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vad 15 30-09-2017
 
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फोकस
 
हालात ने दी कुर्सी

राजनाथ सिंह को एक बार फिर से भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी गयी है। अपनी इस ताजपोशी से वह खुद भी कम हैरत में नहीं होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि बतौर अध्यक्ष वे भाजपा में बिखराव के सबब भी बने थे। लेकिन राजनीति में व्यक्ति से ज्यादा कभी-कभी स्थितियों महत्वपूर्ण हो जाती हैं। राजनाथ का भी दोबारा अध्यक्ष बनना स्थितियां और विकल्पहीनता की देन है। इस देश में एचडी राजनीतिक रूप से  परिपक्व होने के बावजूद राजनाथ की राहों पर अक्सर लड़खड़ाते रहे हैं। उनका ग्राफ उठता गिरता रहा। कुर्सी मिलने के तीन दिन के भीतर ही नरेन्द्र मोदी से उनकी मुलाकात ने यह भी साफ कर दिया कि २०१४ आम चुनावों को लेकर उन्होंने जल्द ही गंभीरता से काम कराना शुरू कर दिया है। 

राजनाथ के राजनीतिक सफर का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी जाता है। राजनाथ एक समय पर अटल के प्रिय नेता भी हुआ करते थे। गौरतलब है कि २००९ के लोकसभा चुनावों में भाजपा की तरफ से लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी का चेहरा बनाया गया था। लेकिन मतदाताओं को आडवाणी के नेतृत्व पर पर्याप्त भरोसा नहीं था। हार का सारा ठीकरा आडवाणी पर फोड़ा जाने लगा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि २००९ के आम चुनाव में हार सुनिश्चित करने में राजनाथ की बड़ी भूमिका थी। ढुलमुल रवैये के लिए पहचाने जाने वाले राजनाथ ने पार्टी के कई पुराने मित्रों को भी तोड़ने का काम किया। कल्याण सिंह के साथ पार्टी के रिश्ते कड़वे होने में राजनाथ ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उसी समय उत्तर प्रदेश में भाजपा के तीन अन्य बड़े नेताओं कलराज मिश्र, लालजी टंडन और ओम प्रकाश सिंह को भी राजनाथ ने ही किनारे कर दिया। राजनाथ ने ही झारखंड में बाबूलाल मरांडी के लौटने की हर संभावना समाप्त कर दी। इन्होंने ही उड़ीसा में ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी जिससे नवीन पटनायक ने भाजपा से गठबंधन तोड़ अपने बूते लड़ने का फैसला किया। इसके अलावा वरुण गांधी का समर्थन करने में उन्होंने जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाई और शहरी क्षेत्रों में वोटरों को पार्टी से दूर भगा दिया था। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। राजनाथ पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने एक विस्तृत आधार वाले राजनीतिक दल को एक संप्रदाय में तब्दील करने में बड़ी भूमिका निभाई है। उन पर जातिवाद या दूसरे शब्दों में कहें तो ठाकुरवाद के आरोप तो नियमित तौर पर लगते ही रहे है। नितिन गडकरी की तरह ही अपने पहले कार्यकाल में अपनी अक्षमता और असुरक्षा की भावना के चलते भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भाजपा को इस हालत में ला खड़ा किया कि पार्टी के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा। 

दूसरी तरफ यह बात भी उठ रही है कि नितिन गडकरी को रोकने के लिए संद्घ पर दबाव बनाने की भाजपा की कोशिश कामयाब हुई है। दरअसल वे लोग भूल गए हैं कि राजनाथ खुद भी संद्घ के चहेतों में से ही एक हैं। यह संद्घ ही है जिसने राजनाथ को २००५ में आडवाणी का उत्तराधिकारी बनाया था। उस समय ही राजनाथ खुद को संद्घ का वफादार साबित कर चुके थे। अपने पहले कार्यकाल में राजनाथ सिंह ने भाजपा पर पकड़ मजबूत करने में संद्घ की काफी मदद की थी। इस दौरान उन्होंने खुद को भी पार्टी के अंदर मजबूत किया। संद्घ पहले ही २००९ में राजनाथ को फिर से पार्टी अध्यक्ष बनाने की अपनी इच्छा जाहिर कर चुका था। राजनाथ को फूट डालो और राज करो वाली नीति की सोच के लिए भी जाना जाता है। माना जाता है कि वह राजनाथ सिंह ही हैं जिन्होंने भाजपा के अंदर गुटबाजी और अंतर्कलह की परंपरा शुरू कर अपनी जगह पक्की करने की कई चालें चलीं। इसी हथियार से उन्होंने कई विरोधियों को धूल भी चटाई।

राजनाथ पर सबसे बड़ा आरोप है कि उनकी अपनी कोई राजनीतिक जमीन नहीं है और वे गगन बिहारी हैं। यानी १९७७ की जनता लहर के बाद उन्होंने सीधे जनता से कोई चुनाव नहीं जीता, सिवाम हैदरगढ़ से जब वह मुख्यमंत्री थे। इसका जवाब देने के लिए उन्होंने गाजियाबाद से पिछला लोकसभा चुनाव जीत कर इन आरोपों का जवाब देने की कोशिश की। दरअसल राजनाथ की नजर भाजपा अध्यक्ष से ज्यादा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रही है। इसीलिए पिछले कुछ दिनों से वह इस कोशिश में लगे थे कि अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी को दुरुस्त करें और जिन लोगों से उनकी पुरानी दुश्मनी है उनका भरोसा हासिल करें। इसी कोशिश में उन्होंने कल्याण सिंह को दोबारा भाजपा में लाने के लिए लगातार प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने फिर से अपने को प्रदेश के ठाकुर नेता के रूप में स्थापित करने की भी भरपूर कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा को दिल्ली में वापस आना है, तो राजनाथ को पहले अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश पर ही ध्यान देना होगा। दूसरी तरफ राजनाथ ऐसे समय पर दोबारा भाजपा अध्यक्ष पद की कमान संभालने जा रहे हैं, जब प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार को लेकर पार्टी में अंदरूनी उठापटक चरम पर है। अभी तक राजनाथ ने नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंध बना रखे हैं। पिछले दिनों हुई दोनों की मुलाकात इसी क्रम का एक हिस्सा है। लेकिन महत्वाकांक्षी राजनाथ ने ही आडवाणी की उम्मीदवारी को भी कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। अब इंतजार इसी बात का है कि मोदी से राजनाथ की ये दोस्ती कब तक जारी रहती है। फिलहाल तो गडकरी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से हुई पार्टी की फजीहत की भरपाई, राहुल गांधी की युवा राजनीति का तोड़ और कर्नाटक कलह से निपटना ही राजनाथ की शुरुआती मुश्किलों में से एक है। अगर पिछली बातों को भूलकर राजनाथ सिंह पार्टी को एकजुट करने में कामयाब होते हैं तो यह उनके साथ- साथ भाजपा का भी बेहतर भविष्य तय करेगा। 

 


 

राजनीतिक यात्रा


एक आम कार्यकर्ता से भाजपा के शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व में शामिल होने वाले राजनाथ सिंह का जन्म १० जुलाई, १९५१ को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम राम बदन सिंह और माता का नाम गुजराती देवी था। १३ साल की उम्र से ही राजनाथ सिंह का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ से जुड़ाव हो गया था। 

राजनाथ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है। उसके बाद १९७१ में वह मिर्जापुर के केबी डिग्री कॉलेज में वह प्रोफेसर नियुक्त हुए। नौकरी लगने के बाद भी राजनाथ लगातार संद्घ से जुड़े रहे। वर्ष १९७४ में उन्हें भारतीय जनसंद्घ का सचिव नियुक्त किया गया। इमरजेंसी के दौरान कई महीनों तक जेल में बंद रहने के बाद राजनाथ १९७५ में जनसंद्घ के मिर्जापुर जिले के अध्यक्ष बने। राजनाथ मिर्जापुर से ही पहली बार १९७७ में विधायक बने। इसी के बाद भाजपा की यूथ विंग की कमान राजनाथ  को सौंप दी गई। १९८६ में राजनाथ सिंह को यूथ विंग के लिए राष्ट्रीय महासचिव चुना गया। संद्घ के चहेते राजनाथ सिंह १९९१ में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। उन्होंने बतौर शिक्षा मंत्री नकल-विरोधी कानून लागू करवाया था। राजनाथ ने ही वैदिक गणित को यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल करवाया था। वह १९९४ में राज्यसभा के लिए चुने गए। १९९७ में राजनाथ उत्तर प्रदेश से भाजपा के अध्यक्ष चुने गए। वाजपेयी के पसंदीदा नेता होने के चलते उन्होंने राजनाथ को सरकार में भूतल परिवहन मंत्री बनाया। वर्ष २००० से २००२ तक राजनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। २००४ में उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी देते हुए भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। राजनाथ के खाते में २००९ के आम चुनावों में मिली हार भी दर्ज है।

 

 
         
 
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