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vad 41 02-04-2017
 
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आवरण कथा
 
कि तुम कब आओगे

उत्तराखण्ड में बच्चे निरंतर लापता हो रहे हैं। वर्ष २००५ से लेकर अब तक राज्य में चार हजार से अधिक बच्चे लापता हुए हैं। बड़ी संख्या में लापता बच्चों के शव भी मिले हैं। बच्चों के बाद बालिग लड़कियों और महिलाओं की गुमशुदगी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले अंक में बच्चों की गुमशुदगी को लेकर प्रस्तुत दि संडे पोस्ट की विशेष रिपोर्ट में गढ़वाल मंडल की तस्वीर पेश की गई थी। रिपोर्ट की यह कड़ी बता रही है कि कुमाऊं मंडल की स्थिति भी बेहद भयावह है

 

बच्चे घर से निकले और नहीं लौटे। उनके निकलने और नहीं लौटने के बीच वक्त का एक बड़ा फासला गुजर गया। बच्चों का इस तरह गुम होना उनके अभिभावकों के दिल पर एक ऐसा जख्म दे गया है जो समय के साथ भरने की बजाय लगातार गहरा होता गया है। बच्चों की गुमशुदगी ने मायूसी संग आशंकाओं को भी जन्म दिया है। मायूसी आशंकाओं अनिश्चय और व्यवस्था की इस बाबत उदासीनता से मिलकर जो रसायन तैयार हुआ है उसने जो दर्द दिया है वह शब्दातीत है। बच्चों के शव मिले बच्चियों को गलत धंधों में उतारा गया, कुछेक को विदेश भेजा गया। इन सबके बीच अपने गुम हुए बच्चों के सकुशल लौटने के इंतजार की टीस क्या होती है इसकी कल्पना तक सहज नहीं।

बागेश्वर 


कुमाऊं मंडल के बागेश्वर जनपद में वर्ष २००४ से अगस्त २०१२ तक गुमशुदगी के २३८ मामले पंजीकृत किये गये। इनमें बच्चों और महिलाओं की संख्या काफी अधिक है। ३६ बालक २६ बालिकाएं और १०० महिलाएं यहां से लापता हुईं। पुरुषों की संख्या ७६ है। बैजनाथ थाने में दर्ज मामलों में ईश्वरी दत्त, पायल देवी, कलावती देवी किशोरी लाल तुलसी देवी का पता नहीं चल पाया है। ऐसे ही थाना कपकोट में भी प्रताप पुरी गोस्वामी हरीश सिंह दानू और बीना जोशी को ढूंढ़ने में पुलिस अभी तक नाकाम रही है। बागेश्वर कोतवाली थाना क्षेत्र में १३४ मामले दर्ज किये गये जिनमें १२१ में बरामदगी हो चुकी है या कई लोगों की मृत्यु होने की जानकारी पुलिस को मिल चुकी है। लेकिन रेवती देवी हंसी देवी बसंती देवी गांवली देवी, कु पार्वती दफौटी गोपुली देवी पार्वती देवी, का आज तक कोई पता नहीं चला पाया। थाना बैजनाथ के अंतर्गत दुर्गा दत्त पंत, कु मेद्घा दूबे, किशन राम, योगेश तिवारी को पुलिस ढूंढ़ नहीं पाई। गुमशुदा लोगों का अगर पता चला है तो उनकी मौत के बाद। थाना कपकोट में दर्ज ऐसे मामलों में हरूली देवी और सीमा की बरामदगी उनके मरने के बाद ही हो पाई।

पिथौरागढ़ 


सीमांत जिले में हालात अपेक्षाकृत संतोषजनक हैं। जिले के सभी थाना क्षेत्रों में कोतवाली पिथौरागढ़, अस्कोट, धारचूला थल, बलुवाकोट, कनालीछीना, जौलजीवी, डीडीहाट, बेरीनाग, मुनस्यारी, झूलाद्घाट और पांगला में पिछले सात वर्षों के दौरान गुमशुदगी के कुल १३३ मामले दर्ज किये गये। इनमें से १२१ मामलों में गुमशुदा लोगों की बरामदगी हो चुकी है।

 

कोतवाली पिथौरागढ़ में गुमशुदगी के दर्ज ७१ मामलों में से ६२ की बरामदगी हो चुकी है। शेष ९ मामले अभी भी लंबित हैं। इनमें २०११ में गायब हुए हरीश सिंह, बोहरा, २०१२ लापता गौरव चन्द्र पाण्डेय, मन्नू सार्की मुकेश सिंह और पवन कुमार कोहली कु  किरन जोशी राकेश पाण्डेय और संतोष का सुराग लगाने में पुलिस नाकाम रही है। धारचूला थाने में कु  गौरी कुंवर छिपक कैड़ा का मामला लंबित है। झूलाद्घाट थाने में भी कु अनीता की गुमशुदगी का मामला अभी लंबित है। गौर करने वाली बात यह है कि पिथौरागढ़ जिले में लंबित १२ मामलों में ३ बालिकाओं के हैं।

 

अल्मोड़ा 


जिले में पिछले सात वर्षों में दर्ज गुमशुदगी के मामलों में सूचना के अधिकार कानून के तहत पुलिस अधीक्षक कार्यालय से पूर्ण जानकारी नहीं मिल पाई है। विभाग ने वर्षवार गायब हुए लोगों के आंकड़े उपलब्ध करवाये हैं। बरामदगी के भी केवल आंकड़े दे दिये। इससे यह पता नहीं चल पा रहा है कि बरामद किये गये और लंबित मामलों में कौन नाबालिग हैं और कौन बालिग। इसके अलावा उन सभी का नाम भी सूचना में ज्ञात नहीं हो पा रहा है। जिला पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार सभी आठ थाना क्षेत्रों में वर्ष २००५ से अगस्त २०१२ तक कुल बालिग/नाबालिग बालक-बालिकाओं की गुमशुदगी के कुल ३८५ मामले पंजीकृत किये गये हैं। इनमें से ३५७ मामलों में बरामदगी कर ली गई है। शेष २८ मामले जिनका कोई नाम और पता नहीं दिया गया है, लंबित चल रहे हैं।

 

जिले के सभी थानों के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक १९३ मामले कोतवाली अल्मोड़ा में दर्ज किये गये। जिनमें १८९ मामलों में बरामदगी कर ली गई है। शेष १४ अभी भी लंबित है। इसी प्रकार कोतवाली रानीखेत में ८१ मामले दर्ज किये गये जिनमें ८ मामलों में बरामदगी हो चुकी है। द्वाराहाट थाने में भी ४७ मामले पंजीकृत हुये और ४३ में बरामदगी हो चुकी है। थाना भतरौजखान में दर्ज ९ मामलों में से ८ तथा थाना लमगड़ा में दर्ज सभी १२ मामलों बरामदगी हो चुकी है। इसी तरह थाना सोमेश्वर में १९ मामलों में से १८ में बरामदगी हो चुकी है। थाना सल्ट ७ में सभी ७ मामलों में बरामदगी कर ली गई है। महिला थाना अल्मोड़ा में दर्ज १७ मामलों में से केवल १ मामला ही लंबित है। अल्मोड़ा जिले में गुमशुदगी के २७ मामले ऐसे हैं जिनका सुराग लगाने में पुलिस अभी तक नाकाम रही है।

चंपावत 


चंपावत भले ही कुमाऊं में सबसे छोटा जिला हो, पर पिछले सात वर्षों के दौरान यहां दर्ज गुमशुदगी के २५० मामले झकझोर देने वाले हैं। २९ मामले अभी भी पुलिस फाइलों में लंबित हैं। इनमें भी ६ नाबालिग बच्चों और ५ महिलाओं से जुड़े हैं। टनकपुर थाना क्षेत्र से गायब कई बच्चों के परिजन उनकी द्घर वापसी की आस लगाए हुए हैं। इनमें २००६ में गायब त्रिलोक सिंह प्रकाश चंद वंदना झा २०१० में गायब पुष्पा, २०१२ में गायब प्रियंका का मामला अभी तक लंबित ही चल रहा है। इन मामलों में टनकपुर थाना पुलिस कोई जानकारी तक नहीं जुटा पाई है। इसके अलावा २००८ में गायब ५ वर्षीय भावनीदत्त की जिंदा बरामदगी में भी पुलिस असफल रही। 

 

कोतवाली चंपावत में दर्ज ६२ मामलों में से ६ अभी भी लंबित ही पड़े हुए हैं। इनमें भी नाबालिग बच्चे और महिलाओं से जुड़े मामले हैं। २००९ में गुमशुदा नाबालिग नवीन सिंह, अगस्त २०१२ को गायब ममता का कोई सुराग नहीं लग पाया है। इसी प्रकार २००९ में गायब १९ वर्षीय उमादेवी और २०११ में गायब १८ साल की मुन्नी को भी पुलिस ढूंढ़ नहीं पाई है। बनबसा थाने में भी ४५ मामले दर्ज हुए जिनमें से २ का पुलिस कोई सुराग नहीं लगा पाई है। एक नाबालिग बच्चे का शव बरामद किया गया है। यह मामला ३० मार्च २०१० में लापता सूरज प्रकाश का है। 

 

पंचेश्वर थाने में १३ मामलों में से केवल एक मामला लंबित है। थाना तामली के अंतर्गत दर्ज ७ मामलों में से एक मामले में २३ वर्षीय पार्वती देवी का बाद में शव ही मिल पाया। वह २ मई २०१२ को गायब हुई थी। पंचेश्वर कोतवाली में भी १३ मामले दर्ज किये गये जिसमें से केवल एक लंबित है। रीठा साहिब थाने में केवल एक ही मामला दर्ज हुआ जिसमें गायब व्यक्ति का शव बरामद किया गया।

ऊधमसिंहनगर 


ऊधमसिंहनगर जिले के हाल सबसे ज्यादा खराब हैं। यहां हत्या अपहरण के मामले आम हो चुके हैं। नाबालिग बच्चों के अपहरण का मामला संभवतः उत्तराखण्ड में ऊधमसिंहनगर जिले में ही आया है। जिसमें अपहर्ताओं को फिरौती देकर बच्चे को छुड़ाया गया। यह मामला खटीमा थाने की पुलिस की फाइल में दर्ज है। बरामदगी पर लिखा है कि फिरौती देकर बच्चे को बरामद किया गया। वर्ष २००५ से लेकर अगस्त २०१२ तक जिले के विभिन्न थानों में गुमशुदगी के कुल १०७० मामले दर्ज हुए। इनमें से ८६८ मामलों को ही पुलिस सुलझा पाई। २०२ मामले अभी भी लंबित हैं।

 

काशीपुर कोतवाली में पिछले सात वर्ष में गुमशुदगी के सबसे अधिक २६१ मामले दर्ज किए गए। इनमें से ९ मामलों को सुलझाने में काशीपुर कोतवाली पुलिस नाकाम रही है। गंभीर बात यह है कि इनमें ८ मामले नाबालिग बच्चों के हैं। बच्चों के लापता होने के १०५ मामले कोतवाली में दर्ज हुए। जिनमें ९७ मामलों में गयाब बच्चों को या तो बरामद किया जा चुका है या वे अपने परिजनों के पास सुरक्षित पहुंच गये हैं। लेकिन बाकी ८ बच्चों के परिजन उनकी राह देख रहे हैं।  रुद्रपुर कोतवाली में दर्ज २५६ मामलों में से १७७ सुलझ चुके हैं। ७७ मामलों में कोई सुराग नहीं लगा है। ४४ मामले नाबालिग बच्चों के हैं इनमें १५ बालिकाएं हैं। इसके अलावा १७ मामले बालिग बालिकाओं और महिलाओं से जुड़े हैं जिनको ढूंढ़ पाने में रुद्रपुर कोतवाली नाकाम रही है।

 

कोतवाली खटीमा में १९९ मामले दर्ज हुए। जिनमें से २२ मामले अभी लंबित हैं। इसी कोतवाली क्षेत्र में बच्चों के अपहरण का मामला भी दर्ज किया गया था जिसमें खुद पुलिस सूचना के अधिकार के तहत दी गई जानकारी में खुलासा किया है कि बच्चे को फिरौती देकर मुक्त करवाया गया है। यह मामला वर्ष २००९ का है जिसमें छह साल के मोहम्मद कैफ पुत्र हाजी मोहम्मद वार्ड नंबर ३ खटीमा का अपहरण किया गया और २२ सितंबर २००९ को उसे फिरौती देकर बरामद किया गया। इसके अलावा रोहित सिंह गौरव राम रोहित सिंह राणा और सुमित सिंह राणा जैसे बच्चों का कोई सुराग नहीं लग पाया है। २००७ में लापता १२ वर्षीय सुनील का भी अभी तक पता नहीं चल पाया है। २००६ में गायब हुए ३ वर्षीय रोहित, २००७ में लापता नाबालिग सुमित राणा और २०१० में लापता को दिनेश चंद्र जिंदा ढूंढ़ पाने में पुलिस असफल रही।

 

बाजपुर कोतवाली में भी ७० मामले दर्ज किए गए। जिनमें ६ में कोई सुराग नहीं लगा पाया है। एक मामले में लापता बच्चे का शव नहर में बरामद किया गया है। लापता नाबालिग बालकों और बालिकाओं में धूम सिंह और मिश्रीलाल का कोई भी सुराग नहीं मिला है।

 

कोतवाली किच्छा में दर्ज १७ मामलों में से ५ अभी भी लंबित हैं। इनमें २००९ में नाबालिग बालिका मुनिया, २०१० में सुखाजी यादव, दीपक, संदीप, और मई २०१२ में गायब हाजरा, शिवम, का भी कोई सुराग नहीं लग पाया है। थाना गदरपुर में ६१ में से १६ मामले अभी भी पुलिस फाइलों में ही कैद हैं। ६९ में से १६ मामले नाबालिग बच्चों के आये हैं जिनमें एक लंबित है। थाना कुण्डा में भी २०१० का केवल एक ही मामला लंबित है। थाना पंतनगर में वर्ष २००७ से लेकर अगस्त २०१२ तक कुल २१ मामले दर्ज हुये। जिनमें सभी सुलझा लिये गये। दिनेशपुर थाने में कुल २१ मामलों में सभी की बरामदगी हो चुकी है। नानकमत्ता थाना क्षेत्र से लापता सभी १५ लोगों को बरामद कर लिया गया है। 

 

कोतवाली जसपुर में २००५ से अब तक कुल ३८ मामले दर्ज किये गए। जिनमें ५ अभी लंबित हैं जो कि वर्ष २०१२ के हैं। यह सभी नाबालिग बच्चों के मामले हैं। इनमें महेश सिंह मोहम्मद फैसल अर्चना शाने आलम और हेमवती शामिल हैं।

 

सितारगंज कोतवाली में दर्ज ९८ मामलों में से १२ अभी भी लंबित हैं। इनमें अधिकतर नाबालिग बच्चों के हैं। इन २००७ में लापता ३ वर्षीय रजनी को पुलिस नहीं खोज पाई है। और उसने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी है। २००७ में ही लापता लाल मोहम्मद, २०११ में गोरिया, २०१२ में सुनीता, लक्ष्मी, सिदरा मलिक, फूलबानो आदि बच्चों का कोई सुराग लगाने में सितारगंज कोतवाली पुलिस नाकाम रही है। ऐसे ही बालिगों के मामले में भी हुआ है। २०११ में गायब हुई प्रियंका विश्वास, २०१२ में गुमशुदा कमलेश, सोनम का पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई है।

 

शेष भाग आगे है...

 
         
 
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