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vad 7 05-08-2017
 
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प्रदेश 
 
उल्टे बांस बरेली को

 

उत्तराखण्ड की संस्कृति से यदि सब चला जाए और सिर्फ 'नंदा' शेष रह जाए तो तब भी यहां बहुत कुछ बच जाता है। नंदा राजजात की परंपराओं से छेड़छाड़ बेहद खतरनाक है

 

उत्तराखण्ड की संस्कृति में नंदा देवी का विशेष महत्व है। यह संपूर्ण उत्तराखण्ड की आराध्य देवी है। लोगों की इसके प्रति गहरी आस्था ही है कि यहां नदी, द्घाटियों और कई पर्वत शिखरों के नाम इस देवी को समर्पित हैं। हर गांव में किसी न किसी रूप में इसकी पूजा होती है। कई जगहों पर नंदा के नाम से भव्य वार्षिक उत्सव और मेले आयोजित किये जाते हैं। चमोली जिले में लोग हर साल नंदा राजजात का आयोजन करते हैं जो कुरुड़ से लेकर वेदनी बुग्याल तक जाती है। नंदा राजजात तो यूनेस्को की धरोहर बन चुकी है।


नंदा राजजात हर १२ साल में आयोजित की जाती है। इसीलिए इसे हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है। नौटि से लेकर होमकुंड तक निकलने वाली २८० किलोमीटर लंबी इस पैदल यात्रा के एक पड़ाव बाग बासा में आठवीं सदी की गणेश मूर्ति और एक अन्य पड़ाव रूपकुंड में सातवीं सदी के मानव कंकाल इसके प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की प्राचीनता को प्रदर्शित करते हैं। माना जाता है कि उस वक्त उज्जैन के राजा यशधवल अपनी सेना के साथ यात्रा पर गए थे। लेकिन उनसे एक ऐसी मानवीय भूल हो गई थी जिससे क्रोधित हो नंदा ने बर्फीला तूफान चला दिया था जिससे वे बर्फ के नीचे दबकर मर गए। हर यात्रा पड़ाव का अपना एक खास इतिहास है। मसलन रूपकुंड में नंदा ने अपना आधा रूप छोड़ दिया था। इसीलिए इसकी सुंदरता यात्रियों को आकर्षित करती है। हर पड़ाव पर श्रद्धालु उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास और संस्कृति से रूबरू होने के साथ ही सुंदर-सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद भी उठाते हैं। यही नहीं, साहसिक पर्यटन के शौकीन लोगों के लिए भी यह यात्रा एक सुखद अनुभव है। प्राकृतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहसिक हर तरह के पर्यटन की दृष्टि से नंदा राजजात महत्वपूर्ण है।


स्थानीय लोग वर्षों से यात्रा का सफल संचालन करते रहे हैं। लेकिन जब धार्मिक और सांस्कृतिक यात्राओं में राजनीति हावी होने लगती है तो उनका स्वरूप भी प्रभावित होने से नहीं रह पाता। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य यही है कि यहां छोटे-छोटे मेलों और त्यौहारों का भी राजनीतिकरण कर दिया जाता है। यह सच है कि एक समय राजजात वहां के नरेशों ने ही शुरू करवाई थी। आज भी इसके संचालन में कांसुवा के कुंवर और चांदपुर के सभी थानों के ब्राह्मण अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन जो चीजें परंपरा का अंग बन चुकी हैं उनमें आनावश्यक छेड़छाड़ ठीक नहीं है। इस बार यात्रा के संचालन में उत्तराखण्ड सरकार कुछ खास ही दिलचस्पी ले रही है। कहा जा रहा है कि सरकार का पर्यटन विभाग यात्रा की तैयारियों में जोर से लगा हुआ है। क्षेत्र के विधायक जीतराम कह रहे हैं कि यात्रा पड़ावों पर श्रद्धालुओं के लिए विशेष इंतजाम किये गए हैं। सरकारी इंतजाम कितने पुख्ता हो सकते हैं इनकी पोल राज्य निर्माण के बाद आयोजित होने वाले तमाम धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों या तीर्थ यात्राओं के मौके पर खुलती रही है। लेकिन फिलहाल विषय नंदा राजजात की परंपराओं से आवश्यक छेड़छाड़ का है।

 

कितनी दुखद बात है कि चमोली जिले की जिस धरती पर नंदा देवी की सिद्धपीठ है जिन गांवों में उसकी थाती है वहां के लोग खुद को नंदा राजजात के मानचित्र पर शामिल न किये जाने से आंदोलन को बाध्य हुए। स्थानीय विधायक जीतराम का उन्हें द्घेराव करना पड़ा। विधायक जीतराम भी इस पक्ष में रहे हैं कि जो गांव नंदा की संस्कृति के प्रतीक हैं वे यात्रा मानचित्र पर शामिल होने चाहिए। लेकिन स्थानीय लोगों की भावनाओं को दरकिनार कर ऐसी परंपराओं को स्थापित किये जाने की बातें हो रही हैं जिनसे सहमत हो पाना असंभव है। सच कहें तो राजजात यात्रा के नाम पर 'उल्टे बांस बरेली को' वाली कहावत चरितार्थ करने की कोशिशें हो रही हैं। चर्चा है कि इस बार नंदा राजजात में मुंबई (बंबई) से भी छतौलियां आएंगी। देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से लोग नंदा राजजात में शामिल होते रहे हैं। लेकिन छतौलियां गढ़वाल और कुमाऊं के कुछ खास गांवों की ही शामिल होती हैं। आखिर मुंबई से छतौलिया के आने का क्या औचित्य है? परंपराओं से आवश्यक छेडछाड़ क्यों? प्रवास में रह रहे उत्तराखण्डवासी यदि अपने देवी-देवताओं और संस्मृति के प्रति लगाव रखते हैं तो वे बधाई के पात्र हैं। अपनी माटी से लगाव होना भी चाहिए। लेकिन उन्हें यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि उत्तराखण्ड की पुरानी पीढ़ियों ने जो सांस्कृतिक परंपराएं और उपासना पद्धति शुरू की थी। उसके पीछे ठोस विचार भी थे। उससे छेड़छाड़ के भविष्य में गंभीर खतरे हैं। इससे संस्कृति और परंपराओं का महत्व कम होता है। नारदीय संहिता के मुताबिक बदरी केदार में छह माह देवता पूजा करते हैं और छह माह मनुष्यों के लिए कपाट खुलते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी देखें तो ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है। इसके बावजूद राज्य गठन के बाद सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोग समय-समय पर यह बेतुका प्रस्ताव भी लाते रहे हैं कि यात्रा साल भर चालू रहनी चाहिए। देवभूमि के सांस्कृतिक स्वरूप को खराब करने की सरकार या कहीं से भी कोई कोशिश होती है तो उसका विरोध किया जाना चाहिए। नंदा पूरे उत्तराखण्ड को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधती है। यह हमारी ऐसी विरासत है कि उत्तराखण्ड की संस्कृति से सब कुछ चला जाए और नंदा शेष रह जाए तो तब भी हमारे पास बहुत कुछ बच जाता है।

 

पढाई से ज्यादा लकड़ी की चिंता

 

 

मिड डे मील योजना में भ्रष्टाचार के मामले अक्सर सुर्खियों में रहे हैं। हालात ये हैं कि भोजन पकाने के नाम पर दी जाने वाली राशि को डकार कर बच्चों से लकड़ियां मंगाई जा रही हैं

 

उत्तराखण्ड में शिक्षा के विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे होते रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान के नारे जोर-शोर से लग रहे हैं। लेकिन असलियत यह है कि व्यवस्था पर भ्रष्टाचार इस तरह कुंडली बनाए हुए है कि इसने राज्य की शिक्षा को करीब चार दशक पीछे धकेल दिया है। पहाड़ी इलाकों में मासूम बच्चे पढ़ाई के बजाए मिड डे मील के लिए लकड़ियां एकत्रित करने में जुटे रहते हैं। उनकी चिंता पढ़ाई से कहीं अधिक लकड़ी इकट्ठा करने की होती है।


उल्लेखनीय है कि कभी पहाड़ के स्कूलों में बच्चे अपने शिक्षकों के लिए लकड़ी लेकर स्कूल जाते थे। लेकिन तब शिक्षकों का वेतन बहुत कम होता था। शिक्षक समाज से आत्मीय संबंध रखते थे। लोग उनकी आर्थिक स्थिति से वाकिफ थे और खुद बच्चों के हाथ उनके लिए लकड़ी, दूध और सब्जी राशन आदि भिजवाना अपना दायित्व समझते थे। लेकिन अब तो हद हो गई।

 

सर्व शिक्षा अभियान का स्लोगन 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' भले ही सुनने में बहुत अच्छा लग रहा हो, लेकिन इसका फायदा कहीं दिख नहीं रहा है। केन्द्र सरकार की वित्तपोषित व राज्य सरकार के अंशदान से संचालित इस योजना का फायदा बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। चमोली जनपद के कई विद्यालयों में आज भी बच्चों से मिड डे मील के लिए लकड़ी ढुलाई जाती है। जबकि सरकार की ओर से दोपहर का भोजन पकाने के लिए गैस, केरोसीन और लकड़ी के पैसे दिए जाते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों में मास्साब शिक्षक स्कूली बच्चों से भोजन पकाने के लिए लकड़ी मंगाते हैं। बच्चे कोई किताब ले जाना भूल जायें तो कोई हर्ज नहीं, पर लकड़ी ले जाना भूल जायें तो उन्हें दंड दिया जाता है। इसलिए बच्चों को किताब से ज्यादा चिंता स्कूल में लकड़ी ले जाने की होती है। इसका बुरा असर उनकी शिक्षा पर पड़ता है। सरकार भले ही बडे़-बडे़ दावे कर रही हो, लेकिन धरातल पर तो यही नजर आ रहा है। 


वर्तमान में चमोली जनपद में कुल १४०० विद्यालयों के छात्रों को इस योजना का लाभ मिल रहा है। किन्तु इनमें सभी विद्यालयों में भोजन बनाने के लिए सरकार की ओर से गैस,कैरोसीन और दूरस्थ क्षेत्रों में लकड़ी के लिए धनराशि दी जाती है। लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में आज इसी से स्कूली बच्चों से लकड़ी ढुलाई जाती है। तभी स्कूल का चूल्हा सुलग पाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सरकार भोजन बनाने के लिए ईंधन का जो पैसा देती है आखिर उसे कौन खा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मास्साब ही मिड डे मील की लकड़ी को खा जा रहे हैं। दूसरी ओर सरकार की मिड डे मील योजना भी बच्चों की संख्या बढ़ाने में नाकाम ही साबित हुई है। सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या दिन ब दिन द्घटती ही जा रही है। आज हाल ये हैं कि अधिकतर लोग अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाना नहीं चाहते हैं। परिणाम है कि आज सरकारी विद्यालयों में गरीब व नेपाली मजदूरों के बच्चे ही अधिकतर दिखाई दे रहे हैं। 

 

प्राथमिक स्तर पर प्रति छात्र पर ३११ रुपये प्रतिदिन खर्च जबकि उच्च प्राथमिक स्तर पर ४६५ रुपये प्रति छात्र प्रतिदिन खर्च होता है। चमोली में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय में २११७ भोजन माताएं कार्यरत हैं। जिन्हें प्रतिमाह १५०० मानदेय मिलता है।

 

बात अपनी अपनी

कानूनन बच्चों से लकड़ी मंगाना गलत है। दोपहर भोजन पकाने के लिए सरकार कैरोसीन, रसोई गैस एवं लकड़ी के लिए धनराशि दे रही है। अगर किसी विद्यालय में बच्चों से लकड़ी का ढुलान करवाया जा रहा है तो ऐसे विद्यालयों के शिक्षकों पर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी।

भूपेंद्र सिंह नेगी मुख्य शिक्षा अधिकारी चमोली

गांवों में आज भी लोगों को यह जानकारी नहीं है कि सरकार लकड़ी के लिए धनराशि देती है। जिसका फायदा उठाकर शिक्षक छात्र-छात्राओं से लकड़ी मंगा रहे हैं। ऐसे शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए।

भरत सिंह कुंवर, जिलाध्यक्ष अभिभावक संघ चमोली

 


 

गरीबी ने ली जान


इआर्थिक स्थिति कैसे किसी की मौत का सबब बनती है इसका उदाहरण नैनीताल के रामनगर में देखने को मिला। यहां द्घटित एक द्घटना सतही तौर पर पशु प्रेम की मालूम होती है। जबकि उसके मूल में द्घर के बदहाल आर्थिक हालात के कारण लड़की की दी गई जान का मामला है। 


रामनगर के मोहल्ला इन्द्रा कॉलोनी में जगदीश अपनी तीन बच्चों के साथ रहता है। बच्चों की पढ़ाई और परिवार का भरण-पोषण चाट-पकौड़ी के एक मात्र खोमचे से होता है। चाट-पकौड़ी के खोमचे से द्घर का गुजारा नहीं होने के कारण जगदीश बकरियों के छोटे बच्चे लाकर पालता था फिर बड़ा होने पर उसे बेचता था। इससे उसके आर्थिक बजट में मदद मिल जाती थी। मौजूदा समय में उसके पास चार बकरियां थीं जो लम्बे समय से द्घर में पल रही थीं। पिता जगदीश के मुताबिक उसकी लड़की किरन को यूं तो चारों बकरियों से ही काफी लगाव था लेकिन एक बकरी से किरन को बेहद प्यार हो गया था। किरन उस बकरी का नाम 'टिंकी' रख दिया। ठंड से बचाने के लिए उसे स्वेटर पहनाया करती थी। विद्यालय जाने से पहले बकरी से तमाम बातें करती थी। उसे छोड़कर कहीं न जाने की हिदायत दिया करती थी। खुद पत्तियां काटकर लाती और अपने हाथ से खिलाती थी। बीती १२ फरवरी को किरन के पिता जगदीश ने किरन की सबसे प्यारी बकरी 'टिंकी' को बेच दिया। स्कूल से जब शाम को किरन द्घर पहुंची तो उसे बकरी बेचने की जानकारी मिली। उसके बाद वह मायूस हो गई। बकरी बेचने के सदमें में उसने रात को भोजन भी नहीं किया। किरन के पिता जगदीश के मुताबिक रात दस बजे तक किरन के पढ़ने की आवाज सुनाई दी। इसके बाद हम ने सोचा शायद किरन सो गई होगी। सुबह जब दरवाजा खटखटाया तो देखा दरवाजा अन्दर से बन्द है। तमाम आवाज देने के बाद जब कोई नहीं बोला तो हमने रोशनदान से चढ़कर देखा तो दंग रह गये। किरन पंखे से झूलती दिखी। तुरंत पुलिस को सूचना दी और पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर पंखे से लटकी किरन को नीचे उतारा। किरन के हाथ पर ब्लेड से खुदा बकरी का टिंकी नाम लिखा था। जगदीश ने बताया कि किरन अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहती थी।

 

 
         
 
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  • कृष्ण कुमार

 

उत्तराखण्ड कांग्रेस में जबर्दस्त कलह चल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने स्तर से कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं तो पार्टी अध्यक्ष प्रीतम सिंह

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