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खेल-सिनेमा
 
खिलाडियों का सिने प्रेम

क्रिकेट के मैदान से लेकर टेनिस कोर्टमें खिलाड़ियों के हाव-भाव और अदाएं खेल प्रेमियों को लुभाती हैं। जब यही खिलाड़ी मैदान या कोर्ट छोड़कर सिनेमा की तरफ खिंचे चले आते हैं तो उनसे मनोरंजन की उम्मीदें और बढ़ जाती हैं। इसी उम्मीद को आने वाले दिनों में एक आइटम सांग के जरिए शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गट्टा जगाने वाली हैं। 

 

दरअसल राष्ट्र मंडल खेलों की स्वर्ण पदकधारी ज्वाला गट्टा तेलगु फिल्म 'गुंडे जारी गालानथायिंडे' (जीजेजी) के एक गाने में नृत्य करती दिखाई देंगी। ज्वाला इन दिनों फिल्म के इस गाने की शूटिंग कर रही हैं। ज्वाला गट्टा के अलावा स्पिनर हरभजन सिंह भी दो फिल्मों में अभिनय करने के लिए अपनी मंजूरी दे चुके हैं। 

 

उधर ओलंपिक कांस्य पदक विजेता बॉक्सर विजेंद्र सिंह भी जल्द ही सिल्वर स्क्रीन पर हीरो के रूप में नजर आएंगे। विजेन्द्र निर्देशक आनंद की फिल्म 'पटियाला एक्प्रेस' से डेब्यू करने जा रहे हैं। यह फिल्म आतंकवाद के मुद्दे पर आधारित है। भारतीय टेनिस प्लेयर के रूप में ख्याति पाने वाले लिएंडर पेस ने भी पिछले दिनों राजधानी एक्सप्रेस फिल्म में अपना भाग्य आजमाया। लिएंडर पेस बताते हैं कि अभिनय उनका जुनून है। वर्ष १९९६ में अटलांटा से ओलंपिक मेडल जीतकर जब वह लौटे थे, उसी वक्त उन्हें फिल्म का ऑफर आ गया था। फिल्मों को वह अपने लंबे कॅरियर ऑप्शन की तरह ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी तीन फिल्में और आनी बाकी हैं। आने वाली दो फिल्मों में उनका किरदार अंडर कवर स्पाई जैसा है तो तीसरी में वह रोमांटिक भूमिका में नजर आएंगे। 

 

मशहूर टेनिस स्टार महेश भूपति ने पूर्व मिस यूनिवर्स और अभिनेत्री लारा दत्ता से परिणय सूत्र में बंधने के बाद पेस की तरह बॉलीवुड में भाग्य आजमाने का फैसला किया है। भूपति ने फिल्म प्रोड्यूसर के तौर पर बॉलीवुड में प्रवेश करके अपनी एक और नई पारी की शुरुआत की है। भूपति की यह फिल्म इरोज इंटरनेशनल और अन्य प्रोडक्शन कंपनियों के सहयोग से मिलकर तैयार की गयी थी। इस फिल्म का नाम चलो दिल्ली था। इसमें भूपति की पत्नी लारा दत्ता और अभिनेता विनय पाठक मुख्य भूमिका निभाई। 

 

ओलंपिक क्वालीफायर में शानदार प्रदर्शन करने वाले हॉकी स्टार संदीप सिंह अब रूपहले पर्दे पर अभिनय का जलवा दिखायेंगे। उन्होंने बालीवुड के मशहूर सिनेमेटोग्राफर मनमोहन सिंह की पंजाबी फिल्म में अतिथि भूमिका निभाई है। 

खिलाड़ियों के सिनेमा प्रेम के अतीत को देखा जाए तो सबसे पहले पहलवान दारा सिंह और क्रिकेटर सलीम दुर्रानी का नाम आता है। इसके बाद कपिल देव सुनील गावस्कर अजय जडेजा संदीप पाटिल सैयद किरमानी आदि खिलाड़ी सिनेमा में अपना जौहर दिखा चुके हैं। लेकिन यह साफ है कि अभिनय हर किसी के बस की बात नहीं है। विज्ञापनों की बात और है, वहां बात कुछ सेकंड की होती है लेकिन फिल्म तो लगभग दो-ढाई द्घंटे की बात है और उसमें कोई भी खिलाड़ी इतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंच सका है। दारा सिंह को छोड़कर कोई खिलाड़ी सिनेमा की दुनिया में सफल नहीं हुआ। 

 


 

 

विवादों का दौर

विवादों में रहकर सबकी जुबान पर छा जाना फिल्मी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला पब्लिसिटी स्टंट है। लेकिन ये विवाद जब किसी व्यक्ति विशेष से हटकर पूरी फिल्म के लिए होने लगें तो कभी-कभी इसका असर फिल्म के व्यापार को भी प्रभावित करता है। ताजा मामला साउथ और हिन्दी सिनेमा के सुपरस्टार कमल हासन का है। इनकी फिल्म विश्वरूपम में दिखाए गए कुछ दृश्यों को लेकर मुस्लिम संगठनों ने ऐतराज जाहिर किया। तमिलनाडु सरकार ने वहां इस फिल्म की रिलीज पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। इस प्रतिबंध ने मीडिया में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' और 'सेंसर बोर्ड के अस्तित्व' को लेकर बहस गर्म कर दी। 

 

इन्हीं बहसों ने 'विश्वरूपम' को बेइंतहा पब्लिसिटी दी है। बावजूद इसके ऐसा माना जा रहा है कि इस विवाद ने फिल्म की कमाई को प्रभावित किया है। ९५ करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म की पायरेटेड सीडी पहले बाजार में आ चुकी है जिससे इसकी कमाई पहले की अपेक्षा कम होगी। वर्तमान में फिल्म तमिलनाडु छोड़ बाकी सभी जगह रिलीज हो चुकी है और फिल्म समीक्षकों ने इसे सामान्य फिल्म कहा है। इस कमल हासन, कबीर बेदी और राहुल बोस ने अपने अभिनय से बेहतरीन बनाया है। 

 

हालांकि बॉलीवुड में कई फिल्मों पर पहले भी विवाद होता रहा है। कई विवाद तो इतने बड़े हुए कि फिल्मों को चलने ही नहीं दिया गया। ऐसी ही एक फिल्म थी किस्सा कुर्सी का। १९७७ में अमृता नहाटा के निर्देशन में बनी इस फिल्म को न सिर्फ रिलीज होने से रोका गया बल्कि तत्कालीन सरकार ने इसके सारे प्र्रिंट भी जब्त कर लिए। दीपा मेहता की फिल्मों का विरोध भी कई अतिवादी संगठनों ने पुरजोर तरीके से किया। वर्ष १९३० के भारत में विधवा महिलाओं की स्थिति पर बनी फिल्म वाटर को तो शूटिंग के पहले दिन से ही विरोध झेलना पड़ा। करीब २००० लोगों ने इस फिल्म का विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना था कि फिल्म में हिन्दू धर्म को गलत तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है। इसके बाद 'वाटर' की शूटिंग मेहता को श्रीलंका में करनी पड़ी। इससे पहले दीपा मेहता की 'फायर' का भी व्यापक विरोध हुआ था। 'फायर' हिन्दी सिनेमा की पहली फिल्म थी जिसने लेस्बियन रिलेशस को पर्दे पर उतारा गया था। नंदिता दास और शबाना आजमी अभिनीत इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने 'ए' सर्टिफिकेट के साथ और दोनों अभिनेत्रियों ने नाम बदलने की शर्त के साथ रिलीज करने की इजाजत दी थी। लेकिन रिलीज के बाद राजनीतिक दलों ने थियेटर को आग लगाने की हद तक इसका विरोध किया। इससे फिल्म चर्चित हुई लेकिन कमाई नहीं कर सकी। 

 

गुलजार के निर्देशन में बनी 'आंधी' भी ऐसी ही फिल्म है जिसे विरोध की आग का सामना २३ सप्ताह तक करना पड़ा। विरोधियों का कहना था कि फिल्म में सुचित्रा सेन का पात्र इंदिरा गांधी जैसा बनाया गया है। इसके बाद कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोगों ने इसका विरोध किया। २३वें सप्ताह में इस फिल्म को बैन कर दिया गया। वर्ष २००५ में शाइनी आहूजा अभिनीत 'सिन्स' को भी कई प्रदेशों में रिलीज नहीं होने दिया गया। इस फिल्म में एक पादरी के नायिका के साथ शारीरिक संबंधों को दिखाया गया था। संबंधित धर्म से जुड़े संगठनों ने इसका विरोध किया। जिसका परिणाम हुआ कि फिल्म कई जगहों पर रिलीज नहीं की जा सकी। ८० के दशक में हॉलीवुड फिल्म 'लिपिस्टिक' का रीमेक 'इंसाफ का तराजू' बनाई गई। इस फिल्म में दो रेप दृश्य फिल्माए गए। जिस कारण इसका विरोध बहुत व्यापक तौर पर हुआ। हालांकि फिल्म को इसका फायदा हुआ और इसने बॉक्स ऑफिस पर बहुत कमाई की। 

 

कुछ वर्षों पहले आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा अकबर आई। इस फिल्म का भी जमकर विरोध हुआ। कहा गया कि आशुतोष ने इतिहास के तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है। विरोध के कारण फिल्म राजस्थान और मध्य प्रदेश पर रिलीज नहीं हुई। लेकिन इसके बाद भी बॉक्स ऑफिस में यह सफल फिल्म साबित हुई। इसके अलावा २००६ में आमिर खान और काजोल की फिल्म 'फना' भी विवादों में द्घिरी। नर्मदा बचाओं आंदोलन के विरोधियों के साथ आमिर के तालमेल के कारण इस फिल्म का गुजरात में विरोध किया गया। फिल्म गुजरात छोड़कर पूरे देश में रिलीज हुई और इसने अच्छा व्यापार किया। इतना ही नहीं गुजरात में भी बाद में इस विवाद में सरकार ने दखल दिया और फिल्म को पूरी सुरक्षा के साथ सिनेमा द्घरों में रिलीज कराया गया। 'माई नेम इज खान', 'बैंडिट क्वीन', 'ब्लैक फ्राइडे', 'आरक्षण' आदि कई ऐसी दूसरी फिल्में हैं जिन्हें किन्हीं न किन्हीं कारणों से विरोध झेलना पड़ा। 

 

कुछ फिल्मों को छोड़ दें तो अब तक ऐसा देखा गया है कि इस तरह के विरोध के बाद फिल्मों को अपेक्षा से ज्यादा सफलता मिली है। ऐसे विरोध फिल्मों के प्रति लोगों में उत्सुकता बढ़ा देते हैं। जिसका फायदा अक्सर बॉक्स ऑफिस पर नजर आता है। कमल हासन की देश छोड़ने की धमकी और तमिलनाडु सरकार का बैन अंत में विश्वरूपम को क्या स्वरूप देता है यह आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। 

 

 
         
 
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