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न्यूज़-एक्सरे 
 
बेरोजगारों से छिनी आस की बैसाखी

 

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा बैसाखियों के सहारे चल रही अपनी सरकार को बचाने के लिए विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों को खुश रखने का हर नुस्खा आजमा रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि राज्य वित्तीय संकट और बेरोजगारी से जूझ रहा है, उन्हें अधिकारियों और मंत्रियों को लग्जरी वाहन सुविधाएं देने की सूझी है। सरकार ने इस संबंध में जो शासनादेश जारी किया है उसके मुताबिक अधिकारी अपने निजी वाहन और ड्राइवर रख सकेंगे। उन्हें लग्जरी वाहनों के क्रय, आउटसोर्सिंग, ईंधन, चालक का वेतन, बीमा जैसी सुविधाएं सरकार देगी। इससे जहां एक ओर सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा, वहीं राज्य के कई चालक बेरोजगार हो जाएंगे। निकट भविष्य में सरकारी विभागों में चालकों की भर्ती की आस लगाए बैठे बेरोजगारों को भी सरकार का यह एक बड़ा झटका है

 

 

देवभूमि उत्तराखण्ड में पलायन एक बड़ी समस्या बन चुका है। गांव के गांव खाली हो गए हैं। राज्य की वित्तीय स्थिति भी किसी से छिपी हुई नहीं है। ऐसे में बहुगुणा सरकार राज्य के विकास का पैसा मंत्रियों और अधिकारियों को लग्जरी गाड़ियों की सुविधाएं देने के नाम पर बर्बाद कर रही है। खास बात यह है कि यह लग्जरी सुविधाएं कई लोगों को बेरोजगार कर देंगी। दरअसल, बहुगुणा सरकार बैसाखियों पर टिकी हुई है। मुख्यमंत्री की चिंता राज्य की समस्याओं से कहीं अधिक अपनी कुर्सी बचाये रखने की है। यही वजह है कि विधायकों को अपने खेमे में करने और मंत्रियों-अधिकारियों को खुश रखने के लिए मुख्यमंत्री जन विरोधी फैसले लेते रहे हैं। विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों को खुश करने की यह नीति भ्रष्टाचार को खुला आमंत्रण दे रही है।


सरकार संभालते ही मुख्यमंत्री ने राज्य की पूर्व खण्डूड़ी सरकार के लोकपाल बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। भाजपा सरकार के कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों और नीतियों को मौजूदा सरकार ने दरकिनार कर दिया। जनता को यह नागवार भी गुजरा है। यहां तक कि बहुगुणा सरकार अपने तुगलकी आदेशों से भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण प्रदान कर रही है। वह सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून पर नियमावली का अंकुश लगाकर भ्रष्टाचार के दुश्मन इस महत्वपूर्ण कानून की धार कुन्द करने का भी प्रयास कर चुकी है। अब एक और शासनादेश से बहुगुणा सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक तरफ से देखा जाए तो सरकार के इस तुगलकी फरमान से जहां कर्ज से दबे नवोदित राज्य की आर्थिक स्थिति और बदतर होगी, वहीं पलायन की समस्या से त्रस्त सैकड़ों लोगों का रोजगार छिन जाएगा। सरकार ने अपने मंत्रियों और अधिकारियों को खुश रखने के लिए १७ जनवरी २०१३ को एक शासनादेश जारी किया है। इस शासनादेश संख्या-६५/पग.१/२०१३/२१५/२०११ के जरिये राज्य के मंत्रियों-अधिकारियों को वाहन उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख करते हुए वाहन की कीमत तथा मॉडल निर्धारित किये गये हैं। अब तक राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर अधिकारी वर्ग और मंत्रीगण-६-७ लाख रुपये की कीमत वाली अंबेसडर कार का उपयोग करते रहे हैं। लेकिन नए शासनादेश में उन्हें वाहन सुविधाएं देने के लिए ए,बी,सी,डी चार श्रेणियां बनाई गई हैं। हर श्रेणी के लिए वाहन के मूल्य व मॉडल अनुमन्य किये गये हैं। इसमें ए श्रेणी के लिए १५ लाख रुपये की कीमत वाले वाहन जैसे कि टोयोटा-इनोवा वी-एक्स मॉडल, स्कोड़ा, लौरा, होण्डा-सिटी, महिन्द्रा एक्सयूवी ५०० मॉडल अनुमन्य किया गया है। इस श्रेणी में कैबिनेट मंत्रीगण, मुख्य सचिव, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, अपर मुख्य सचिव, महानिदेशक पुलिस एवं समकक्ष अधिकारी शामिल हैं। बी श्रेणी में आने वाले अधिकारियों हेतु १२ लाख तक के वाहन मॉडल टोयोटा -इनोवा, होण्डा सिटी, मारुति-एक्स ४, स्विफ्ट डिजायर अनुमन्य की गई है। सी श्रेणी में आने वाले अधिकारियों के लिए ८ लाख तक का मारुति एस एक्स४, स्विफ्ट डिजायर, एरिटिगा टाटा इंडिगो, मान्जा मॉडल अनुमन्य किया गया है। डी श्रेणी में ६ लाख कीमत की टाटा इंडिगो, सी-एस, एम एम बुलेरो मॉडल अनुमन्य कर सरकारी खजाने को लुटाने वाला आदेश जारी किया गया है।

 

ए श्रेणी में आने वाले मंत्रियों-अधिकारियों के लिए लग्जरी वाहनों की अधिप्राप्ति और आउटसोर्सिंग शासन की ओर से की जाएगी। अन्य श्रेणियों के अधिकारियों को निजी वाहन खरीदकर सरकारी कार्यों में प्रयोग करने की सुविधा प्रदान की गई है। तर्क दिया गया है कि सरकार स्वयं वाहन क्रय कर संचालन कराएगी तो यह महंगा विकल्प होगा। इसलिए अधिकारियों को निजी वाहन शासकीय कार्य के लिए प्रयोग करने का विकल्प दिया गया है। वाहन के प्रयोग में लाने पर होने वाले व्यय की प्रतिपूर्ति सरकार करेगी। प्रावधान किया गया है कि अगर सचिव स्तर के अधिकारी अपने निजी वाहन का सरकारी कार्य में प्रयोग करेंगे तो उनको प्रतिमाह ५००० रुपये वाहन मूल्य ह्वास, ७००० रुपये चालक के मानदेय, १२० लीटर पेट्रोल के लिए ८४०० रुपये, वाहन बीमा मूल्य के लिए १५००, वाहन रख रखाव के लिए १००० रुपये यानी कुल २३००० रुपये प्रतिमाह दिए जाएंगे। इस तरह उन्हें सालाना २७६००० रुपये का भुगतान किया जाएगा। यह व्यवस्था ऐसे समय में लागू की गई है जब राज्य वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। गौर करने वाली बात है कि राज्य में पहले से ही अंबेसडर और अन्य वाहन काफी संख्या में मौजूद हैं। लेकिन इनोवा और स्विफ्ट डिजायर में अधिकारियों को द्घुमाने का मन बना चुकी बहुगुणा सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अधिकारियों को निजी वाहन उपलब्ध कराकर सरकार इन वाहनों के चालकों को बेरोजगार करने का मन बना चुकी है।


मंत्रियों-अधिकारियों के आगे घुटने टेक चुकी बहुगुणा सरकार ने नौकरशाहों को निजी वाहन उपयोग करने की छूट देकर सरकारी वाहन चालकों को बेरोजगार करने का रास्ता भी बखूबी ढूंढ निकाला है। सबसे पहले तो वाहन चालकों की भर्ती पर रोक लगाई गई है। इसके पश्चात बेकार होने वाले चालकों को वीआरएस दिए जाने का भी फरमान जारी किया गया है। छह पृष्ठीय सरकारी आदेश को मात्र नौकरशाही को खुश कर सरकारी खजाने पर चोट के रूप में ही देखा जा रहा है। वर्तमान में मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव, डीजीपी तक सभी अंबेसडर का ही प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन नया शासनादेश आते ही अब सरकारी महानुभव १५ लाख की ऊंचे मॉडल वाली गाड़ियों में द्घूमते नजर आएंगे। वाहन चालकों के काफी बड़ी संख्या में कार्यहीन होने के चलते बेरोजगारों की एक लंबी-चौड़ी फौज उत्तराखण्ड में खड़ी नजर आएगी। अधिकारियों- मंत्रियों के साथ-साथ बहुगुणा सरकार ने दायित्वधारियों के लिए भी वाहन की अनुमन्यता तय करते हुए उनके लिए अंबेसडर वाहन की व्यवस्था का आदेश जारी किया है। 


उड़नखटोले पर बैठकर देहरादून से दिल्ली की सैकड़ों दौड़ लगा चुके उत्तराखण्ड के मुखिया विजय बहुगुणा राज्य में लोकप्रिय सरकार देने में नाकाम साबित हुए। एक ओर राज्य की आम जनता रोज-रोज की हड़ताल से परेशान है तो वहीं सरकार के मुखिया सरकार गठन से लेकर अब तक के ११ माह के कार्यकाल में सरकार बचाने की जद्दोजहद में ही उलझे रहे। राज्य की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने में वह नाकामयाब साबित हो रहे हैं। रही सही कसर सरकारी खजाने पर बोझ डालकर नौकरशाहों को लग्जरी वाहनों में घुमाने वाले सरकारी आदेश ने पूरी कर दी है। यहां सवाल उठता है कि जब राज्य संपत्ति विभाग सहित जनपदों में सरकारी वाहन अच्छी खासी तादाद में उपलब्ध हैं तो इसके बावजूद लग्जरी वाहनों की आवश्यकता क्यों? आखिर क्यों बहुगुणा सरकार वाहन चालकों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देने पर आमादा है? क्या इससे राज्य में बेरोजगारी में इजाफा नहीं होगा? खैर बहुगुणा सरकार की नौकरशाही को लग्जरी वाहनों की सैर कराने की मंशा क्या है यह तो सरकार ही बेहतर जाने, परंतु परिवहन विभाग के सचिव उमाकांत पंवार की ओर से जारी शासनादेश को लागू करने में बहुगुणा सरकार की जल्दबाजी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कैबिनेट से पास कराकर महज तीन दिन में ही यह शासनादेश जारी हो गया। सरकार भले ही तर्क दे रही हो कि वाहनों की नई व्यवस्था के चलते उसे नए वाहन नहीं खरीदने पड़ेंगे, वाहन चालकों का वेतन भी नहीं देना पड़ेगा। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इससे जहां बेरोजगारी बढ़ेगी वहीं एक भारी-भरकम रकम इन निजी वाहन स्वामियों को प्रतिवर्ष दी जाएगी। इससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा। इस व्यवस्था से और किसी को लाभ हो या न हो, निजी वाहन खरीदकर मालिक बनने का अधिकारियों का सपना जरूर पूरा होगा। एक और खासबात यह है कि नई वाहन व्यवस्था में ड्राइवर का मानदेय मात्र ७००० रुपये प्रतिमाह रखा गया है। इतने कम पैसे में कहां ड्राइवर मिलेगा? जाहिर है कि इससे भ्रष्टाचार का भी बढ़ना तय है।


वरिष्ठ पत्रकार भगीरथ शर्मा कहते हैं कि सरकार तर्क दे रही है उसकी नई वाहन व्यवस्था से अनुत्पादक व्यय पर रोक लगेगी। लेकिन यहां देखना होगा कि बहुत बड़ी संख्या में बेरोजगारी बढ़ेगी। सरकारी धन से अधिकारी वाहन मालिक बनेंगे। इससे बेहतर होता कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर ध्यान दिया जाता। इससे स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हो सकते थे।

 

 
         
 
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