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vad 41 02-04-2017
 
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जनपदों से 
 
बेहाल तकनीक प्रशिक्षण संस्थान

पिथौरागढ़। जनपद में चलाए जा रहे अधिकतर तकनीक प्रशिक्षण संस्थानों की हालत सुविधाओं और देखरेख के अभाव में लगातार खराब होती जा रही है। ज्यादातर संस्थानों में उपयुक्त भवन, कार्यशाला आदि मौजूद ही नहीं है। गंगोलीहाट राईआगर जोरासी धारचूला मुनस्यारी में आठ औद्यौगिक प्रशिक्षण संस्थान चल रहे हैं और सभी इंफ्रास्ट्रक्चर और बजट की कमियों से जूझ रहे हैं। 

 

सरकार ने प्रदेश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में इन तकनीकी संस्थानों की स्थापना इसलिए की थी कि युवाओं को रोजगार आधारित प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके। आईटीआई की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसकी फीस और अन्य खर्चा गरीब तबके के लोगों की भी पहुंच में होती हैे। लेकिन आज स्थिति यह है कि सरकार की उपेक्षा और बुनियादी ढांचे के अभाव में ये क्षेत्र को जो लाभ पंहुचा सकते थे उसमें नाकाम साबित हुए हैं। धारचूला में १९९२ में खुला आईटीआई, भवन के अभाव में अस्कोट में चल रहा है तो अस्सी के दशक में खुला गंगोलीहाट आईटीआई भी आज तक भवनहीन है। यही हाल अन्य प्रशिक्षण संस्थानों का भी है। समय-समय पर मुख्यमंत्री से लेकर क्षेत्रीय विधायक भवन निर्माण का आश्वासन देते रहे हैं। तुष्टीकरण की राजनीति के चलते पहाड़ों में तमाम रोजगारपरक संस्थान खोल तो दिए गए लेकिन जल्दी-जल्दी बदल रही सरकारों ने पुरानी सरकार के फैसलों को या तो बदल दिया या फिर जानबूझकर उन पर अमल नहीं किया। जिला मुख्यालय स्थित औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान को छोड़ दें तो जनपद का कोई भी आईटीआई पूर्ण साज सज्जा व कर्मचारियों से युक्त नहीं है। 

 

गौरतलब है कि आईटीआई प्रशिक्षुओं की औद्यौगिक प्रतिष्ठानों में बहुत मांग है लेकिन मूलभूत सुविधाओं का अभाव झेल रहे ये संस्थान मापदंडों के अनुकूल प्र्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार नहीं कर पा रहे हैं। उत्तराखंड जैसे नवगठित राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए विभिन्न उद्योगों की जरूरत हेती है। सरकार ने भी सिडकुल-१ और सिडकुल-२ के नाम से दो औद्यौगिक परियोजनाएं चला रखी हैं। यहां स्थापित उद्योगों को बड़े पैमाने पर तकनीक संपन्न युवाओं की आवश्यकता पड़ती है। अगर राज्य के तकनीक संस्थान युवाओं को बेहतर प्रशिक्षण दे पाएं तो युवाओं को रोजगार के लिए कहीं भटकने की जरूरत ही नहीं है। 

 

जिन संस्थानों में प्रशिक्षण चल भी रहा है वह नई टेक्नॉलॉजी के अनुरूप नहीं है। टीवी व्यवसाय की तकनीकी ट्रेनिंग पर नजर डालें तो चीजें एलसीडी और एलईडी तक पहुंच गई हैं लेकिन यहां आज भी प्रशिक्षण पुरानी टेक्नोलॉजी आधरित ही दिया जा रहा है। पर्यटन राज्य का मुख्य व्यवसाय है और इन संस्थानों में टूरिज्म एंड ट्रैवलिंग का कोर्स भी चल रहा है। लेकिन सुविधाओं और पुराने पाठ्यक्रम के चलते यह किसी काम का नहीं है। स्थिति यह है कि रोजगार परक शिक्षा केन्द्र और राज्य के बीच जूझ रही है लेकिन किसी को इसकी कोई परवाह नहीं है। समवर्ती सूची का मामला होने के चलते जहां राज्य सरकार इसके आधारभूत ढांचे के लिए जिम्मेदार है तो वहीं परीक्षाओं से लेकर पाठ्यक्रम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान दोनों ने ही इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया है जिसके चलते न तो ढांचा खड़ा हो पाया है, और न ही नई तकनीक के साथ पाठ्यक्रम जुड़ पाया है। औद्यौगिक प्रशिक्षण संस्थानों से जुड़े लोगों का कहना है कि जगह-जगह आधारहीन संस्थान खोलने के बजाय जनपद के कुछ औद्यौगिक प्रशिक्षण संस्थानों का आधुनिकीकरण करना ज्यादा जरूरी है। इससे जहां संस्थानों को आधारभूत ढांचा उपलब्ध होगा वहीं युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी उपलब्ध हो पाएगी। युवा बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त कर औद्योगिक प्रतिष्ठानों में अपने कॅरियर को नया आयाम दे सकते हैं। 

 

गौरतलब है कि जिला मुख्यालय स्थित प्रशिक्षण संस्थान १९६ नाली भूमि में बना है और अगर इसके आधुनिकीकरण पर ध्यान दिया जाए तो यह एक बेहतर संस्थान के रूप में सामने आ सकता है। यहां इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति दूसरे संस्थानों की अपेक्षा बेहतर है। इस संस्थान में इलेक्ट्रीशियन, मोटर मैकेनिक, इलेक्ट्रॉनिक, रेडियो, टीवी, ड्राफ्रट्समैन, सिविल, कटिंग, स्टेनो हिंदी जैसे कोर्स चलाए जा रहे हैं। इन कोर्सों को चलाने के लिए फिलहाल प्लान और नॉन प्लान दोनों मदों से पैसा आता है। हालांकि यहां भी ३९ पदों में से ६ पद रिक्त चल रहे हैं। 

 

पिथौरागढ़ स्थित औद्यौगिक प्रशिक्षण संस्थान के प्रधानाचार्य आर एस मर्तोलिया बताते हैं कि औद्यौगिकी को आगे बढ़ाने में आईटीआई प्रशिक्षितों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। आईटीआई प्रशिक्षित ही औद्यौगिक उत्पादों को लोगों तक पहुंचाते हैं। लेकिन बदलती तकनीक के साथ तालमेल बिठाना इनके लिए बेहद जरूरी है। इस वर्क फोर्स का सबसे बड़ा फायदा राज्य की आर्थिकी को ही होगा। हमारे पास प्रशिक्षितों के लिए हर साल कई तरह की कंपनियां आती हैं और वे बेस्ट चाहते हैं। फिटर इलेक्ट्रीशियन इलेक्ट्रॉनिक्स वेल्डर मोटर मैकेनिक की मांग प्राइवेट सेक्टर में जर्बदस्त है। बहरहाल अभी तो इन प्रशिक्षण संस्थानों की हालत को देखकर कोई उम्मीद नजर नहीं आती। 

 

 


 

भ्रष्टाचार के जाल में योजनाएं 

पौड़ी गढ़वाल। सरकार की स्वरोजगार आधारित 'वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार पर्यटन योजना' पर्यटन विभाग अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते भ्रष्टाचार के जाल में फंसती जा रही है। 

 

गौरतलब है कि पर्यटन विभाग बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के नाम पर अनुदान मुहैया करवाता है। लेकिन असल स्थिति यह है कि असली बेरोजगारों की बजाय राजनीति से जुड़े हुए छुटभैया नेता इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इसके अलावा अनुदान के नाम पर दी जाने वाली धनराशि समय पर नहीं दी जाती, जिससे कि बेरोजगार युवाओं को समय पर इसका लाभ नहीं मिल पाता है। योजना में अनुदान के नाम पर दी जाने वाली धनराशि का बड़ा हिस्सा लाभार्थी तक पहुंचने से पहले ही बाबुओं की जेब में चला जाता है। 

 

पौड़ी पर्यटन विभाग में फर्जीवाडे़ का एक मामला उजागर हुआ है। पौड़ी मुख्यालय से १३ किलोमीटर दूर परसुण्डाखाल बाजार में विनोद रावत को फर्जी टूरिस्ट लॉज के नाम पर योजना का लाभ मिला है। विनोद ने विभाग में साठ-गांठ कर योजना के अंतर्गत एक लाख २५ हजार की रकम का भ्रष्टाचार किया है। रसुण्डाखाल निवासी रद्घुवीर सिंह नेगी ने सूचना के अधिकार को उपयोग कर इस भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है। दरअसल विनोद ने रकम हासिल करने के लिए भ्रामक और फर्जी पर्यटकों की सूची पर्यटक विभाग को उपलब्ध करवाई है। जिसमें ३० मई २०१२ को जयदर्शन लाल ग्राम चौरा थैलीसैण को कक्ष संख्या १ में ठहरा दिखाया गया है जिसके कमरा छोड़ने की तिथि एक माह बाद ३१ जून २०१२ दर्ज है। गौर करने वाली बात है कि जून माह में ३१ तारीख आती ही नहीं है। इस तरह क्रम संख्या २७१, २७२ और २७५ में भी इसी तरह की भ्रामक सूचनाएं दी गई हैं। २१ अगस्त २०१२ के आखिर तक इस पर्यटक लॉज में ४६३ पर्यटकों यात्रियों के ठहरने की बात कही गयी है। 

 

दूसरी ओर १२ नवंबर २०१२ को दूसरी सूचना में पर्यटन विभाग अपनी ओर से उपलब्ध करवायी गयी सूचना से ही पलट गया है। यहां तक की विभाग ने अपनी इस सूचना में लॉज को अवैधानिक करार दे दिया गया। सूचना में कहा गया की लॉज स्वामी की ओर से पंजीकरण के लिए इस कार्यालय में कोई आवेदन ही नहीं किया गया और यह लॉज पंजीकूत भी नहीं है। बिना पंजीकरण के लॉज संचालित करना गलत है। अब जब पर्यटन विभाग के कारनामों की पोल खुली तो स्वयं विभाग ने स्वीकार कर लिया की परसुन्डाखाल में जिस नाम से लॉज संचालित हो रहा है वह अवैध है। इसके बाद लॉज को जारी की गई रकम को लेकर विभाग कठद्घरे में है। वर्र्ष २००९-१० में विभाग द्वारा संचालित ५३ और योजनाओं में अनियमितता पायी गई है। इनमें आवेदकों को जिला अनुक्षरण समिति की स्वीकूति के बिना ही ऋण दे दिया गया। इस पूरे प्रकरण में अब तक विभागीय कर्मचारी हीरा लाल को निलंबित किया जा चुका है। पौड़ी के क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी पीके गौतम से बात करने पर वह गोल-मटोल जवाब देते हैं। गौतम का कहना है कि यह मामला मेरे कार्यकाल का नहीं है। जिसने सूचना मांगी है वह और जिसने लॉज बनाया है दोनों एक गांव के हैं और यह उनकी आपसी लड़ाई है। 

 


 

इंजीनियरिंग कॉलेज बनने की प्रक्रिया शुरू

चमोली। चमोली में इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए भूमि चयन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा राकेश शर्मा और अपर सचिव (तकनीकी शैलेस बगौली स्वयं कौठियालसैंण व अन्नागोली रांगतोली में भूमि का निरीक्षण कर चुके हैं। चमोली में ९ मई २०१२ को गोपेश्वर में जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने चमोली में इंजीरियरिंग कालेज की द्घोषणा की थी। इसके लिए भूमि परीक्षण के दौरान कौठियालसैण अन्नागोली (रांगतोली के साथ ही बंड क्षेत्र पीपलकोटी में पर्याप्त सरकारी भूमि चिन्हित की गई थी। इसके बाद राकेश शर्मा और शैलेस बगौली ने कौठियालसैंण के साथ ही अन्ना गोली में भूमि चयन को अंतिम रूप देने के लिए निरीक्षण किया। कौठियालसैंण में १८७ नाली उद्यान विभाग और ५० नाली से अधिक सरकारी भूमि उपलब्ध हुई हैं वहीं अन्नागोली में ५०० नाली से अधिक भूमि गांव वाले इंजीनियरिंग कॉलेज को देने के लिए तैयार हुए हैं। 

 

 
         
 
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