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प्रदेश 
 
चीन से बढ़ी चिंता

ब्रह्मापुत्र को बांधने के चीनी रवैये पर हमारी चिंता स्वाभाविक है। इस ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी सोचना होगा कि आखिर हिमालय में बड़े बांधों के निर्माण की जिद कितनी घातक हो सकती है

 

पड़ोसी मुल्क चीन सदैव हमारे लिए चिंता का कारण रहा है। १९६२ में उसने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देते हुए हिमालय के सीमा क्षेत्रों से भारत पर आक्रमण कर दिया। तिब्बत तक रेल पहुंचाने की उसकी मंशा में खोट नजर आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से उसने भारत के एक लिए और चिंता खड़ी कर दी है। अब वह पूर्वोत्तर हिमालय के अरुणाचल, असम मेद्यालय राज्यों की जीवन रेखा कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी को निगलने को आतुर है।

 

चीन ब्रह्मपुत्र पर विशालकाय बांध बना रहा है। इससे हमारी चिंता स्वाभाविक है। २४०० मेगावाट क्षमता की टिहरी बांध परियोजना के चलते देवप्रयाग में भागीरथी करीब डेढ़ साल तक दिखाई नहीं दी। ऐसे में सोचने का विषय है कि जब चीन ३०-४० हजार मेगावाट क्षमता का बांध बनाएगा, तब ब्रह्मपुत्र कहां बचेगी? ब्रह्मपुत्र जितनी गहरी है इसका सीना उतना ही विस्तृत है। यही वजह है कि इसे नदियों में 'नद' कहा गया है। लेकिन चीन इसे बांध लेगा तो पूर्वोत्तर हिमालय के राज्यों में बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। भारत को विश्व समुदाय के समक्ष चीन के इस मनमानीपूर्ण रवैये को ठोस ढंग से उठाना चाहिए। दुनिया को बताना होगा कि चीन का कदम न तो पर्यावरण की दृष्टि से उचित है और न ही उसे मानवता का खयाल है। लेकिन सवाल यह है कि चीन की दादागिरी पर सवाल उठाने से पहले हमारे देश के कर्णधार अपनी प्रस्तावित अंतरात्मा में झांककर देखने का साहस जुटा पाएंगे? अकेले चीन नहीं बल्कि खुद भारत की अब तक की सरकारें हिमालय में विकास का विनाशकारी मॉडल लागू कर वहां के निवासियों के मानवाधिकारों का हनन करती रही है।

 

पूर्वोत्तर राज्यों सिक्किम कश्मीर हिमालय और उत्तराखण्ड में लोग निरंतर बड़े बांधों का विरोध करते आ रहे हैं। इसके बावजूद सरकार बलपूर्वक उनकी आवाज को दबाकर बड़े बांधों का निर्माण कर उन्हें विस्थापन की त्रासदी झेलने को मजबूर करती रही हैं। हिमालय में सैकड़ों बांध परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं।

 

सरकार इन परियोजनाओं को किसी भी कीमत पर बनाने के लिए आमादा है। टिहरी में और नर्मदा में लोग वर्षों संद्घर्ष करते रहे, लेकिन अंततः सरकार ने आंदोलन को कुचलकर वहां विशालकाय बांध बना दिये। यही नीति अन्य जगहों पर भी अपनाई जा रही है। उत्तराखण्ड में गंगा यमुना अलकनंदा पिंडर टौंसभिलंगना सरयू धौली आदि नदी द्घाटियों में लोग बांधों का विरोध कर रहे है। लेकिन सरकार उनकी आवाज को कुचलती रही है। किसी भी परियोजनाओं के निर्माण से पहले वह जन सुनवाई तक की जरूरत महसूस नहीं करती। पयोजानाओं की सुरंगों के ऊपर बसे गांव उजड़ रहे हैं। लोग खुले आसमान तले और गुफाओं में रातें काटने को विवश हैं मगर सरकार उनके बारे में सोचने के बजाय परियोजना का विरोध करने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर देती है।

 

पर्यावरणविदों और भूगर्भ अर्थशास्त्रियों की चेतावनियों से भी सरकार पर फर्क नहीं पड़ता। टिहरी बांध पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक प्रोफेसर खड़ग सिंह बल्दिया की आशंकाओं को दरकिनार कर दिया गया। १९७६ में गढ़वाल मंडल के कमिशनर महेश चंद्र मिश्रा कमेटी की सिफारिशें कहीं धूल फांक रही हैं और जोशीमठ के नीचे तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना के लिए सुरंग बना दी गई है। २०१० में रुड़की आईआईटी के प्रोफेसर आरएन बालागन भी आशंका व्यक्त कर चुके हैं कि सेलंग के पास सुरंग को एकदम सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। गढ़वाल विश्वविद्यालय और कुमाऊं विश्वविद्यालय में हाल के वर्षों में हुए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि हिमालय में बड़े बांधों और बेतरतीब विकास कार्यों से जैवविविधता प्रभावित हो रही है। गंगा में हिमालयन महाशीर मछली की लंबाई घट रही है। कीट पतंगों और तितलियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई विलुप्ति की कगार पर हैं।

 

कहने का मतलब यह है कि चीन जो कर रहा है उसे विश्व समुदाय के सामने तर्कपूर्ण ढंग से रखा जाना चाहिए। लेकिन इससे पहले हमारे नेताओं को सोचना होगा कि आखिर हिमालय में बड़े बांधों के निर्माण की जिद देश को कहां ले जाएगी आजादी के बाद बने ५१०० बांधों से ४४ लाख हेक्टेयर जमीन डूब गई। चार करोड़ से अधिक लोगों को विस्थापन की त्रासदी झेलनी पड़ी। लेकिन बड़े बांध निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप बिजली पैदा नहीं कर पाए। ऐसे में लोगों को उनकी जगहों से उजाड़ने का औचित्य समझ से परे है।

 

 

 


 

 

राजजात यात्रा पर संकट 

विश्व प्रसिद नंदादेवी राजजात यात्रा के आयोजन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। बारह वर्षों में एक बार आयोजित होने वाली इस यात्रा में अब सिर्फ छह माह का समय शेष रह गया है। लेकिन लगभग तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा मार्ग के विकास एवं सुविधा संबंधित कार्य शुरू नहीं हो सका है। राज्य सरकार ने केन्द्र से इसके लिए १५०० करोड़ रुपए की रकम मांगी है लेकिन अभी तक केन्द्र से एक रूपये भी नहीं मिल सका है। पर्यटन विभाग ने ३५ करोड़ रूपये के टेंडर विभिन्न विभागों के माध्यम से जारी कराये हैं। हालत यह है कि विभाग और कार्यदायी संस्था पैसों के लिए बाट जोह रही है।

 

नंदा राजजात यात्रा सचल हिमालयी महाकुंभ के नाम से भी विख्यात है। इसमें देश-विदेश के हजारों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। पिछले सप्ताह विधानसभा के डिप्टी स्पीकर डॉ अनुसूया प्रसाद मैखूरी और चमोली जनपद के अधिकारियों की बैठक में वसंत पंचमी के दिन यात्रा की तारीख तय करने का निर्णय लिया है। चूंकि अभी तक राजजात यात्रा मार्ग में विकास कार्य शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में  विश्व की सबसे लम्बी २८० किमी० पैदल यात्रा के सफल आयोजन पर शक होने लगा है। पर्यटन विभाग इस मद में पैसा नहीं होने के बावजूद ३५ करोड़ रुपए के टेंडर जारी किए हैं। बजट नहीं होने के कारण कार्य शुरू नहीं हुआ है। विभाग ने सरकार से १ करोड़ रुपये निर्जन स्थानों में टेंट बरसाती और तिरपाल के लिए भी मांगा है। इसके अलावा यात्रा मार्ग के ब्लॉक पंचायतों के माध्यम से भी कार्य होने हैं। घाट ब्लॉक के लिए १.१६ करोड़, नारायबगड़ के लिए ८०लाख, गैरसैंण के लिए ३५लाख, कर्णप्रयाग ब्लॉक के लिए ८१ लाख, देवाल के लिए ९४ लाख, थराली के लिए ८१ लाख, बद्रीनाथ वन प्रभाग को ९४ लाख, उरेडा को ९५ लाख, जल संस्थान को ४.५ करोड़, विद्युत विभाग १ करोड़, नगर पंचायत कर्णप्रयाग को ४.५ करोड़ के साथ ही जिला पंचायत चमोली को ३.४३ करोड़ रुपये के टेंडर दिये गये हैं। इन सभी को अभी तक सरकार से धन आने का इंतजार है।

 

राजजात यात्रा के लिए २५ पड़ाव बनाये गए हैं। राजजात यात्रा का प्रथम पड़ाव ईड़ा गधाणी है जबकि होमकुंड यात्रा का निर्जन एवं अंतिम पड़ाव है। इन पड़ावों पर भी धन अभाव के कारण कार्य आरंभ नही हो पाया है। राजजात यात्रा में इस बार ५०० से अधिक छांतोली यानी देव डोलियों के शिरकत करने की संभावना है। अभी तक पर्यटन विभाग ने जिले के ३५ लड़कों को १० दिवसीय रेस्क्यू का प्रशिक्षण दिया है। इनमें से मात्र २० प्रशिक्षितों को यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए रखा जायेगा। पूर्व में राजजात यात्रा को लेकर कई दौर की मैराथन बैठक हो चुकी है। हर बैठक के बाद सरकार चुस्त-दुरुस्त तैयारी करने का दावा करती है। लेकिन अभी तक इसे लेकर कोई कदम आगे नहीं बढ़ पाए हैं।

 

विश्वस्त सूत्रों की मानें तो राज्य सरकार ने इस यात्रा के लिए केन्द्र को १५०० करोड़ रूपये का प्रस्ताव बनाकर भेजा है। यदि केन्द्र से १५०० के बदले ५०० करोड़ रूपए भी देती है। तो इतने कम समय में जिला प्रशासन भी पूरा बजट खर्च नहीं कर पाएगा। ऐसे में स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं को शंका है कि यात्रा के बजट का हश्र वर्ष २०१० में दिल्ली में संपन्न राष्ट्रमंडल खेलों की तरह न हो जाए। जिसमें अंतिम समय में २००-३०० गुणा ज्यादा पैसा खर्च कर महाद्घोटाले को अंजाम दिया गया। उसी तर्ज पर नंदादेवी राजजात के अधिकतर पैसों का दुरुपयोग  होना तय है। नंदादेवी राजजात की तैयारियां पर्यटन अधिकारी सोवत सिंह राणा का कहना है कि उन्होंने शासन से राजजात के लिए पैसों की मांग की है। लेकिन अभी तक पैसे न मिलने से राजजात के कार्य नहीं हो पा रहे हैं। नंदादेवी राजजात यात्रा का आरंभ ९वीं शताब्दी से माना जात है। इस पद यात्रा की शुरुआत तत्कालीन गढ़वाल और कुमाऊंनी राजाओं एवं प्रजा ने की थी। इस महायात्रा में मां नंदादेवी को मायके से ससुराल कैलाश के लिए विदा किया जाता है। २८० किलोमीटर लंबी इस यात्रा का मार्ग बहुत ही दुर्गम और निर्जन है। हजारों यात्रियों के लिए मार्ग में रहने, खाने, सोने से लेकर उनकी स्वास्थ्य सुविधाओं की भी व्यवस्था करना होती है। इसके अलावा देव डोलियों और धर्मिक गुरुओं के लिए भी सभी प्रकार की व्यवस्था सरकार को करनी होती है।   

 


 

 

 

फर्जी डॉक्टर गिरफ्तार 

 

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली आयुर्विज्ञान और शोध संस्थान के माइक्रोबायलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर काम कर रहे फर्जी डाक्टर केबी सिंह को पिछले सप्ताह पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। राजकीय मेडिकल कॉलेज में अगस्त २०११ के अंतिम सप्ताह में डॉ कर्ण बहादुर सिंह ने माइक्रोबायलॉजी विभाग में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर केबी सिंह को ज्वॉयनिंग दी थी। सिंह के दस्तावेजों पर नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद विभागाध्यक्ष डॉ नीलम शर्मा को संदेह हुआ। उन्होंने तत्कालीन प्राचार्य डॉ स्नेहलता सूद से इसकी शिकायत की। डॉ सूद की ओर से इस संदर्भ में भेजे गए पत्र पर शासन ने इस पर संज्ञान नहीं लिया। आठ माह तक यह फर्जी डॉक्टर सरकार से प्रतिमाह ९९ हजार रुपये बतौर वेतन वसूलता रहा। 

 

गौरतलब है कि एमसीआई की वेबसाइट के अनुसार वर्ष २००७ में केबी सिंह एमसीआई निरीक्षण में भी शामिल हुआ और उसके दस्तावेजों को स्वीकार कर एमसीआई ने ही उसे नियुक्ति दी थी। वर्ष २००७ में राम मूर्ति स्मारक मेडिकल कॉलेज बरेली में हुए एमसीआई निरीक्षण में भी केबी सिंह शामिल थे। 

 

एमसीआई के समक्ष रखे गये दस्तावेजों में केबी सिंह ने छत्रपति साहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी में वर्ष १९८५ से १९९० के बीच खूद को वहां ट्यूटर पद पर तैनात बताया है। इसके साथ ही इसी विवि में वर्ष १९९१ से १९९६ तक असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर भी तैनाती दिखाई है। इतना ही नहीं सिंह ने उत्तराखण्ड डेन्टल कॉलेज हरिद्वार में वर्ष १९९६ से २००४ तक प्रोफेसर पद पर भी अपनी तैनाती दिखाई है। चूंकि एमसीआई में मेडिकल कालेजों के अनुभवों को ही वरीयता दी जाती है। इसलिए एमसीआई ने असिस्टेंट प्रोफेसर पद के पांच वर्षीय अनुभव को देखते हुए सिंह को एसोसिएट पद पर स्वीकार कर लिया था।

 

दरअसल केबी सिंह ने नियुक्ति के समय कॉलेज को एमएससी की जो डिग्री दी थी वह कानपुर विवि के इंस्टीट्यूट ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज की थी। इस विवि में माइक्रोबायलॉजी में एमएससी कोर्स वर्ष २००४ से शुरू हुआ जबकि केबी सिंह ने कानपुर विवि के इसी कालेज की वर्ष १९८८ की डिग्री दस्तावेजों में दी है। शोध पत्र के शीर्षक में विषय संबंधी स्पेलिंग गलत पाए जाने पर उन्होंने ४ दिन में ही नई डिग्री कॉलेज प्राचार्य के समक्ष रख दी जिससे उन पर शक करने के लिए और वजह मिल गईं। इसके अलावा लखनऊ विवि से ठीक कराकर लाई गई दूसरी पीएचडी में कुलपति ने ७ जनवरी २००५ के स्थान पर ८ जनवरी २००५ को हस्ताक्षर किए गये थे जबकि पुरानी उपाधि में पीएचडी वर्ष १९९८ में लिखी गई है। नई पीएचडी में उपाधि का वर्ष १९९९ लिखा गई है। इसके बाद फरवरी २०१२ में एमसीआई निरीक्षण से पहले भरे जाने वाले डिक्लेरेशन फार्म में विभागाध्यक्ष ने सिंह के दस्तावेजों की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर अपना संदेह दोबारा प्रकट किया। जांच में सामने आया कि फर्जी डॉक्टर ने एमएससी और पीएचडी के लिए जिन विश्वविद्यालयों के प्रमाण पत्र जमा किए थे, उन विश्वविद्यालयों ने इस नाम के किसी भी व्यक्ति को डिग्री देने से साफ इनकार कर दिया है। इस बीच केबी सिंह श्रीनगर से गायब हो गए। शासन की स्वीकृति पर १२ जून २०१२ को सिंह के खिलाफ श्रीनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज की। तब से इनकी तलाश की जा रही थी।

 

 
         
 
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