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आवरण कथा ४
 
देवभूमि में भी दरिंदे

देवभूमि में दरिंदे निरंतर बलात्कार और हत्या की वारदातों को अंजाम देकर मानवता को शर्मसार करते आ रहे हैं। राज्य की मित्र पुलिस उनसे निपटने में नाकाम है। पीड़ित न्याय के लिए नेताओं के चक्कर काटने को मजबूर हैं। लेकिन लगता है कि उनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं

 

   देवभूमि उत्तराखण्ड में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली में हुई दरिंदगी ने देश को शर्मसार किया है। देवभूमि में भी ऐसे दानवों की कमी नहीं है, जो महिलाओं की इज्जत आबरू से खेलने और उन्हें मौत के द्घाट उतारने में लगे हुए हैं। प्रदेश की मित्र पुलिस महिलाओं की सुरक्षा करने और दरिंदों को पकड़ने में बेहद नाकारा साबित हुई है। जनाक्रोश भड़कने पर खाकी वर्दी ऐसे मामलों में किसी को भी बलि का बकरा बनाकर पल्ला झाड़ लेती है। पीड़ित परिवार न्याय के लिए वर्षों से भटक रहे हैं। लेकिन राजनेताओं की संवेदनहीनता बरकरार है।

   हल्द्वानी स्थित जेटकिंग इंस्टीट्यूट की काउंसलर २४ वर्षीया प्रीति शर्मा की १९ नवंबर २००८ को उस समय नृशंस हत्या कर दी गई, जब वह इंस्टीट्यूट से द्घर लौट रही थी। उसकी मोतीनगर में गन्ने के एक खेत में २० नवंबर की सुबह अर्द्धनग्न हालत में क्षत-विक्षत लाश मिली थी। हत्यारों ने प्रीति के ही पर्स की बेल्ट से उसका गला दबाकर हत्या करने के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं। 

   इस हत्याकांड में पुलिस ने शुरू के पांच दिनों में क्षेत्र के ही चार युवकों पर अपना शिकंजा कसा। इसके बाद २८ नवंबर को जब पुलिस ने इस कांड का खुलासा किया तो स्थानीय लोग अचंभित रह गये। पुलिस ने बुकलिया गांव निवासी भास्कर जोशी नामक एक युवक को प्रीति का हत्यारा साबित कर इस कांड का एकमात्र हत्याभियुक्त बना दिया। पुलिस के इस खुलासे को न तो क्षेत्रवासी मानने को तैयार हुए और न ही प्रीति के परिजन। स्थानीय जनता ने पुलिस पर असली हत्यारों को बचाने का आरोप लगाया और इस प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग को लेकर सड़क पर उतर गई। 

   पुलिस के नकारात्मक रवैये के बाद इस मामले में व्यापक आंदोलन हुआ और दो दिसंबर २००८ को हल्द्वानी बंद रहा। इसके बाद १९ दिसंबर को जन दबाव में आकर तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने सीबीआई जांच की संस्तुति कर दी और केन्द्र सरकार से इसकी मांग की लेकिन केंद्र ने इस मामले के हाई प्रोफाइल न होने की बात कहकर सीबीआई जांच कराने से इंकार कर दिया। सीबीआई ने भी इस मामले को हाथ में लेने में कतई रुचि नहीं दिखाई। मृतक प्रीति के पिता हेमराज शर्मा बताते हैं कि वे १४ फरवरी २००९ को इस बाबत केंद्रीय मंत्री हरीश रावत और केसी सिंह बाबा के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज सिंह चौहान से मिले थे। लेकिन न्याय की कोई उम्मीद न लगने पर मजबूरन उन्होंने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका लगाई। उस पर भी सरकार बहस कराने से बच रही है। प्रदेश सरकार की ओर से पुलिस कह रही है कि उसने चार्जशीट दाखिल कर दी है और सीबीआई कह रही है कि जब तक केन्द्र सरकार से कोई आदेश नहीं मिलेगा वह केस को टेक ओवर नहीं कर सकती, यह ऐसा राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं है कि इसे वह अपने हाथ में ले। मामला कोर्ट में है तारीख पर तारीख लग रही है।

   हेमराज शर्मा कहते हैं कि वे ही नहीं, बल्कि इलाके के बहुत सारे लोग जानते हैं कि असली अपराधी कौन हैं। लेकिन वर्तमान कांग्रेस सरकार के एक मंत्री और राज्य की पूर्व भाजपा सरकार में मंत्री रह चुके एक नेता का संरक्षण होने के कारण मुख्य आरोपी खुले द्घूम रहे हैं। प्रीति की हत्या के पांचवें दिन ही एसटीएफ के लोगों ने उनसे कहा था कि उन्होंने अपराध का खुलासा कर दिया है। अपराधी चार हैं, जिनमें एक उनका इतना नजदीकी रिश्तेदार है कि जब वे उसका नाम जाहिर करेंगे तो वे भौंचक्के रह जायेंगे। लेकिन दो दिन बाद ही एसटीएफ ने भास्कर जोशी को मुजरिम बताते हुए पूरी कहानी बदल दी।

   एक दूसरी द्घटना ४ अक्टूबर २००९ की है। रहस्मय परिस्थितियों में मृत पाई गई ऊधमसिंह नगर जनपद की मीना की मौत की आज तक निष्पक्ष जांच नहीं हो पाई है। पिछले तीन साल से मीना की सहपाठी रजनी और ज्योति न्याय के लिए दर-दर भटक रही हैं। उन्होंने पहले काशीपुर के एसडीएम कोर्ट के सामने धरना दिया। लेकिन जब वहां से भी बात नहीं बनी तो मजबूरन उन्हें देहरादून के गांधी पार्क में आमरण अनशन पर बैठना पड़ा। १७ जुलाई २०१० को १० दिन बाद प्रदेश की राज्यपाल मार्गेट अल्वा के निष्पक्ष जांच के आश्वासन के बाद उन्होंने अनशन समाप्त कर दिया। लेकिन राज्यपाल के आश्वासन के ढाई साल बाद भी जांच शुरू नहीं हो पाई है।

   उन्नीस वर्षीया मीना गोला उर्फ कूतिका प्रतिभाशाली छात्रा थी। वह काशीपुर शहर में रहकर अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरा करके आत्मनिर्भर बनना चाहती थी। लेकिन बेतवाला गांव निवासी उसके परिजनों को यह पसंद नहीं था और वे उसकी जबरन शादी कराना चाहते थे। मीना की पढ़ाई बंद करा दी गई और उसके परिजन उसे काशीपुर से गांव ले गए। जहां उसकी ४ अक्टूबर २००९ को रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। परिजनों ने पुलिस के आने से पहले ही न केवल सारे सबूत नष्ट कर दिए, बल्कि पोस्टमार्टम भी नहीं कराया। पोस्टमार्टम में यह खुलासा हो जाता कि मीना की मौत कैसे हुई। बताया जाता है कि गला द्घोटने के बाद फांसी पर लटका दिखाकर आत्महत्या का रूप दे दिया गया था। मीना के माता और पिता के अलग-अलग बयान यह बताने के लिए काफी हैं कि उसकी मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि नियोजित तरीके से उसे मारा गया था।

   पछास की कार्यकर्ता एवं महिला उत्पीड़न विरोधी संयुक्त मोर्चा की संयोजक रजनी जोशी के अनुसार मीना गोला के साथ उसके द्घर वाले पूर्व में लगातार मारपीट करते रहते थे। एक अनपढ़ युवक के साथ जबरन उसकी शादी कराना चाहते थे। लेकिन वह शादी करने के बजाय आत्मनिर्भर बनने और महिलाओं के उत्थान के लिए भी कुछ करना चाहती थी।

   चार अक्टूबर २००९ की दोपहर दो बजे कुंडा थाने में रजनी जोशी ने एक लिखित तहरीर दी। जिसमें मीना की हत्या की आशंका जताते हुए उसके परिजनों पर मामला दर्ज करने की मांग की। लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करना तो दूर तहरीर तक रिसीव करने से इंकार कर दिया। इसके बाद १४ दिसंबर को रुद्रपुर में जिलाधिकारी कार्यालय का द्घेराव किया गया। २४ अक्टूबर को उत्तराखण्ड के तत्कालीन डीजीपी सुभाष जोशी और महिला आयोग के हस्तक्षेप से मीना के परिजनों के खिलाफ आत्महत्या के लिए बाध्य करने और साक्ष्य मिटाने का मामला दर्ज किया गया। लेकिन आज तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया।

   देहरादून स्थित पीजी (डीएवी कॉलेज में बी कॉम की छात्रा अंशु नौटियाल की वर्ष २००९ में हुई हत्या का मामला लोग अभी तक नहीं भूले हैं। अंशु नौटियाल की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। जिसके चलते वह अपनी पढ़ाई का जिम्मा खुद उठाने के लिए एक पीसीओ पर भी काम करती थी। पढ़ाई के साथ ही पहले वह नौकरी करती और उसके बाद कंप्यूटर कोर्स करने जाती थी। यही उसकी दिनचर्या थी। लेकिन २३ मई २००९ को २१ वर्षीय अंशु द्घर नहीं पहुंची। उसके दो दिन बाद २५ मई २००९ को देहरादून को जिलाधिकारी निवास के बाहर एक बोरे में बंद उसकी क्षत-विक्षत लाश मिली। इस हत्याकांड से पूरा देहरादून दहल उठा। लोग सड़कों पर उतर आए। दो महीने तक चले लंबे आंदोलन के बाद परिजनों की मांग पर सरकार ने इस मामले की सीबीसीआईडी से जांच कराने के आदेश दिए। बाद में पुलिस ने इस मामले में एक दुकान के सेल्समैन प्रवीण चावला को हत्यारोपी बताकर गिरफ्तार किया। पुलिस के दावे के अनुसार प्रवीण का युवती से प्रेम प्रसंग चल रहा था। उसके पिता को फंसाने के लिए ही उसने अंशु की हत्या कर दी। लेकिन पुलिस की यह कहानी अदालत में नहीं टिक सकी। आरोपी युवक को कुछ दिन पूर्व ही अदालत ने बरी कर दिया। सवाल यह है कि अंशु की हत्या प्रवीण ने नहीं की तो फिर किसने की? अंशु हत्याकांड को लेकर डीएवी कॉलेज के पूर्व छात्रसंद्घ अध्यक्ष पंकज क्षेत्री अभी भी आंदोलन चला रहे हैं।

   रानीखेत के बग्वाली पोखर के नजदीक गांव पट्टी केलारो (बिन्ता) की निवासी कविता बिष्ट को क्या पता था कि जिस खोड़ा कॉलोनी में रहकर वह नोएडा की फैक्टरी में नौकरी करके अपने परिवार को आगे बढ़ा रही हैं वहां उसी के शहर अल्मोड़ा का एक आवारा किस्म का लड़का उसकी जिंदगी में तेजाब का जहर द्घोल देगा। यह लड़का कविता से अनैतिक संबंध बनाना चाहता था जिसका वह विरोध करती थी।

   २ फरवरी २००८ की वह सुबह कविता अभी तक नहीं भूली है जब प्रातः सवा ५ बजे 'कविता पैलेस' के गेट के पास कविता सरस्वती विहार (खोड़ा कॉलोनी) में ड्यूटी पर जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थी। उसी वक्त जगदीश अपने एक दोस्त के साथ मोटर साइकिल पर आया। उसने एक द्घी के डिब्बे में तेजाब ले रखा था। आते ही उसने कविता के मुंह पर तेजाब फेंक दिया। कविता की चीख निकल गई। उसको तड़पता देख उसकी कंपनी की दोस्त ने लोगों की मदद लेकर उसे जिला चिकित्सालय निठारी में पहुंचाया। कविता की चीख निकल रही थी। गेट पर जाते ही डॉक्टरों ने उसे एडमिट करने से मना कर दिया। कविता की फैक्ट्री वाले उसे नोएडा के कई अस्पतालों में ले गए। लेकिन उसकी गंभीर हालत देखकर किसी ने भी उसे एडमिट नहीं किया। आखिर में दिल्ली स्थित सफदरंज अस्पताल के आईसीयू में उसे भर्ती कराया गया। जहां जाते ही वह बेहोश हो गई। ६ दिन बाद उसे होश आया। १५ दिन सफदरजंग अस्पताल में रखने के बाद उसे एम्स में ट्रांसफर कर दिया गया। दो माह एम्स में इलाज कराने के बाद किरण की जान तो बच गई लेकिन उसकी आंखों की रोशनी जाती रही। इसके बाद उसे दिल्ली के ही राजेन्द्र प्रसाद नेत्र चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया। जहां चिकित्सक ने कहा कि पहले नाक की सर्जरी कराओ। नाक की पूरी त्वचा जल चुकी थी। उसकी हड्डी दिख रही थी। इसके बाद कविता को नोएडा स्थित कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उसकी नाक का ऑपरेशन हुआ। कई महीनों तक चेहरे पर पट्टी बंधने से उसकी दोनों आंखों की पलकें इस कदर चिपक गईं कि काफी प्रयासों के बाद भी वे नहीं खुली। अब उसे लोगों की परछाई दिखाई देती है। आंखों में अश्रुधारा बहती है। उसका कुछ कान पहले से ही तेजाब से जल चुका था बाकी बाद में इलाज के दौरान डॉक्टरों ने काट दिया। कैलाश अस्पताल में इलाज के दौरान उनका करीब सवा लाख रुपया खर्च हो गया। जबकि दिल्ली स्थित गंगाराम अस्पताल में चेहरे की सर्जरी के लिए २ लाख २० हजार का खर्चा बताया गया। उधर कई दिनों बाद कविता के पिता ने सेक्टर-५८ थाने में जगदीश और उसके दोस्त के खिलाफ रिपोर्ट तो करा दी, लेकिन मामले की ठीक पैरवी न कर सके। इसका फायदा आरोपियों को मिला और उन्हें थाने से ही छोड़ दिया गया।

लालकुआं का संजना हत्याकांड पांच माह पूर्व हुआ। इन पांच महीनों में पुलिस ४६ डीएनए टेस्ट और पांच दर्जन से अधिक संदिग्धों से पूछताछ कर चुकी है, पर उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा है। १० जुलाई २०१२ की रात लालकुआं कोतवाली के अंतर्गत बिन्दुखत्ता क्षेत्र के तिवारी नगर में इंसानियत को शर्मसार करने वाली वारदात सामने आई। उस रात आठ साल की संजना के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई। वह रात को अपनी दादी के साथ सोई थी। आधी रात को रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गई। परिजनों को उसका शव द्घर से मात्र ढाई सौ मीटर की दूरी पर एक खेत में पड़ा मिला। मौके पर पहुंची पुलिस टीम और डॉग स्क्वायड ने दो दिन में संजना के हत्यारों को पकड़ने की द्घोषणा की। लेकिन लगभग छह महीने बीत जाने के बावजूद कातिलों का पता नहीं चल सका है। 

 
         
 
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  • दिनेश पंत

प्रचंड जन आंदोलन और शहादत के बावजूद सरकार शराब के राजस्व का मोह नहीं छोड़ पाई है

प्रदेश में एक तरफ शराब विरोधी आंदोलन चल रहे हैं। मातृ

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