fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 23 25-11-2017
 
rktk [kcj  
 
आवरण कथा
 
कानून को क्रश करता खनन

उत्तराखण्ड में धड़ल्ले से जारी अवैध खनन का खेल विनाश लीला को आमंत्रण दे रहा है। माफिया ने नदियों और गाड-गदेरों को निर्ममता पूर्वक सोखकर उनके प्राकृतिक बहाव को प्रभावित कर दिया है। सीमान्त चमोली जिले में प्रतिबंध के बावजूद प्रशासन की नाक के नीचे खनन हो रहा है। खनन माफिया सरकार को करोड़ों के राजस्व का चूना भी लगा रहे हैं। बांधों और सड़कों के निर्माण में जुटी कंपनियां और संगठन भी खुलेआम अवैध खनन कर रहे हैं

 

 

 

अवैध खनन की मार प्रदेश की नदियों पर ऐसी पड़ी है कि गंगा (अलकनंदा- भागीरथी), यमुना, टौंस, कोसी, रामगंगा आदि नदियों ने कई स्थानों पर अपना रास्ता तक बदल दिया है। खनन माफिया ही नहीं प्रदेश में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं के लिए भी बिना अनुमति नदियों में खनन किया जा रहा है। अकेले हरिद्वार में जहां गंगा नदी के किनारे ४१ स्टोन क्रशर चल रहे हैं, वहीं पहाड़ों पर भी कई जगहों पर सड़कों के किनारे स्टोन क्रशर लगे नजर आ जाते हैं। चमोली जनपद में एक दर्जन से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनके निर्माण में उपयोग होने वाले उपखनिज निर्माण स्थल से गुजर रही नदियों से निकाले जाते हैं। जबकि इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी जरूरी होती है। सिर्फ जलविद्युत परियोजनाएं ही नहीं चमोली में राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने वाला सीमा सड़क संगठन भी अवैध खनन कर रहा है। 


राजमार्ग के किनारे ही बीआरओ ने क्रशर लगाया हुआ है। चमोली से करीब ४ किलोमीटर दूर क्षेत्रपाल में अलकनंदा नदी के किनारे ही क्रशर लगा है। रोजाना यहां से अधिकारी आवाजाही करते हैं, लेकिन कभी इन पर कार्रवाई नहीं की गई।

 

उत्तराखण्ड देश का अकेला राज्य है जहां ६५ प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं। देश को पर्यावरण सुविधाएं प्रदान करने के एवज में राज्य सरकार तीस हजार करोड़ से अधिक का ग्रीन बोनस केंद्र सरकार से मांगती रही है। राज्य सरकार का दावा है कि उत्तराखण्ड के वन देश को ३० हजार करोड़ रुपए से अधिक की ऑक्सीजन सेवा दे रहे हैं। पर जिस तरह से दिन-प्रति दिन प्रदेश में वनों का कटान, खनन और क्रशर से प्रदूषण फैल रहा है, उससे प्रदेश सरकार का यह दावा लगातार कमजोर होता जा रहा है। सरकार के इस दावे पर उत्तराखण्ड आंतरिक्ष उपयोग केंद्र भी प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। इस संस्था द्वारा जारी मानचित्रों के मुताबिक राज्य गठन के बाद तेजी से हुए शहरीकरण, औद्योगीकरण, सड़क निर्माण, खनन और अन्य परियोजनाओं के कारण राज्य का वन क्षेत्र लगातार कम हुआ है। यहां तक कि राज्य का सद्घन वन क्षेत्र भी लगातार घट रहा है।

 

सीमांत जनपद चमोली में खनन पर लगाम होने के बावजूद खनन का खेल तेजी से चल रहा है। खनन माफिया ने जिले की नदियों व गाड गदेरों को छलनी कर दिया है, जिससे इनका भविष्य संकट में है। ऐसा नहीं है कि जिला प्रशासन व वन विभाग को खनन के इस खेल की जानकारी न हो। जिला प्रशासन खनन माफिया पर लगाम लगाने में बेबस नजर आ रहा है। जिससे माफिया के हौसले बुलंद हैं। खनन के इस खेल से प्राकृतिक आपदा की आशंकाएं भी बढ़ चुकी हैं। 


 सीमांत चमोली जनपद में २०११ के बाद किसी भी सरकारी व गैरसरकारी संस्था को खनन पट्टे जारी नहीं हुए हैं। इसके बावजूद  जनपद में खनन का खेल पूर्व की भांति उसी गति से चल रहा है। खनन माफिया के आगे जिला प्रशासन ने भी घुटने टेक दिये हैं। वर्तमान में जिले की कोई भी नदी-नाले और गाड-गदेरे खनन माफिया से अछूते नहीं हैं। खनन के इस खेल से जहां खनन माफिया ने जनपद की नदियों का भविष्य खतरे में डाल दिया है वहीं मानवजनित आपदा को भी न्योता दे दिया है। खनन से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा है। इतना ही नहीं माफिया खनन राजस्व विभाग को भी करोड़ों रुपये का चूना लगा रहे हैं। अगर समय रहते इन पर लगाम नहीं लगायी गयी तो इससे लोगों का ही भविष्य संकट में पड़ जायेगा। साथ ही जिस गंगा की स्वच्छीकरण के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है उसकी पवित्रता भी एक दिन नष्ट हो जायेगी। प्रशासन की नरमी के चलते जिले के खनन माफियों के हौसले बुलंद हैं।


जिले में प्रशासन की ओर से किसी भी संस्था या व्यक्ति को महीनों से खनन पट्टे जारी नहीं किये गए। खुलेआम जारी खनन से स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार का यह खेल प्रशासन की सह पर ही गौरतलब है कि सीमांत जनपद चमोली भूगर्भीय दृष्टि से पहले ही संवेदनशील क्षेत्र द्घोषित किया गया है। वर्ष १९९९ में आये भूकंप से जिले को जोन ५ में रखा गया। भूगर्भशास्त्री यहां किसी भी तरह के खनन को भविष्य के लिए खतरनाक मानते हैं। 

 

नेशनल हाईवे रोड बना रही ग्रेफ की ओर से बिरही के समीप अलकनंदा व बिरही नदी में सरेआम खनन कार्य को अंजाम दिया जा रहा है। राजस्व विभाग व वन विभाग कुंभकर्णी नींद में सोये हुए हैं। इससे सरकार को लाखों के राजस्व का नुकसान हो रहा है। ऐसे में विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना लाजिमी है। यदि इसी तरह खनन होना ही था तो फिर किस बात का प्रतिबंध लगा है? प्रतिबंध लगने से तो उलटे विभाग को करोड़ों का चूना लग रहा है। बीआरओ महीने भर से अलकनंदा के किनारे खनन कार्य को अंजाम दे रहा है। बीआरओ जहां खनन कार्य कर रहा है वहां से ५०० मीटर की दूरी पर ही वन विभाग और ८ किमी की दूरी पर चमोली के उपजिलाधिकारी का कार्यालय है। प्रशासन का काफिला भी हर रोज इसी मार्ग से गुजरता है।

 

हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान के निदेशक पर्यावरणविद् सुरेश का कहना है कि राज्य में सद्घन वन क्षेत्र केवल ३६ प्रतिशत ही बचा है। शेष भूमि जिसे सरकार वन बता रही है दरअसल खाली हो चुके मैदान हैं। उत्तराखण्ड राज्य गठन के पहले से जारी पर्यावरण चिंता अब और तेज हो गई है। प्रदेश की विभिन्न नदियों में हो रहे खनन ने सभी नदियों की सूरत बदल कर रख दी है। राजधानी बनने के बाद दस सालों में अकेले देहरादून शहर में सरकारी व निजी योजनाओं के लिए लगभग ५० हजार पेड़ काटे जा चुके हैं। सीटिजन फॉर ग्रीन दून के डॉ नितिन पाण्डे का कहना है कि इसमें से २० हजार पेड़ तो राजधानी की सड़कों के चौड़ीकरण के लिए ही काटे गए हैं जबकि सूचना के अधिकार के तहत वन विभाग की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी यह बताती है कि इसके बदले में वन विभाग दो हजार पेड़ लगाने में भी कामयाब नहीं हो पाया है।


उत्तराखंड में सड़क निर्माण के लिए कितने पेड़ काटे जा रहे हैं इसका सबसे ताजा उदाहरण देहरादून- हरिद्वार फोर लेन सड़क निर्माण है। इस सड़क को फोर लेन करने में ९९७८ पेड़ काटे जाने हैं। वनों के काटे जाने का सिलसिला प्रदेश भर में चल रहा है। वन विभाग हर साल वृक्षारोपण के लिए बड़े- बड़े कार्यक्रम तो चलाता है लेकिन उसकी हकीकत समय- समय पर सामने आती रही है। उत्तराखण्ड में औद्योगीकरण के कारण भी पर्यावरण पर खासा असर हो रहा है। तराई के इलाकों काशीपुर, पंतनगर, रुद्रपुर आदि में हुए औद्योगीकरण का असर वहां की हवा में तो महसूस हो ही रहा है, वैज्ञानिकों ने इसके असर को वहां के भू-जल में भी प्रमाणित कर दिया है।


पर्यावरण प्रदूषण के असर से ग्लेशियर भी अछूते नहीं हैं। जिस गंगोत्री ग्लेशियर की लंबाई ३० किलोमीटर थी वह आज मात्र १८ किलोमीटर रह गई है। सर्वे ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक गंगोत्री ग्लेशियर २५,३०० वर्ग मीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से पिद्घल रहा है। प्रदूषण की चपेट से नदियां भी अछूती नहीं हैं।

 

 

बात अपनी अपनी

क्षेत्रपाल स्थित क्रशर का चलान १२ फरवरी को किया गया है। ५० घन मीटर डस्ट और ९० घन मीटर कंक्रीट का चलान एस कुंवर के नाम किया गया है। चमोली क्षेत्र में किसी को खनन का पट्टा नहीं दिया गया है। यदि यहां बीआरओ खनन और क्रशर लगाया होगा तो उन पर भी कार्यवाही की जाएगी।

अवधेश कुमार उपजिलाधिकारी चमोली

 

यहां हो रहा अंधाधुंध खनन

 

  • कर्णप्रयाग में पिंडर व अलकनंदा नदी के संगम पर
  • पिंडर नदी में सिमली के आस-पास  
  • थराली में पिंडर नदी के किनारे  
  • देवाल में पिंडर नदी के साथ बकरीगाड़ में भी
  • गैरसैंण में रामगंगा व आटागाड़ के तटों पर  
  • कर्णप्रयाग व चमोली के मध्य अलकनंदा के किनारे और गदेरों में
  • चमोली में अलकनंदा स्नान द्घाट पर  
  • क्षेत्रपाल में अलकनंदा के किनारे
  • बिरही में बिरही गंगा व अलकनंदा के संगम पर खनन
  • पीपलकोटी में टीएचडीसी कैम्पस व हाट रोड पर कम्पनी की आड़ में रातों-रात ठिकाने लगाया जा रहा है रेत व पत्थर
  • हेलंग में अलकनंदा के किनारे से रातों-रात पत्थरों को 
  • ठिकाने लगाया जा रहा है
  • हेलंग में पटेल इंजीनियरिंग कंपनी अलकनंदा के किनारे खनन कार्य कर रही है।
  • जोsशीमठ और विष्णुप्रयाग में जीपी कम्पनी मशीन नदी में डालकर खनन कर रही है।
  • तपोवन में वैराज व टनल निर्माण कम्पनी धौलीगंगा में खनन  कर रही है।
  • पांडुकेश्वर में नदी व गदेरों में। 

 

 

 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 70%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

  • कृष्ण कुमार

पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूड़ी ने भ्रष्टाचार को लेकर त्रिवेंद्र सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर यह कहते हुए प्रहार किया है कि सरकार उनके

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1917895
ckj