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vad 23 25-11-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
नरेन्द्र मोदी वाल्मीकि नहीं

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि नरेन्द्र मोदी के भाषण उनके पैशन से मैं खासा प्रभावित हुआ हूं। वे जिस अंदाज में अपनी बात रख रहे थे उससे उनके आत्म विश्वास और अपनी सोच के प्रति खुद उनकी प्रतिबद्धता कायल करने वाली थी। उन्होंने अपने प्रदेश के विकास पर जो कुछ कहा उसकी पुष्टि कई अन्य पहले ही कर चुके हैं। मेरे कई मित्र गुजरात से हैं। जब कभी भी उनसे बात होती है तो वे नरेन्द्र मोदी के गुणों का बखान करते नहीं थकते। इसलिए मुझे यह स्वीकारने में कतई संकोच नहीं कि मोदी का भाषण सुनते-सुनते मैं उनका प्रशंसक कब बन गया यह मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन वह सब क्षणिक था। कुछ समय के लिए शायद मैं भी मोदीमय सा हो चला था। किंतु मैं उन निरपराधों की हत्या के जद्घन्य अपराध को कैसे भुलूं? कैसे भूल जाऊं कि दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में जो शख्स पंथ और जाति की राजनीति को देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बता रहा है उसका खुद का दामन सैकड़ों निर्दोषों के खून से रंगा है। कहीं नरेन्द्र भाई मोदी खुद को वाल्मीकि समझने की भूल तो नहीं कर रहे। त्रेता युग के कुख्यात डाकू और शिकारी रत्नाकर को तो नारद मुनि ने सत्य का मार्ग प्रशस्त कर संत वाल्मीकि बना डाला था लेकिन अब कौन नारद कलयुग में मोदी का हृदय परिवर्तन कर उन्हें धर्म निरपेक्ष-पंथ निरपेक्ष बनाने चला है

 

नरेन्द्र मोदी को पहली बार सुना। यूं यदि चाहता तो पहले भी उनके भाषण सुन सकता था लेकिन कभी इच्छा ही नहीं हुई। कारण उनकी साम्प्रदायिक-कट्टरपंथी छवि और गोधरा के बाद गुजरात दंगों में उनकी सक्रिय भूमिका का होना रहा। मैं नरेन्द्र मोदी का कटु आलोचक हूं। मेरी दृष्टि में २००२ में जब गोधरा कांड के पश्चात हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़के तब यदि वे बतौर मुख्यमंत्री चाहते तो हालात बेकाबू न होते। लेकिन उन्होंने अपनी तो आंखें मूंदी ही मूंदी अपने मातहतों को राज्य की पुलिस को, प्रशासन को भी आंखें बंद करने के संकेत दिए जिसके चलते कई सौ निरपराध धर्मान्धता की आग में जिंदा जला दिए गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दंगाग्रस्त राज्य का दौरा करने के बाद अपनी वेदना जगजाहिर करते हुए कहा था 'मोदी ने राजधर्म का पालन नहीं किया'। सही में यदि मोदी ने अपने कर्तव्य का सही निर्वहन किया होता तो शायद इतने बड़े पैमाने पर न तो हिंसा होती और न ही इतनी जानें जातीं। बहरहाल गोधरा और उसके बाद पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। मैं उस सब को दोहराना नहीं चाहता। लेकिन यह सच है कि नरेन्द्र मोदी को न तो मैं सुनना चाहता था और न ही उनके द्वारा गुजरात के विकास की जो कहानियां पिछले कुछ वर्षों से सुनने को मिलती रही हैं, उस पर विश्वास करना चाहता था। कारण, मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि उन्होंने अक्षम्य अपराध किया है जिसकी कोई माफी नहीं। लेकिन फिर जब अखबारों में पढ़ने को मिला कि दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्र-छात्राओं ने अपने वार्षिक कार्यक्रम के लिए तमाम एक से बढ़कर एक नामी-गिरामी राजनेताओं, बिजनेस लीडर्स और समाजशास्त्रियों के बीच से नरेन्द्र मोदी का नाम चुना और केवल उन्हें ही सुनने की मांग रखी तो मैं खुद को रोक न सका भाषण को सुनने से। मैंने लगभग आधे घंटे तक उन्हें सुना। वे बहुत संतुलित बोले क्योंकि उन्हें पता था कि उनका नई पीढ़ी से किया जाने वाला यह संवाद आने वाले समय में देश की राजनीति में उनकी भूमिका को तय करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। इसीलिए नरेन्द्र मोदी किसी भी विवादास्पद मुद्दे पर कुछ नहीं बोले। उन्होंने अपनी पार्टी के मुख्य एजेंडे तक को छूने से परहेज किया। वे केवल और केवल गुजरात के विकास मॉडल पर केंद्रित रहे। उन्होंने अपने पिछले दस बरस के शासनकाल को रोल मॉडल के तौर पर बड़ी खूबसूरती के साथ पेश किया। 

 

उन्होंने युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए उन्हें भारत की तकदीर बदलने वाला करार दिया। सीधे नहीं लेकिन बड़ी नफासत के संग उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि उन्हें देश की बागडोर सौंपी गई तो वह भारत का गौरव विश्व में स्थापित कर देंगे। विकास के अपने मॉडल को भी उन्होंने विस्तार से सामने रखा। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनके भाषण उनके पैशन से मैं खासा प्रभावित हुआ हूं। वे जिस अंदाज में अपनी बात रख रहे थे उससे उनके आत्म विश्वास और अपनी सोच के प्रति खुद उनकी प्रतिबद्धता कायल करने वाली थी। उन्होंने अपने प्रदेश के विकास पर जो कुछ कहा, उसकी पुष्टि कई अन्य पहले ही कर चुके हैं। मेरे कई मित्र गुजरात से हैं। जब कभी भी उनसे बात होती है तो वे नरेन्द्र मोदी के गुणों का बखान करते नहीं थकते। इसलिए मुझे यह स्वीकारने में कतई संकोच नहीं कि मोदी का भाषण सुनते-सुनते मैं उनका प्रशंसक कब बन गया, यह मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन वह सब क्षणिक था। कुछ समय के लिए शायद मैं भी मोदीमय सा हो चला था। किंतु मैं उन निरपराधों की हत्या के जघन्य अपराध को कैसे भुलूं? कैसे भूल जाऊं कि दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में जो शख्स पंथ और जाति की राजनीति को देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बता रहा है उसका खुद का दामन सैकड़ों निर्दोषों के खून से रंगा है। कहीं नरेन्द्र भाई मोदी खुद को वाल्मीकि समझने की भूल तो नहीं कर रहे। त्रेता युग के कुख्यात डाकू और शिकारी रत्नाकर को तो नारद मुनि ने सत्य का मार्ग प्रशस्त कर संत वाल्मीकि बना डाला था लेकिन अब कौन नारद कलयुग में मोदी का हृदय परिवर्तन कर उन्हें धर्म निरपेक्ष-पंथ निरपेक्ष बनाने चला है सच तो यह है कि जिस ब्रांडिंग और 'पैकेजिंग' को विकास का मूलभूत आधार बता मोदी नए भारत के निर्माण का स्वप्न दिखा रहे हैं उसी ब्रांडिंग और पैकेजिंग को आधार बना वे स्वयं की छवि बदलना चाहते हैं, यानी 'माल' चाहे जैसा भी हो उस पर पैकेजिंग इतनी चमक-दमक वाली कर दी जाए कि असल गुण-दोष का पता न चले। लेकिन ऐसा करके कुछ समय तक ही 'ग्राहक' को बेवकूफ बनाया जा सकता है। कलई खुलते ही असलियत सामने आ जाती है।

 

मैं मानता हूं कि भले ही मोदी के दस वर्ष का शासन गुजरात को तरक्की के मार्ग पर ले चला हो, भले ही गुजरात में दूध-दही की नदियां बहने लगी हों और भले ही वहां साम्प्रदायिक अथवा जातीय दंगे होने बंद हो चुके हों, नरेन्द्र भाई मोदी को देश की बागडोर नहीं सौंपी जा सकती, नहीं सौंपी जानी चाहिए। कौन जाने कब 'वाल्मीकि' के भीतर का 'रत्नाकर' सामने आ जाए? और क्या पता रत्नाकर कभी मरा ही न हो उसने वाल्मीकि नाम का चोला अपना लिया हो और मौका पाते ही वह फिर वाल्मीकि से रत्नाकर बन जाए। तब कौन उसे रोकेगा? वह त्रेता युग था, तब नारद थे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी धरती पर भ्रमण के लिए आ जाते थे। अब कलयुग है। ये सभी धरती में आने का दुस्साहस नहीं करते। ऐसे में मेरी समझ तो कम से कम प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को देखने का जोखिम नहीं उठा सकती। और एक बात। हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी भले ही पंथ रहित, जात-पात रहित राजनीति से छुटकारा पाने की बात करें, उनकी पार्टी और उससे जुड़े संगठन एक बार फिर 'हिन्दुत्व' का कार्ड खेलने की तैयारी में हैं। एक तरफ मोदी विकास को बुनियादी आवश्यकता मान देश की युवा पीढ़ी को मोहने का प्रयास कर रहे हैं। या फिर स्वांग कर रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह राम मंदिर निर्माण को पार्टी एजेंडे में बने रहने पर बल दे रहे हैं। इतना ही नहीं विश्व हिन्दू परिषद् के संत खुलकर फिर से मंदिर निर्माण का राग अलापने लगे हैं। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं एक बार फिर देश को धर्म-जाति के नाम पर बांटने की तैयारी तो नहीं चल रही। एनडीए ने छह वर्ष तक केन्द्र में सरकार चलाई। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली इस सरकार में भाजपा सबसे बड़ा दल होने के नाते हावी तो रही, लेकिन अपने कई ऐसे चुनावी वादों को लागू न कर सकी जिनसे सहयोगी दलों को ऐतराज था। वाजपेयी सरकार कई मायनों में मनमोहन सिंह सरकार से बेहतर कही जा सकती है। उस सरकार में कट्टरपंथी अपनी नहीं चला पाये थे तो उसके पीछे गठबंधन सरकार की मजबूरी के साथ-साथ वाजपेयी का नेतृत्व भी था। अटल बिहारी कभी भी कट्टरपंथी सोच के नहीं रहे। लेकिन नरेन्द्र मोदी-वाजपेयी की सोच वाले नहीं हैं। भले ही वे अपनी, विकास के लिए मॉडल का अवतार पुरुष वाली ब्रांडिंग क्यों न करें, कहीं भीतर से वे कट्टरपंथी हैं। इसलिए मैं समझता हूं यदि इस देश की धर्म निरपेक्षता, सहिष्णुता को अक्षुण्ण रखना है तो हमें नरेन्द्र भाई मोदी और उन जैसों के मायावी जाल से स्वयं को बचाना होगा। अन्यथा कांग्रेस ने अपनी गलत नीतियों और भ्रष्ट आचरण से मुल्क को पिछले ६५ वर्षों में जिस तबाही के मंजर तक ला पटका है ये कट्टरपंथी उसे अगले पांच से दस सालों में ही मध्ययुगीन बर्बरता में ला पटकेंगे। यदि भाजपा २०१४ में केंद्र में आना चाहती है तो उसे अपने नेतृत्व के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी जैसी विराट सोच के व्यक्ति को आगे करना होगा।

 

 
         
 
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  • आकाश नागर

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