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vad 50 04-06-2017
 
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सिनेमा
 
राजुला का बनावटी प्रेम

उत्तराखण्डी सिनेमा तीन दशक का सफर पूरा कर चुका है। इस दौरान जगवाल, द्घरजवैं, मेद्या आ सहित कई अन्य फिल्में बनीं। लंबे समय बाद एक फिर क्षेत्रीय फिल्म राजुला न सिर्फ सिने पर्दे पर आई बल्कि इसने दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी अपनी जगह बनाई। पिछले दिनों दिल्ली फिल्म महोत्सव में यह फिल्म प्रदर्शित की गई।

              फिल्म की कहानी करीब ७०० वर्ष पुरानी बैराट के राजकुमार मालू और जोहार के व्यापारी सुनपति शौका की बेटी राजुला की प्रेम कहानी पर आधारित है। यह प्रेम कहानी उत्तराखण्ड के कुमाऊं अंचल की लोकगाथाओं में आज भी जीवित है। प्रेम कहानी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोग इस पर मंचित नाटकों को बड़े उत्साह से देखते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे बीएम शाह ने राजुला-मालूशाही पर पहली बार १९८१ में दिल्ली में नाटक प्रस्तुत किया था। इस नाटक में मोहन उप्रेती के संगीत ने धूम मचा दी थी। हाल के दिनों में पर्वतीय कला केंद्र ने भी राजुला- मालूशाही पर नाटक खेले हैं। प्रसून जोशी ने अंग्रेजी में 'राजुला एण्ड वेब ड्रेगन' पुस्तक में पर्वतीय बाला की इस कहानी को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया। द हिन्दू अखबार ने इसे 'पर्वत पुत्री की दास्तान' कहना उचित समझा। पूर्व में सोनोटोन कंपनी से इसी कहानी को आधार बना सामने आई कैसेट भी खूब चली। 

              लोकगाथाओं रंगमंच और किताबों के बाद उत्तराखण्ड लोक में प्रचलित राजुला-मालूशाही प्रेम कहानी को सिने पर्दे पर ले जाने का श्रेय 'हिमाद्री प्रोडक्शन' को जाता है। दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में पिछले दिनों १०५ मिनट की इस फिल्म का प्रदर्शन किया गया। राजुला-मालूशाही की कहानी पर आधारित  इस फिल्म देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। लेकिन यहां आकर उन्हें लगा कि दो समानांतर कहानियों पर फिल्म बनाने की चेष्टा समकालीन समाज की दो पीढ़ियों में मौजूद जातिवाद को तोड़ने का उद्देश्य भी पूरा करती नहीं लगती। फिल्म की कहानी के मुताबिक रवि नामक एक लड़का कुछ वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। उसके माता-पिता की कार दुर्द्घटना में वहीं मृत्यु हो गई और अब वह अपने चाचा के साथ दिल्ली में रह रहा है। रवि 'राजुला-मालूशाही' नाटक देखकर प्रभावित होता है और उस पर रिसर्च करते हुए उत्तराखण्ड जाता है। वहां उसे उसके छोटे मामा के 'जागर' में शामिल होने का निमंत्रण मिलता है। वहां जाकर रवि दुखी होता है कि आज भी उसके बड़े मामा और गांव के अन्य लोग उसके माता-पिता के प्रेम विवाह को लेकर अप्रसन्न हैं। ब्राह्मण परिवार में जन्मी उसकी मां ने राजपूत परिवार के लड़के से प्रेम विवाह किया था। रवि वहां से चला जाता है। और अपनी रिसर्च जारी रखता है। गांवों में जाकर लोगों से 'इंटरव्यू' लेता है। इतिहासकारों से भी बात करता है, अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पूरे पहाड़ में लोगों की राय अलग-अलग है। किसी को नहीं पता कि राजुला के अंत में उन दोनों का विवाह हुआ या फिर वे मारे गए।

              इसी बीच रवि को एनजीओ में काम करने वाली एक लड़की भावना से प्रेम हो जाता है। वह भी उत्तराखण्ड से ही है। कई अवरोधों की जानकारी देते हुए भावना रवि को समझाती है, पर रवि गुस्से में चला जाता है और फिर से रिसर्च में ध्यान देता है। आखिरकार पता चलता है कि भावना भी उससे प्यार करती है। रवि के भीतर दबा प्रेम फिर से उफान भरता है और अतिनाटकीय परिस्थितियों में 'राजुला-मालूशाही' की ही तरह उनका मिलन हो जाता है।

              रवि को अपनी मां की कहानी भी पता चलती है और मामा और गांव के लोग भी रवि का साथ देते हैं। रवि की रिसर्च में उसके नाना की किताब भी साथ देती है। उसे लगता है कि किस तरह उसकी और राजुला की कहानी में समानता है। दिग्दर्शक मनोज चंदोला के अनुसार उत्तराखण्ड की इस अनूठी प्रेम कहानी को देश-दुनिया के सामने रखने और मैदान में पली-बढ़ी पहाड़ की नई पीढ़ी की सहूलियत के लिए फिल्म में कुमाऊंनी के साथ ही हिन्दी भाषा का प्रयोग किया गया है। लेकिन दो समानांतर प्रेम कहानियों को कुमाऊंनी भाषा के साथ हिंदी में चलाने का जो प्रयोग किया गया उसके चलते यह फिल्म न तो पूरी तरह कुमाऊंनी रह पाई और न ही हिंदी की। फिल्म के सबटाइटिल्स अंग्रेजी में दिए गए हैं।

              करन शर्मा असीमा पांडे, हेमंत पांडे, अनिल द्घिल्डियाल, चंद्रा बिष्ट, ममता कर्नाटक, मनोज शर्मा, विष्णु गुरूंग, भावना पंत आदि कलाकारों को लेकर २५ दिनों में फिल्माई गई यह फिल्म नैनीताल से मुनस्यारी तक का भ्रमण तो कराती है, लेकिन कमजोर पटकथा की वजह से दर्शकों को बांध पाने में समर्थ नहीं दिखती। लगता है कि डॉ एसएस पांगती को रिसर्च के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला, अन्यथा लोकेशन का चयन और बेहतर हो सकता था। जोहार द्घाटी के उच्च इलाकों की लोकेशन को ध्यान में रखते हुए वहां शूटिंग के लिए टीम पहुंचती तो सुनपति शौका के जोहार को दर्शाने का ढंग कुछ अलग होता और इससे दर्शकों को भी बांधा जा सकता था। 

              जागर और बैराट आदि की लोकेशन के फिल्मांकन में भी निर्देशन की कमियां झलकती हैं। प्रकाश संयोजन की कमियों की वजह से कुछ जगहों पर कलाकारों के चेहरे धुंधले नजर आते हैं, लगता है कि निर्देशक ने एडिटिंग के समय इस पर गौर नहीं किया। वेशभूषा पर भी शोध की जरूरत थी। इसके अभाव में राजुला- मालूशाही के दृश्य आधुनिक से लगे। संगीत की दृष्टि से भी फिल्म दर्शकों को आनंदित नहीं कर पाती। कर्णप्रिय पहाड़ी संगीत की चिर- परिचित शैली का ही समावेश हो जाता तो लोग उसी से मंत्रगुग्ध रहते।

              अभिनय के स्तर पर मथुरा मामा की भूमिका में अनिल द्घिल्डियाल अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे। अन्य कलाकारों का प्रदर्शन भी अच्छा रहा। राजुला- मालूशाही की भूमिका निभा रहे नये कलाकार भी काफी अच्छा कर गए। रिटेक देकर उनके अभिनय को और बेहतर ढंग से उभारा जा सकता था। संभवतः समय की कमी के चलते निर्देशक नितिन तिवारी ऐसा करने का साहस नहीं दिखा पाए। फ्लैशबैक का टूटा हुआ हिस्सा दिखने से दोनों कहानियां कमजोर पड़ी हैं। पटकथा ने उन्हें सबसे अधिक निराश किया। कुछ दर्शकों की प्रतिक्रिया थी कि समकालीन दोनों प्रेम कहानियां कहीं से उधार ली गई मालूम पड़ती है। कहानी ही नहीं बल्कि फिल्म प्रदर्शन के कार्यक्रम में शामिल कुछ अतिथि भी उधार लिए हुए लगे। मसलन उत्तराखण्ड के महाधिवक्ता उमाकांत उनियाल प्रदर्शन के बाद मीडिया सेंटर में कलाकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में राजुला-मालूशाही पर डॉ हरिसुमन बिष्ट की पुस्तक के विमोचन पर महाधिवक्ता उनियाल ने अंग्रेजी में दिए अपने संबोधन में बड़े दंभ से कहा कि उत्तराखण्ड की संस्कूति के बारे में मुझे मालूम नहीं है। मेरी शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई है। फिर भी मैं फिल्म देखने आया। सीटें भर गई थी। आयोजकों ने मुझे सीट दिलाई। लोगों ने बताया कि यह अच्छी फिल्म है। इसलिए देखने चला आया। उनके इस संबोधन पर वहां मौजूद पर्वतीय लोगों ने बड़े हल्के में लिया। वे हैरान थे कि उत्तराखण्ड में ऐसे लोग उच्च पदों पर आसीन हो जाते हैं जिनके न ही वे राज्य से कोई सरोकार रहे और न तो राज्य के बारे में जानते हैं। बहरहाल कम समय में बनी फिल्म में कमियां रह जानी स्वाभाविक है और महाधिवक्ता उनियाल जैसे अतिथि अपने बयान से पर्वतीय लोगों को झकझोर कर हर कमी पूरी कर गए। इस सबके बावजूद निर्माता- निर्देशक और कलाकारों की टीम इस फिल्म को दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पहुंचाने में कामयाब रही। उनकी इस उपलब्धि पर बधाई।

 
         
 
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