fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 37 05-03-2017
 
rktk [kcj  
 
देश-दुनिया 
 
कसाब के बाद अब अफजल

कसाब के बाद उसी की तर्ज पर संसद हमले के दोषी अफजल को ९ फरवरी की सुबह फांसी दे दी गई। इसके बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा सरेआम हो गई है कि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव में इसका लाभ लेगी


नौ फरवरी की एक आम ठंडी सुबह को एक सुनी हुई सी कहानी केवल मुख्य पात्र बदलकर टीवी चैनलों ने सुनानी शुरू की। इस बार भी फांसी हुई, वह देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले को दी गई और इसके अलावा एक बार फिर इतने खुफिया तरीके से अंजाम दी गई कि लुटियन टीले पर बसने वाले पत्रकारों को इस बात की भनक तक नहीं लगी।


दरअसल १३ दिसंबर २००१ को संसद पर हुए हमले के दोषी पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की त्वरित कार्यवाहियों के फलस्वरूप ९ फरवरी की सुबह इतिहास की गवाह बन गई। जब अफजल गुरू को फांसी दी गई। सूत्रों के अनुसार ३ फरवरी को ही राष्ट्रपति ने अफजल की फांसी को मंजूरी दे दी थी और इसके बाद बिना देर किए गृहमंत्री ने फाइल पर लाल हस्ताक्षर कर दिए। इस फांसी की जानकारी भी चुनिंदा लोगों को ही थी और सुबह आठ बजे अफजल को फांसी देकर तिहाड़ में ही दफना भी दिया गया। 


आतंकवाद के खिलाफ फांसी के दो बेमिसाल उदाहरण तीन महीनों के भीतर ही कांगे्रस सरकार ने देश के सामने पेश किए। इतनी सुरक्षा बरती गई कि अफजल के घर वालों तक को इस बात की सूचना देना और उनसे मानवीयता के आधार पर मौत के पहले मिलना मुनासिब नहीं समझा गया। सरकार ने यह जरूर किया कि फांसी देने के बाद से ही अलग संविधान और एएफएसपीए जैसे कानूनों के साथ जिंदगी जी रहे कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया। इंटरनेट और केबल टीवी भी बंद कर दिए गए। खबर लिखे जाने तक कर्फ्यू जारी था और अफजल के गृह जिले सोपोर में पुलिस के साथ झड़प में दो लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। जेकेएलएफ (जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट चीफ यासीन मलिक ने भी अफजल के शरीर की मांग करते हुए भूख हड़ताल शुरू कर दी है। इस दौरान हाफिज सईद उसके साथ मंच साझा करता नजर आया। लेकिन समझदारी का परिचय देते हुए यासीन ने पाकिस्तान से सरबजीत की फांसी मांग रहे लोगों की बात न सुनने की अपील की।


कांग्रेस से यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि क्या यह कोई इत्तफाक है कि कसाब को संसद के शीतकालीन सत्र और अजमल को बजट सत्र से पहले अचानक फांसी दे दी गई। सवाल तो लुटियन पर दिन-रात मंडराने वाले राजनीतिक/खोजी पत्रकारों से भी पूछा जा सकता है कि आजकल सरकार ही इतनी खुफिया हो गई है या आप ही भावनात्मक रूप से पुष्ट हो रहे हैं। 


बहरहाल अफजल की फांसी ऐसे कई सवाल अपने पीछे छोड़ गई है जिनके जवाब अब शायद ही मिलें। संसद पर हमले के पूरे केस पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि पांच लोगों ने संसद पर हमला किया था। अफजल ने अपने कबूलनामे में इन लोगों की पहचान मोहम्मद, राणा, राजा, हमजा और हैदर के रूप में की थी। आज भी अफजल के इकबालिया बयान के अलावा हमारे पास उनसे जुड़ी कोई जानकारी नहीं है। अफजल खुद जेकेएलएफ का मेंबर रह चुका था और कश्मीर एसटीएफ से भी अपने संबधों की बात उसने कबूली थी। पूरा मामला दो ही दिन में सुलझा लिया गया था और दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एसएआर गिलानी, शौकत और अफजल को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद शौकत की बीवी अफशां गुरू को भी गिरफ्तार कर लिया गया। गिलानी को पूरी द्घटना का मास्टरमाइंड बताया गया। फास्ट ट्रेक कोर्ट ने अफजल, शौकत और गिलानी को फांसी की सजा सुनाई। कुछ ही दिन बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफशां गुरू को आरोपों से बरी कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनकी रिहाई को बरकरार रखा। मगर सर्वोच्च अदालत ने अफजल को सजा-ए-मौत सुनाई।


फिलहाल कांग्रेस ने अफजल की फांसी से राजनीतिक बढ़त हासिल कर ली है और भाजपा के पास बजट सत्र में वाकआउट के सिवाय और कोई चारा नहीं बचा है। उम्मीद जताई जा रही है कि बजट सत्र के एकदम बाद कांग्रेस आम चुनाव की द्घोषणा कर सकती है। इन्हीं अंदेशों के चलते अफजल की फांसी को भी कांग्रेस की राजनीतिक चाल कहा जा रहा है। ९ फरवरी को जंतर-मंतर पर फांसी का विरोध कर रहे गौतम नवलखा और कुछ कश्मीरी लड़कियों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया उससे स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस की भावनात्मक चाल कारगर भी हो रही है। कांग्रेस इस बात को जानती है कि चुनाव में भावना अहम भूमिका निभाती है। कसाब के बाद अफजल को फांसी से राष्ट्रभक्तों के साथ-साथ हिन्द भावनाएं भी संतुष्ट हुई है। इसका चुनावी लाभ अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिलना तय है।

 

नाटो की वापसी


करीब पिछले ११ सालों से नाटो सेना अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के खिलाफ जंग लड़ रही थी, लेकिन अब उनकी वापसी का समय नजदीक आ गया है। १० फरवरी को पहले चरण के तहत सैन्य सामानों से लदे नाटो के २५ कंटेनर वापसी के लिए निकल लिए। इन कंटेनरों को कराची बंदरगाह ले जाया गया। नाटो के इस कदम से तो इस बात के संकेत मिलते हैं कि आने वाले दिनों में नाटो लौट जाएगी। लेकिन सुरक्षा और शांति को बनाए रखने के लिए कई अहम सवाल अब भी फिजा में तैर रहे हैं। यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या नाटो की वापसी के बाद वहां व्याप्त भ्रष्टाचार में कमी आ पाएगी।


अफगानिस्तान से २०१४ के बाद अमेरिकी अगुवाई वाली फौज के चले जाने के बाद वहां तालिबान के फिर लौटने की शंका जाहिर की जा रही है। इसके अलावा क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ क्या अफगानिस्तान तालमेल बना पाएगा, जैसे सवाल उठ रहे हैं। दरअसल ओबामा ने बीते महीने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई से बातचीत के बाद द्घोषणा की कि 'हमारे सैनिक जरूरत के समय अफगानी बलों के साथ मिलकर लड़ते रहेंगे, लेकिन मैं स्पष्ट तौर पर यह कहना चाहता हूं कि इस माह से हमारे सैनिक अफगानी बलों के प्रशिक्षक, सलाहकार और सहायक के रूप में एक अलग मिशन पर होंगे।


यह अफगानिस्तान की पूर्ण संप्रभुता की दिशा में ऐतिहासिक क्षण और एक अगला कदम होगा, उस संप्रभुता के बारे में जिसका राष्ट्रपति करजई पूरा ख्याल रखते हैं और अफगानिस्तान के लोग भी। दोनों नेताओं ने अपने बयान में पुष्टि कर दी है कि अमेरिका अफगानिस्तान में स्थायी सैन्य ठिकाने नहीं चाहता है। अगले साल यानी २०१४ के अंत तक जैसे ही हस्तांतरण प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, वैसे ही सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी अफगानिस्तान की हो जाएगी। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संद्घ ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि अफगानिस्तान में नाटो हमलों के कारण सैकड़ों बच्चे मारे गए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जंग में फंसा अफगानिस्तान अब रिश्वतखोरी की चपेट में है। युद्ध से जर्जर मुल्क भ्रष्टाचार के चादर में लिपट गया है और आधी आबादी को रिश्वत देकर अपना काम कराना पड़ रहा है। 


अमेरिकी नेतृत्व में हुए हमले के ११ साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इस बीच अफगानिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद भी मिली है। करोड़ों अरबों डॉलर देश की अर्थव्यवस्था में झोंके गए हैं। पश्चिमी देशों का कहना है कि अगले साल जब अमेरिका पूरी तरह से अफगानिस्तान से हट जाएगा, तब भी उसे बाहरी देशों की वित्तीय मदद की जरूरत पड़ती रहेगी। जिसके लिए अफगानिस्तान पूर्णतः तैयार नहीं हो पाया है। राष्ट्रपति हामिद करजई ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि विदेशियों की वजह से देश में भ्रष्टाचार फैला है। उनका कहना था कि नाटो सेना की वापसी के साथ भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है। राष्ट्रपति के इस बयान से तो यह लगता है कि नाटो के बाद देश आर्थिक विकास की पटरी पर लौटेगा। 


देश को विकास की पटरी पर लाने के लिए राष्ट्रपति हामिद करजई और पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से बीते दिनों मुलाकात भी की। इसमें अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए छह माह की समय सीमा तय की गई। त्रिपक्षीय बातचीत के दौरान सभी पक्ष इस पर तेजी से जरूरी कदम उठाने के लिए भी तैयार हो गए हैं। कैमरन ने जहां तालिबान से शांति प्रक्रिया में शामिल होने की अपील की, वहीं जरदारी ने कहा कि अफगानिस्तान में शांति के लिए तालिबान से हर प्रकार का समझौता पाकिस्तान करता है। करजई ने उम्मीद जताई कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते भविष्य में भाई जैसे बनेंगे। कैमरन ने अफगान शांति परिषद और तालिबान के बीच वार्ता के लिए कतर की राजधानी दोहा में एक कार्यालय खोलने की द्घोषणा की।


तीनों देशों ने २०१४ में अफगानिस्तान से नाटो सेना के निकल जाने के बाद तालिबानी द्घुसपैठ रोकने और शांति प्रक्रिया पर चर्चा की। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक जरदारी ने अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण और शांति स्थापना के लिए पूर्ण सहयोग पर जोर दिया। बताया गया कि इसके लिए दोनों देशों में वार्ता और सहयोग बढ़ा है। दोनों ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान उलेमाओं की मार्च में संयुक्त वार्ता कराने की बात भी कही। दोनों देशों में सैन्य और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी। फिलहाल अफगानिस्तान में ६० हजार अमेरिकी सैनिक हैं और अमेरिका ने इस साल हजारों सैनिकों की वापसी की योजना बनाई है। 

 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 57%
uk & 13%
 
 
fiNyk vad

 

  • दिनेश पंत
उत्तराखण्ड में मत्स्य पालन से स्वरोजगार और आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन नीति&नियोजकों ने कभी इसे गंभीरता
foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1532266
ckj