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आवरण कथा
 
कहां तुम चले गए

बच्चों की लगातार गुमशुदगी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन पांच राज्यों को फटकार लगाई है जहां बड़ी संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं। बेशक उत्तराखण्ड उन पांच राज्यों में नहीं है लेकिन यहां भी बढ़ रही बच्चों की गुमशुदगी इस बात की तस्दीक करती है कि हालात भयावह हैं और राज्य निठारी कांड के मुहाने पर खड़ा है। स्थिति यह है कि वर्ष २००५ से लेकर २०१२ तक राज्य के १३ जिलों के विभिन्न थाना क्षेत्रों में गुमशुदगी के कुल ८,८५५ मामले दर्ज हुए। इनमें से चार हजार से अधिक मामले बच्चों-नाबालिगों के थे। इसके अलावा पुलिस को लापता लोगों के जो १८६ शव मिले, उनमें से ७० बच्चों के थे। बच्चों के बाद गुमशुदगी के सबसे अधिक मामले बालिग लड़कियों और महिलाओं के दर्ज हुए हैं। जाहिर है राज्य में महिलाएं भी सुरक्षित नहीं। इस अंक में हम दो भागों वाली इस विशेष रिपोर्ट का प्रथम अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। यह रिपोर्ट गढ़वाल मंडल में बच्चों की गुमशुदगी की सूरत-ए-हाल बयां करती है

 

वह उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों का कोई भी घर हो सकता है जिसकी चौखट पर इंतजार का दम तोड़ता दीया आठों पहर जलता है। साथ ही जलता है दिल। मां की आंखें दैनिक कामकाज की व्यस्तता के बीच अक्सर उस पंगडंडी की ओर उठ जाती हैं जो सड़कों से घर की देहरी को जोड़ती हैं। हर आहट पर वे चौंक जाते हैं। उन्हें अपने उन बच्चों के लौटने का इंतजार है जो व्यवस्था की धुंध में कहीं गुम हो गए हैं जो सालों बाद भी नहीं लौटे जिनके प्रति शासन-प्रशासन की उदासीनता अमानवीयता के घेरे में दाखिल हो गयी है। दर्द और टीस से भरे अभिभावकों ने अपने बच्चे के इंतजार को भी सत्ता-व्यवस्था के चरित्र में लापता बना दिया। लापता इंतजार का दामन थामे उन लोगों का इंतजार वक्त के किसी मोड़ पर खत्म भी होगा। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।

देहरादून राज्य की राजधानी देहरादून में आधुनिक सुविधा संपन्न पुलिस व्यवस्था होने के बवजूद यहां के विभिन्न थाना क्षेत्रों में गुमशुदगी के मामले डराने वाले हैं। केवल तीन माह के भीतर ही गुमशुदगी के ५० मामलों के दर्ज होने का रिकॉर्ड यहीं के नाम है। विगत सात वर्ष के दौरान यहां गुमशुदगी के १०५ मामले प्रकाश में आए। 

कोतवाली थाना क्षेत्र के अंतर्गत गुमशुदगी के ५५ मामले लंबित चल रहे हैं। इनमें १६ बच्चों के तो ८ बालिग लड़कियों और महिलाओं के हैं। जिन १२ लापता लोगों के शव मिले उनमें ५ बच्चों के और दो बालिग लड़कियों के थे। इसी थाना क्षेत्र से वर्ष २००५ में लापता बच्चों प्रीत सिंह, गुफरान, रोहित, रेशम लाल, पूजा, रामकुमार का आज तक कहीं सुराग नहीं है। २००८ में लापता रेनू और २००९ में लापता शांति को भी पुलिस खोज नहीं पाई है। इसी थाना क्षेत्र से लापता हुई सुशीला राणा बाद में मरी हुई मिली।

रायपुर थाना क्षेत्र बालिग लड़कियों और महिलाओं की गुमशुदगी को लेकर चर्चाओं में रहा है। वर्ष २००७ में यहां से दीपिका रावत, पूजा, २००९ में ममता, २०१० में साधना शुक्ला, २०११ में जसमिंदर कौर, माया देवी, मुन्नी यादव, २०१२ में रिंकी और इमराना लापता हुईं। आज तक इनका पता नहीं लग पाया है।

कैंट थाना क्षेत्र में वर्ष २००५ से लेकर अगस्त २०१२ तक दर्ज गुमशुदगी के २५ मामले अभी तक लंबित हैं। २००५ में लापता राम सिंह बिष्ट, २००६ में पंकज बिष्ट, २००८ में चारुलता, २०१० में तरुण कुमार, मनोज दरमानी, सरिता और २०१२ में पूजा वर्मा जैसे लापता बच्चों को कैंट पुलिस अभी तक ढूंढ़ नहीं पाई है। इसी थाना क्षेत्र से लापता नाबालिग बच्चों के ७ और बालिग बालिकाओं और महिलाओं के ९ मामले अभी तक पुलिस फाइलों में धूल फांक रहे हैं। बालिग युवतियों और महिलाओं की बात करें तो वर्ष २००५ में लापता सिमरन शर्मा, फरजाना, रीना, मीना थपलियाल, लीला देवी, वर्ष २००६ में बबीता नेगी, २०११ में तृप्ति राई, अनिता खड़का और अंजू इसी थाना क्षेत्र से लापता हैं।

पटेल नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत बच्चों की गुमशुदगी के १६ और बालिग बालिकाओं महिलाओं की गुमशुदगी के ८ मामले लंबित हैं। लापता लोगों में से जिन १२ के शव मिले उनमें से ५ बच्चों और दो बालिग लड़कियों एवं महिलाओं के हैं। वर्ष २००५ में लापता महबूब हसन, कमलेश, कंचन, दिव्या पांडे, वर्ष २००९ में लापता संतोष कुमार, लक्ष्मी राणा, साहिल, निक्की, चंद्रमणि जैसे बच्चों का कोई अता-पता नहीं है। यही स्थिति बालिग लड़कियों और महिलाओं की भी रही। वर्ष २००५ में लापता प्रीत सिंह, २००५ में गुमशुदा सुषमा, उसकी लड़की चुन्नू, २०१० में लापता किरन थापा, और २०१२ में गायब हुई निशा का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है।

डालनवाला थाना क्षेत्र में गुमशुदगी के ११ मामले लंबित चल रहे हैं। इनमें २ बच्चों के और ३ बालिग बालिकाओं और महिलाओं के हैं। २००८ में लापता संगीता, २०११ में लापता रोहित चौहान का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। बालिग बालिकाओं और महिलाओं की बात करें तो २००८ में गुमशुदा आशा कपूर, मधु और २०१२ में लापता दीपिका का अभी कोई पता नहीं चल पाया है। लापता लोगों के जो दो शव मिले उनमें एक महिला का था।

राजपुर थाना क्षेत्र में गुमशुदगी के १० मामले लंबित चल रहे हैं। इनमें ३ बच्चों और ५ बालिग बालिकाओं एवं महिलाओं के हैं। अभी तक जिन ३ लापता लोगों के शव बरामद हुए उनमें एक नाबालिग बच्चे का है। २००८ में लापता मासूम मुस्कान, २०१२ में उषा पासवान और राकेश रोका का अभी तक पता नहीं चल पाया है। इसी प्रकार से बालिग बालिकाओं और महिलाओं में २००७ में लापता दीपिका रावत, २०१० में गायब सुनीता देवी, वर्ष २०११ में गायब जयश्री, शहनाज, मनकुमारी थापा का राजपुर पुलिस कोई भी सुराग नहीं लगा पाई है।

क्लीमेंटाउन थाने में गुमशुदगी के कुल ९ मामले लंबित हैं। इनमें २ बच्चों के और १ मामला बालिग लड़की का है। लापता नाबालिग बच्चों में २००५ में लापता उत्तम सिंह, २००८ में गायब गौरव भाटी का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। इसी प्रकार बालिग आयशा का भी पता लगाने में पुलिस कामयाब नहीं हो पाई है।

ऋषिकेश कोतवाली में २००५ से लेकर अगस्त २०१२ तक लापता हुए लोगों के ७१ मामले लंबित हैं। पुलिस ने ४ लापता लोगों के शव उनके गायब होने के कई दिनों के बाद बरामद किये। जिनमें २ शव महिलाओं के भी थे। कोतवाली में नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी को लेकर दर्ज १६ मामलों का कोई भी सुराग नहीं लग पाया है। पांच मामले बालिकाओं के हैं। २००५ में गायब पवनजीत उर्फ लक्की, गणेश उर्फ अभिषेक, गोविन्दा, लक्ष्मण, राकेश पैन्यूली, संगीता, मोहित कुमार, २००९ में लापता संजय गिरी, २०१० में लापता गौरव कुमार गोलू जैसे बच्चों का अभी भी पता नहीं चल पाया है। इसी प्रकार २०११ में गायब हुई खुशबू, सौरभ चौरसिया, धीरज चौहान उर्फ धीरा, २०१२ में लापता देवेन्द्र कुमार उर्फ दीना, गोकुल राय लींची उर्फ अक्षरा, कामिनी और अर्चना के मां-बाप भी अपने बच्चों का पता न लगने पर दुखी हैं। कोतवाली पुलिस बालिग लड़कियों के मामले में भी सुस्त ही रही है। २००६ में लापता उमरोती देवी, २००७ में राम मारी उर्फ मीरा देवी, २००८ में रविन्दर कौर, २००९ में हिमशिखा, शकुंतला देवी, २०१० में हरिन्दर कौर, अर्चना रावत एवं उसका डेढ़ वर्षीय पुत्र अर्चित और २०११ में लापता सुमन का भी कोई पता नहीं चल पाया है। इसी तरह २०१२ में गुमशुदा, सावित्री, नीमा देवी, प्रियंका सेमवाल, सोनिया का भी अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। 

रायवाला थाने में गुमशुदगी के कुल ९ मामले लंबित हैं। इनमें एक बच्चे का है। पुलिस २००५ में लापता हुई मासूम संगीता का अभी तक कोई पता नहीं लगा पाई है। इसके साथ ही २०१० में लापता हुई इंदिरा देवी, और २०१२ में गायब हुई सुनीता का भी कोई पता नहीं चल पाया है।

डोईवाला थाना क्षेत्र से वर्ष २०१० में सीमा, २०११ में भारती और दीपक जैसे बच्चों की गुमशुदगी आज भी रहस्य बनी हुई है। बालिग लड़कियों के मामलों में भी डोईवाला पुलिस नाकाम रही है। २००९ में लापता मीनाक्षी, २०१२ में लापता भारती, निक्की और पुष्पा का भी डोईवाला थाना पुलिस कोई सुराग नहीं लगा पाई है।

विकासनगर थाना क्षेत्र में वर्ष २००५ से अगस्त २०१२ तक गुमशुदगी के २३ मामले लंबित थे। जिनमें बच्चों के ४ और लड़कियों के ६ मामले हैं। पुलिस ने एक गुमशुदा हुए बच्चे का शव भी बरामद किया। २००५ में शुभम, सैयद अली २००६ में सुनील कुमार, २०१० में सुमन और २०१२ में गुम हुई अनुराधा जैसे बच्चों का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। महिलाओं और लड़कियों के मामलों में २००५ से लापता बबली, सीता गुरंग और २००९ में गायब हुई पार्वती राणा का भी कोई पता नहीं चल पाया है। इसी तरह २०११ में लापता डौली शर्मा रीना देवी के बारे में भी पुलिस अभी तक कोई जानकारी हासिल नहीं कर पाई है।

 

 

शेष भाग आगे है.....

 
         
 
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