ष्मण झूला मार्ग के पुल से लेकर त्रिवेणी द्घाट चौराहे तक रखी गई। इस क्षेत्र को नगर क्षेत्र माना गया। शेष ग्राम सभा तपोवन और ऋषिकेश के नाम से ही तत्कालीन ग्रामसभा में ऋषिकेश नोटिफाइड एरिया से अलग नगर और ग्रमाीण इलाके रखे गये जिसमें ढालवाला भी शामिल था। इसके बाद १९४६ में टाउन एरिया बनाया गया जिसे नगर पंचायत कहा जाता है। इसकी सीमा फिर से बढ़ा दी गई जिसे लक्ष्मण झूला चौदह बीद्घा जिसे छोटा ढालवाला कहा जाता था को टाउन एरिया में मिला दिया गया। इसमें ग्राम सभा की जमीनों को मिला दिया गया और इसकी सीमाएं बढ़ा दी गईं। कुछ लोगों का कहना है कि टाउन एरिया के बाद नगर पंचायत की सीमा वर्तमान नगर पालिका तक ही थी।

 

वर्ष १९५६ में महंत परिवार ने शांति प्रपन्न शर्मा की राजनीतिक हैसियत का सहारा लेकर उत्तर प्रदेश शासन की मिलीभगत से बगैर किसी आपत्ति के नगर पंचायत की सीमा को बढ़ा दिया। ग्राम सभा की जमीन बनखण्डी को इसमें जबरन शामिल कर लिया गया। इसकी सीमाएं उत्तर में चौदहबीद्घा चुंगी तक और हरिद्वार रोड़ पुरानी चुंगी तक की गई। पश्चिम में रेलवे स्टेशन और देहरादून रोड की पुरानी चुंगी तक कर बढ़ा दी गई। पालिका के सीमांकन का सिलसिला निरंतर चलता रहा। बंगाली मंदिर रोड स्थित पुराना रोडवेज बस अड़्डा और हरिद्वार रोड स्थित भूखंड जिस पर नगर पालिका की ओर से विगत ४० वर्षों से कूड़ा-करकट डाला जाता है, को नगर सीमा में लाया गया और उसे महंतों की भूमि में तब्दील कर दिया गया। वर्ष १९७१ में एक बार फिर नगर पालिका की सीमा बढ़ाई गई और इसे पूर्ण नगर पालिका का दर्जा दिया गया। इस बार तो इसकी सीमा बैराज रोड स्टर्डिया फैक्ट्री और आईडीपीएल से कुछ पहले काली कमली की गौशाला तक कर दी गई। इसके अलावा देहरादून रोड पुरानी चुंगी से बढ़ाकर वर्तमान बाईपास और वर्तमान प्रगति विहार तक कर दी गई।


बताया जाता है कि तत्कालीन समय में महंतों के दवाब में नगर पालिका की सीमा को श्यामपुर तक ले जाने की पूरी कोशिश हुई जिससे कि उनके द्वारा इन स्थानों में कब्जाई गई भूमि को नगर सीमा में लाया जा सके। लेकिन उनकी यह हसरत पूरी नहीं हुई। इस तरह महंत परिवार के लोग अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करते हुए ग्राम सभा की भूमि को तहसील कर्मचारियों की मिलीभगत से अपने नाम यानी भरत मंदिर के नाम चढ़वाते चले गये और फिर गुपचुप तरीके से बेचते चले गये। यह सब जैड ए और नॉन जैड ए के खातों के तहत होता रहा। प्रशासन ने कभी भी ऋषिकेश के इस प्रकार के द्वय भूमि प्रबंधन को खत्म करने का कोई प्रयास नहीं किया।

 

असल में शासन की नाकामी के चलते भरत मंदिर का प्रकरण फाइलों में गुम होता चला गया। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद इस मामले की तमाम शिकायतों को देखते हुये पूर्व की सभी जांच रिपोर्टों का फिर से अध्ययन किया जाने लगा। संस्कृति और धर्मस्व विभाग की तत्कालीन अंजलि प्रसाद ने इस प्रकरण पर शासकीय बैठक करने का निर्णय लिया। इस पर शासन में कई दौर की बैठकें हुईं और अंत में ३० जुलाई २००९ को जारी दो शासनादेशों के जरिए भरत मंदिर की सभी पूर्व की जांच रिपोर्टों और तहसीलदार ऋषिकेश की जांच आख्या के अनुसार भरत मंदिर की समस्त भूमि के पंजीकरण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई। अंजलि प्रसाद द्वारा जारी इन शासनादेशों के बावजूद प्रशासन भरत मंदिर के संबध में कोई कार्यवाही करने से बचता रहा। इसका मूल कारण भी राजनीतिक दवाब बताया जाता है। ऋषिकेश में यह चर्चां सर्वत्र रहती है कि महंत अशोक प्रपन्न शर्मा के छोटे भाई हर्षवर्धन शर्मा की पुत्री का विवाह तत्कालीन भाजपा सरकार की कबीना मंत्री विजया बड़थ्वाल के पुत्र के साथ हुआ है। एक कैबिनेट मंत्री के संबंधी होने का महंत परिवार को भरपूर लाभ मिला। विजया बड़थ्वाल संस्कृति और धर्मस्व विभाग के मंत्री पद पर आसीन थी और शासनादेश भी उनके ही विभाग से जारी हुआ था। लेकिन जिस तरह से प्रशासन ने भरत मंदिर के प्रकरण में कोई गंभीरता नहीं दिखाई उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं सरकार का दवाब भी कार्रवाई न करने पर था। राज्य की पहली निर्वाचित नारायण दत्त तिवारी सरकार में भी महंत परिवार की खासा पकड़ रही। प्रशासन और राजस्व विभाग के अलावा नगर पालिका तो हमेशा से ही महंतों के पक्ष में काम करती रही। 


अपने शासनादेश के कुछ दिनों बाद अंजलि प्रसाद केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर चली गईं और उक्त सभी शासनादेशों को एक बार फिर से फाइलों में दबा दिया गया। भाजपा की सरकार के समय भरत मंदिर प्रकरण में कोई कार्रवाई होना असंभव था, लेकिन नई सरकार के आने के बाद भी इस पर कोई प्रगति नहीं हुई। इस पर ऋषिकेश के एक पत्रकार प्रमोद नौटियाल एवं ब्रह्मचारी विजय स्वरूप चेला शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज ने नैनीताल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की। जिसमें राज्य सरकार, जिला मजिस्ट्रेट देहरादून, सब रजिस्ट्रार ऋषिकेश, तहसीलदार ऋषिकेश और अशोक प्रपन्न शर्मा पुत्र ज्योतिप्रसाद शर्मा मैनेजर महंत भरत मंदिर ऋषिकेश को पार्टी बनाया गया। हाईकोर्ट के मामले को गंभीरता से लेने पर भरत मंदिर के महंत और कर्ता-धर्ताओं में खासा हड़कंप मचा हुआ है।

 
         
 
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