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देश-दुनिया 
 
मिस्त्र में आपातकाल

मिस्र के इतिहास में २५ जनवरी होस्नी मुबारक के तख्ता पलट की तिथि है। इस वर्ष इसकी दूसरी वर्षगांठ मनाई गई। इसी दिन फिर हिंसा हो गई। लेकिन इस बार हिंसा की वजह अदालती फैसला था। 

दरअसल दो वर्ष पूर्व मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर जनता का सैलाब उमड़ा था अरब क्रांति की लहर के असर में सत्ता परिवर्तन की मांग जोर-शोर से उठी थी। होस्नी मुबारक सत्ता से हटे। कुछ समय तक भारी उथल-पुथल और राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला। फिर मोहम्मद मुर्सी ने सत्ता संभाली, नया संविधान बना, लेकिन देश के हालात बेहतर नहीं बल्कि बदतर हुए। जिन लोगों ने इस क्रांति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था, वे भी अब यह मानने लगे हैं कि आज के निजाम से बेहतर होस्नी मुबारक का शासन ही था। उस सत्ता में भले तानाशाही हावी थी, लेकिन आज की छद्म लोकतांत्रिक प्रणाली से वह बेहतर थी। जनता का एक वर्ग अगर ऐसी सोच रख रहा है, तो यह अकारण नहीं है। मिस्र में हिंसक द्घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। 

 

हिंसा उस समय भड़की थी जब एक स्थानीय अदालत ने पिछले वर्ष फरवरी में एक फुटबॉल स्टेडियम पर हुए हमले के आरोप में २१ लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी। फुटबॉल स्टेडियम की हिंसा में ७४ लोग मारे गए थे। दरअसल, स्टेडियम में पोर्ट सैद के अल-मसरी और काहिरा के अल-अहले क्लब के बीच मैच था। उसी दौरान दोनों तरफ के प्रशंसकों का आपस में टकराव हुआ। अल मसरी टीम के समर्थकों ने मैदान में धावा बोल दिया और अल अहली के खिलाड़ियों और फैंस पर हमला करने लगे। दर्शकों पर भी चाकुओं से हमला किया गया और स्टेडियम की छत से धक्का दे दिया गया। इस भीषण हिंसा के बाद अल अहले  ने पुलिस पर उनके विरोधियों के साथ साजिश करने का आरोप लगाया। 

 

इस मामले की सुनवाई २५ जनवरी को मिस्र की राजधानी में हुई। इससे पहले प्रदर्शनकारी जेल के बाहर इसलिए जमा हुए थे कि उसी जेल में ज्यादातर स्टेडियम में हुई हिंसा के मुजरिम बंद हैं। प्रदर्शनकारियों में उनकी तादाद ज्यादा थी, जिनके सगे संबंधी इस मामले में जेल में हैं। पोर्ट सैद फुटबॉल स्टेडियम की हिंसा के आरोपी ७३ लोगों में से कोर्ट ने २१ लोगों को सजा-ए-मौत दी। फुटबॉल प्रेमियों ने काहिरा में कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। फुटबॉल प्रेमियों ने धमकी दी थी कि अगर उन्हें इंसाफ नहीं मिला और दोषियों को फांसी न दी गई तो वे हिंसा करेंगे। हालांकि, एक्सपर्ट्स को उम्मीद थी कि इसमें सभी आरोपी छूट जाएंगे। 

 

फैसला सुनाए जाने के बाद मिस्र की राजधानी में जबर्दस्त हिंसा भड़क गई। इसमें अभी तक ६० लोग मारे गए हैं। मिस्र के सबसे बड़े विपक्षी मोर्चे ने आने वाले संसदीय चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी दी है। उन्होंने राजनीतिक मांगें न माने जाने की सूरत में अगले हफ्ते विशाल रैली निकालने की धमकी दी है। विपक्ष ने कहा है, 'नेशनल सलवेशन फ्रंट राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों की अत्यधिक हिंसा के लिए पूरी तरह जिम्मेदार मानता है और इसकी जांच व खूनखराबे के दोषियों को सजा देने के लिए स्वतंत्र समिति बनाने की मांग करता है।' उन्होंने इस्लामी सरकार द्वारा बनाए गए संविधान के मसौदे को रद्द करने और राष्ट्रीय बचाव सरकार बनाने की मांग की। 

 

हाल ही में एक जनमत संग्रह में मुस्लिम ब्रदरहुड पार्टी के मुर्सी की सरकार के मसौदे का अनुमोदन कर दिया गया था। लेकिन उसकी वजह से देश का ध्रुवीकरण हो गया है। धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी विपक्ष का कहना है कि इससे राजनीतिक और अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन होगा। संसदीय चुनावों की तारीख की द्घोषणा अभी तक नहीं की गई है। 

 

बढ़ती हिंसा देख मिस्र के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी ने इथियोपिया का दौरा रद्द कर दिया है जहां वे अफ्रीकी शिखर सम्मेलन में भाग लेने जाने वाले थे। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ देश में फैली अशांति पर आपात बैठक की। इसमें रक्षा, कानून और सूचना मंत्री भी शामिल रहे। राष्ट्रपति मुर्सी ने कहा कि 'मैंने वादा किया था कि जब तक कोई मजबूरी नहीं होगी, मैं कोई असाधारण कदम नहीं उठाऊंगा और यहां मैंने ऐसा ही किया। मैं तीन शहरों इस्माईलिया, स्वेज और पोर्ट सैद में ३० दिनों के लिए आपातकाल लगाए जाने की द्घोषणा करता हूं।' यानी स्वेज नहर के किनारे बसे तीन शहरों में एक महीने के लिए आपातकाल लगा गया है। 

 

इस तरह दो वर्ष पूर्व हुई क्रांति का जो लक्ष्य था, वर्तमान सरकार उससे भटक गई है। मोहम्मद मुर्सी किसके हाथ की कठपुतली बने हुए हैं, फिलहाल कहा नहीं जा सकता। मध्यपूर्व का प्रमुख देश होने के कारण मिस्र के संकट का असर अन्य देशों, विशेषकर क्रांतिशील अरब देशों पर पड़ना स्वाभाविक है। यह देखने वाली बात है कि इन देशों के क्रांतिवीर विगत दो वषोर्ं में हुए द्घटनाक्रमों से कोई सबक ले पाते हैं या नहीं। बहरहाल बचे हुए अभियुक्तों के फैसले आगामी ९ मार्च को सुनाए जाएंगे। उस दौरान सरकार की सुरक्षा और प्रदर्शनकारियों के सब्र को देखना होगा कि कहीं इससे और अधिक हिंसा न भड़क जाए। 

 

 

 


 

 

एक जरूरी लेकिन अधूरा अध्यादेश 

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ३ फरवरी को बिना देरी किए महिला सुरक्षा कानूनों से जुड़ी वर्मा समिति के सुझावों को लेकर अध्यादेश जारी कर दिया। हालांकि समिति के एएफएसपीए (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट और जनप्रतिनिधि कानून को लेकर दिए गए सुझावों को सरकार ने नकार दिया।  

 

दिल्ली में १६ दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार के बाद महिला सुरक्षा कानूनों में सुधार के लिए जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था। देखा जाए तो इससे पहले बन चुकी सैकड़ों समितियों की तरह इसमें भी ऐसा कुछ खास नहीं था। सरकार भी इसे लेकर गंभीर नहीं थी। इस बात का पता इसी से चलता है कि गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने इस दौरान एक बार भी समिति से संपर्क नहीं किया। इसके बाद मामले को निपटाने में लगी कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल ने आधी रात को जस्टिस वर्मा के निवास पर जाकर जबरन तत्काल उनसे सुझाव-पत्र सौंपने की जिद की, जिस पर बाद में सोनिया गांधी ने जस्टिस वर्मा को फोन कर अफसोस जताया। लेकिन जब समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपने के लिए वक्त मांगा तो सरकार के पास इतने गंभीर मुद्दे के लिए वक्त नहीं था। आखिरकार गृह मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने सरकार की तरफ से यह रिपोर्ट ग्रहण की। 

 

सामूहिक बलात्कार की द्घटना के बाद हुए आंदोलन पर हालांकि शुरुआत में दोषी के लिए फांसी की मांग जैसे उथले विचार प्रचारित हुए लेकिन कई छात्र संगठनों की भागीदारी बढ़ने के साथ ही आखिरकार बात पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देने तक पहुंच गई। इसी का सबसे ठोस सबूत जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट को भी माना जा सकता है। वर्मा समिति ने जब काम शुरू किया तो उन्हें लगभग अस्सी हजार ज्ञापन मिले। इन सभी पर विचार करते हुए सिर्फ वर्मा समिति ने निर्धारित एक महीने की समय सीमा के भीतर जो रिपोर्ट पेश की वह काबिले तारीफ है। यह कहना गलत नहीं है कि यूपीए सरकार की अपेक्षाओं के विरुद्ध जाकर समिति ने महिलाओं के अधिकारों और उनसे जुड़े बढ़ रहे अपराधों की गहरी पड़ताल की। 

 

इस रिपोर्ट में यौन हिंसा यौन उत्पीड़न को व्यापक सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक परिस्थितियों को आधार बनाकर समझा गया है। प्रशासन कानून राजनीति और सामाजिक नजरिए को ध्यान में रखकर सभी चीजों को व्याख्यायित भी किया गया है। समिति ने अपनी सिफारिशों को संवैधानिक और कानून की मानवीय व्याख्या के दायरे में पेश किया है। इसी के चलते बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा और नाबालिग अपराधी की श्रेणी तय करने और उम्र सीमा द्घटाने की मांग को खारिज कर दिया गया है। हालांकि समिति ने भी दोषियों के लिए सख्त सजा, बलात्कार की परिभाषा का विस्तार करने और बलात्कार पीड़िता की जांच के लिए स्पष्ट मेडिकल प्रोटोकॉल तैयार करने जैसी बातों पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। समिति की रिपोर्ट की बड़ी सार्थकता यही सामने आई है कि दिल्ली बलात्कार कांड से इतर देश के अशांत क्षेत्रों में सुरक्षाकर्मियों द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार होने वाली महिलाओं के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया गया है। वर्मा कमेटी ने अपनी एक अहम सिफारिश में कहा है कि ऐसे आरोपों के द्घेरे में आने वाले सुरक्षाकर्मियों को एएफएसपीए का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। इसके अलावा यानी उनके खिलाफ कार्रवाई सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। समिति ने राजनीतिक व्यवस्था में महिला विरोधी पूर्वाग्रहों और बलात्कार के आरोपियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की सिफारिश भी की है। साथ ही उसने कानूनों पर अमल में पुलिस एवं न्यायिक व्यवस्था की नाकामी के संदर्भ में पुलिस सुधारों का मुद्दा भी उठाया है। 

 

फिलहाल सरकार ने जनप्रतिनिधि या सुरक्षाबलों से जुड़ी तमाम सिफारिशों पर नकारात्मक रुख दिखाते हुए उन्हें सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार के इस रुख से कई महिला संगठनों में काफी रोष है और उन्होंने इसे लेकर फिर प्रदर्शन करने की बात कही है। ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमेंस एसोसिएशन की कविता कृष्णन का कहना है कि इस अध्यादेश में जीएस वर्मा कमेटी के कई अहम सुझावों को दरकिनार कर दिया गया है। सरकार ने बिना किसी चर्चा के इसे लागू किया है जो कि गलत है। दरअसल सरकार ने जानबूझकर अपने हितों के टकराव से बचने के लिए में महिलाओं पर होने वाली हिंसा जैसे मसलों को इस अध्यादेश में जानबूझकर कोई जगह नहीं दी गई है। इसके अलावा शादी के तहत होने वाले बलात्कारों, समलैंगिकों के हितों को इस अध्यादेश में नकारा गया है। पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास, निर्धारित समय में मामलों का निपटारा आदि पर भी इसमें कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। जबकि लोगों का ध्यान बंटाने के लिए बिन मांगे फांसी की सजा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। सरकार ने सशस्त्र कानूनों को लेकर अपने अड़ियल और अलोकतांत्रिक रवैए से एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि महिला अधिकार भी उसके एजेंडे में तभी तक है जब तक उसके हित सुरक्षित हैं। 

 

क्या है अध्यादेश में

 

  • दुष्कर्म और हत्या या पीड़िता के कोमा में जाने पर न्यूनतम २० साल का कारावास या जीवन भर कैद या मौत की सजा।
  • एसिड हमले पर दस साल तक के कारावास की सजा।
  • महिला को निर्वस्त्र करने पर ३ से ७ साल तक का कारावास।
  • ताक-झांक के अपराध में ३ साल तक का कारावास।
  • पीछा करना या छेड़खानी- यूनतम १ वर्ष तक का कारावास।
  • दुष्कर्म की परिभाषा में दुष्कर्म शब्द की जगह 'यौन हमला' किया गया, जिससे लिंग भेद खत्म हो।
  • हिरासत या संरक्षा में दुष्कर्म पर न्यूनतम दस वर्ष और अधिकतम उम्रकैद।
  • जानबूझकर छूना या अश्लील हरकत को अलग से अपराध में शामिल किया गया है।

 

 
         
 
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