fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 26 16-12-2017
 
rktk [kcj  
 
देश-दुनिया 
 
हिंसा में लिपटा देश

दुनिया के अशांत देशों में शुमार सीरिया को अब हिंसा से मुक्ति का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा। वहां लगभग दो सालों में ६० हजार जाने जा चुकी हैं। इस बीच राष्ट्रपति बशर अल असद ने ६ जनवरी को राष्ट्रीय वार्ता की। इसके जरिए देश में छाए संकट का राजनीतिक समाधान करने का प्रस्ताव पेश किया गया। साथ ही संबंधित देशों से सीरियाई विपक्षी दलों को आर्थिक मदद और हथियारों की सप्लाई बंद करने का आग्रह किया गया। 

               दरअसल बशर ने राष्ट्रीय वार्ता के आयोजन से राष्ट्रीय चार्टर बनाने का प्रस्ताव पेश किया। यह इसलिए पेश किया गया ताकि सीरिया में संसदीय चुनाव हो सके और सीरियाई जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार बन सके। जब तक जनप्रतिनिधि की सरकार नहीं बनती तब तक राष्ट्रीय चार्टर का क्रियान्वयन नहीं हो सकेगा। साथ ही इस वार्ता में नया संविधान बनाने की पेशकश भी की गई। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ने अपने सियासी विरोधियों को आड़े हाथों लिया और उन्हें खुदा का दुश्मन और पश्चिम की कठपुतली करार दिया है। ये वो लोग हैं जो सीरिया को टुकड़ों में बांटना और कमजोर करना चाहते हैं लेकिन सीरिया मजबूत है और संप्रभु रहेगा। जो पश्चिम को परेशान करती है। 

               इसके बाद विपक्ष ने असद की अपील ठुकरा दी। विपक्षी गठबंधन के नेता कमाल लाबवानी ने कहा कि हम बार-बार कह चुके हैं कि असद के हटने से कम कुछ भी हमें मंजूर नहीं है। विपक्ष के खारिज करने के बाद अमेरिका ने भी असद के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। यह कारण बताते हुए कि असद के शांति प्रस्ताव को उनके सत्ता में बने रहने की एक कोशिश है। अमरीकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नुलांड ने तो यहां तक कह दिया कि राष्ट्रपति असद के प्रशासन ने सारी वैधता खो दी है और उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। तुर्की समेत ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने भी बशर अल असद को कोरे वायदे करने वाले के अलावा कुछ नहीं कहा। 

               राष्ट्रपति असद ने यह अपील उस समय की जब देश की भद दुनिया में पिटने लगी कि विद्रोह और संघर्ष में सबसे अधिक मारे जाने वालों की संख्या सीरिया में ही है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनुमान लगाया है कि सीरिया में वर्ष २०११ के मार्च में शुरू हुए विद्रोह के बाद ६० हजार से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ले के निर्देश पर सात विभिन्न स्रोतों के आधार पर ये आंकड़े जारी किए गए हैं। नवी पिल्ले का कहना था कि इन स्रोतों के मुताबिक मरने वालों का आंकड़ा साठ हजार को पार कर गया है और ये बेहद चौंकाने वाला है। इससे पहले सीरिया में विद्रोही समूहों ने करीब पैंतालीस हजार लोगों के मरने का अनुमान लगाया था। 

               शरणार्थियों  ने शीघ्र ही देश लौटने के लिए भले ही बशर अल असद ने मुठभेड़ के विभिन्न पक्षों से युद्ध विराम करने की अपील की हो। लेकिन राष्ट्रीय वार्ता में बशर अल असद ने विपक्षी दलों से सलाह मशविरा लेने के लिए मना कर दिया। जबकि विपक्षी दलों को विश्व के प्रमुख देशों ने पूरी राजनीतिक मान्यता बहुत पहले ही दे दी है। अमेरिका ने सीरिया के विपक्षी अलायंस को औपचारिक तौर पर मान्यता दी। ब्रिटेन फ्रांस तुर्की और खाड़ी देशों ने पहले से ही नेशनल कोलिशन फॉर सीरियन रेवोल्यूशनरी एंड ऑपोजिशन फोर्सेस को मान्यता दे दी थी। 

इस बीच बशर अल असद ने अपने वादों में एक ढील दी है कि वे उन विद्रोहियों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं जिन्होंने सीरिया को धोखा नहीं दिया है। इस तरह बशर अल असद देश में बढ़ते खून-खराबे और जन संघर्ष के बीच अपने वादों को तो रखे। लेकिन वे देश के हालात से कितने वाकिफ हैं उनके इस बयान से ही पता चलता है कि विद्रोहियों ने लोगों का गेहूं चुराया है। इससे साफ होता है कि असद देश के कितने हिमायती हैं। कुल मिलाकर वक्त का तकाजा वहां शांति कायम करने का है। यह वहां के शासन के लिए कठिन चुनौती है और कायदे से इसमें विपक्षी दलों को भी दलगत भावना से ऊपर उठकर सरकार की मदद करनी चाहिए।

 


 

सत्ता के लिए धोखा

कहा जाता है कि इतिहास अपने को दोहराता है लेकिन अगर यह इतिहास राजनीति और खासकर संसदीय राजनीति से जुड़ा हो तो इसके दोहराए जाने की आवृत्ति और संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। झारखंड में भारतीय जनता पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच जारी सत्ता की खींचतान को इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भी माना जा सकता है। पिछले एक महीने से चल रही राजनीतिक खींचतान के बाद झामुमो ने सात जनवरी को अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। समर्थन वापसी के बाद मुंडा सरकार अल्पमत में आ गई है। झामुमो ने आठ जनवरी को समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को सौंप दिया। मुंडा सरकार में झामुमो के अलावा एजेएएसयू-जेडीयू भी शामिल हैं। 

               आजादी के बाद से ही भारत ने हालांकि संसदीय पार्टी पॉलिटिक्स को अपनाया लेकिन एक लंबे समय तक कांग्रेस ने संसद में अपना वर्चस्व कायम रखा। नेहरू के जाने के बाद हालांकि इंदिरा ने कांग्रेस को संभालने की भरपूर कोशिश की लेकिन नेहरू के समय से ही पार्टी सिंडिकेट ने अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी थी। इसी सिंडिकेट की बदौलत कांग्रेस विभाजन हुआ। इसके बाद इंदिरा ब्रांड राजनीति ने देश के कई क्षेत्रों में राजनीतिक असंतोष पैदा किया। क्षेत्रीय क्षत्रपों का उदय यहीं से होना शुरू हुआ। इमरजेंसी लागू हुई और इसी ने आज की कई क्षेत्रीय पार्टियों के मुखियाओं को राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाई। इसके बाद मंडल-कमंडल ने इन नेताओं को अपने स्थापित और स्थायी वोट बैंक को हासिल कराने में अहम भूमिका निभाई। काशीराम को दलबदल राजनीति का अग्रदूत माना जाता है और उन्होंने ही संदेश दिया कि राजनीति में कोई नैतिकता नहीं, यहां कोई किसी का सगा नहीं होता। 

               बहरहाल इसी राजनीतिक विचार का विस्तार झारखंड में साफ दिखाई दे रहे हैं। २००९ में राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए जिसके बाद भाजपा और झामुमो की संयुक्त सरकार बनी। कुल ८१ सीटों वाली झारखंड विधानसभा में फिलहाल सत्ता पक्ष के पास ४६ विधायक हैं। जिसमें बीजेपी के १८, जेएमएम के १८, एजेएसयू के ६, जेडीयू के २ और २ निर्दलीय विधायक हैं जबकि विपक्ष में कांग्रेस के १३, जेवीएम के ११, आरजेडी के ५, लेफ्ट के २ और अन्य ४ विधायक हैं। दरअसल सरकार बनाते समय भाजपा और झामुमो के बीच क्रमशः २८-२८ महीने सरकार चलाने का समझौता हुआ था। चूंकि भाजपा के पास विधानसभा में संख्याबल अधिक है तो उसे सरकार चलाने के लिए पहला मौका मिला। भाजपा सरकार की कमान अर्जुन मुंडा ने संभाली और झामुमो की तरफ से हेमंत सोरेन उपमुख्यमंत्री बने। भाजपा के २८ महीने खत्म होने के बाद जब झामुमो ने अर्जुन मुंडा से कुर्सी खाली करने को कहा तो उसे भाजपा ने पहले तो टरकाया और अंत में सीधे मना कर दिया। इसके बाद पूरी उम्मीद जताई जा रही थी कि झामुमो गठबंधन को लेकर कोई बड़ा फैसला ले सकती है। 

               झामुमो कार्य समिति की बैठक के बाद सात जनवरी को सबसे पहले पार्टी विधायक दल के नेता हेमंत सोरेन मीडिया के सामने आए और मुंडा सरकार से सर्मथन वापसी की द्घोषणा की। उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से राज्य में अस्थिरता की स्थिति उत्पत्र हो गई थी और वे उसका पटाक्षेप कर रहे हैं। हम नहीं चाहते कि राज्य में ऐसी स्थिति बनी रहे। हेमंत सोरेन ने कहा कि पिछले ढाई साल से सरकार में हमारी पार्टी उपेक्षित रही है। सरकार में समन्वय का अभाव रहा। इसे लेकर कई बार संदेश दिया गया था, पर इसमें कोताही बरती गई। उन्होंने कहा कि समन्वय के अभाव में पार्टी ने सरकार से सर्मथन वापसी का निर्णय लिया है। इससे पहले मुंडा ने झामुमो के मांग पत्र पर ३ जनवरी को बिंदुवार जवाब दिया था और ऐसे (२८-२८ महीने की सरकार) किसी समझौते से इंकार किया। मुंडा का कहना है कि गठबंधन सहयोगी झामुमो से कोई समझौता नहीं हुआ था। सरकार बनाने के समय इस तरह की कोई बात सामने नहीं आयी थी। मुंडा ने कांग्रेस पर राज्य सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करने का आरोप भी लगाया है।

               गौरतलब है कि ११ सितंबर, २०१० को गठित अर्जुन मुंडा सरकार का २८ महीने का कार्यकाल ११ जनवरी २०१३ को पूरा हो रहा है। समर्थन वापसी के बाद भाजपा ने कहा है कि हम सरकार बचाने की कोशिश नहीं करेंगे। पार्टी चाहती है कि राज्य में फिर से विधानसभा चुनाव हों। इसके बाद संभावना जताई जा रही है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। संभावना यह भी है कि झामुमो कांग्रेस, आरजेडी और अन्य मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करें। कांग्रेस के पास केवल १३ विधायक हैं और झामुमो के उसके पाले में आने के बावजूद भी वह बहुमत से काफी दूर है। २००० में गठन के बाद १२ सालों में आठ सरकारें और दो बार राष्ट्रपति शासन देख चुका झारखंड फिलहाल गठबंधन सरकार में जारी कुर्सी की दौड़ के चलते एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की कगार पर खड़ा दिख रहा है। १० जनवरी को होने वाली कैबिनेट की बैठक में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद ने विधानसभा निलंबित कर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की है। राज्यपाल के मुताबिक मौजूदा हालात में कोई भी राजनीतिक दल सरकार बनाने की हालत में नहीं है। इतिहास जानता है कि मायावती अपने राजनीतिक करियर में एक बार सपा और एक बार भाजपा को ऐसे ही उल्लू बना चुकी हैं। इसके अलावा कर्नाटक के मजबूत नेता बीएस येदियुरप्पा की राजनीतिक यात्रा भी ऐसे ही शुरू हुई थी। फिलहाल तो झारखंड का राजनीतिक भविष्य अधर में ही समर्थन वापसी के बाद वहां राष्ट्रपति शासन के हालात बना रहे हैं।  

 

 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 71%
uk & 15%
 
 
fiNyk vad

दिनेश पंत

न्यायालय के आदेश पर अवैध खनन निरोधक सतर्कता ईकाई का गठन तो हुआ] लेकिन नदियों] जंगलों और गाड-गधेरों को बेतरतीबी से उजाड़ने का सिलसिला कभी रुका नहीं। अकेले

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1947832
ckj