fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 18 21-10-2017
 
rktk [kcj  
 
प्रदेश 
 
लोकगायक या लोकनायक

क्या भूपेन दा की तरह उत्तराखण्ड का कोई 'भैजी' या दाज्यू अपने क्षेत्र की संस्कृति को राष्ट्रीय महत्व दिला पाएगा

 

उत्तराखण्ड के जाने-माने लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी किसी परिचय और सरकारी सम्मान के मोहताज नहीं हैं। पिछले चालीस वर्षों से वह अपने गीतों और कविताओं के माध्यम से पहाड़ की पीड़ा को स्वर दे रहे हैं। उनके गीतों में प्रकृति चित्रण के साथ ही पहाड़ के कठोर जीवन, इतिहास और सांस्कृतिक वैभव का बेहतर समावेश है। वे एक विद्रोही कवि और आंदोलनकारी के रूप में भी समाज के साथ खड़े रहे हैं। राज्य आंदोलन के दौर में उनके गीत जनता की जुबान पर छाए रहे। राज्य गठन के बाद भी जब सत्ताशीर्ष पर बैठे नेता जनविरोधी और मनमाने फैसले लेने लगे तो इस लोक कवि और चिंतक के दिलो-दिमाग में उठता विद्रोह उनके कंठ से फूट पड़ा। नौछमी नारैण और 'अब कथग्या खैलू' रचनाओं के जरिये उन्होंने सत्ता के जनविरोधी चारित्र पर तीखे प्रहार किये। पूरे उत्तराखण्ड में उनकी प्रशंसा हुई। इस दृष्टि से वे उचित सम्मान के हकदार हैं।

 


इस बीच दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में लोकगायक नेगी का सम्मान किया गया। इस अवसर पर उनकी ४० वर्षीय गीत यात्रा पर एक परिचर्चा का आयोजन हुआ। परिचर्चा में डॉ पुष्पेश पंत, डॉ शेखर पाठक, डॉ गोविंद सिंह और सीपीआई नेता समर भंडारी जैसे वक्ताओं ने समाज के लिए लोकगायक नेगी के योगदान की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। नेगी एक बड़े कलाकार हैं। स्वाभाविक है कि परिचर्चा उनके कूतित्व और व्यक्तित्व तक सिमटी नहीं रह सकती थी। लेकिन समर भंडारी को छोड़ दिया जाए तो परिचर्चा को विस्तार देने में वक्ताओं ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिन्हें संभवतः बहुत से लोग पचा नहीं पाए होंगे। देश की आजादी से पहले और बाद के उत्तराखण्डी कवियों और गायकों के योगदान का जिक्र करते हुए अपने लंबे संबोधन में डॉ शेखर पाठक ने गिरीश तिवारी गिर्दा पर अवश्य विशेष फोकस किया, लेकिन उन्होंने केशव अनुरागी, गोपाल बाबू गोस्वामी, चंद्र सिंह राही, बेणी माधव रतूड़ी, रतन सिंह जौनसारी, शेरदा अनपढ़, कबोतरी देवी और हीरा सिंह राणा जैसे लोक रचनाधर्मियों का नाम लेना तक उचित नहीं समझा। जबकि नरेन्द्र सिंह नेगी अक्सर केशव अनुरागी की प्रशंसा करते रहे हैं कि उन्हें नजीबाबाद रेडियो स्टेशन तक पहुंचाने वाले अनुरागी जी ही थे। देश के जाने-माने कवि मंगलेश डबराल ने भी उन पर कविता लिखी है।

 

समझ में नहीं आता है कि जब खुद नरेंद्र नेगी अपने से पूर्व के और अपने समकालीन रचनाधर्मियों को बराबर का सम्मान देते रहे हैं तो आयोजकों और वक्ताओं को इससे कष्ट क्यों होता है? कार्यक्रम में उपस्थित जिन लोकगायकों और कलाकारों की उपस्थिति से नेगी गद्गद् थे, मंच से उनका नाम लेने से आयोजक क्यों परहेज करते रहे? यह दुखद है कि कार्यक्रमों को ऐसा रंग दे दिया जाता है जैसे कि गायकों और कवियों के अपने-अपने खेमे हों। लगता है कि मुंह देखकर प्रशंसा करने का रिवाज उत्तराखण्ड समाज में कुछ ज्यादा ही हो चला है। डॉ पुष्पेश पंत और डॉ ़ गोविंद सिंह ने तो लोकगायक नेगी को लोकनायक की संज्ञा तक दे डाली। डॉ पंत की दृष्टि में गोपाल बाबू गोस्वामी पूरे उत्तराखण्ड को प्रतिबिंबित नहीं करते जबकि नेगी पूरे उत्तराखण्ड के लोकप्रिय गायक हैं। हकीकत यह है कि एक समय गोपाल बाबू गोस्वामी के गीत पूरे उत्तराखण्ड की जनता के मर्म को छूते थे। कैला बाजी मुरली हाय तेरू रूमाल 'छबीलो गढ़देश मेरू रंगीलो कुमाऊं' सरीखे उनके गीत आज भी गढ़वाल में सुने जाते हैं। गोस्वामी पर जिस व्यावसायिक दबाव की बात डॉ पंत करते हैं, वह दरअसल उनके समय में था ही नहीं। और अगर रहा भी होगा तो उन्होंने उत्तराखण्डी की सांस्कृतिक मर्यादाओं का सम्मान हमेशा बनाए रखा।


लोकगायक नेगी को लोकनायक बताने की किसी भी वक्ता की अभिव्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि स्वागत है। लेकिन सवाल यह है कि लोकनायक होने के भी मायने होते हैं। देश में जनता जयप्रकाश नारायण के बाद किसी और को 'लोकनायक' का सम्मान नहीं दे पाई। राज्य आंदोलन के दौर में स्वर्गीय इद्रमणि बडोनी को लोगों ने उत्तराखण्ड का गांधी अवश्य कहा, लेकिन लोकनायक नहीं। हां, नरेन्द्र सिंह नेगी में उत्तराखण्ड के कला और संस्कृति जगत का लोकनायक बनने की भरपूर संभावनाएं हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें अपने क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को उभारने और उत्तराखण्ड की संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए धरातल पर ठोस प्रयास करने होंगे। संस्कृति सिर्फ लोकगीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह काफी विस्तृत विषय है। उन्हें चाहने वाले समाज के साधन संपन्न लोग इस महत्वपूर्ण कार्य में अपना सहयोग दे सकते हैं। हमें संस्कृति के क्षेत्र में अपना लोकनायक देखने की ललक अवश्य होनी चाहिए। यह अच्छी बात है। लेकिन इससे पहले हमारे लिए यह प्रश्न विचारणीय होना चाहिए कि भूपेन हजारिका के रूप में पूर्वोत्तर हिमालय के असम राज्य की सांस्कृतिक पहचान राष्ट्रीय महत्व हासिल कर गई। वहां की धरती से 'भूपेन दा' के रूप में ब्रह्मपुत्र का बेटा पैदा हो गया। लेकिन मध्य हिमालय उत्तराखण्ड की धरती से आज तक कोई 'भैजी', 'दाज्यू' या गंगा का बेटा क्यों नहीं पैदा हो पाया

 

 

भगवान भरोसे स्वास्थ्य सेवाएं

 

उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के उद्देश्य से २००५ में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार ने एक पाइलट प्रोजेक्ट के तहत १७६५ स्वास्थ्य उपकेन्द्रों के सापेक्ष ५३९ उपकेन्द्रों में फार्मासिस्टों के पद सृजित कर बेरोजगार फार्मासिस्टों को रोजगार दिया था। सरकार के इस अनूठे कदम से न केवल पहाड़ी इलाकों में आम जनमानस को द्घर पर ही स्वास्थ्य सेवाएं मिल पायी थीं, बल्कि राष्ट्रीय कायक्रमों की सफलता दर में भी वृद्धि देखी गयी थी। उस समय उत्तराखण्ड पूरे देश में पहला राज्य था जिसने पहली बार उपकेन्द्रों पर फार्मासिस्टों की नियुक्ति की थी। सरकार के इस कदम से लोगों को काफी लाभ हुआ। परिणाम स्वरूप प्रदेश के अन्य इलाकों से भी लोगों ने शेष बचे १२२६ उपकेन्द्रों में फार्मासिस्टों की नियुक्ति की मांग समय-समय पर उठाईं लेकिन इसके विपरीत एकाएक शासन स्तर पर ५३९ उपकेन्द्रों के पद समाप्त करने की कार्यवाही से लोग बेहद सकते में हैं।


गौरतलब है कि शासन ने स्वास्थ्य उपकेन्द्रों में नियुक्त फार्मासिस्टों को पांच साल की नौकरी के बाद वर्षवार श्रेष्ठता के आधार पर अस्पतालों में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है। इसके एवज में उपकेन्द्र के पद को खाली होते ही समाप्त करने की कार्यवाही की जा रही है। जिसका सीधा-साधा अर्थ यह हुआ कि उपकेन्द्रों में सृजित ५३९ पद समाप्त होने की तैयारी पूरी हो चुकी है। इससे खासतौर पर पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमरा जाएंगी। लोगों को चिकित्सा सुविधाओं के लिये मीलों का सफर तय करना पड़ेगा। लोगों का कहना है कि वर्षों से ये फार्मासिस्ट ही हमारी छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज किया करते थे, लेकिन अब इनके जाने के बाद हम कहां इलाज कराएंगे हमें खुद नहीं मालूम। अगर हकीकत देखी जाय तो राज्य में डॉक्टरों की कमी राज्य बनने के १२ साल बाद भी जस की तस बनी हुई है। ऐसे में पहाड़ के असली डॉक्टर तो ये फार्मासिस्ट ही हैं जो सालों से पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं। ये ही स्वास्थ्य महकमे की बैसाखी बने हुए हैं। सरकार द्वारा लाख कोशिशों के बाद भी पहाड़ पर डॉक्टर चढ़ नहीं पाए। फलतः आज भी यही फार्मासिस्ट यहां के निवासियों के लिये किसी भगवान से कम नहीं हैं।

 

उपकेन्द्रों पर फार्मासिस्टों की नियुक्ति होने से पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं काफी मजबूत हो गयी थीं। बेरोजगार डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय चौहान ने उपकेन्द्रों पर सृजित ५३९ पदों को समाप्त किये जाने की कार्यवाही को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि यदि उपकेन्द्र के पद समाप्त होते हैं तो प्रदेश के बेरोजगार फार्मासिस्टों को रोजगार कहां मिलेगा। क्योंकि अस्पतालों में खाली पदों पर उपकेन्द्र से फार्मासिस्टों का वर्षवार के आधार पर चयन किया जायेगा ऐसे में १९९७ से डिप्लोमा प्राप्त बेरोजगारों के लिए रोजगार के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिये बंद हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि एक ओर जहां पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वर्ष २००२ तक के बैच के प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को वर्षवार श्रेष्ठता के आधार पर तत्काल रोजगार दिये जाने की वकालत की गयी है जिसके तहत अभी तक प्रदेश में ७४६ फार्मासिस्टों को दिसम्बर माह में नियुक्ति दी गयी है। वहीं उत्तराखण्ड में बेरोजगारों के लिए रोजगार के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं। क्या इसीलिए हमने पृथक राज्य की मांग की थी। प्रदेश में इस वक्त उत्तराखण्ड फार्मेसी काउंसिल में ७००० से अधिक बेरोजगार फार्मासिस्ट पंजीकृत हैं। इनमें से वर्ष १९९७ के बेरोजगारों को अभी तक रोजगार प्राप्त नहीं हुआ है।

 

 

फांसी से राष्ट्रीय गेम्स स्थगित

 

फजल को दी गई फांसी का असर उत्तराखण्ड में भी देखा जा सकता है। फांसी के बाद कर्फ्यू कश्मीर में लगा है लेकिन उससे यहां के कुछ लोग मायूस है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में राष्ट्रीय शीतकालीन जूनियर अल्पलाईन स्कीइंग प्रतियोगिता को स्थगित कर दिया गया है। इससे उत्तराखण्ड राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे जोशीमठ क्षेत्र के करीब १५ प्रतिभागी हैं। ये सभी खिलाड़ी अपनी पढ़ाई छोड़ पिछले दो माह से चुनौतीपूर्ण एवं कठिन परिस्थितियों में कोचिंग कर रहे थे।


गौरतलब है कि संसद हमलों के आरोपी अफजल गुरू को  ११ फरवरी दिल्ली के तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। एतियातन जम्मू कश्मीर राज्य में शंति व्यवस्था कायम करने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया। इस कारण के लिए गुलमर्ग में ११ फरवरी से आयोजित होने वाले राष्ट्रीय शीतकालीन जूनियर अल्पाईन स्कीइंग प्रतियोगिता सुरक्षा कारणों से टाल दिया गया। ऐसे में इस सीमांत विकास खण्ड जोशीमठ के इन युवा स्कीयर्सों के अरमानों पर पानी फिर गया है। इनमें से कई का पहली बार प्रदेश टीम में चयन हुआ था।

 

गौरतलब है कि बेहद जटिल तकनीकी खेलों के लिए पूरे दो माह से कड़ी तैयारियों के बाद इन नौनिहालों ने उत्तराखण्ड राज्य की टीम में जगह बनाई थी। अब आने वाले कुछ दिनों में इनकी गृह वार्षिक परीक्षाएं भी नजदीक हैं। गुलमर्ग में बर्फीले तेंदुए के जैसे कौशल से प्रदेश का परचम लहराने को तैयार इन युवा तुर्कों की प्रतिभा पर अचानक ब्रेक लगने से इनमें मायूसी है। 

 

विंटर गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष (सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर) एसएस पटवाल ने बताया है कि जम्मू कश्मीर के पर्यटन सहित आला अधिकारियों से वे संपर्क में हैं। हालात ठीक होने पर गेम्स अलग तिथि में हो सकते हैं। हालांकि गुलमर्ग के अलावा इन बर्फीले रोमांच से भरे अल्पाईन खेलों का आयोजन औली जोशीमठ में होने की संभावना थी लेकिन यहां २६ फरवरी से राष्ट्रीय सीनियर अल्पाईन स्कीइंग प्रतियोगिता होनी है। जिस कारण यहां जूनियर गेम्स का आयोजन नहीं हो सकता। हालांकि इसके लिए बैठकों का दौर जारी है। यदि ऐसा होता तो इन युवा प्रतियोगिताओं की मेहनत रंग लाएगी और राज्य के लिए इन युवा प्रतिभागियों विंटर स्पोर्ट्स क्लब ऑली के अध्यक्ष उत्तराखण्ड राज्य टीम के मैनेजर विजयंत रावत बताते हैं कि उत्तराखण्ड की टीम को गुलमर्ग सुरक्षा कारणों के चलते नहीं भेजा गया है। वैसे भी फिलहाल ये गेम्स गुलमर्ग में स्थगित है। आगे जहां भी ये होंगे टीम तैयार हैं। उन्होंने कहा कि ऑली में होने वाले राष्ट्रीय शीतकालीन खेलों के लिए १५ फरवरी को औली में ही उत्तराखण्ड राज्य की टीम का चयन हो जाएगा। और फिर चयनित स्कीयर्सों को औली में ही कोचिंग देकर तैयार किया जाएगा। 


उत्तराखण्ड जूनियर टीम में अनुज भुजवाण, अभिषेक भट्ट, आयुष भट्ट, आयुष पंवार, सौरव कंवाण, बिजेन्द्र रावत, रविन्द्र मरतोलिया, जयदीप भट्ट, संदीप भट्ट, संगीता भट्ट, अनीता भुजवाण, देवेन्द्र भुजवाण, महेन्द्र भुजवाण, रजनीश भुजवाण आदि को जगह मिली थी। ये सभी खिलाड़ी वासा, जीएमवीएन और उत्तराखण्ड की टीम से संयुक्त रूप में प्रतिभाग कर रहे थे। 


सूबे की टीम में दूसरी बार चयनित महेन्द्र भुजवाण ने बताया कि गुलमर्ग की ढलानों में सभी खिलाड़ी पहली बार अपना जौहर दिखाने को उत्सुक थे। अफजल की फांसी के बाद कश्मीर में तनाव बढ़ने की सम्भावना से इन खिलाड़ियों के अभिभावक चिंतित थे। लेकिन जब इन्हें खेल स्थगित होने की खबर मिली तो उन्होंने राहत की सांस ली।

 

 

 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 70%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

Bharat Rawat : दीनदयाल के पर्दे से चंद्र सिंह गढ़वाली नहीं ढके जा सकेंगे] मुख्यमंत्री जी! आज पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चंद्र सिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि है। १ अक्टूबर

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1879328
ckj