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प्रदेश 
 
संकल्प का साहस जरूरी

यदि उत्तराखण्ड के राजनेता ईमानदारी से पहाड़ के विकास का संकल्प लेते हैं तो भविष्य में सूर्य उत्तरायण होने पर वहां के बुजुर्ग सुखद अहसास के साथ प्राण त्याग सकेंगे। विधानसभा भवन का शिलान्यास ही किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं है

सूर्य उपसना का महापर्व मकर संक्रांति उत्तराखण्डवासियों के लिए वर्षों से संकल्प का शुभ मुहूर्त भी रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान कुर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे के नेतृत्व में जनता ने बागेश्वर स्थित शिव के प्रांगण में सरयू, गोमती के संगम पर ब्रिटिश साम्राज्य की थोपी हुई कुली बेगार प्रथा को जड़ से खत्म करने का संकल्प लिया था। तभी से उत्तरायणी का पर्व हर वर्ष संकल्प का एक नया शुभ मुहूर्त लेकर आता है। हर वर्ष बागेश्वर में संगम के तट पर विशाल मेला लगता है। इसमें तमाम राजनीतिक पार्टियों के मंच भी सजते हैं। सभी पार्टियां अपने-अपने एजेंडे तय कर उन्हें पूरा करने का भी संकल्प लेती रही हैं।

             संकल्प के इसी शुभ मुहूर्त पर इस बार उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में एक नये विधानसभा भवन की आधारशिला रखी है। सत्ता पक्ष और उसके समर्थक इसे ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं, तो राज्य में ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो गैरसैंण को पूरी तरह राजधानी देखना चाहते हैं। वे इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के सिद्धांत के सख्त विरोधी हैं। उनकी नाराजगी फूटती रही है कि गैरसैंण किसी के लिए ग्रीष्मकालीन पिकनिक स्पॉट नहीं बनाया जा सकता। इसके साथ ही एक सोच यह भी सामने आ रही है कि गैरसैंण को राजधानी बना देना ही पर्याप्त नहीं है। सरकार सुनिश्चित करे कि पहाड़ के दुर्गम और सीमांत क्षेत्रों में कैसे विकास की किरणें पहुंच पाएंगी।

             उत्तराखण्ड की मांग वास्तव में पहाड़ के विकास के सवाल को लेकर उठी थी। आंदोलनकारी जनता की सोच थी कि नए राज्य में पहाड़ की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही वहां के विकास के अनुकूल योजनाएं बनेंगी। लेकिन आज भी पहाड़ के विकास की योजनाएं मैदानी भागों के हिसाब से बनाई जा रही हैं। संपूर्ण पहाड़ में विकास के नाम पर ऐसी बेतरतीब योजनाएं बन रही हैं जिससे लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। बांध परियोजनाओं के लिए हो रहे विस्फोटों ने पहाड़ों को हिलाकर रख दिया है। नेता तर्क दे रहे हैं कि ये परियोजनाएं रोजगार उपलब्ध करा रही हैं। लेकिन हकीकत यह है कि हर जगह परियोजना कंपनियों की मनमानी के खिलाफ युवा बेरोजगार और इन परियोजनाओं में मामूली वेतन पर कार्यरत युवा आंदोलन को बाध्य होते रहे हैं।

             सवाल यह है कि यदि परियोजनाएं रोजगार दे रही हैं तो राज्य गठन के बाद पलायन की रफ्तार पहले की अपेक्षा तेज क्यों हुई? उत्तराखण्ड के अस्तित्व में आने के बाद लाखों लोगों ने जिस प्रकार पहाड़ छोड़ा उससे स्पष्ट है कि जनता में हताशा और निराशा बढ़ती ही गयी है। आज पहाड़ के हजारों गांव वीरान हो चुके हैं। लाखों मकान इस इंतजार में ध्वस्त हो चुके हैं कि कभी कोई इनमें रहने के लिए लौटेगा।

             पहाड़ से पलायन यूं ही नहीं हुआ है। रोजगार सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा जहां जीवन जीने की बुनियादी सुविधाओं का भयंकर अभाव है। ऊर्जा प्रदेश में लोग अंधेरे में रातें काटने को विवश हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग मामूली बीमारियों से अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं। पहाड़ में अधिकांश महिलाएं द्घरों में ही बच्चों के जन्म देने को विवश हैं। प्रसव वेदना से कराहती कई महिलाएं असमय दम तोड़ देती हैं। सदियों से लोगों ने जिस जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की, उससे भी उनके अधिकार छीन लिये गये हैं। इसके चलते कृषि और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था चरमरा गई और पहाड़ खाली होते गये। शिक्षा जनता की बुनियादी जरूरत है। ६०-७० के दशक में लोगों ने अपनी भावी पीढ़ियों के लिए श्रमदान से जो स्कूल स्थापित किये थे उन्हें सरकार ने अपने हाथ में तो लिया लेकिन इन स्कूलों में अध्यापक नहीं हैं। स्कूली बच्चे आज भी गाड-गदेरों में पुल न होने के कारण बह जाते हैं। ये समस्याएं हैं जिन्हें जड़ से खत्म करने का संकल्प लेने का साहस अब तक की सरकारें नहीं दिखा पाई हैं।

       मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार से भी लोगों की यही उम्मीदें हैं कि वे खाली होते पहाड़ को आबाद रखने का दृढ़ता से संकल्प लें। विधान भवन के शिलान्यास के साथ ही यह संकल्प बेहद जरूरी है। महाभारत काल में कुरुवंश के पितामह भीष्म ने वाणों की शैय्या पर लेटे-लेटे संकल्प लिया था कि जब वह यह देख लेंगे कि उनका हस्तिनापुर सुरक्षित हाथों में है, तभी सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागेंगे। लेकिन उत्तराखण्ड के बुजुर्ग भीष्म जैसे भाग्यशाली नहीं हैं। वे अपने बच्चों की द्घर वापसी की प्रतीक्षा में ही दम तोड़ देते हैं। मृत्यु के समय धर्म इंसान के साथ जाता है। लेकिन वहां के बुजुर्गों के साथ यह मलाल जाता है कि पहाड़ खाली हो रहा है। वे सुकून से मर सकें ऐसा संकल्प लेने का साहस यदि वहां के राजनेता दिखा दें तो निश्चित ही वे सच्चे जनसेवक कहलाने के हकदार बन जाएंगे।

हाथी पर काली

 

नैनीताल लोकसभा सीट के पौने तीन लाख पंजाबी और ढाई लाख दलित वोटों पर बसपा की निगाहें टिकी हुई हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी यहां से पंजाबी समाज के युवा नेता जरनैल सिंह काली को मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है

 

बसपा सुप्रीमो मायावती हाथी को पहाड़ पर चढ़ाने के लिए बेताब रही हैं। हाथी बेशक पहाड़ की ऊंचाई नहीं चढ़ पाया, लेकिन मैदान में उसके दौड़ने की संभावनाएं बराबर बनी हुई हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में हाथी हरिद्वार में हार गया लेकिन नैनीताल में पार्टी के लिए नई संभावनाएं लेकर आया। इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर बसपा नैनीताल पर विशेष ध्यान दे रही है। इसके लिए बाकायदा एक उम्मीदवार भी तलाश लिया गया है।

        बताया जाता है कि पूर्व में साइकिल की सवारी कर चुके तराई के युवा नेता जरनैल सिंह 'काली'को तराई में हाथी का नया महावत बनाया जा रहा है। बहुजन समाज पार्टी काली को आगामी लोकसभा चुनाव में नैनीताल ऊधमसिंहनगर से अपना प्रत्याशी बनाने के पक्ष में है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती से आशीर्वाद मिलते ही काली ने लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने के लिए कमर कस ली है। पूर्व में दो बार गदरपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके जरनैल सिंह पंजाबी समुदाय में काफी लोकप्रिय हैं।

जरनैल सिंह काली ने राजनीति की शुरुआत वर्ष २००५ में जाफरपुर (दिनेशपुर किसान सहकारी समिति के अध्यक्ष पद से की। इस पद पर उन्हें निर्विरोध चुनाव गया। इसके बाद वर्तमान में किच्छा के विधायक राजेश शुक्ला उन्हें समाजवादी पार्टी में ले गए।किच्छा से भाजपा विधायक बनने से पूर्व राजेश शुक्ला समाजवादी पार्टी के नेता थे। शुक्ला पूर्व में नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। तब उन्होंने काली को पार्टी में लाकर उनकी बनिस्पत पंजाबी वोटों पर सेंधमारी करने की कोशिश की थी। जिसमें शुक्ला कामयाब नहीं हो सके थे। हालांकि बाद में जरनैल सिंह भी २००७ का विधानसभा चुनाव साइकिल के चुनाव चिह्न पर ही लड़े थे। गदरपुर विधानसभा सीट पर काली को इस चुनाव में १२००० वोट मिले थे। हालांकि काली यह चुनाव हार गए थे। लेकिन बावजूद इसके समाजवादी पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य बना दिया। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति जमीन न होने के चलते २०१० में काली ने पार्टी को इस्तीफा दे दिया। २००८ में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में काली ने ऊधमसिंहनगर से जिला पंचायत का चुनाव जीता। जिस पंचायत क्षेत्र से काली चुनाव जीते वह कांग्रेस के रुद्रपुर से पूर्व विधायक रहे तिलकराज बेहड़ के विधानसभा क्षेत्र में आता है। तिलकराज बेहड़ ने अपने राजनीतिक कॅरियर और २०१२ के आम विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जरनैल सिंह 'काली' को गदरपुर से कांग्रेस का टिकट दिलाने का सपना दिखाकर पार्टी में शामिल करा लिया। पिछले विधानसभा चुनाव से एक साल पूर्व ही काली ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा खूब जोर पकड़ी थी कि काली को कांग्रेस गदरपुर से अपना प्रत्याशी बनाएगी। यह लगभग तय भी हो चुका था। लेकिन ऐन वक्त पर पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने अपने भतीजे मनीष तिवारी को गदरपुर से विधानसभा का टिकट दिला दिया। जिसके चलते काली का कांगे्रस से टिकट कट गया।

बाद में जरनैल सिंह ने कांग्रेस के बागी उम्मीदवार के रूप में गदरपुर से चुनाव लड़ा। इसका फायदा भाजपा प्रत्याशी अरविंद पाण्डे को मिला और वे चुनाव जीत गए। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मनीष तिवारी को १० हजार २०० वोट मिले जबकि जरनैल सिंह 'काली' २३ हजार वोट पाकर अरविंद पाण्डे से महज ४ हजार वोटों से पीछे रहे। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर कांग्रेस मनीष तिवारी को टिकट न देकर जरनैल सिंह 'काली' को टिकट दे देती तो यह सीट कांग्रेस की झोली में जानी निश्चित थी।

अगर लोकसभा चुनाव के मद्देनजर देखे तो बहुजन समाज पार्टी ने पूर्व में यहां से अपना प्रत्याशी सितारगंज के पूर्व विधायक नारायण पाल को बनाया था। वर्ष २००९ के लोकसभा चुनावों में बसपा प्रत्याशी नारायण पाल को यहां से एक लाख ४५ हजार वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में नारायण पाल सितारगंज से चुनाव हार गए। इसके कुछ दिन बाद ही बसपा ने उन्हें तथा उनके भाई मोहन पाल जो भीमताल सीट से चुनाव लड़े थे, को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निष्कासित कर दिया। पाल बंधु बाद में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के उपचुनाव के दौरान कांग्रेस में शामिल हो गए।

बसपा को इस क्षेत्र से एक मजबूत जनाधार वाले नेता की जरूरत थी। जिसके चलते जरनैल सिंह 'काली' को बसपा में लाया गया। इस बार काली को बसपा में लाने का श्रेय गदरपुर के पूर्व बसपा विधायक प्रेमानंद महाजन को जाता है। महाजन पिछले विधानसभा चुनाव रुद्रपुर से लड़े थे। लेकिन वे भाजपा प्रत्याशी राजकुमार ठुकराल से हार गए। नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट पर बसपा जरनैल सिंह को तुरुप के पत्ते के रूप में खेलेगी। यहां पंजाबी समाज के पौने तीन लाख वोटों के साथ ही करीब ढाई लाख दलित भी हैं। गदरपुर विधानसभा के ही पंजाबी समुदाय के ८० हजार से अधिक वोट हैं। अब देखना यह है कि बसपा के लिए यह पंजाबी कार्ड कितना मुफीद साबित होता है।

 
         
 
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अमर सिंह नाम है उस शख्स का जो कुछ हलकों के शीर्ष पंक्ति पर व्याप्त हैं। आप इन्हें पॉलीटिकल मैनेजर या नेशनल लाइजनर कहकर इनको नापसंदगी के ?ksjss में डाल सकते हैं। लेकिन इनका एक दूसरा

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