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जनपदों से 
 
बिन डॉक्टरअस्पताल

पिथौरागढ़। जनपद की स्वास्थ्य सुविधा के हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि यहां अस्पताल तो हैं लेकिन उनमें डॉक्टरों की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है। द्घंटाकरण स्थित राजकीय जिला चिकित्सालय हो या गंगोलीहाट स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सभी डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। 

                   गौरतलब है कि २५ मई १९६४ को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने जब द्घंटाकरण के नजदीक स्थित इस जिला चिकित्सालय का शिलान्यास किया था तो क्षेत्र के लोगों में इस बात की उम्मीद बंधी थी कि अब उन्हें  इलाज के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। १७ दिसम्बर १९६७ को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री प्रताप सिंह ने इस जिला चिकित्सालय का उद्द्घाटन किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बद्री दत्त पांडेय के नाम से इस अस्पताल का नामकरण हुआ और लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी प्रारंभ हुईं। इस अस्पताल को डॉक्टरों की कमी का सामना करना पड़ा। नए राज्य बनने के बाद एक बार फिर उम्मीद जगी कि लंबे समय से डाक्टरों की कमी झेल रहे इस अस्पताल के दिन बहुरेंगे। लेकिन राज्य निर्माण के १० साल बाद भी इस अस्पताल की हालत यह है कि डॉक्टरों के २७ पदों के मुकाबले यहां फिलहाल १४ पद रिक्त चल रहे हैं। रिक्त पदों में सीनियर डॉक्टर के ५, नेत्र सृर्जन के २, आर्थोपेडिक सर्जन का १, ईएमओ का १, सीएमओ का १, सिस्टर के २, एनेस्थेटिक्स का १, जीडीएमओ का १ और बाल रोग विशेषज्ञ का १ पद शामिल है। जिला अस्पताल आने वाले रोगियों की संख्या में तो बढ़ोतरी हो रही है लेकिन अधिकांश रोगियों को उचित सुविधाएं न मिल पाने के चलते बाहर रेफर कर दिया जाता है। इस वर्ष अक्टूबर २०१२ तक यहां ८१५७६ ओपीडी हुई तो ७६३० रोगी भर्ती हुए। वहीं उचित इलाज के अभाव में २५४ लोगों की मौत हो गई। १२० बिस्तरों वाले इस अस्पताल की हालत गर्मियों में और खराब हो जाती है, जबकि वित्तीय वर्ष २०११-१२ में जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं पर करीब २ करोड़ बीस लाख रुपये खर्च हुए। 

कुछ ऐसा ही हाल जिला मुख्यालय स्थित हरगोविन्द पंत महिला अस्पताल का भी है। यहां कुल सृजित पद ८ हैं लेकिन इसमें ३ पद रिक्त चल रहे हैं। जिसके चलते गर्भवती महिलाओं को खासी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस अस्पताल में वर्ष २०११-१२ में ४ महिलाओं की मौत हुई तो १८ शिशु मौत के आगोश में समा गए। जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की जनसंख्या ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद यहां अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कमी बनी हुई है। जनपद  में महिला चिकित्सकों के २१ पद स्वीकृत हैं जबकि ९ महिला डॉक्टर ही उपलब्ध हैं।

                   जनपद में १८ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और ४ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं। सभी स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों की भारी कमी झेल रहे हैं। यही हाल १५६ सब सेंटरों यानि एएनएम सेन्टर का भी है। इनमें से ७७ भवन किराए में चल रहे हैं। एएनएम के १८१ पद रेग्युलर हैं तो २८ पद कांट्रेक्ट पर चल रहे हैं। पूरे जनपद में चिकित्सकों के १५९ पद स्वीकृत हैं जबकि ५९ में तैनाती है और १०० पद खाली पड़े हैं। जनपद के सुदूरवर्ती विकासखंडों धारचूला, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेरीनाग, कनालीछीना स्थित सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी बदहाल चल रहे हैं। मुनस्यारी और धारचूला में तो लंबे समय से बेहतर स्वास्थ्य को लेकर जनता आंदोलित होती रही है। यहां चिकित्सकों के २० स्वीकृत पदों के सापेक्ष छह ही चिकित्सक हैं। करोड़ों रुपयों की लागत से बने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दम तोड़ रहे हैं। यही हालत वर्ष १९९५ में स्थापित गंगोलीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की भी है। इसमें सर्जन, फिजीशियन, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ सहित डाक्टरों के ९ पद सृजित हैं। लेकिन फिलहाल मात्र दो डॉक्टरों के भरोसे यह अस्पताल चल रहा है। अस्पताल में सर्जन, ऑर्थोपेडिक, शिशु रोग विशेषज्ञ सहित कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। वर्ष २००५ में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री तिलक राज बेहड़ ने इस अस्पताल की नई इमारत का शुभारंभ किया था। उसी समय यहां पर अल्ट्रासांउड की मशीन लगाई गई थी, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट के न होने के चलते यह तब से ही बेकार पड़ी है। यहां महिला मेडिकल ऑफिसर भी नहीं है। महिला डॉक्टर न होने से गर्भवती महिलाओं को खासी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। गंगोलीहाट के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ कुंदन कुमार कहते हैं कि चिकित्सकों की कमी के चलते हमारे ऊपर काफी दबाव रहता है। यहां एक्सरे और पैथोलॉजी की व्यवस्था तो ठीक है लेकिन रेडियोलॉजिस्ट न होने की वजह से अल्ट्रासाउंड मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।

                   विधायक गंगोलीहाट नारायण राम आर्य कहते हैं कि हमने यह मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में डाला है। शीद्घ्र ही डाक्टरों की कमी पूरी कर ली जाएगी। सीएमओ डॉ जेएस पांगती भी लचर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए डॉक्टरों की कमी को बड़ी वजह मानते हैं। पांगती कहते हैं कि रिक्त पदों को भरने का प्रस्ताव स्वास्थ्य विभाग की ओर से शासन को भेजा गया है। उधर दूरस्थ क्षेत्रों में काम कर रहे कई डॉक्टरों का कहना है कि चौबीस द्घंटे सेवा के चलते उन्हें छुट्टी नहीं मिल पाती है। दुर्गम भत्ता भी मात्र २००० रुपये ही मिलता है। जानकारों का कहना है कि विषम परिस्थितियों में अपने परिवार से अलग रात-दिन मरीजों की सेवा कर रहे डॉक्टरों का मनोबल बढ़ाने के प्रयास सरकारी स्तर पर नहीं हो रहे हैं। कुल मिलाकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जो स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित किए गए हैं वे खुद ही बीमार चल रहे हैं।

 


ठगा जाता पौड़ी

पौड़ी गढ़वाल। पौड़ी के गांव उत्तराखण्ड के सबसे प्राचीन पहाड़ी गांवों में से हैं। लेकिन शहरीकरण और पलायन के चलते आज इन गांवों का र्अस्तित्व खतरे में है। २०११ की जनसंख्या के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो यही बात निकलकर सामने आती है।    

                   गौरतलब है कि पौड़ी हमेशा से ही श्रीनगर और कोटद्वार के  बीच एक मुख्य पड़ाव रहा है। १८१५ से १८३९ तक पौड़ी कुमाऊं  कमिश्नरी से जुड़ गया और १९३९ में पृथक जिला द्घोषित कर दिया गया। और १९६९ में पौड़ी को गढ़वाल कमिश्नरी का मुख्यालय बनाया गया। वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी ६९७०७८ थी। तब ६०७२०३ लोग गावों और ८९८७५ लोग शहरों में रहते थे। लेकिन वर्ष २०११ की जनगणना में जिले की अंतिम जनसंख्या ६८६५२७ है। जो वर्ष २००१ की अपेक्षा १०५५१ कम है। एक दशक पहले जिले में ६०७२०३ लोग गावों में निवास कर रहे थे। लेकिन अब ५७३८४७ लोग ही गांवों में रह रहे है। एक दशक पहले नगरीय क्षेत्रों में ८९८७५ निवास करते थे लेकिन अब यह संख्या बढ़कर ११२६८६ हो गयी है। शहरीकरण की दौड़ में नगरों के समीपवर्ती गावं धीरे-धीरे नगर का रूप लेकर अपनी ग्रामीण संस्कृति को समाप्त कर रहे हैं। अब तक कई गांव  जैसे प्रेमनगर, च्वींचा, बैज्वाडी,पौड़ीगावं, काडई रांई समेत अन्य गांव शामिल हैं। २००५ से अब तक की स्थिति पर नजर डालें तो अब तक इन सभी गांवों को मिलाकर २०० हेक्टयर भूमि की बिक्री भवन निर्माण के लिए हो चुकी है। साथ ही पौड़ी के आस-पास बुआखाल, मांडाखाल, खांड्यूसैण तक पौड़ी की आबादी बढ़ती जा रही है साथ ही जमीन की बिक्री जारी है। इसी के चलते पौड़ी के समीपवर्ती गांवों की कूषि भूमि धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।

                   पौड़ी यहां से नजर आने वाली हिमालय की पर्वत  श्रृंखलाओं के साथ ही आसपास के द्घने जंगलों की हरियाली के लिए मशहूर हुआ करता था। लेकिन आज पौड़ी में बहुमंजिला भवन निर्मित हो चुके हैं, साथ ही निर्माणाधीन हैं। वर्ष १९९१ और १९९८ के भूकंप के बाद निर्माण को लेकर निश्चित कायदे कानून निर्धारित किये गये और पहाड़ में इसे सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए। शासनादेश के अनुसार यहां भवन की ऊचांई मात्र आठ मीटर तय की गयी है लेकिन निजी भवनों को छोड़ दिया जाए तो सरकारी भवनों को भी १५ से १६ मीटर की ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया है। 

                   वर्ष २००४-०५ में काग्रेस सरकार द्वारा स्वीकृत करायी गयी करीब पांच करोड़ लागत वाली पौड़ी-खिर्सू-लैंसडॉन पर्यटन सर्किट महायोजना से जुड़ी कई योजनाएं अभी तक आधी-अधूरी पड़ी हैं। मंडल मुख्यालय में साहसिक पर्यटन पैराग्लाइडिंग, रॉक क्लाइंबिंग, जंगल कैपिंग, ट्रैकिंग आदि की संभावनायें भी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रही हैं। पर्यटन विभाग में कर्मचारियों के आधे पद रिक्त पडे़ हैं। पिछले कई वर्षों से निर्माणाधीन बस अड्डे का अभी तक निर्माण नहीं हो पाया है। एशिया के सबसे उच्च स्थलीय स्टेडियमों में शुमार रांसी स्टेडियम का निर्माण कार्य अधर में लटका है। पौड़ी में पेयजल आपूर्ति के लिए करोड़ों की लागत से बनायी गयी नानद्घाट योजना का पानी भी सुचारु रुप से शहर तक नहीं आ पा रहा है। विकास इस जिले से जुडे़ तीन-तीन मुख्यमंत्रियों के होने के बावजूद यहां की समस्याएं जस की तस हैं। 

                   स्थानीय निवासी उमा चरण बडत्वाल के मुताबिक पौड़ी को १९६९ में गढ़वाल कमिश्नरी का मुख्यालय बनाया गया था। तब यहां पर सभी मूलभूत सुविधाएं थीं। लेकिन आज गढ़वाल कमिश्नरी पौड़ी, उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहा के लोग अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। उधर लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी का कहना है कि इन १२ सालों में पौड़ी ने उत्तराखण्ड को तीन-तीन मुख्यमंत्री दिये हैं। बावजूद इसके पौड़ी काफी उपेक्षित जिला है। यहां पर सरकार की तरफ से किये गये कार्य आधे अधूरे हैं। कोई भी कार्य पूरा नहीं हुआ है। पौड़ी विधायक सुन्दर लाल मन्द्रवाल का कहना है कि पौड़ी का विकास मेरी प्रथमिकता रही है। कूषि निदेशालय पौड़ी में ही बनेगा और बस अड्डे का निर्माण कार्य इसी वर्ष पूरा किया जायेगा। 

 


उपेक्षा का शिकार गंगोत्री

 

उत्तरकाशी। पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील गंगोत्री क्षेत्र को सरकार ने दो दशक पूर्व नेशनल पार्क तो द्घोषित कर दिया लेकिन इसके बावजूद पार्क प्रशासन आज भी कर्मियों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में पार्क प्रशासन वन प्रभाग से उधार लिए जाने वाले कर्मियों के सहारे चल रहा है।

                   गंगोत्री क्षेत्र को वर्ष १९८९ में नेशनल पार्क द्घोषित किया था। २३९.०२ वर्ग किमी क्षेत्रफल के गंगोत्री नेशनल पार्क का कार्य शुरुआत से ही उत्तरकाशी वन प्रभाग के जिम्मे रहा। राज्य बनने के बाद पार्क क्षेत्र में वार्डन तथा कुछ अन्य कर्मचारियों की तैनाती तो की गई, लेकिन यह भी नाकाफी साबित हुई। सीजन में कांवड़ और गंगोत्री गोमुख यात्रा की चुनौती से निपटने के साथ ही पर्वतारोही और ट्रैकिंग दलों को परमिट जारी करने, कोर जोन में अवांछित मानवीय गतिविधियां रोकने तथा अन्य कार्यों के लिए पचास से अधिक कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। इनके लिए पार्क प्रशासन को हर बार उत्तरकाशी और गंगोत्री वन प्रभाग पर निर्भर होना पड़ता है।  जहां तक वन संपदा के संरक्षण का सवाल है तो पार्क प्रशासन केवल चेतावनी बोर्ड लगाने तक ही सीमित है। हालांकि कुछ वर्ष पूर्व गंगोत्री नेशनल पार्क के विभिन्न पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी लेकिन स्थानीय लोगों की उपेक्षा का आरोप लगने के बाद यह प्रक्रिया भी लंबित पड़ी है। पार्क प्रशासन के कार्यों को सुचारू करने के लिए इस समय ३४ फॉरेस्ट गार्ड, १० फॉरेस्टर और तीन रेंजरों की जरूरत है। 

 
         
 
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